TRENDING TAGS :
Aankh Fadakna Shubh Ashubh: आंख फड़कना शुभ है या अशुभ? शरीर में असल में क्या होता है, जानिए विज्ञान
Aankh Fadakna Shubh Ashubh: आंख फड़कने को शुभ या अशुभ क्यों माना जाता है? जानिए विज्ञान में इसे मायोकिमिया क्यों कहा जाता है, आंख फड़कने की वजह, तनाव, नींद की कमी, कैफीन और स्क्रीन टाइम का असर।
Aankh Fadakna Shubh Ashubh Vastu Tips Explained
Aankh Fadakna Shubh Ashubh: अचानक आंख फड़कने लगे तो भारत में ज्यादातर लोगों के मन में सबसे पहला खयाल यही आता है कि अब कुछ खास होने वाला है, या तो कोई अच्छी खबर मिलेगी या फिर कोई मुसीबत आने वाली है। यह मान्यता इतनी गहराई से हमारी सोच में बसी हुई है कि आंख फड़कते ही लोग यह इंतजार करने लगते हैं कि आखिर आगे क्या होगा। लेकिन असल में शरीर के भीतर उस वक्त जो कुछ हो रहा होता है, उसका किसी शुभ या अशुभ घटना से कोई सीधा नाता नहीं है। इसे समझने के लिए पहले इस मान्यता की जड़ों को देखते हैं, और फिर विज्ञान की नजर से यह जानते हैं कि आंख फड़कने के पीछे असली वजह क्या है।
आंख फड़कने को लेकर क्या मान्यता है
भारतीय परंपरा में सदियों से यह माना जाता रहा है कि शरीर के किसी हिस्से का अनायास हिलना या फड़कना आने वाले समय का संकेत देता है, और आंख फड़कना इसी सोच का एक हिस्सा है। आमतौर पर यह मान्यता प्रचलित है कि पुरुषों की दाईं आंख फड़कना शुभ माना जाता है, जबकि बाईं आंख फड़कना अशुभ समझा जाता है। महिलाओं के मामले में यह मान्यता उलट जाती है, यानी उनकी बाईं आंख फड़कना शुभ और दाईं आंख फड़कना अशुभ माना जाता है। अलग अलग क्षेत्रों और समुदायों में इस मान्यता के अपने अपने रूप भी मिलते हैं, कहीं इसे किसी खास समय या दिन से भी जोड़ा जाता है। यह पूरी सोच प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों और लोक परंपराओं से होते हुए पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही है।
यह मान्यता बनी ही क्यों
इंसानी दिमाग हमेशा से अनजान और अनियंत्रित घटनाओं को कोई न कोई अर्थ देने की कोशिश करता रहा है। पुराने जमाने में जब विज्ञान के पास शरीर में होने वाली छोटी छोटी अनैच्छिक हरकतों की कोई व्याख्या नहीं थी, तब लोगों ने इन्हें भविष्य से जोड़ना शुरू कर दिया। यह एक बेहद सामान्य मानवीय प्रवृत्ति है, जहां हम किसी संयोग को कारण और परिणाम के रिश्ते में बदल देते हैं। अगर किसी दिन आंख फड़कने के बाद वाकई कोई अच्छी या बुरी घटना घट जाए, तो दिमाग उस संयोग को मजबूती से याद रख लेता है, जबकि उन सैकड़ों मौकों को भूल जाता है जब आंख फड़कने के बाद कुछ खास नहीं हुआ। यही चयनात्मक याददाश्त धीरे धीरे एक मजबूत सामाजिक मान्यता का रूप ले लेती है, और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती चली जाती है।
विज्ञान की भाषा में यह होता क्या है
