TRENDING TAGS :
Anti-Glare Glass कैसे काम करता है? जानिए आंखों की चमक का विज्ञान
Anti-Glare Glass कैसे काम करता है? जानिए चश्मे पर बनने वाले रिफ्लेक्शन, आंखों में चुभने वाली चमक, स्क्रीन से होने वाली थकान और रात की हेडलाइट में Anti-Reflective Coating कितना काम करती है।
Anti Glare Glass Kya Hai Explained in Hindi
Anti Glare Glass Kya Hai: धूप में कार चलाते समय सामने से आती तेज रोशनी अचानक आंखों को चुभने लगती है। रात में सामने वाली गाड़ी की हेडलाइट शीशे पर पड़ती है तो कुछ सेकंड के लिए सड़क और बाकी चीजें धुंधली सी लग सकती हैं। कंप्यूटर पर काम करते समय खिड़की की रोशनी स्क्रीन पर पड़ती रहे तो अक्षर साफ होने के बावजूद आंखों को लगातार मेहनत करनी पड़ती है। यहां तक कि कभी-कभी चश्मा पहनने वाले व्यक्ति को भी लगता है कि साफ नंबर वाला चश्मा होने के बावजूद रोशनी आंखों को परेशान कर रही है।
यही वह जगह है जहां एंटी-ग्लेयर ग्लास या कहें एंटी-रिफ्लेक्टिव कोटिंग काम आती है।
आज चश्मे की दुकानों पर इसे अक्सर आंखों के लिए किसी खास सुरक्षा कवच की तरह बताया जाता है। कहीं इसे कंप्यूटर चलाने वालों के लिए जरूरी बताया जाता है, तो कहीं रात में ड्राइविंग के लिए। लेकिन असल सवाल यह है कि इस पतली सी परत में ऐसा क्या होता है कि चश्मे पर पड़ने वाली रोशनी कम चमकती दिखाई देती है? क्या यह आंखों की थकान भी कम करती है? क्या इससे स्क्रीन देखने से होने वाली परेशानी खत्म हो जाती है? और क्या हर "एंटी-ग्लेयर" चश्मा आंखों के लिए बेहतर होता है?
इसका जवाब समझने के लिए सबसे पहले यह समझना होगा कि ग्लेयर आखिर है क्या।
आंख में जाने वाली हर रोशनी समस्या नहीं होती
हमारी आंखों को देखने के लिए रोशनी चाहिए। किसी वस्तु से टकराकर आने वाली रोशनी आंख के सामने मौजूद कॉर्निया और लेंस से गुजरती है, फिर रेटिना तक पहुंचती है। रेटिना इस रोशनी को विद्युत संकेतों में बदलती है और दिमाग उन संकेतों को तस्वीर के रूप में समझता है।
समस्या तब पैदा होती है जब देखने वाली तस्वीर के साथ ऐसी अतिरिक्त तेज रोशनी भी आंख तक पहुंचती है जो दृश्य को साफ करने के बजाय उसे ढकने लगती है। इसे आसान भाषा में समझें तो अगर आप मोबाइल की स्क्रीन देख रहे हैं और उसके ऊपर कमरे की खिड़की का प्रतिबिंब भी दिखाई दे रहा है, तो आपकी आंख को स्क्रीन की जानकारी और उस अतिरिक्त चमक, दोनों से निपटना पड़ रहा है।
इसी तरह सड़क पर रात में सामने से आती तेज हेडलाइट आंखों में बहुत ज्यादा रोशनी भेज सकती है। आंख की पुतली रोशनी को नियंत्रित करने के लिए सिकुड़ती है, लेकिन तेज प्रकाश और आसपास के अंधेरे के बीच बहुत बड़ा फर्क होने पर दृश्य की स्पष्टता प्रभावित हो सकती है।
आंखों की परेशानी में सिर्फ चमक ही जिम्मेदार नहीं होती। लंबे समय तक स्क्रीन देखने पर हम कम पलक झपकाते हैं, जिससे आंख की सतह सूख सकती है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी के अनुसार स्क्रीन देखने से होने वाली डिजिटल आंखों की परेशानी में सूखी आंख, धुंधला दिखना, पानी आना और सिरदर्द जैसे लक्षण हो सकते हैं। इसलिए "ग्लेयर" और "स्क्रीन से होने वाली आंखों की थकान" को एक ही चीज समझना सही नहीं है। ग्लेयर परेशानी को बढ़ा सकती है, लेकिन हर आंख की थकान का कारण ग्लेयर नहीं होता।
चश्मे पर चमकती सफेद रोशनी आती कहां से है?
