TRENDING TAGS :
India Standard Time: टाइम जोन्स किसने तय कीं? भारत का समय ग्रीनविच से साढ़े पांच घंटे आगे ही क्यों है?
India Standard Time: भारत का समय GMT से 5 घंटे 30 मिनट आगे क्यों है? जानिए टाइम जोन किसने तय किए, ग्रीनविच को क्यों चुना गया और 82.5°E से IST का क्या संबंध है।
India Standard Time (Image Credit-Social Media)
India Standard Time: रोज़ सुबह जब आप अपने फोन की घड़ी देखते हैं, तो शायद ही कभी यह सवाल मन में आता हो कि यह समय आखिर तय किसने किया? क्यों भारत का समय लंदन से साढ़े पांच घंटे आगे है, ठीक '5 घंटे' या '6 घंटे' आगे क्यों नहीं? इसका जवाब भूगोल, रेलवे, ब्रिटिश साम्राज्य और खगोलशास्त्र - इन सबके दिलचस्प मेल में छिपा है।
जब दुनिया में हर शहर का अपना अलग समय होता था
19वीं सदी से पहले तक समय का कोई वैश्विक मानक नहीं था। हर शहर सूरज की स्थिति के आधार पर अपना स्थानीय समय तय करता था। यानी जब सूरज ठीक सिर के ऊपर होता, वही उस जगह का दोपहर 12 बजे माना जाता। इससे कोई खास दिक्कत नहीं थी, जब तक लोग पैदल या घोड़ों से यात्रा करते थे। लेकिन अमेरिका में तो हालात इतने उलझे हुए थे कि एक ही समय में 100 से ज्यादा अलग-अलग स्थानीय समय चल रहे थे, जिनमें 3 घंटे तक का फर्क होता था। रेलवे और टेलीग्राफ के आने के बाद यह अफरा-तफरी बड़ी समस्या बन गई क्योंकि अब ट्रेनों के टाइम-टेबल और शहरों के बीच संचार के लिए एक साझा समय जरूरी हो गया था।
1884 का वो सम्मेलन जिसने दुनिया को एक समय में बांधा
कनाडाई-स्कॉटिश इंजीनियर सर सैनफोर्ड फ्लेमिंग को दुनिया भर में 24 टाइम जोन के सिस्टम का प्रस्ताव देने का श्रेय जाता है। 1876 में आयरलैंड में एक ट्रेन छूट जाने के बाद हुई असुविधा से प्रेरित होकर उन्होंने दुनिया को 24 बराबर हिस्सों में बांटने का सुझाव दिया, जिनमें से हर हिस्सा 15 डिग्री देशांतर का हो और ठीक एक घंटे के अंतर पर हो।
इसी विचार को अमलीजामा पहनाने के लिए अक्टूबर 1884 में अमेरिकी राष्ट्रपति चेस्टर आर्थर के निमंत्रण पर वॉशिंगटन डीसी में इंटरनेशनल मेरिडियन कॉन्फ्रेंस बुलाई गई, जिसमें 25 देशों के 41 प्रतिनिधि शामिल हुए। इस सम्मेलन में दो बड़े फैसले लिए जाने थे - दुनिया की 'शून्य देशांतर रेखा' (प्राइम मेरिडियन) कहां रखी जाए, और उसके इर्द-गिर्द टाइम जोन का ढांचा कैसे बने।
ग्रीनविच को ही क्यों चुना गया? वोटिंग में 22 देशों ने ग्रीनविच के पक्ष में मतदान किया, सिर्फ डोमिनिकन रिपब्लिक ने विरोध किया जबकि फ्रांस और ब्राज़ील ने वोटिंग से दूरी बनाई। असल वजह व्यावहारिक थी। उस दौर में दुनिया के ज्यादातर जहाजी नक्शे पहले से ही ग्रीनविच स्थित रॉयल ऑब्ज़र्वेटरी के आधार पर बनते थे, और खुद ब्रिटेन में 1847 से ही सभी रेलवे स्टेशनों पर जीएमटी को मानक समय के तौर पर अपनाया जा चुका था।
इस तरह ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) यानी लंदन के पास स्थित रॉयल ऑब्ज़र्वेटरी का समय दुनिया भर के लिए 'शून्य घंटे' का आधार बन गया। हर देश का समय अब इसी से आगे या पीछे नापा जाने लगा।
भारत का समय ग्रीनविच से ठीक साढ़े पांच घंटे आगे ही क्यों?
