Gen Z Voters India: केवल महिलाएं ही नहीं जेन-Z भी होंगे निर्णायक

Gen Z Voters India: भारत में महिला मतदाता और जेन ज़ी आने वाले चुनावों में निर्णायक राजनीतिक वर्ग बनते जा रहे हैं। लाड़ली बहना, लाडकी बहिन, महतारी वंदन, सुभद्रा और ओरुनोदोई जैसी योजनाओं के जरिए महिला वोट को साधने की कोशिश के बीच अब करोड़ों जेन ज़ी युवा भी चुनावी राजनीति का नया केंद्र बन रहे हैं।

Yogesh Mishra
Published on: 30 Aug 2026 6:54 PM IST
Women Voters and Gen Z How BJP Is Building Its Election Strategy
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Women Voters and Gen Z How BJP Is Building Its Election Strategy 

Gen Z Voters India: भारत में महिलाओं, महिला मतदाताओं और नई पीढ़ी—विशेषकर जेन ज़ी—की संख्या को यदि चुनावी दृष्टि से साथ रखकर देखा जाए, तो एक बहुत बड़ा राजनीतिक परिवर्तन दिखाई देता है। पिछले लगभग दस वर्षों में महिला मतदाता केवल ‘कल्याण योजनाओं की लाभार्थी’ नहीं रही हैं। बल्कि कई राज्यों में वे अलग चुनावी वर्ग के रूप में उभरी हैं। मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना, महाराष्ट्र की लाडकी बहिन, छत्तीसगढ़ की महतारी वंदन, असम की ओरुनोदोई और ओडिशा की सुभद्रा जैसी योजनाएँ इसी बदलाव का सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं।

पहले संख्या समझिए। संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या अनुमानों पर आधारित 2026 के आँकड़ों के अनुसार भारत की कुल आबादी लगभग 147.66 करोड़ है। इसमें महिलाओं की संख्या लगभग 71.55 करोड़ और पुरुषों की संख्या लगभग 76.11 करोड़ आंकी गई है। अर्थात महिलाओं का हिस्सा करीब 48.46 प्रतिशत है। विश्व बैंक के नवीन उपलब्ध आँकड़े भी भारत की महिला आबादी का अनुपात लगभग 48.4 प्रतिशत बताते हैं।

लेकिन चुनावी राजनीति के लिए इससे अधिक महत्वपूर्ण संख्या महिला मतदाताओं की है। निर्वाचन आयोग के 2024 लोकसभा चुनाव के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार देश में कुल 97,97,51,847 पंजीकृत मतदाता थे, जिनमें 47,63,11,240 महिला मतदाता थीं। यानी लगभग 47.63 करोड़। कुल मतदाताओं में महिलाओं का हिस्सा 48.62 प्रतिशत था। 2019 में महिला मतदाता 43.85 करोड़ थीं; पाँच वर्ष में उनमें लगभग 3.78 करोड़ की वृद्धि, यानी 8.61 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। प्रति 1,000 पुरुष मतदाताओं पर महिला मतदाताओं की संख्या भी बढ़कर 946 हो गई।

इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि महिलाएँ केवल मतदाता सूची में बढ़ नहीं रही हैं। बल्कि मतदान में भी बहुत सक्रिय हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में करीब 64.64 करोड़ वोट पड़े। कई राज्यों में महिला मतदान दर पुरुषों के बराबर या उनसे अधिक रही। यही वह बदलाव है जिसने राजनीतिक दलों को महिलाओं को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता देने वाली योजनाओं की ओर तेजी से धकेला है।

भाजपा और महिला मतदाता : सबसे महत्वपूर्ण राज्य

मध्य प्रदेश इस राजनीति की सबसे सफल प्रयोगशाला है। शिवराज सिंह चौहान सरकार ने जनवरी 2023 में मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना घोषित की। शुरुआत में पात्र महिलाओं को ₹1,000 प्रतिमाह दिया गया, फिर इसे ₹1,250 और बाद में ₹1,500 किया गया। वर्तमान व्यवस्था में करीब 1.25 करोड़ महिलाएँ पंजीकृत हैं। 2023-24 में इस योजना पर लगभग ₹14,734 करोड़ खर्च हुए थे; 2025-26 में ₹18,669 करोड़ का प्रावधान था और 2026-27 के बजट में इसे बढ़ाकर ₹23,883 करोड़ कर दिया गया है।