जब रोशनी चश्मे के शीशे पर पड़ती है तो उसका पूरा हिस्सा सीधे आंख के भीतर नहीं जाता। रोशनी का कुछ हिस्सा शीशे की सतह से वापस लौट जाता है। यही परावर्तित रोशनी हमें चश्मे पर चमक या प्रतिबिंब के रूप में दिखाई देती है।
आपने शायद किसी व्यक्ति का चश्मा देखा होगा जिसमें सामने से देखने पर उसकी आंखें कम दिखाई देती हैं और शीशे पर कमरे की लाइट या खिड़की का प्रतिबिंब साफ दिखाई देता है। यह उसी परावर्तन का नतीजा है।
साधारण चश्मे में यह परावर्तन ज्यादा दिखाई दे सकता है। अब अगर चश्मा आंखों के ठीक सामने है, तो यह केवल बाहर से देखने वाले व्यक्ति की परेशानी नहीं है। चश्मे की सतह से आने वाली कुछ अनचाही रोशनी पहनने वाले की आंखों तक भी पहुंच सकती है। यहीं एंटी-रिफ्लेक्टिव कोटिंग का काम शुरू होता है।
एंटी-ग्लेयर की पतली परत असल में करती क्या है?
जिसे बाजार में आमतौर पर एंटी-ग्लेयर कहा जाता है, वह अक्सर एंटी-रिफ्लेक्टिव कोटिंग होती है। यह चश्मे की सतह पर लगाई जाने वाली बहुत पतली परतों की व्यवस्था होती है। इसकी मूल तरकीब प्रकाश के व्यवहार पर आधारित है। अलग-अलग पदार्थों की पतली परतें इस तरह बनाई जाती हैं कि सतह से लौटने वाली कुछ रोशनी एक-दूसरे को काफी हद तक कम कर दे। इसे प्रकाश का हस्तक्षेप कहा जाता है।
बहुत आसान भाषा में समझें तो चश्मे की सतह पर ऐसी परत बनाई जाती है जो रोशनी को सीधे वापस उछालने के बजाय उसके परावर्तन को कम करने में मदद करती है।इसका नतीजा यह होता है कि चश्मे पर पहले की तरह तेज सफेद प्रतिबिंब कम दिखाई देता है। ज्यादा रोशनी आंख तक पहुंचाने की क्षमता भी बढ़ सकती है और देखने वाला दृश्य अपेक्षाकृत साफ महसूस कर सकता है।
इसीलिए अच्छी एंटी-रिफ्लेक्टिव कोटिंग वाले चश्मे में सामने से देखने पर शीशा अपेक्षाकृत गायब सा लगता है। आपकी आंखें दूसरे व्यक्ति को ज्यादा साफ दिखाई देती हैं।
एंटी-ग्लेयर का असली काम आंखों में आने वाली हर तेज रोशनी को रोकना नहीं है, बल्कि चश्मे की सतह से होने वाले अनचाहे परावर्तन (रिफ्लेक्शन) को कम करना है।
तो क्या इससे आंखों की थकान कम होती है?
अगर आपकी परेशानी का एक हिस्सा चश्मे पर पड़ने वाले प्रतिबिंब के कारण है, तो रिफ्लेक्शन कम होने से दृश्य ज्यादा साफ और आरामदायक लग सकता है। खासकर ऐसी जगह जहां रोशनी कई दिशाओं से आ रही हो, जैसे दफ्तर, रात में गाड़ी चलाना या तेज कृत्रिम रोशनी वाला कमरा।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि एंटी-ग्लेयर चश्मा पहनते ही डिजिटल आंखों की थकान खत्म हो जाएगी।अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी की जानकारी के मुताबिक डिजिटल आंखों की परेशानी में कम पलक झपकना, सूखी आंख, लंबे समय तक पास की चीज पर ध्यान लगाना, गलत नंबर का चश्मा और रोशनी की स्थिति जैसे कई कारण हो सकते हैं। स्क्रीन पर पड़ने वाला प्रतिबिंब भी परेशानी बढ़ा सकता है।
यानी अगर कोई व्यक्ति दिन में आठ घंटे स्क्रीन देखता है, बहुत कम पलक झपकाता है और बिना ब्रेक काम करता है, तो केवल एंटी-ग्लेयर चश्मा उसकी पूरी समस्या का समाधान नहीं करेगा। यह कुछ वैसा ही है जैसे कमरे में पंखा चला देने से गर्मी थोड़ी कम महसूस हो सकती है, लेकिन अगर कमरे में लगातार धूप आ रही है तो खिड़की से आती गर्मी की समस्या अलग से बनी रहेगी।
रात में गाड़ी चलाते समय एंटी-ग्लेयर कितना काम आता है?