यहीं से भारत की अपनी दिलचस्प कहानी शुरू होती है, जो सम्मेलन से भी पहले की है।
1802 में मद्रास वेधशाला: 1792 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने चेन्नई (तब मद्रास) में मद्रास वेधशाला बनाई थी। 1802 में कंपनी के पहले आधिकारिक खगोलशास्त्री जॉन गोल्डिंगम ने मद्रास के देशांतर की गणना करते हुए पाया कि यह ग्रीनविच मीन टाइम से 5 घंटे 30 मिनट आगे है और यही आंकड़ा आगे चलकर पूरे भारत के मानक समय का आधार बना।
रेलवे की मजबूरी: भारत में भी वही समस्या थी जो दुनिया भर में थी। 1850 में जब रेलवे का विस्तार हुआ, तो एक साझा समय अपनाना जरूरी हो गया, लेकिन बॉम्बे (मुंबई) और कलकत्ता (कोलकाता) जैसे शहर अपने ही स्थानीय समय पर चलते रहे। बॉम्बे टाइम जीएसटी से सिर्फ 4 घंटे 51 मिनट आगे था जबकि कलकत्ता का समय अलग था।
1905 का फैसला: 1905 में भारत के लिए एक मानक समय तय किया गया और इसे 1 जनवरी 1906 से आधिकारिक रूप से लागू कर दिया गया। इसके लिए देश के लगभग बीचोंबीच से गुजरने वाली 82.5 डिग्री पूर्वी देशांतर रेखा को चुना गया, जो ग्रीनविच मीन टाइम से ठीक 5 घंटे 30 मिनट आगे बैठती है। यह रेखा उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के पास से गुजरती है, इसीलिए भारतीय मानक समय का आधिकारिक संदर्भ बिंदु आज भी मिर्जापुर ही माना जाता है।
आज़ादी के बाद पूरे देश में लागू: दिलचस्प बात यह है कि 1905 का फैसला होने के बावजूद मुंबई और कोलकाता जैसे शहर अपने पुराने स्थानीय समय पर ही चलते रहे। 1947 में आज़ादी के बाद ही भारत सरकार ने पूरे देश के लिए भारतीय मानक समय (IST) को आधिकारिक तौर पर लागू किया, हालांकि कोलकाता और मुंबई ने 1955 तक अपने पुराने स्थानीय समय (बॉम्बे टाइम) को बनाए रखा। इस एकीकरण की पहल में सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका को अहम माना जाता है, जिन्होंने विविधता से भरे देश को एक समय-सूत्र में बांधने का काम आगे बढ़ाया।
साढ़े पांच घंटे - भूगोल की मजबूरी
ज्यादातर देशों का समय जीएमटी से पूरे घंटे के अंतर पर होता है (जैसे भारत का पड़ोसी पाकिस्तान जीएमटी+5, बांग्लादेश जीएमटी+6)। भारत के मामले में 'आधा घंटा' इसलिए जुड़ा क्योंकि 82.5 डिग्री पूर्वी देशांतर, जो देश के भौगोलिक केंद्र के सबसे करीब बैठती है, ठीक इसी बिंदु पर आकर जीएमटी+5:30 बनाती है। अगर भारत जीएमटी+5 या जीएमटी+6 को चुनता, तो देश के एक छोर पर सूरज बहुत जल्दी और दूसरे छोर पर बहुत देर से उगता दिखता। यानी आधे घंटे का यह एडजस्टमेंट पूरब और पश्चिम के बीच की दूरी को संतुलित करने की एक व्यावहारिक कोशिश थी।
एक समय, दो सूर्योदय - आज भी अनसुलझी बहस
भारत जितना बड़ा और पूर्व-पश्चिम में फैला हुआ देश है, उसके लिए एक ही टाइम जोन रखना कई बार असुविधाजनक भी साबित होता है। पूर्वोत्तर राज्यों (जैसे असम, अरुणाचल प्रदेश) में सूरज गुजरात-राजस्थान की तुलना में करीब दो घंटे पहले उगता और डूबता है, जिससे वहां के लोगों को दफ्तर के समय और दिन के उजाले में तालमेल बिठाने में दिक्कत होती है। यही वजह है कि पूर्वोत्तर राज्यों के लिए अलग टाइम जोन बनाने की मांग समय-समय पर उठती रहती है, हालांकि अब तक सरकार ने देश को एक ही मानक समय में बनाए रखने का फैसला बरकरार रखा है।
तो फिर अगली बार जब आप अपनी घड़ी देखें, तो याद रखिए, यह सिर्फ समय नहीं, बल्कि इतिहास और भूगोल की एक पूरी कहानी है।