इस योजना और भाजपा की 2023 की विजय का संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण है। भाजपा ने 230 में से 163 सीटें जीतीं, जबकि 2018 में उसे 109 सीटें मिली थीं। लोकनीति-CSDS के चुनाव बाद सर्वे में लगभग 80.4 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उनके परिवार की कोई महिला लाड़ली बहना योजना से लाभान्वित हुई थी। यही कारण है कि मध्य प्रदेश में भाजपा की विजय के विश्लेषण में लाड़ली बहना को एक बड़े कारक के रूप में देखा गया। हालांकि किसी एक योजना को पूरी जीत का कारण मानना ठीक नहीं होगा—मोदी की लोकप्रियता, शिवराज सिंह का व्यक्तिगत महिला आधार, संगठन, आदिवासी क्षेत्रों में वापसी और कांग्रेस की कमजोरियाँ भी महत्वपूर्ण थीं।

मध्य प्रदेश में महिला मतों के बारे में विभिन्न चुनाव-बाद सर्वे कुछ अंतर दिखाते हैं, लेकिन मोटे तौर पर भाजपा को लगभग आधी महिला मतदाता आबादी का समर्थन मिलने का अनुमान लगाया गया। इसलिए मध्य प्रदेश का राजनीतिक निष्कर्ष यह है कि महिला नकद हस्तांतरण ने पहले से मौजूद भाजपा समर्थक महिला आधार को और मजबूत किया।

महाराष्ट्र में इसका और भी नाटकीय उदाहरण 2024 में दिखाई दिया। महायुति सरकार ने लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना लागू की। महिलाओं को ₹1,500 प्रतिमाह देने की व्यवस्था की गई। महाराष्ट्र सरकार के बजट दस्तावेज के अनुसार लगभग 2.53 करोड़ महिलाओं तक इसका लाभ पहुँचा और मार्च 2025 तक इस पर लगभग ₹33,232 करोड़ खर्च किया जा चुका था। 2025-26 के लिए अकेले इस योजना पर ₹36,000 करोड़ का प्रावधान किया गया।

नवंबर 2024 के विधानसभा चुनाव में महायुति ने असाधारण सफलता हासिल की। भाजपा और उसके सहयोगियों ने मिलकर 288 में 230 सीटें जीतीं। Axis My India के मतदानोत्तर अनुमान में महायुति को 50 प्रतिशत महिला वोट, जबकि महाविकास अघाड़ी को लगभग 36 प्रतिशत महिला वोट मिलने का अनुमान था। पुरुषों में महायुति का समर्थन लगभग 46 प्रतिशत था। अर्थात अनुमान के अनुसार महिलाओं में महायुति को पुरुषों की तुलना में करीब चार प्रतिशत अंक अधिक समर्थन मिला।

इसलिए महाराष्ट्र वह राज्य है जहाँ महिला प्रत्यक्ष नकद योजना और चुनावी परिणाम के बीच सबसे मजबूत समय-संबंध दिखाई देता है। योजना जुलाई 2024 में शुरू हुई, नवंबर में चुनाव हुए और महायुति का महिला वोट असाधारण रूप से मजबूत रहा। इसे केवल योजना का परिणाम कहना अतिशयोक्ति होगी, लेकिन यह कहना भी कठिन है कि इसका कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ा।

छत्तीसगढ़ का मामला थोड़ा अलग है। भाजपा ने 2023 विधानसभा चुनाव में महतारी वंदन योजना का वादा किया था—विवाहित पात्र महिलाओं को ₹1,000 प्रतिमाह। भाजपा ने चुनाव जीतने के बाद इसे लागू किया। 2025-26 के बजट में अकेले महतारी वंदन के लिए ₹5,500 करोड़ रखे गए।