रात में जब सामने से किसी गाड़ी की तेज हेडलाइट आती है तो आंखों पर अचानक तेज रोशनी पड़ती है। अगर चश्मे की सतह पर भी रोशनी का प्रतिबिंब बन जाए तो परेशानी और बढ़ सकती है। एंटी-रिफ्लेक्टिव कोटिंग चश्मे की सतह से बनने वाले प्रतिबिंब को कम कर सकती है। इससे कुछ लोगों को रात में देखने में आराम महसूस हो सकता है। लेकिन इसे हेडलाइट की तेज रोशनी को खत्म करने वाला चश्मा समझना गलत होगा। अगर किसी व्यक्ति को रात में हेडलाइट देखते समय बहुत ज्यादा चकाचौंध, रोशनी के चारों ओर घेरे या धुंधलापन दिखाई देता है, तो इसकी वजह सिर्फ चश्मे का प्रतिबिंब नहीं हो सकती। आंखों का नंबर, सूखी आंख, कॉर्निया की समस्या, मोतियाबिंद या दूसरी आंखों की स्थितियां भी रात में चमक और रोशनी से परेशानी बढ़ा सकती हैं।इसलिए लगातार या बढ़ती हुई रात की चकाचौंध को केवल एंटी-ग्लेयर चश्मे की जरूरत मान लेना ठीक नहीं है।
कंप्यूटर की स्क्रीन पर एंटी-ग्लेयर क्यों उपयोगी हो सकता है?
मान लीजिए आपके पीछे एक खिड़की है और सामने कंप्यूटर। खिड़की से आती रोशनी स्क्रीन पर पड़कर वापस आपकी आंखों की ओर आ रही है। आपको स्क्रीन पर अक्षर दिखाई दे रहे हैं, लेकिन उनके पीछे कमरे का प्रतिबिंब भी दिखाई दे रहा है। अब आपकी आंख और दिमाग को स्क्रीन की जानकारी को उस अतिरिक्त चमक से अलग करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में पढ़ने में असुविधा हो सकती है।
अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी भी डिजिटल आंखों की परेशानी कम करने के लिए आसपास की रोशनी और स्क्रीन पर पड़ने वाले प्रतिबिंब को कम करने की सलाह देती है। जरूरत पड़ने पर मैट स्क्रीन फिल्टर का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।
कई बार समस्या चश्मे में नहीं, कमरे की व्यवस्था में होती है। अगर खिड़की सीधे स्क्रीन के पीछे है, कमरे की लाइट स्क्रीन पर प्रतिबिंब बना रही है या स्क्रीन की चमक आसपास की रोशनी से बहुत अलग है, तो सिर्फ नया चश्मा खरीदने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। स्क्रीन को इस तरह रखना कि खिड़की की सीधी रोशनी उस पर न पड़े, कमरे की रोशनी संतुलित रखना और स्क्रीन की चमक जरूरत के हिसाब से बदलना कई बार ज्यादा प्रभावी कदम हो सकता है।
ग्लेयर आंखों को आखिर नुकसान कैसे पहुंचाती है?
