Anti Snake Venom: एंटी स्नेक वेनम कैसे बनता है? घोड़े के खून का क्या है पूरा विज्ञान?

Anti Snake Venom: सांप के जहर से एंटी स्नेक वेनम कैसे बनता है? जानिए घोड़े की एंटीबॉडी, वेनम मिल्किंग, बिग फोर सांपों, एंटीवेनम निर्माण और इसके पीछे का पूरा विज्ञान।

Neel Mani Lal
Published on: 13 Aug 2026 5:42 PM IST
Anti Snake Venom Explained Hindi News
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Anti Snake Venom: सांप के काटने के बाद अस्पताल में लगने वाली एंटी स्नेक वेनम (anti snake venom) की शीशी देखने में बहुत सामान्य लगती है। लेकिन इसके पीछे की कहानी बेहद दिलचस्प है। जिस जहर से इंसान की जान जा सकती है, उसी जहर की बेहद नियंत्रित मात्रा का इस्तेमाल ऐसी दवा बनाने में किया जाता है जो उस जहर के असर को रोक सकती है। और इस पूरी प्रक्रिया में एक ऐसा जानवर सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिसकी शायद आपने कल्पना भी नहीं की होगी - घोड़ा। एंटी स्नेक वेनम (anti snake venom) यानी एंटीवेनम (anti venom) कोई ऐसा केमिकल नहीं है जो सीधे सांप के जहर को ‘काट’ देता है। यह असल में एंटीबॉडीज (antibodies) का मिश्रण है। ये एंटीबॉडीज जहर के जहरीले हिस्सों यानी टॉक्सिन (toxin) को पहचानकर उनसे चिपकती हैं और उन्हें शरीर की कोशिकाओं (cells) पर असर करने से रोकने में मदद करती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक आज भी सांप के जहर से होने वाली गंभीर विषाक्तता (toxicity) का सबसे प्रभावी विशिष्ट इलाज एंटीवेनम ही है।

सांप के जहर से दवा तक का सफर

सबसे पहले सवाल आता है कि दवा बनाने वाली कंपनी को सांप का जहर मिलता कहां से है? जवाब है कि ये सांप से ही मिलता है। इसके लिए जहरीले सांपों को सुरक्षित तरीके से रखा जाता है और प्रशिक्षित विशेषज्ञ उनसे जहर निकाला करते हैं। इस प्रक्रिया को आम तौर पर वेनम मिल्किंग (venom milking) कहा जाता है। निकाले गए जहर को नियंत्रित परिस्थितियों में प्रोसेस करके आगे इस्तेमाल किया जाता है।

भारत में एंटीवेनम के लिए लंबे समय से चार प्रमुख सांपों के जहर का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इन्हें भारत का ‘बिग फोर’ कहा जाता है: इंडियन कोबरा (Indian cobra), कॉमन क्रेट common krait), रसेल वाइपर (russel viper) और सॉ-स्केल्ड वाइपर (saw-scaled viper)। भारतीय पॉलीवैलेंट एंटी स्नेक वेनम (polyvalent anti snake venom) इन्हीं चार सांपों के जहर के खिलाफ एंटीबॉडी तैयार करने के लिए बनाया जाता है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात है। भारत में सांपों की बहुत-सी दूसरी जहरीली प्रजातियां भी हैं और उनके जहर की संरचना अलग हो सकती है। इसलिए ‘बिग फोर’ वाला एंटीवेनम हर जहरीले सांप के काटने के लिए समान रूप से प्रभावी होगा, ऐसा मानना सही नहीं है। एंटीवेनम की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि जिस सांप के जहर से इसे बनाया गया है और जिस सांप ने काटा है, उनके जहर में कितनी समानता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी इस बात पर जोर देता है कि एंटीवेनम में इस्तेमाल होने वाला जहर उस इलाके में पाए जाने वाले चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण सांपों से सही तरीके से लिया जाना बेहद जरूरी है।

सांप के जहर को घोड़े में क्यों डाला जाता है?