यहाँ एक जरूरी अंतर समझना चाहिए। 2023 में महिलाओं को पैसा चुनाव से पहले नहीं मिला था; उस समय यह भाजपा का चुनावी वादा था। इसलिए यह कहना गलत होगा कि योजना के भुगतान ने भाजपा को 2023 में जिताया। लेकिन योजना के वादे ने महिला मतदाताओं को प्रभावित किया हो सकता है। भाजपा का वोट प्रतिशत 2018 के लगभग 33 प्रतिशत से बढ़कर 2023 में 46.27 प्रतिशत हो गया और उसने 90 में 54 सीटें जीतीं। राज्य में महिला मतदाताओं की भूमिका बहुत बड़ी थी—2023 विधानसभा चुनाव में पड़े कुल वोटों में करीब 49.87 प्रतिशत वोट महिलाओं के थे।

ओडिशा में सुभद्रा योजना ने भाजपा के चुनावी अभियान में यही भूमिका निभाई। भाजपा ने 2024 विधानसभा चुनाव के दौरान महिलाओं के लिए योजना का वादा किया और सरकार बनने के बाद सितंबर 2024 में इसे लागू किया। पात्र महिलाओं को सालाना ₹10,000 दो किस्तों में देने की व्यवस्था है। राज्य सरकार के अनुसार इसका लक्ष्य एक करोड़ से अधिक महिलाओं को लाभ देना है। 2026-27 के लिए ₹10,145 करोड़ का प्रावधान किया गया है। प्रारंभिक 2024-25 बजट में इसके लिए ₹10,000 करोड़ का प्रावधान किया गया था।

ओडिशा में भाजपा ने 2024 में पहली बार अपने दम पर सरकार बनाई और 147 में 78 सीटें जीतीं, जबकि बीजद 51 पर रह गया। लेकिन यहाँ भी सावधानी जरूरी है—सुभद्रा का वास्तविक पैसा चुनाव के बाद पहुँचा। इसलिए 2024 के परिणाम पर उसका प्रभाव “लाभार्थी अनुभव” से अधिक चुनावी वादे के रूप में था। राज्य में महिलाओं ने बहुत बड़ी संख्या में मतदान किया; महिला मतदान दर 75.55 प्रतिशत थी और पड़े कुल विधानसभा वोटों में लगभग 49.78 प्रतिशत महिलाओं के थे।

असम इस मॉडल का पुराना उदाहरण है। भाजपा सरकार की ओरुनोदोई योजना में परिवार की महिला को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता दी जाती है। 2024-25 में इसके लिए ₹3,750 करोड़ बजट था और वास्तविक व्यय करीब ₹3,680 करोड़, यानी 98 प्रतिशत से अधिक उपयोग हुआ। 2025-26 में इसका प्रावधान बढ़ाकर ₹5,000 करोड़ कर दिया गया।

ओरुनोदोई 2021 विधानसभा चुनाव से पहले शुरू हो चुकी थी और इसे उस चुनाव में भाजपा के महिला वोट आधार को मजबूत करने वाले प्रमुख कारकों में माना गया। 2021 में भाजपा-नेतृत्व वाले गठबंधन ने 126 में 75 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी। असम में उस चुनाव में पड़े कुल वोटों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 49.04 प्रतिशत थी और महिला मतदान दर 82 प्रतिशत से अधिक थी।

राजस्थान में भाजपा सरकार का मॉडल अभी मध्य प्रदेश या महाराष्ट्र जैसा सार्वभौमिक मासिक नकद हस्तांतरण नहीं है। यहाँ लाडो प्रोत्साहन योजना, कालीबाई भील महिला संबल, मुख्यमंत्री नारी शक्ति योजना, मातृत्व सहायता आदि महत्वपूर्ण हैं। 2026-27 के बजट में महिला विकास कार्यक्रम पर ₹1,128.96 करोड़ का प्रावधान है, जिसमें कालीबाई भील महिला संबल पर ₹504.25 करोड़, लाडो प्रोत्साहन पर ₹320 करोड़ और मुख्यमंत्री नारी शक्ति प्रशिक्षण एवं कौशल कार्यक्रम पर ₹86 करोड़ शामिल हैं। इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के लिए ₹321 करोड़ और इंदिरा गांधी मातृत्व पोषण योजना के लिए ₹110 करोड़ हैं।