ग्लेयर आम तौर पर आंख को उसी तरह स्थायी नुकसान नहीं पहुंचाती जैसे तेज पराबैंगनी (अल्ट्रा वायलेट) किरणें आंख की सतह को नुकसान पहुंचा सकती हैं। रोजमर्रा के कंप्यूटर या मोबाइल की चमक को लेकर स्थायी आंखों की बीमारी पैदा होने का दावा भी वैज्ञानिक प्रमाण से समर्थित नहीं है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी के मुताबिक कंप्यूटर स्क्रीन की रोशनी से आंखों को स्थायी नुकसान होने का प्रमाण नहीं है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ग्लेयर बेअसर है। तेज प्रतिबिंब या चमक आंखों में दृश्य असुविधा पैदा कर सकती है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति में देखने से आंखों में थकान, सिरदर्द, धुंधलापन या ध्यान लगाने में परेशानी महसूस हो सकती है। डिजिटल आंखों की थकान में रोशनी का गलत प्रबंधन एक योगदान देने वाला कारण हो सकता है। इसका असर खासकर तब ज्यादा महसूस हो सकता है जब व्यक्ति पहले से आंखों की किसी समस्या से जूझ रहा हो, जैसे सूखी आंख या बिना सुधारा हुआ नंबर।
ग्लेयर और सूखी आंख का भी रिश्ता है
जब हम स्क्रीन पर बहुत ध्यान लगाकर देखते हैं तो हमारी पलक झपकने की दर कम हो सकती है। इससे आंख की सतह पर मौजूद आंसुओं की परत तेजी से टूटती है और आंख सूखने लगती है। सूखी आंख में पहले से ही जलन, चुभन, लालिमा और रोशनी से परेशानी हो सकती है। ऐसे में स्क्रीन की चमक और प्रतिबिंब समस्या को और ज्यादा महसूस करा सकते हैं। अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी के अनुसार सामान्य स्थिति में इंसान करीब 15 बार प्रति मिनट पलक झपक सकता है, लेकिन स्क्रीन या लगातार पास का काम करते समय यह दर काफी कम हो सकती है।
इसलिए अगर कोई व्यक्ति कहता है कि कंप्यूटर देखने पर आंखें जलती हैं तो तुरंत यह मान लेना कि उसे ब्लू-लाइट या एंटी-ग्लेयर चश्मा चाहिए, सही तरीका नहीं है। हो सकता है असली समस्या आंखों की नमी, गलत नंबर या लगातार बिना ब्रेक स्क्रीन देखने की हो।
एंटी-ग्लेयर और ब्लू-कट चश्मे को एक क्यों समझ लिया जाता है?
एंटी-रिफ्लेक्टिव कोटिंग का मुख्य काम चश्मे से होने वाले प्रकाश के परावर्तन को कम करना है।
ब्लू-लाइट फिल्टर का उद्देश्य नीली रोशनी के कुछ हिस्से को कम करना है।
दोनों को एक ही चश्मे में लगाया जा सकता है, इसलिए बाजार में कई चश्मे ऐसे मिलते हैं जिन्हें एक साथ ब्लू कट एंटी-ग्लेयर कहा जाता है। लेकिन ब्लू-लाइट को लेकर किए जाने वाले कई बड़े दावों से सावधान रहना चाहिए। अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी के अनुसार स्क्रीन से आने वाली नीली रोशनी को आंखों को स्थायी नुकसान पहुंचाने वाला साबित नहीं किया गया है और डिजिटल आंखों की थकान के लिए विशेष ब्लू-लाइट चश्मे की जरूरत का पर्याप्त प्रमाण नहीं है। अगर चश्मे की दुकान पर कोई यह कहे कि ब्लू कट नहीं लगाया तो मोबाइल आपकी आंख खराब कर देगा, तो इस दावे को वैज्ञानिक तथ्य मान लेना ठीक नहीं होगा।
एंटी-ग्लेयर चश्मे के कुछ और फायदे भी हैं
इस कोटिंग का फायदा केवल पहनने वाले को नहीं होता। चश्मे पर कम प्रतिबिंब होने से दूसरे व्यक्ति को पहनने वाले की आंखें भी ज्यादा साफ दिखाई देती हैं। फोटो खिंचवाते समय भी तेज फ्लैश का प्रतिबिंब कुछ हद तक कम दिखाई दे सकता है।
एक और फायदा यह है कि अगर चश्मे के दोनों तरफ का अनचाहा रिफ्लेक्शन कम हो तो लेंस से गुजरने वाली रोशनी का उपयोग बेहतर हो सकता है। खासकर उच्च नंबर के चश्मों में यह फर्क कुछ लोगों को ज्यादा महसूस हो सकता है। हालांकि कोटिंग की गुणवत्ता महत्वपूर्ण है। सस्ती या खराब कोटिंग पर खरोंच, उंगलियों के निशान और सफाई की समस्या जल्दी दिखाई दे सकती है। इसलिए चश्मा लेते समय केवल "एंटी-ग्लेयर है या नहीं" पूछने के बजाय कोटिंग की गुणवत्ता, टिकाऊपन और देखभाल के तरीके के बारे में भी पूछना बेहतर है।
क्या एंटी-ग्लेयर चश्मा हर किसी को चाहिए?
