मरकर 12 साल बाद साधु बनकर लौटा राजकुमार? Bhawal Sannyasi Case की हैरान करने वाली कहानी

Bhawal Sannyasi Case Story: भावल संन्यासी केस की रहस्यमयी कहानी जानिए, जिसमें रमेंद्र नारायण रॉय की मौत के 12 साल बाद एक साधु ने खुद को वही राजकुमार बताया और पहचान का मुकदमा 16 साल तक अदालतों में चला।

Neel Mani Lal
Published on: 3 Oct 2026 7:43 PM IST
Bhawal Sannyasi Case
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Bhawal Sannyasi Case

Bhawal Sannyasi Case Story: बंगाल के किसी गांव में आज भी बुज़ुर्ग लोग एक किस्सा सुनाते हैं, एक ऐसे राजकुमार का जिसे जला दिया गया, जिसकी राख तक बिखेर दी गई, लेकिन बारह साल बाद वही राजकुमार राख से उठकर, एक साधु के भेष में, अपने ही राज्य की दहलीज़ पर वापस आ खड़ा हुआ। यह कोई लोककथा नहीं, बल्कि भारत और ब्रिटेन की अदालतों में सोलह साल तक चला एक असली मुकदमा है, जिसने न सिर्फ पूरे बंगाल को झकझोरा बल्कि लंदन की प्रिवी काउंसिल तक को उलझन में डाल दिया। इस कहानी का नाम है भावल संन्यासी केस।

वह राजसी परिवार जिसकी तीन पीढ़ियां बर्बाद हो गईं

ढाका के पास भावल नाम की एक विशाल और बेहद धनी ज़मींदारी हुआ करती थी, जिसके महल में कहा जाता है कि तीन सौ पैंसठ कमरे थे, और इसे बनाने वाले वास्तुकार वही माने जाते थे जिन्होंने अमेरिका का व्हाइट हाउस डिज़ाइन किया था। उन्नीस सौ एक में इस ज़मींदारी के राजा रजेंद्र नारायण रॉय का निधन हो गया, और पीछे छोड़ गए तीन बेटे, रणेंद्र, रमेंद्र और रवींद्र, जो तीनों मिलकर इस विशाल जायदाद के वारिस बने। इनमें से दूसरा कुमार, रमेंद्र नारायण रॉय, इसी कहानी का असली केंद्र है। रमेंद्र का बचपन और जवानी दोनों ही विलासिता और भोगविलास में बीती। परिवार की दौलत ने उन्हें पढ़ाई लिखाई से दूर रखा और शिकार, दावतों और कई रखैलों के साथ ज़िंदगी बिताने की आदत दे दी। इसी जीवनशैली का नतीजा यह निकला कि उन्हें सिफलिस नाम की गंभीर यौन संक्रामक बीमारी हो गई। उन्नीस सौ नौ की शुरुआत में बीमारी गंभीर होने लगी, और परिवार वालों की सलाह पर, खासकर उनकी पत्नी बिभावती देवी के भाई सत्येन बनर्जी के कहने पर, उन्हें इलाज के लिए दार्जिलिंग भेजा गया, जहां का ठंडा मौसम उस दौर में कई बीमारियों के इलाज के लिए मुफीद माना जाता था।

दार्जिलिंग की वह रात जब राजकुमार मर गया

दार्जिलिंग में कुछ ही हफ्तों के भीतर रमेंद्र की हालत बिगड़ने लगी। आठ मई 1909 को स्थानीय डॉक्टर ने घोषणा की कि उनकी मृत्यु हो चुकी है, और कारण बताया गया पित्त की गंभीर शिकायत। उसी रात घनघोर बारिश और तूफान के बीच उनका अंतिम संस्कार किया गया। लेकिन यहीं से इस कहानी की पहली गांठ बंधती है। कई नौकरों ने बाद में दावा किया कि संस्कार की रस्म अधूरी छोड़ी गई थी, क्योंकि तेज़ तूफान की वजह से वहां मौजूद लोग शव को वैसे ही छोड़कर शरण लेने भाग गए थे। कुछ और अफवाहें यह भी फैलीं कि राजकुमार की उल्टी इतनी तेज़ाबी थी कि उसने उनके कपड़ों में छेद कर दिए थे, जो उस दौर के ज़हर देने की आशंका से जुड़ी अटकलों को और हवा देती थीं। मृत्यु की खबर भावल भेज दी गई, पूरा राज्य शोक में डूब गया, और धीरे धीरे ज़िंदगी सामान्य ढर्रे पर लौट आई। अगले कुछ सालों में बाकी दोनों भाई भी बिना किसी संतान के चल बसे, और पूरी ज़मींदारी कोर्ट ऑफ वार्ड्स नाम की सरकारी संरक्षण व्यवस्था के अधीन चली गई।

