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1 Crore House vs Rent: ₹1 करोड़ का घर खरीदें या निवेश करके किराए पर रहें? 20 साल का पूरा हिसाब
1 Crore House vs Rent: ₹1 करोड़ का घर खरीदना बेहतर है या ₹1 करोड़ निवेश करके किराए पर रहना? जानिए 20 साल में प्रॉपर्टी की कीमत, किराया, निवेश रिटर्न, महंगाई और होम लोन का पूरा गणित।
1 Crore House vs Rent: मान लीजिए आपके पास एक करोड़ रुपये हैं। आपके सामने दो रास्ते हैं - पहला, इस पैसे से अपना मकान खरीद लें। दूसरा, मकान खरीदने के बजाय किराए के मकान में रहें और 1 करोड़ रुपये को निवेश कर दें। पहली नजर में मकान खरीदना ज्यादा सुरक्षित लगता है। अपना मकान होगा, हर महीने किराया नहीं देना पड़ेगा और कुछ साल बाद आपके पास अपनी संपत्ति भी होगी। दूसरी तरफ निवेश करके किराए पर रहने का विकल्प थोड़ा अजीब लग सकता है। आखिर किराया देते-देते पैसा खत्म हो जाएगा, जबकि खरीदा हुआ मकान तो आपके पास रहेगा। लेकिन असली गणित इतना सीधा नहीं है।
1 करोड़ के मकान पर सिर्फ 1 करोड़ खर्च नहीं होता
मान लीजिए मकान की कीमत 1 करोड़ रुपये है और आपके पास भी 1 करोड़ रुपये हैं। अगर आप पूरा भुगतान करके मकान खरीदते हैं तो आपकी लगभग पूरी पूंजी एक ऐसी संपत्ति में चली जाएगी जिसे जरूरत पड़ने पर तुरंत नकद में बदलना आसान नहीं होता। इसके ऊपर स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन जैसे खर्च हो सकते हैं। राज्य और संपत्ति की कीमत के हिसाब से इनका खर्च अलग होता है। मकान खरीदने के बाद रखरखाव, मरम्मत, संपत्ति कर और सोसायटी से जुड़े खर्च भी आते हैं। यानी 1 करोड़ रुपये का मकान या फ्लैट खरीदने का मतलब यह नहीं है कि आपकी कुल लागत सिर्फ 1 करोड़ रुपये होगी।
इससे भी बड़ा सवाल है कि अगर आपने 1 करोड़ रुपये मकान में लगा दिए तो उस रकम से मिलने वाला संभावित निवेश रिटर्न आपने छोड़ दिया। फाइनेंस की भाषा में इसे मौका-खर्च कहा जाता है। यानी मकान खरीदते समय सिर्फ यह नहीं देखना चाहिए कि मकान की कीमत कितनी बढ़ेगी, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि वही पैसा किसी दूसरे निवेश में लगाया जाता तो कितना बढ़ सकता था।
किराए पर रहने वाले के पास 1 करोड़ रुपये निवेश में रहेंगे
अब दूसरे व्यक्ति को देखिए। उसके पास भी 1 करोड़ रुपये हैं, लेकिन वह मकान नहीं खरीदता। वह उसी तरह का मकान किराए पर लेता है और अपना 1 करोड़ रुपये निवेश कर देता है। अब उसके सामने सबसे बड़ा खर्च किराया है। मान लीजिए उस मकान का शुरुआती किराया 30 हजार रुपये महीना है। यानी साल का किराया 3.6 लाख रुपये हुआ। अगर किराया हर साल औसतन 5 प्रतिशत बढ़ता है तो अगले वर्षों में यह रकम लगातार बढ़ती जाएगी। 20 साल में किराए पर रहने वाले व्यक्ति को बड़ी रकम किराए में देनी पड़ेगी। यहीं मकान खरीदने वाला व्यक्ति कहेगा कि मैंने किराया नहीं दिया, लेकिन निवेश वाले व्यक्ति के पास इस दौरान 1 करोड़ रुपये लगातार बढ़ने का मौका भी था। इसलिए सिर्फ दिए गए किराए को देखना पूरी तस्वीर नहीं है।
20 साल बाद घर की कीमत कितनी होगी?
मान लीजिए 1 करोड़ रुपये का मकान अगले 20 वर्षों में औसतन 6 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ता है। तब 20 साल बाद उसकी कीमत करीब 3.21 करोड़ रुपये हो सकती है। अगर कीमत 7 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ी तो यही घर करीब 3.87 करोड़ रुपये का हो सकता है। वहीं 5 प्रतिशत की सालाना वृद्धि पर कीमत करीब 2.65 करोड़ रुपये होगी।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मकान की कीमत बढ़ना और आपके हाथ में पैसा आ जाना एक बात नहीं है। जब तक आप मकान बेचते नहीं, उसकी बढ़ी हुई कीमत आपके बैंक खाते में नहीं आती। इसके अलावा मकान बेचते समय भी कुछ खर्च हो सकते हैं। इसलिए सिर्फ यह देखकर फैसला नहीं किया जा सकता कि मकान की कीमत 20 साल में तीन गुनी हो जाएगी।
निवेश वाला 1 करोड़ कितना बन सकता है?