मान लीजिए वैज्ञानिकों के पास कोबरा का जहर है। अगर यही जहर किसी इंसान के शरीर में चला जाए तो गंभीर नुकसान हो सकता है। लेकिन वैज्ञानिक इसी जहर की बहुत नियंत्रित और सुरक्षित मात्रा से घोड़े की प्रतिरोधक क्षमता (resistance capacity) को प्रशिक्षित करते हैं। घोड़े को जहर की ऐसी मात्रा दी जाती है जो उसकी जान के लिए खतरनाक न हो। समय के साथ और नियंत्रित तरीके से उसकी प्रतिरोधक क्षमता को उस जहर के खिलाफ मजबूत किया जाता है। घोड़े की प्रतिरक्षा प्रणाली जहर में मौजूद टॉक्सिन को बाहरी खतरे के रूप में पहचानती है और उनके खिलाफ एंटीबॉडी बनाना शुरू करती है। यानी वैज्ञानिक सांप के जहर को घोड़े के शरीर में इस तरह पेश करते हैं कि घोड़ा खुद उसके खिलाफ “हथियार” बनाने लगे। WHO के मुताबिक एंटीवेनम बनाने के लिए आम तौर पर घोड़े या भेड़ जैसे जानवरों को संबंधित जहर के खिलाफ प्रतिरक्षित किया जाता है। इसके बाद उनके प्लाज्मा से एंटीबॉडी हासिल की जाती हैं।

घोड़े के शरीर में असल में क्या होता है?

जब जहर की नियंत्रित मात्रा घोड़े की प्रतिरक्षा प्रणाली के सामने आती है तो उसका शरीर उस जहर में मौजूद अलग-अलग प्रोटीन और टॉक्सिन को पहचानना शुरू करता है। इसके बाद बी-कोशिकाएं (B cells) सक्रिय होती हैं और उनके जरिए खास एंटीबॉडी बनने लगती हैं। इन्हें आप शरीर के ताले की सही चाभी ढूंढने वाले सुरक्षा गार्ड की तरह समझ सकते हैं। जहर में मौजूद कोई खास टॉक्सिन एक लक्ष्य है और उसके खिलाफ बनी एंटीबॉडी उस लक्ष्य को पहचानकर उससे जुड़ सकती है। समय के साथ घोड़े के खून में इन एंटीबॉडी की पर्याप्त मात्रा जमा हो जाती है। अब वैज्ञानिकों के पास वह चीज आ जाती है जिसकी उन्हें जरूरत है यानी जहर के खिलाफ तैयार एंटीबॉडी।

फिर घोड़े का पूरा खून इस्तेमाल नहीं होता

यहां एक और गलतफहमी दूर करना जरूरी है। एंटीवेनम बनाने के लिए घोड़े का पूरा खून मरीज को नहीं चढ़ाया जाता। घोड़े से रक्त लिया जाता है और उसमें से प्लाज्मा अलग किया जाता है। प्लाज्मा (plasma) वह तरल हिस्सा है जिसमें एंटीबॉडी सहित कई प्रोटीन होते हैं। इसके बाद औद्योगिक प्रक्रिया के जरिए जरूरी इम्युनोग्लोबुलिन (immunoglobin) यानी एंटीबॉडी वाले हिस्से को अलग और शुद्ध किया जाता है। WHO के अनुसार अलग-अलग घोड़ों से प्राप्त प्लाज्मा को बैच में मिलाया जा सकता है और फिर उससे सक्रिय इम्युनोग्लोबुलिन अंश निकाला जाता है। इसके बाद उसे शुद्ध, स्थिर और सुरक्षित बनाकर एंटीवेनम तैयार किया जाता है।

एंटीबॉडी जहर को खत्म कैसे करती है?

अब एंटीवेनम के काम करने का असली विज्ञान समझिए। सांप के जहर में एक ही तरह का पदार्थ नहीं होता। उसमें कई तरह के टॉक्सिन और प्रोटीन हो सकते हैं। कुछ नसों और मांसपेशियों के बीच संदेश पहुंचने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं, कुछ खून के जमने की प्रक्रिया को बिगाड़ सकते हैं और कुछ ऊतकों (tissue) तथा अंगों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। एंटीवेनम में मौजूद एंटीबॉडी इन टॉक्सिन को पहचानकर उनसे जुड़ सकती हैं। इससे टॉक्सिन के लिए शरीर की कोशिकाओं पर अपना असर डालना मुश्किल हो जाता है और शरीर उसे हटाने की प्रक्रिया में आगे बढ़ सकता है।

इसे ऐसे समझिए: सांप का जहर शरीर में घुसकर अलग-अलग ताले खोलने वाली चाबियों का एक गुच्छा है। एंटीवेनम में ऐसी चीजें हैं जो उन चाबियों को पकड़कर उन्हें बेकार करने की कोशिश करती हैं। इसी वजह से एंटीवेनम जितनी जल्दी सही मरीज को दिया जाए, उतना बेहतर हो सकता है। हालांकि इसकी जरूरत, मात्रा और दोबारा देने का फैसला मरीज के लक्षणों और चिकित्सकीय स्थिति के आधार पर डॉक्टर करते हैं।

भारत में एक शीशी चार सांपों के खिलाफ कैसे काम करती है?