बारह साल बाद वह साधु जो ढाका की गलियों में प्रकट हुआ

रमेंद्र की मौत के करीब बारह साल बाद, 1921 में ढाका के सदरघाट इलाके में एक अजीब साधु दिखना शुरू हुआ। गोरी चमड़ी, लंबी जटाएं, शरीर पर राख, यह संन्यासी खुद को सुंदरदास कहता था। लेकिन जल्द ही लोगों का ध्यान एक अजीब बात पर गया, उसका चेहरा और शरीर मृत कुमार रमेंद्र से हैरान करने वाली हद तक मिलता जुलता था। धीरे धीरे यह खबर फैलने लगी, भीड़ जुटने लगी, और आखिरकार खुद रमेंद्र की दो बहनों ने उसे देखकर पहचान लिया कि यह उनका खोया हुआ भाई ही है। शुरुआत में यह संन्यासी खुद को रमेंद्र नहीं मानता था, बल्कि उसने एक अजीब कहानी सुनाई। उसके मुताबिक उसे कुछ भी ठीक से याद नहीं, सिवाय इसके कि वह किसी अंधेरे जंगल में होश में आया था, उसका दिमाग कुछ सालों तक जैसे खाली सा रहा, और धीरे धीरे पुरानी यादें टुकड़ों में लौटने लगीं। आखिरकार सैकड़ों लोगों के दबाव में उसने खुले तौर पर स्वीकार किया कि वह और कोई नहीं, बल्कि भावल का दूसरा कुमार रमेंद्र नारायण रॉय है।

परिवार दो हिस्सों में बंट गया

इस दावे ने पूरे भावल परिवार को दो धड़ों में बांट दिया। रमेंद्र की बहनें, उनकी नानी और कई पुराने प्रजा और किसान उसे तुरंत अपना खोया हुआ राजकुमार मानने लगे, क्योंकि वह महल की बारीक बारीक बातें, पुराने नौकरों के नाम और निजी आदतें इतनी सफाई से बता पाता था कि किसी बाहरी इंसान के लिए यह जानना लगभग नामुमकिन लगता था। लेकिन दूसरी तरफ उसकी विधवा बताई जाने वाली पत्नी बिभावती देवी, जो अब कलकत्ता में रह रही थीं, उन्होंने इस साधु को अपना पति मानने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ऑफ वार्ड्स, जो अब तक इस विशाल ज़मींदारी का प्रशासन संभाल रहा था, उसने भी इस दावे को खारिज कर दिया। यहीं पर कहानी में एक गहरा संदेह भी जुड़ता है। कुछ लोगों का मानना था कि बिभावती और उनके भाई सत्येन पर यह शक किया जाता रहा कि कहीं उन्होंने ही रमेंद्र को ज़हर देकर मरवाया हो, ताकि जायदाद पर उनका नियंत्रण बना रहे। यह शक कभी अदालत में पूरी तरह साबित नहीं हुआ, लेकिन इसी ने पूरे मामले को और भी ज़्यादा सनसनीखेज़ बना दिया।

अदालत का वह मुकदमा जो सोलह साल तक चला

जब सुलह की सारी कोशिशें नाकाम हो गईं, तो चौबीस अप्रैल 1930 को इस संन्यासी की तरफ से ढाका की अदालत में एक मुकदमा दाखिल किया गया, जिसमें उसने अपनी असली पहचान और जायदाद पर अपने हिस्से का दावा किया। यह मुकदमा जज पन्नालाल बोस की अदालत में चला, और इसमें सैकड़ों गवाह पेश हुए, दर्जनों पुराने नौकर, रिश्तेदार और डॉक्टर बुलाए गए, और फोरेंसिक विशेषज्ञों ने शरीर पर मौजूद पुराने निशानों, चोटों और जन्मजात चिन्हों की बारीकी से जांच की। बाईस दिसंबर 1936 को, करीब छह साल की सुनवाई के बाद, जज बोस ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि यह संन्यासी सच में कुमार रमेंद्र नारायण रॉय ही है। यह फैसला उस दौर के ब्रिटिश प्रशासनिक ढांचे की जड़ों तक हिला देने वाला साबित हुआ, क्योंकि इसका मतलब था कि कोर्ट ऑफ वार्ड्स ने सालों तक एक ज़िंदा इंसान को मरा हुआ मानकर उसकी जायदाद पर कब्ज़ा रखा। विधवा पक्ष ने इस फैसले को कलकत्ता हाई कोर्ट में चुनौती दी, जहां भी फैसला उनके खिलाफ ही गया। आखिरी उम्मीद के तौर पर मामला लंदन की प्रिवी काउंसिल तक पहुंचा, जो उस दौर में ब्रिटिश भारत की सबसे ऊंची न्यायिक अदालत मानी जाती थी।