अब मान लीजिए किराए पर रहने वाला व्यक्ति अपना 1 करोड़ रुपये ऐसे निवेश में लगाता है जिससे औसतन 10 प्रतिशत सालाना रिटर्न मिलता है। 20 साल में 1 करोड़ रुपये करीब 6.73 करोड़ रुपये हो सकते हैं। अगर औसत रिटर्न 8 प्रतिशत रहा तो रकम करीब 4.66 करोड़ रुपये होगी। 12 प्रतिशत औसत रिटर्न पर यह करीब 9.65 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।
लेकिन यहां एक बड़ी शर्त है। निवेश वाले व्यक्ति को इन पैसों में से किराया देना है। इसलिए 6.73 करोड़ रुपये देखकर यह कहना गलत होगा कि किराए वाला सीधे जीत गया। सही हिसाब में 20 साल के दौरान दिए गए किराए को भी शामिल करना होगा। साथ ही निवेश से मिलने वाला रिटर्न हर साल एक जैसा रहना जरूरी नहीं है। बाजार आधारित निवेश में उतार-चढ़ाव होता है और 10 प्रतिशत रिटर्न कोई गारंटी नहीं है।
असली खेल है मकान की कीमत और किराए का अनुपात
इस पूरे सवाल में सबसे महत्वपूर्ण चीजों में से एक है मकान की कीमत और उसके किराए का अनुपात। मान लीजिए 1 करोड़ रुपये के मकान का किराया 20 हजार रुपये महीना है। यानी साल का किराया 2.4 लाख रुपये, जो मकान की कीमत का सिर्फ 2.4 प्रतिशत है। ऐसी स्थिति में किराए पर रहकर बाकी पैसा निवेश करने का विकल्प काफी आकर्षक हो सकता है।
लेकिन अगर उसी मकान का किराया 60 हजार रुपये महीना है तो साल का किराया 7.2 लाख रुपये होगा। यानी मकान की कीमत का 7.2 प्रतिशत। ऐसी स्थिति में मकान खरीदना तुलनात्मक रूप से ज्यादा आकर्षक लग सकता है। इसलिए सिर्फ यह देखना कि मकान 1 करोड़ रुपये का है, पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि उस मकान में रहने के लिए बाजार कितना किराया मांग रहा है।
होम लोन लेने पर पूरा हिसाब बदल जाता है
अभी तक हमने माना कि आपके पास पूरे 1 करोड़ रुपये हैं और आप बिना कर्ज के मकान या फ्लैट खरीद सकते हैं। असल जिंदगी में ज्यादातर लोग होम लोन लेते हैं। मान लीजिए 1 करोड़ रुपये का मकान है और आप 20 लाख रुपये डाउन पेमेंट देते हैं। बाकी 80 लाख रुपये का लोन लेते हैं। अब हर महीने ईएमआई देनी होगी और कई वर्षों तक ब्याज भी चुकाना होगा।
इस स्थिति में तुलना सिर्फ किराया बनाम मकान की नहीं रहती। अब मकान खरीदने वाले के लिए डाउन पेमेंट, ईएमआई का ब्याज, रखरखाव, टैक्स और घर खरीदने के शुरुआती खर्च को जोड़ना होगा। दूसरी तरफ किराए पर रहने वाले व्यक्ति के लिए किराया और निवेश का हिसाब देखना होगा। कई बार होम लोन की ईएमआई किराए से काफी ज्यादा होती है, लेकिन उस ईएमआई का एक हिस्सा आपकी संपत्ति में बदल रहा होता है। इसलिए ईएमआई को पूरी तरह “खर्च” मानना भी सही नहीं है।
प्रॉपर्टी सिर्फ निवेश नहीं, रहने की सुरक्षा भी है
मकान खरीदने के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क सिर्फ उसकी बढ़ती कीमत नहीं है। अपना मकान रहने की सुरक्षा देता है। किराया बढ़ने की चिंता कम होती है। मकान मालिक से जुड़ी परेशानियां नहीं रहतीं। आप घर को अपनी जरूरत के हिसाब से बदल सकते हैं। अगर आप उसी शहर में लंबे समय तक रहने वाले हैं तो यह फायदा काफी बड़ा हो सकता है। रिटायरमेंट के बाद इसका महत्व और बढ़ जाता है। अगर तब तक घर का लोन खत्म हो चुका है तो हर महीने किराए का बड़ा खर्च नहीं रहेगा। दूसरी तरफ किराए पर रहने वाले व्यक्ति को उम्र बढ़ने के बाद भी किराया देना पड़ सकता है और किराया समय के साथ बढ़ता भी रहेगा।
किराए पर रहने की सबसे बड़ी ताकत है आजादी