राजस्थान में भाजपा की 2023 की जीत को इन वर्तमान योजनाओं से जोड़ना ठीक नहीं होगा, क्योंकि इनमें से कई निर्णय भाजपा सरकार बनने के बाद के हैं। भाजपा ने 2023 में 115 सीटें और लगभग 41.7 प्रतिशत वोट प्राप्त किए। इसलिए महिला योजनाओं का वास्तविक चुनावी परीक्षण यहाँ अगला विधानसभा चुनाव होगा।

उत्तर प्रदेश में स्थिति फिर अलग है। योगी सरकार ने मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला, मिशन शक्ति, महिला स्वयं सहायता समूह, उज्ज्वला लाभार्थियों के लिए मुफ्त सिलेंडर जैसी कई योजनाएँ चलाई हैं। लेकिन यूपी में मध्य प्रदेश जैसा एक सार्वभौमिक “हर पात्र महिला को मासिक नकद” मॉडल अभी केंद्रीय चुनावी औजार नहीं बना है। 2022 में भाजपा गठबंधन ने 403 में 273 सीटें जीतीं और भाजपा ने स्वयं 41.29 प्रतिशत वोट लिया। महिला मतदाता भाजपा के लिए महत्वपूर्ण रहे, लेकिन उपलब्ध सर्वेक्षणों में महिला वोट के अनुमान पद्धति के अनुसार अलग-अलग हैं; इसलिए एक निश्चित प्रतिशत देना उचित नहीं होगा।

इन योजनाओं पर कुल कितना पैसा?

यहाँ संख्या बहुत दिलचस्प है। केवल पाँच सबसे बड़ी प्रत्यक्ष या लगभग प्रत्यक्ष महिला नकद सहायता योजनाओं—मध्य प्रदेश लाड़ली बहना, महाराष्ट्र लाडकी बहिन, छत्तीसगढ़ महतारी वंदन, ओडिशा सुभद्रा और असम ओरुनोदोई—के नवीन उपलब्ध वार्षिक बजट प्रावधानों को जोड़ें तो रकम लगभग ₹80,528 करोड़ सालाना बैठती है। इसमें मध्य प्रदेश ₹23,883 करोड़, महाराष्ट्र ₹36,000 करोड़, छत्तीसगढ़ ₹5,500 करोड़, ओडिशा ₹10,145 करोड़ और असम ₹5,000 करोड़ हैं।

और ध्यान दीजिए—इस ₹80,528 करोड़ में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, दिल्ली आदि भाजपा-शासित राज्यों की कन्या, मातृत्व, शिक्षा, गैस, पेंशन, स्वयं सहायता समूह, छात्रवृत्ति और दूसरी महिला योजनाएँ शामिल नहीं हैं। केंद्र की उज्ज्वला, लखपति दीदी, पीएम मातृ वंदना, महिला आवास लाभ आदि भी इसमें शामिल नहीं हैं। अतः भाजपा-शासित सरकारों द्वारा महिला-केंद्रित कल्याण पर होने वाला वास्तविक कुल खर्च इससे काफी बड़ा है।

भाजपा को महिलाओं का कितना वोट मिलता है?