लंदन का वह फैसला और वह आखिरी शाम

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, तीस जुलाई 1946 को प्रिवी काउंसिल ने अपना अंतिम फैसला सुनाया, और इसमें भी संन्यासी के पक्ष में फैसला आया, यानी सोलह साल की कानूनी लड़ाई में तीन अलग अलग अदालतों ने एक सुर में यही माना कि यह साधु वाकई भावल का खोया हुआ राजकुमार है। लेकिन इस कहानी का सबसे नाटकीय मोड़ अभी बाकी था। जिस शाम कलकत्ता को यह खबर तार के ज़रिए मिली कि लंदन में फैसला उनके पक्ष में आ गया है, उसी शाम खुशी में रमेंद्र नारायण रॉय काली मंदिर में आभार व्यक्त करने गए। लेकिन उसी रात उन्हें अचानक एक गंभीर दौरा पड़ा, और दो दिन बाद उनका निधन हो गया। यानी जिस इंसान ने बारह साल तक मरा हुआ माना जाना झेला, जिसने सोलह साल तक अदालतों में अपनी ज़िंदगी साबित करने की लड़ाई लड़ी, वह आखिरी जीत का स्वाद चखते ही, जीत की खबर सुनने के महज़ दो दिन के भीतर, हमेशा के लिए दुनिया छोड़ गया।

आखिर सच क्या था

आज भी इतिहासकारों और लेखकों में इस बात पर बहस जारी है कि असली सच्चाई क्या थी। एक तरफ अदालत के सामने पेश किए गए सबूत बेहद मज़बूत थे, शरीर पर मौजूद इक्कीस खास पहचान चिन्हों में से उन्नीस का मेल खाना, परिवार के कई सदस्यों की पहचान, और महल की बेहद निजी जानकारी का होना, यह सब किसी धोखेबाज़ के लिए जुटाना लगभग असंभव माना जाता था। कुछ डॉक्टरों ने यह भी सुझाव दिया कि शायद रमेंद्र पूरी तरह मरे नहीं थे, बल्कि किसी गहरी बेहोशी या कैटेलेप्सी जैसी हालत में चले गए थे, जिसे उस दौर के डॉक्टरों ने मृत्यु समझ लिया, और तूफान की अफरातफरी में उन्हें जलाए बिना ही छोड़ दिया गया, जहां से वे होश में आकर भटकते हुए एक संन्यासी का जीवन अपना बैठे।

दूसरी तरफ उनकी पत्नी बिभावती देवी ने आखिरी सांस तक इस दावे को नहीं माना। प्रिवी काउंसिल के फैसले के बाद भी उन्होंने कभी यह स्वीकार नहीं किया कि यह व्यक्ति उनका पति था, और उनके लिए रमेंद्र नारायण रॉय 1909 में दार्जिलिंग में ही हमेशा के लिए खत्म हो चुके थे। यह बात खुद में हैरान करती है कि जिस औरत को कानूनी तौर पर हार मिल चुकी थी, वह निजी तौर पर आखिर तक अपनी बात पर अडिग रही।

एक कहानी जो आज भी किताबों और फिल्मों में ज़िंदा है

भावल संन्यासी केस इतना मशहूर हुआ कि इस पर बांग्ला फिल्म ‘संन्यासी राजा’ बनी, जिसमें दिग्गज अभिनेता उत्तम कुमार ने मुख्य भूमिका निभाई, और 2018 में फिल्मकार सृजित मुखर्जी ने इसी कहानी पर एक और फिल्म ‘एक जे छिलो राजा’ बनाई। लेखिका अरुणा चक्रवर्ती ने भी इस पूरी घटना पर एक उपन्यास लिखा, जिसमें उन्होंने भी यह सवाल खुला ही छोड़ दिया कि आखिर सच में वह इंसान कौन था। आज सौ साल से ज़्यादा गुज़र जाने के बाद भी यह केस भारतीय कानूनी इतिहास के सबसे अनोखे मामलों में गिना जाता है, जहां तीन अलग अलग अदालतों ने यह मानने में सोलह साल लगाए कि एक आदमी वाकई वही है जो वह होने का दावा कर रहा है। यह कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि पहचान, यादें और सच्चाई कभी कभी इतनी उलझी हो सकती हैं कि इंसाफ देने वाली सबसे बड़ी अदालतें भी इसे सुलझाने में बरसों लगा देती हैं, और कई बार जीत का असली मीठा फल चखने से पहले ही ज़िंदगी खुद खत्म हो जाती है।

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