भारत में आम तौर पर इस्तेमाल होने वाला पॉलीवैलेंट एंटीवेनम ‘हर सांप के लिए एक दवा’ नहीं है। इसे चार प्रमुख सांपों के जहर के खिलाफ तैयार किया जाता है। यानी घोड़े को सिर्फ कोबरा के जहर के खिलाफ ही प्रतिरक्षित नहीं किया जाता। पॉलीवैलेंट एंटीवेनम के लिए कोबरा, क्रेट, रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर के जहर के खिलाफ प्रतिरक्षा विकसित कराई जाती है। इसके बाद तैयार एंटीबॉडी का मिश्रण उन चारों जहरों के खिलाफ काम करने की क्षमता रखता ।

उदाहरण के लिए अपने भारतीय पॉलीवैलेंट एंटी स्नेक वेनम में इन चारों जहरों के खिलाफ एंटीबॉडी की क्षमता बताता है। कंपनी के अनुसार उसके उत्पाद में प्रति मिलीलीटर इंडियन कोबरा, कॉमन क्रेट, रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर के जहर को निष्क्रिय करने की निर्धारित क्षमता होती है।

एंटीवेनम को पाउडर क्यों बनाया जाता है?

अस्पताल में मिलने वाली कुछ एंटीवेनम शीशियों में दवा तरल रूप में होती है, जबकि कुछ को फ्रीज-ड्राइड यानी लाइफिलाइज्ड पाउडर के रूप में रखा जाता है। लाइफिलाइजेशन यानी फ्रीज-ड्राइंग में दवा को नियंत्रित तरीके से सुखाया जाता है ताकि वह लंबे समय तक स्थिर रह सके। इस्तेमाल से पहले इसे दिए गए घोल में मिलाकर तैयार किया जाता है। यह सिर्फ सुविधा का मामला नहीं है। जैविक दवाओं में स्थिरता बहुत महत्वपूर्ण होती है। इन्हें सही तापमान और निर्माता के निर्देशों के मुताबिक रखना जरूरी होता है।

क्या हर सांप के लिए अलग एंटीवेनम बनता है?

दुनिया में दोनों तरह के एंटीवेनम मिलते हैं - मोनोवैलेंट और पॉलीवैलेंट। मोनोवैलेंट (monovalent) किसी एक सांप या एक विशेष जहर के खिलाफ तैयार किया जाता है। पॉलीवैलेंट (polyvalent) में कई सांपों के जहर के खिलाफ एंटीबॉडी शामिल होती हैं। भारत में बिग फोर के कारण पॉलीवैलेंट एंटीवेनम का इस्तेमाल महत्वपूर्ण है। इसका एक बड़ा फायदा यह है कि हर बार सांप की प्रजाति की सटीक पहचान करना जरूरी नहीं पड़ती, खासकर तब जब मरीज गंभीर लक्षणों के साथ अस्पताल पहुंचा हो। डॉक्टर लक्षणों और जांच के आधार पर उपचार तय करते हैं।

लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है कि अगर किसी इलाके में ऐसे सांप की प्रजाति ज्यादा है जिसका जहर मानक एंटीवेनम में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं है, तो उपचार की चुनौती बढ़ सकती है।

भारत में एंटीवेनम कौन-कौन बनाता है?

भारत एंटी स्नेक वेनम बनाने वाले महत्वपूर्ण देशों में शामिल है। प्रमुख निर्माताओं में विन्स बायोप्रोडक्ट्स (VINS Bioproducts), भारत सीरम्स एंड वैक्सीन्स (Bharat Serums and Vaccines), बायोलॉजिकल ई (Biological E), हाफ्किन बायोफार्मास्यूटिकल (Haffkine Biopharmaceutical Corporation), प्रीमियम सीरम्स एंड वैक्सीन्स (Premium Serums and Vaccines) और विर्चो बायोटेक (Virchow Biotech) जैसे नाम शामिल हैं। सरकारी आंकड़ों में सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया (Serum Institute of India) और सेंटर; रिसर्च इंस्टिट्यूट (Central Research Institute) का भी उल्लेख किया गया है।

WHO की दक्षिण एशिया से संबंधित सूची में भी भारत के कई एंटीवेनम उत्पादों और निर्माताओं का उल्लेख है, जिनमें Bharat Serums and Vaccines, Biological E, Haffkine, Premium Serums और VINS शामिल हैं। VINS के मुताबिक उसके पास तेलंगाना में उत्पादन संयंत्र और 2,000 से ज्यादा इक्वाइन वाला फार्म नेटवर्क है तथा कंपनी 110 से ज्यादा देशों में अपने उत्पादों की आपूर्ति करती है।

भारत में सबसे ज्यादा एंटीवेनम बनाने वाली कंपनियां कौन सी हैं?