अगर किसी व्यक्ति को चश्मे पर प्रतिबिंब से कोई परेशानी नहीं होती, वह कम स्क्रीन इस्तेमाल करता है और रोशनी की स्थिति भी ठीक है, तो एंटी-रिफ्लेक्टिव कोटिंग कोई अनिवार्य चीज नहीं है।
लेकिन जिन लोगों को लंबे समय तक कंप्यूटर पर काम करना पड़ता है, रात में ड्राइविंग करनी होती है, चश्मे पर रोशनी के प्रतिबिंब से परेशानी होती है या तेज रोशनी में देखने में असुविधा होती है, उनके लिए यह उपयोगी विकल्प हो सकता है। यह भी याद रखना चाहिए कि एंटी-ग्लेयर कोई इलाज नहीं है। यह चश्मे की सतह से होने वाले परावर्तन को कम करने वाली तकनीक है। अगर आंखों में लगातार दर्द, धुंधलापन, रोशनी से असामान्य संवेदनशीलता, बार-बार सिरदर्द या रात में बहुत ज्यादा चकाचौंध होती है, तो केवल नया चश्मा खरीदने के बजाय आंखों की जांच कराना बेहतर है।
आंखों को ग्लेयर से बचाने का सबसे आसान तरीका चश्मा नहीं, सही रोशनी है
मान लीजिए आप रोज आठ घंटे कंप्यूटर पर काम करते हैं। आपके पीछे खिड़की है, स्क्रीन पर कमरे की लाइट पड़ रही है और आप लगातार स्क्रीन देख रहे हैं। ऐसे में सबसे महंगा एंटी-ग्लेयर चश्मा भी पूरी समस्या खत्म नहीं करेगा। स्क्रीन को खिड़की की सीधी रोशनी से हटाना, कमरे की रोशनी संतुलित रखना, स्क्रीन की चमक को आसपास की रोशनी के हिसाब से रखना और नियमित अंतराल पर दूर देखना ज्यादा समझदारी है।
20-20-20 नियम भी मदद कर सकता है। यानी करीब हर 20 मिनट में कम से कम 20 सेकंड के लिए लगभग 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखना। साथ ही पलक झपकाना याद रखना जरूरी है। अगर आंखें सूखती हैं तो चिकित्सकीय सलाह के अनुसार कृत्रिम आंसू भी मदद कर सकते हैं।
असली बात: एंटी-ग्लेयर आंखों को जादुई सुरक्षा नहीं देता
एंटी-ग्लेयर चश्मे को लेकर दो अतियां हैं। एक तरफ कुछ लोग इसे बेकार मानते हैं और दूसरी तरफ कुछ विज्ञापन इसे आंखों की लगभग हर समस्या का समाधान बताते हैं। दोनों बातें पूरी तरह सही नहीं हैं।
इसकी असली उपयोगिता काफी सीधी है। चश्मे की सतह से आने वाले अनचाहे प्रतिबिंब को कम करना।
इससे कुछ परिस्थितियों में दृश्य साफ और आरामदायक लग सकता है। खासकर कंप्यूटर स्क्रीन, तेज कृत्रिम रोशनी और रात में सामने से आती रोशनी के समय इसका फायदा महसूस हो सकता है। लेकिन अगर आंखों में परेशानी का कारण सूखी आंख, गलत नंबर, लगातार बिना ब्रेक काम करना या आंखों की कोई बीमारी है, तो केवल एंटी-ग्लेयर कोटिंग समस्या को हल नहीं करेगी।
और सबसे जरूरी बात, ग्लेयर से होने वाली असुविधा और आंखों को स्थायी नुकसान एक ही बात नहीं हैं। सामान्य स्क्रीन इस्तेमाल से होने वाली डिजिटल आंखों की थकान आम तौर पर अस्थायी होती है और ब्रेक, बेहतर रोशनी, सही देखने की दूरी और पलक झपकाने जैसी आदतों से कम की जा सकती है।
इसलिए अगली बार चश्मे की दुकान पर कोई कहे कि "एंटी-ग्लेयर नहीं लगाया तो मोबाइल की रोशनी आपकी आंखें खराब कर देगी", तो इस दावे को सच मानने से पहले रुकिए।
एंटी-ग्लेयर का असली कमाल कहीं ज्यादा साधारण है, लेकिन उपयोगी भी। यह आपकी आंखों के सामने आने वाली रोशनी को जादुई तरीके से बदलता नहीं, बल्कि चश्मे की सतह से पैदा होने वाले उस अनचाहे प्रतिबिंब को कम करता है जो देखने के रास्ते में बेवजह चमक पैदा कर रहा होता है।