इस प्रश्न में सबसे अधिक सावधानी जरूरी है। निर्वाचन आयोग यह नहीं बताता कि किस पार्टी को कितने महिला वोट मिले। आयोग केवल महिला मतदाताओं की संख्या और मतदान दर बताता है। “भाजपा को 50 प्रतिशत महिलाओं ने वोट दिया” जैसे आँकड़े मतदानोत्तर सर्वेक्षणों से आते हैं। इसलिए इन्हें अनुमान समझना चाहिए, आधिकारिक परिणाम नहीं।

उपलब्ध अध्ययनों से मोटा राजनीतिक चित्र यह बनता है कि मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भाजपा/उसके गठबंधन का महिला समर्थन लगभग आधे महिला मतदाताओं तक पहुँच गया, महाराष्ट्र के 2024 Axis My India सर्वे में महायुति का स्पष्ट अनुमान 50 प्रतिशत था। मध्य प्रदेश में भी सर्वेक्षण भाजपा को महिलाओं में बहुत मजबूत दिखाते हैं। छत्तीसगढ़ और असम में महिला मत भाजपा की विजय में महत्वपूर्ण रहे हैं, लेकिन कोई एक सार्वभौमिक विश्वसनीय प्रतिशत बताना कठिन है। राजस्थान और उत्तर प्रदेश में भाजपा का महिला आधार महत्वपूर्ण है, पर वहाँ जाति, वर्ग, शहरी-ग्रामीण और सामाजिक समूहों के अनुसार भारी अंतर है।

इसका बड़ा राजनीतिक अर्थ है कि भाजपा ने कई राज्यों में ‘लाभार्थी महिला’ को ‘स्वतंत्र महिला मतदाता’ में बदलने की रणनीति अपनाई है। पहले राजनीतिक दल अक्सर परिवार के पुरुष मुखिया को चुनावी इकाई मानते थे। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण ने महिला के अपने बैंक खाते, उसके मोबाइल संदेश और उसकी व्यक्तिगत लाभार्थी पहचान को महत्वपूर्ण बना दिया है। इसी कारण महिला मतदाता अब जाति और परिवार की राजनीतिक पसंद से कुछ हद तक स्वतंत्र होकर वोट करने लगी हैं। हालांकि यह प्रक्रिया हर राज्य और हर सामाजिक वर्ग में समान नहीं है।

अब जेन ज़ी की संख्या

यह दूसरा अत्यंत महत्वपूर्ण चुनावी विषय है। जेन ज़ी की परिभाषा अलग-अलग संस्थाएँ थोड़ी अलग रखती हैं, लेकिन सामान्यतः 1997 से 2012 के बीच जन्मे लोगों को जेन ज़ी माना जाता है। 2026 में इस परिभाषा के अनुसार उनकी उम्र लगभग 14 से 29 वर्ष होगी।Boston Consulting Group और Snap Inc. की विस्तृत भारतीय अध्ययन रिपोर्ट ने भारत में जेन ज़ी की आबादी लगभग 37.7 करोड़ आंकी थी। इसे रिपोर्ट ने भारत की अब तक की सबसे बड़ी पीढ़ी बताया।

अर्थात भारत की लगभग हर चौथी आबादी जेन ज़ी है। 37.7 करोड़ का अर्थ है कि यह समूह अमेरिका की पूरी आबादी से भी बड़ा है।

लेकिन चुनाव के लिए हमें इसमें से नाबालिगों को अलग करना होगा। 2026 में 1997–2008 के बीच जन्मे जेन ज़ी सदस्य 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के होंगे, जबकि 2009–2012 वाले अभी मतदान आयु तक नहीं पहुँचे होंगे। मोटे जनसांख्यिकीय अनुमान से लगभग 27–30 करोड़ जेन ज़ी भारतीय 2026 में मतदान-योग्य आयु में हो सकते हैं। वास्तविक पंजीकृत जेन ज़ी मतदाताओं की संख्या इससे कम होगी क्योंकि हर पात्र युवा मतदाता सूची में पंजीकृत नहीं होता।

और यहीं आगामी चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा गणित बनता है। भारत में आज मोटे तौर पर 71.5 करोड़ महिलाएँ, 47.6 करोड़ से अधिक पंजीकृत महिला मतदाता, और लगभग 37.7 करोड़ जेन ज़ी नागरिक हैं। इनमें करोड़ों लोग दोनों वर्गों में आते हैं—यानी युवा महिलाएँ। राजनीतिक दृष्टि से आने वाले चुनावों में शायद सबसे निर्णायक नया वर्ग 18–29 वर्ष की महिला मतदाता हो सकता है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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