किराए पर रहने का मतलब सिर्फ किराया देना नहीं है। इसका एक बड़ा फायदा लचीलापन है। नौकरी बदलनी हो, शहर बदलना हो, बच्चों की पढ़ाई के लिए दूसरी जगह जाना हो या जीवनशैली बदलनी हो तो किराए का घर ज्यादा सुविधाजनक हो सकता है। आपको किसी एक संपत्ति से बंधे रहने की जरूरत नहीं होती। इसके अलावा आपकी सारी पूंजी एक घर में फंसती नहीं है। आप अपने 1 करोड़ रुपये को अलग-अलग निवेश साधनों में बांट सकते हैं। इससे आपका पैसा एक ही संपत्ति के बजाय कई जगह काम कर सकता है। लेकिन इसके साथ अनुशासन भी जरूरी है। अगर आपने मकान नहीं खरीदा और बचा हुआ पैसा खर्च कर दिया तो किराए पर रहने की रणनीति का सबसे बड़ा फायदा ही खत्म हो जाएगा।
महंगाई किराए और मकान दोनों को बदलती है
आज का 30 हजार रुपये का किराया अगले 20 साल तक 30 हजार रुपये नहीं रहेगा। अगर किराया औसतन 5 प्रतिशत सालाना बढ़ता है तो 20 साल बाद यही शुरुआती किराया करीब 80 हजार रुपये महीना हो सकता है। दूसरी तरफ घर की कीमत भी स्थिर नहीं रहेगी। इसलिए भविष्य का फैसला आज की कीमत देखकर नहीं किया जा सकता।
यही वजह है कि मकान खरीदने और किराए पर रहने की तुलना करते समय कम से कम 15 से 20 साल की अवधि देखना ज्यादा उपयोगी होता है। छोटी अवधि में मकान खरीदने के लेन-देन के खर्च और निवेश के उतार-चढ़ाव तस्वीर को बदल सकते हैं।
रखरखाव का खर्च भी जोड़िए
मकान खरीदने के बाद खर्च खत्म नहीं होता। पेंटिंग, प्लंबिंग, बिजली, उपकरणों की मरम्मत, फर्नीचर, सोसायटी के बड़े रखरखाव और दूसरी जरूरतों पर पैसा लगता रहता है। अपार्टमेंट में सोसायटी शुल्क हो सकता है और पुराने मकान में मरम्मत का खर्च बढ़ सकता है। किराए पर रहने वाले व्यक्ति को इनमें से कई बड़े खर्चों से राहत मिल सकती है, हालांकि यह पूरी तरह किराए के समझौते पर निर्भर करता है। इसलिए तुलना करते समय मकान खरीदने वाले व्यक्ति के रखरखाव के खर्च को भी शामिल करना चाहिए।
किसके लिए मकान खरीदना बेहतर है?
अगर आप किसी शहर में लंबे समय तक रहने वाले हैं, मकान की कीमत आपकी आय और संपत्ति के हिसाब से उचित है, किराया काफी ज्यादा है और आप मकान खरीदने के बाद भी पर्याप्त पैसा निवेश कर सकते हैं तो मकान खरीदना अच्छा फैसला हो सकता है। खासकर तब जब आप उस मकान को 15-20 साल या उससे ज्यादा समय तक रखने वाले हों। लेकिन अगर नौकरी या शहर बदलने की संभावना है, मकान की कीमत बहुत ज्यादा है, उसके मुकाबले किराया कम है और आप निवेश को लंबे समय तक बनाए रख सकते हैं तो किराए पर रहकर निवेश करना आर्थिक रूप से बेहतर हो सकता है। यहां सबसे जरूरी शर्त यही है कि बचा हुआ पैसा वास्तव में निवेश किया जाए, खर्च नहीं।
आखिर 1 करोड़ रुपये कहां ज्यादा काम करेंगे?
इस पूरे सवाल का कोई एक जवाब नहीं है। अगर 1 करोड़ रुपये मकान में लगाए जाते हैं तो बदले में आपको एक संपत्ति और रहने की सुरक्षा मिलती है। अगर वही पैसा निवेश किया जाता है तो आपके पास बढ़ने वाली वित्तीय संपत्ति होती है, लेकिन रहने के लिए किराया देना पड़ता है।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि मकान खरीदना हमेशा बेहतर है या किराए पर रहना। असली सवाल यह है कि आपके शहर में मकान की कीमत और किराए का अनुपात क्या है, अगले 15-20 साल में प्रॉपर्टी की कीमत कितनी बढ़ सकती है, निवेश से कितना रिटर्न मिलने की उम्मीद है, किराया कितनी तेजी से बढ़ सकता है और आपकी अपनी जिंदगी कितनी स्थिर है। प्रॉपर्टी को सिर्फ निवेश मानकर खरीदना भी सही नहीं है और किराए को हमेशा पैसे की बर्बादी मानना भी गलत है। अपना घर आपको रहने की सुरक्षा देता है, जबकि निवेश आपको वित्तीय आजादी का मौका देता है। आखिर में फैसला इस बात पर टिकता है कि आपके लिए इन दोनों में से क्या ज्यादा जरूरी है - अपनी छत या अपने पैसे की ज्यादा तेजी से बढ़ने की संभावना।