चिकित्सा विज्ञान में आंख के आसपास होने वाली इस अनैच्छिक फड़कन को 'मायोकिमिया' कहा जाता है। यह पलक के आसपास मौजूद बेहद पतली मांसपेशियों का एक हल्का और अनियंत्रित संकुचन है। हमारे शरीर की हर मांसपेशी को नसों के जरिए दिमाग से संकेत मिलते हैं कि उसे कब सिकुड़ना है और कब ढीला पड़ना है। पलक के आसपास की मांसपेशियां बेहद संवेदनशील होती हैं, और जब इन्हें नियंत्रित करने वाली नस पर किसी वजह से थोड़ा अतिरिक्त दबाव या जलन जैसी स्थिति बनती है, तो यह मांसपेशियां अपने आप ही छोटे छोटे झटकों के साथ फड़कने लगती हैं। यह पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से हमारी इच्छा से बाहर होती है, यानी हम चाहकर भी इसे सीधे तौर पर तुरंत रोक नहीं पाते, हालांकि यह अपने आप कुछ सेकंड से लेकर कुछ मिनट या कभी कभी कुछ दिनों में खुद ब खुद शांत हो जाती है।
आंख फड़कने के पीछे असली वजहें क्या होती हैं
आंख फड़कने के पीछे सबसे आम वजह है नींद की कमी और थकान। जब शरीर को पर्याप्त आराम नहीं मिलता, तो नसों का सामान्य कामकाज थोड़ा गड़बड़ा जाता है, और इसका असर सबसे पहले चेहरे की संवेदनशील मांसपेशियों पर दिखने लगता है। इसके अलावा मानसिक तनाव भी इसकी एक बड़ी वजह है, क्योंकि तनाव के दौरान शरीर में कुछ खास तरह के रसायन ज्यादा मात्रा में बनने लगते हैं, जो नसों को सामान्य से ज्यादा उत्तेजित कर सकते हैं। बहुत ज्यादा कैफीन का सेवन, जैसे दिन भर में कई कप चाय या कॉफी पीना, भी इसका एक जाना पहचाना कारण है, क्योंकि कैफीन तंत्रिका तंत्र को उत्तेजित करने का काम करता है।
लंबे समय तक स्क्रीन देखना, यानी मोबाइल, लैपटॉप या टीवी पर घंटों समय बिताना भी आंखों पर दबाव डालता है, जिससे आंखों की मांसपेशियां थक जाती हैं और फड़कने लगती हैं। आंखों का सूखापन भी इसकी एक बड़ी वजह है, खासकर उन लोगों में जो बहुत देर तक कंप्यूटर पर काम करते हैं या जिनकी पलकें झपकने की दर कम हो जाती है। इसके अलावा शरीर में मैग्नीशियम जैसे कुछ जरूरी खनिज तत्वों की कमी को भी कुछ हद तक इससे जोड़ा जाता है, क्योंकि यह तत्व मांसपेशियों और नसों के सामान्य कामकाज में मदद करते हैं। कुछ मामलों में शराब का ज्यादा सेवन, एलर्जी की वजह से आंखों में खुजली और मलना, या मौसम में बदलाव भी इसे बढ़ावा दे सकते हैं।
दिमाग और आंख की नसों का आपसी रिश्ता
चेहरे की मांसपेशियों को नियंत्रित करने का काम एक खास तंत्रिका करती है जिसे 'फेशियल नर्व' कहा जाता है, और आंख के आसपास की मांसपेशियां इसी नस के जरिए दिमाग से जुड़ी होती हैं। जब शरीर तनाव, थकान या किसी और वजह से असंतुलन की स्थिति में होता है, तो यह असर सबसे पहले इन्हीं बेहद पतली और संवेदनशील मांसपेशियों पर दिखता है, क्योंकि इनका आकार बाकी मांसपेशियों की तुलना में बहुत छोटा होता है और यह हल्के से बदलाव पर भी जल्दी प्रतिक्रिया देती हैं। यही वजह है कि जब शरीर के किसी और हिस्से में तनाव का कोई खास असर नजर नहीं आता, तब भी आंख का फड़कना साफ महसूस होने लगता है, क्योंकि यह सबसे पहले और सबसे आसानी से दिखने वाला संकेत बन जाता है।