सरकारी आंकड़ों में अलग-अलग निर्माताओं की स्थापित क्षमता भी बताई गई है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों में Bharat Serums and Vaccines की क्षमता 21 लाख शीशियां प्रति वर्ष, Premium Serums and Vaccines की 14.4 लाख, VINS की 13.6 लाख, Biological E की 8.4 लाख, Haffkine की 4.5 लाख और Virchow Biotech की 4.32 लाख शीशियां प्रति वर्ष बताई गई थीं। ये आंकड़े स्थापित उत्पादन क्षमता हैं, वास्तविक सालाना उत्पादन जरूरी नहीं कि इतना ही हो। इस पूरी इंडस्ट्री में एक और दिलचस्प नाम है Biological E जिसका पॉलीवैलेंट स्नेक एंटीवेनम WHO की दक्षिण एशिया वाली सूची में दर्ज है।

असली चुनौती सिर्फ एंटीवेनम बनाना नहीं है

सवाल सिर्फ यह नहीं है कि एंटीवेनम बनाया जा सकता है या नहीं। असली सवाल है, क्या यह उस इलाके में पाए जाने वाले सांपों के जहर के खिलाफ पर्याप्त असरदार है? यही वजह है कि वैज्ञानिकों के बीच क्षेत्रीय जहर के अंतर को लेकर लगातार चर्चा होती रहती है। एक ही प्रजाति के सांप के जहर में भी अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में कुछ अंतर पाया जा सकता है। इसलिए जिस क्षेत्र के सांपों के जहर से एंटीवेनम बनाया गया है, उसका उस क्षेत्र में होने वाले सांप के काटने के खिलाफ प्रभावी होना बेहद महत्वपूर्ण है।

सांप का जहर ही दवा बनाने का कच्चा माल क्यों है?

यह सुनने में अजीब लगता है कि जिस चीज से बीमारी हो रही है, उसी चीज से इलाज की दवा कैसे बनाई जा सकती है। लेकिन शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का यही कमाल है। अगर शरीर को किसी बाहरी टॉक्सिन की पहचान करा दी जाए तो वह उसके खिलाफ एंटीबॉडी बना सकता है। एंटीवेनम बनाने वाली पूरी तकनीक इसी सिद्धांत का इस्तेमाल करती है। वैज्ञानिक सांप के जहर को खुद मरीज को देने के बजाय पहले घोड़े की प्रतिरक्षा प्रणाली को उसके खिलाफ प्रशिक्षित करते हैं। फिर घोड़े के शरीर में बनी एंटीबॉडी को अलग करके शुद्ध किया जाता है और दवा के रूप में तैयार किया जाता है। यानी सांप का जहर कच्चा माल है, घोड़ा एंटीबॉडी बनाने वाली जैविक फैक्ट्री है और एंटीबॉडी असली दवा का सक्रिय हिस्सा है।

क्या भविष्य में घोड़े की जरूरत खत्म हो जाएगी?

वैज्ञानिक अब ऐसे एंटीवेनम पर भी काम कर रहे हैं जो पारंपरिक घोड़ा-आधारित तकनीक पर कम निर्भर हो। WHO के मुताबिक भविष्य की संभावनाओं में मोनोक्लोनल, रिकॉम्बिनेंट और ह्यूमनाइज्ड एंटीबॉडी आधारित उपचार तथा छोटे अणुओं वाली ऐसी दवाएं शामिल हैं जो जहर के खास हिस्सों को निष्क्रिय कर सकें। इसका मतलब यह नहीं है कि घोड़े से बनने वाला एंटीवेनम जल्द खत्म हो जाएगा। फिलहाल पारंपरिक एंटीवेनम ही दुनिया के कई हिस्सों में सबसे महत्वपूर्ण विशिष्ट उपचार है। लेकिन भविष्य की कोशिश ऐसी दवा बनाने की है जो ज्यादा सटीक हो, अलग-अलग सांपों के जहर के खिलाफ बेहतर काम करे और उत्पादन में पशुओं पर निर्भरता कम करे।

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