BRICS Summit 2026: दिल्ली में जुटेंगे मोदी-शी-पुतिन! क्या बदलने जा रही है एशिया की पूरी राजनीति?

BRICS Summit 2026: शी जिनपिंग के 2026 में भारत दौरे की संभावना से वैश्विक राजनीति में हलचल है। BRICS समिट में मोदी-पुतिन-शी की मुलाकात अहम मोड़ ला सकती है।

Snigdha Singh
Published on: 20 May 2026 11:37 AM IST
BRICS Summit 2026
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BRICS Summit 2026

BRICS Summit 2026: नई दिल्ली की सत्ता गलियारों में हलचल तेज है। एशिया की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अब एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। संकेत साफ हैं भारत और चीन, दोनों अब टकराव से आगे बढ़कर रणनीतिक संतुलन की राजनीति की तरफ बढ़ रहे हैं। और इसी बदलते समीकरण के बीच सबसे बड़ी खबर यह है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सितंबर 2026 में भारत आ सकते हैं। अगर यह दौरा होता है, तो यह पिछले 7 वर्षों में उनकी पहली भारत यात्रा होगी।

सूत्रों के मुताबिक, 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में शी जिनपिंग की मौजूदगी लगभग तय मानी जा रही है। इससे भी बड़ा संदेश यह है कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी दिल्ली पहुंचेंगे। यानी दुनिया की तीन बड़ी शक्तियां भारत, चीन और रूस एक ही मंच पर होंगी। यह सिर्फ एक सम्मेलन नहीं बल्कि पश्चिमी दबाव के बीच उभरते नए वैश्विक शक्ति-संतुलन का प्रदर्शन हो सकता है।

मोदी-शी की ‘शांत कूटनीति’ रंग ला रही?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच पिछले डेढ़ साल में बैक-चैनल और बहुपक्षीय मंचों पर संवाद बढ़ा है। यही वजह है कि 2020 के बाद जमे रिश्तों की बर्फ अब पिघलती दिखाई दे रही है।

दरअसल, अक्टूबर 2024 में रूस के कजान में हुए BRICS सम्मेलन को टर्निंग पॉइंट माना जाता है। वहीं पहली बार दोनों नेताओं के बीच रिश्तों को स्थिर और नियंत्रित करने पर गंभीर सहमति बनी। इसके बाद सीमावर्ती इलाकों में सैनिकों की वापसी और सैन्य कमांडर स्तर की वार्ताओं में भी प्रगति देखने को मिली।

गलवान: जिसने रिश्तों को युद्ध जैसी स्थिति तक पहुंचा दिया

भारत-चीन संबंधों में सबसे बड़ा भूचाल जून 2020 में आया था। लद्दाख की गलवान वैली में हुई हिंसक झड़प ने दोनों देशों के रिश्तों को दशकों पीछे धकेल दिया। सैनिकों की मौत, सीमा पर भारी सैन्य तैनाती, आर्थिक प्रतिबंध और डिजिटल स्ट्राइक भारत ने चीन को कई स्तरों पर जवाब दिया। नई दिल्ली ने एक तरफ सीमा पर सेना की ताकत बढ़ाई, दूसरी तरफ चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाकर आर्थिक संदेश भी दिया। यह पहली बार था जब भारत ने चीन के खिलाफ सैन्य, आर्थिक और तकनीकी तीनों मोर्चों पर एक साथ आक्रामक रणनीति अपनाई।

लेकिन अब क्यों बदल रहा है माहौल?

यह सवाल सबसे अहम है। आखिर वही चीन, जिसके खिलाफ भारत QUAD को मजबूत कर रहा था, आज उसी के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश क्यों कर रहा है?

इसके पीछे कई रणनीतिक कारण हैं:

अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद बदला वैश्विक शक्ति समीकरण

BRICS का तेजी से विस्तार

एशिया में आर्थिक गलियारों और सप्लाई चेन की नई राजनीति

भारत की यह रणनीति कि सीमा विवाद को नियंत्रित रखते हुए आर्थिक और वैश्विक मंचों पर चीन से प्रतिस्पर्धा भी की जाए और संवाद भी

दिल्ली अच्छी तरह समझती है कि 21वीं सदी की भू-राजनीति में स्थायी दुश्मनी से ज्यादा अहम रणनीतिक संतुलन है।

BRICS समिट क्यों होगा ऐतिहासिक?

इस बार दिल्ली में होने वाला BRICS सम्मेलन सिर्फ औपचारिक बैठक नहीं माना जा रहा। इसकी कई वजहें हैं:

पहली बार लंबे तनाव के बाद मोदी-शी आमने-सामने होंगे।

पुतिन की मौजूदगी सम्मेलन को और अधिक वैश्विक महत्व देगी।

पश्चिमी देशों के मुकाबले BRICS खुद को वैकल्पिक आर्थिक और राजनीतिक धुरी के रूप में पेश करना चाहता है।

डॉलर आधारित वैश्विक व्यवस्था के विकल्प पर भी चर्चा संभव है।

यानी यह सम्मेलन सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि नई विश्व व्यवस्था की बहस का मंच बन सकता है।

2019 से 2026 तक: रिश्तों का पूरा राजनीतिक रोलर-कोस्टर

2019 : महाबलीपुरम की दोस्ती

तमिलनाडु के ममल्लपुरम में मोदी और शी जिनपिंग की अनौपचारिक मुलाकात हुई। माहौल सकारात्मक था। व्यापार, निवेश और सीमा विवाद पर बातचीत आगे बढ़ाने की बात हुई।

2020 : गलवान का विस्फोट

गलवान हिंसा ने पूरे समीकरण बदल दिए। भारत में चीन विरोधी भावना चरम पर पहुंच गई।

2021-2023 : सैन्य तनाव और बातचीत

सीमा पर तनाव जारी रहा, लेकिन बातचीत के चैनल खुले रहे। दोनों देशों ने पूर्ण टकराव से बचने की कोशिश की।

2024 : कजान में बर्फ पिघलनी शुरू

रूस के कजान में BRICS सम्मेलन के दौरान मोदी और शी की मुलाकात ने संबंधों को नया मोड़ दिया।

2026 दिल्ली में संभावित ऐतिहासिक मुलाकात

अगर शी जिनपिंग दिल्ली आते हैं, तो यह सिर्फ एक यात्रा नहीं होगी। यह संदेश होगा कि एशिया की दो महाशक्तियां टकराव से आगे बढ़कर “प्रतिस्पर्धी सह-अस्तित्व” की नीति की ओर बढ़ रही हैं।

भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल क्या?

भारत के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह चीन के साथ संबंध सुधारते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता कैसे बनाए रखे।

दिल्ली को यह संतुलन साधना होगा:

सीमा पर सख्ती

व्यापार में सावधानी

वैश्विक मंचों पर सहयोग और इंडो-पैसिफिक रणनीति में अमेरिका के साथ साझेदारी

यानी आने वाले महीनों में भारत की विदेश नीति मल्टी-अलाइनमेंट का सबसे बड़ा उदाहरण बन सकती है।

शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा सिर्फ एक राजनयिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एशिया की बदलती शक्ति राजनीति का बड़ा संकेत है। गलवान की तल्खियों से लेकर BRICS की मेज तक पहुंचा यह सफर बताता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते सिर्फ स्थायी हित होते हैं।

Akriti Pandey

Akriti Pandey

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