क्या इसका मतलब हमेशा कोई गंभीर बीमारी होता है
ज्यादातर मामलों में आंख फड़कना पूरी तरह से एक सामान्य और हानिरहित घटना है, जो अपने आप ही कुछ समय बाद खत्म हो जाती है। इसका सीधा संबंध अक्सर रोजमर्रा की जिंदगी की आदतों से होता है, जैसे नींद पूरी न होना, ज्यादा स्क्रीन देखना या तनाव में रहना। ऐसे मामलों में सिर्फ पर्याप्त नींद लेना, आंखों को आराम देना, कैफीन का सेवन कम करना और तनाव को नियंत्रित करना ही इसे ठीक करने के लिए काफी होता है। इसलिए ज्यादातर बार आंख फड़कना किसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं बल्कि शरीर की तरफ से एक छोटा सा इशारा होता है कि उसे आराम और देखभाल की जरूरत है।
कब यह चिंता की बात बन सकती है
कुछ खास स्थितियों में आंख का लगातार फड़कना डॉक्टर को दिखाने लायक बन जाता है। अगर यह फड़कन कई हफ्तों तक लगातार बनी रहे, अगर इसके साथ पलक पूरी तरह बंद होने लगे, अगर चेहरे के दूसरे हिस्सों में भी अनैच्छिक हरकत शुरू हो जाए, या अगर इसके साथ आंख में दर्द, सूजन, धुंधला दिखना या चेहरे के किसी हिस्से में कमजोरी जैसी समस्या भी जुड़ जाए, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थितियों में यह किसी और गहरी तंत्रिका संबंधी समस्या का संकेत हो सकता है, जिसे चिकित्सा जगत में हेमीफेशियल स्पाज्म जैसी स्थितियों से जोड़ा जाता है, और ऐसे मामलों में सही जांच और इलाज जरूरी हो जाता है।
क्या शुभ अशुभ मानने में कोई हर्ज है?
विज्ञान की नजर से देखा जाए तो आंख फड़कने का किसी आने वाली घटना, शुभ हो या अशुभ, से कोई साबित हुआ रिश्ता नहीं है। यह पूरी तरह शरीर के भीतर चल रही एक शारीरिक प्रक्रिया है, जिसका कारण नींद, तनाव, खान पान और जीवनशैली से जुड़ा होता है, न कि भविष्य में होने वाली किसी घटना से। इसलिए अगर कभी आंख फड़कने लगे, तो घबराने या किसी शुभ अशुभ संकेत का इंतजार करने के बजाय यह सोचना ज्यादा फायदेमंद रहेगा कि क्या आपने पर्याप्त नींद ली है, क्या आप बहुत देर से स्क्रीन देख रहे हैं, या क्या आप किसी तनाव से गुजर रहे हैं।
आंख फड़कने को शुभ या अशुभ मानने की परंपरा सदियों पुरानी है और यह इंसानी दिमाग की उसी पुरानी आदत से जन्मी है जिसमें हम बिना वजह वाली घटनाओं को भी किसी न किसी कारण से जोड़ने की कोशिश करते हैं। असल विज्ञान बताता है कि यह पलक के आसपास की मांसपेशियों का एक हल्का और अस्थायी अनैच्छिक संकुचन है, जिसकी वजह थकान, तनाव, ज्यादा कैफीन, स्क्रीन का अधिक इस्तेमाल या शरीर में कुछ जरूरी तत्वों की कमी हो सकती है। ज्यादातर मामलों में यह अपने आप ठीक हो जाता है और इसके लिए सिर्फ आराम और सही आदतें अपनाना काफी होता है, हालांकि अगर यह बहुत लंबे समय तक बना रहे या इसके साथ दूसरे लक्षण भी जुड़ जाएं, तो डॉक्टर से सलाह लेना ही सही रास्ता है।


