TRENDING TAGS :
Brass Band Kya Hai: बारात से ऑर्केस्ट्रा हॉल तक, जानिए बैंड के प्रकार और दोनों में बड़ा अंतर
Brass Band Kya Hai: ब्रास बैंड क्या होता है और यह ऑर्केस्ट्रा से कैसे अलग है? जानिए ब्रास, मिलिट्री, मार्चिंग, पाइप, जैज़ और शादी के बैंड का इतिहास, वाद्य और खासियत।
Brass Band Kya Hai: बारात के आगे चमकती वर्दी में बजते तुरही और ड्रम, गणतंत्र दिवस की परेड में क़दम मिलाते सैन्य बैंड, और कॉन्सर्ट हॉल में सूट पहने सैकड़ों वादकों का सिम्फ़नी ऑर्केस्ट्रा। ये तीनों संगीत हैं, पर तीनों बहुत अलग हैं। 'बैंड' शब्द इतनी जगह इस्तेमाल होता है कि लोग अक्सर ब्रास बैंड, मिलिट्री बैंड, मार्चिंग बैंड और ऑर्केस्ट्रा को आपस में गड़बड़ा देते हैं।
बैंड का मतलब क्या है?
संगीत में "बैंड" वादकों के उस समूह को कहते हैं जो साथ मिलकर बजाता है, और इसका आकार, वाद्य और मक़सद हर तरह के बैंड में अलग होता है। आम बोलचाल में रॉक बैंड भी "बैंड" है, जिसमें गिटार, ड्रम और गायक होते हैं। यहां उस परंपरा की बात कर रहे हैं जिसमें मुख्य रूप से फूँककर बजने वाले वाद्य (ब्रास और वुडविंड) और ड्रम इस्तेमाल होते हैं। इसे आम तौर पर "वाद्य-वृंद" या "वादक-मंडली" कहा जा सकता है।
ब्रास बैंड क्या होता है?
ब्रास बैंड ऐसा वाद्य-समूह है जिसमें सिर्फ़ पीतल (ब्रास) के वाद्य होते हैं, और उनके साथ कई बार ताल के लिए पर्क्यूशन। इसमें बाँसुरी, शहनाई या सैक्सोफ़ोन जैसे लकड़ी या रीड वाले वाद्य नहीं होते। यही बात इसे दूसरे बैंडों से अलग करती है।
ब्रिटिश शैली के मानक ब्रास बैंड में आम तौर पर 25 वादक होते हैं, साथ में कुछ पर्क्यूशन वादक। इनमें शामिल हैं: कॉर्नेट (ट्रंपेट जैसा, पर ज़्यादा गोल और मुलायम आवाज़ वाला), जिसमें एक ऊँचे सुर वाला सोप्रानो कॉर्नेट और बाक़ी कई कॉर्नेट होते हैं; एक फ़्लूगलहॉर्न; तीन टेनर हॉर्न; दो बैरिटोन; दो टेनर ट्रॉम्बोन और एक बास ट्रॉम्बोन; दो यूफ़ोनियम; और चार "बास" यानी ट्यूबा परिवार के भारी वाद्य। इनकी बनावट कुछ ऐसी होती है कि कई वाद्यों की नली शंकु जैसी चौड़ी होती जाती है, जिससे आवाज़ गर्म, मुलायम और घुली-मिली लगती है, ट्रंपेट की चमकदार तीखी आवाज़ से अलग।
एक और दिलचस्प बात यह है कि ब्रिटिश ब्रास बैंड में लगभग सभी वादक एक ही तरह की संकेत-लिपि (ट्रेबल क्लेफ़) पढ़ते हैं, जो इन बैंडों के शौक़िया वादकों के लिए सीखना आसान बनाती है।
ब्रास बैंड की शुरुआत कैसे हुई?
इसकी कहानी औद्योगिक क्रांति से जुड़ी है। 1810 के दशक में वाल्व वाले पीतल के वाद्य बने, जिन्हें बजाना पहले के वाद्यों से कहीं आसान था। इसके बाद अडोल्फ़ सैक्स (जिन्होंने सैक्सोफ़ोन बनाया) ने 1840 के दशक में सैक्सहॉर्न परिवार बनाया, जिसका असर आधुनिक ब्रास बैंड के वाद्यों पर पड़ा। इसी दौर में इंग्लैंड के उत्तरी औद्योगिक इलाक़ों में कपड़ा मिलों, कोयला खदानों और फ़ैक्ट्रियों के मज़दूरों ने अपने बैंड बनाने शुरू किए। मालिक अक्सर इन्हें प्रोत्साहन देते थे, और वाद्य ख़रीदने में मदद भी करते थे। मज़दूरों के लिए यह सस्ता मनोरंजन, सामुदायिक पहचान और गर्व की चीज़ बन गया।
1850 के दशक में मैनचेस्टर के पास बेल व्यू में बैंड प्रतियोगिताएँ शुरू हुईं, और 1900 में लंदन के क्रिस्टल पैलेस में राष्ट्रीय चैंपियनशिप शुरू हुई। उसी दौर में सैल्वेशन आर्मी ने 1878 में सैलिसबरी में अपना पहला ब्रास बैंड बनाया और सड़कों पर धार्मिक प्रचार के लिए संगीत का इस्तेमाल किया, जिससे ये बैंड दुनिया भर में फैले। होल्स्ट और एल्गर जैसे बड़े संगीतकारों ने भी ब्रास बैंडों के लिए ख़ास रचनाएँ लिखीं। ब्रिटेन के खदान-बैंड की कहानी पर बनी फ़िल्म Brassed Off (1996) इस परंपरा को बख़ूबी दिखाती है।
बैंड के प्रकार: कौन-सा बैंड क्या है?
मिलिट्री बैंड। यह सेना, नौसेना या वायुसेना का आधिकारिक बैंड होता है, जिसमें पीतल, वुडविंड और ताल, तीनों के वाद्य होते हैं। इसका काम समारोहों, परेडों, सलामी और राष्ट्रीय आयोजनों में संगीत देना है। भारत में हर 29 जनवरी को दिल्ली के विजय चौक पर होने वाला "बीटिंग रिट्रीट" समारोह इसका सबसे जाना-माना उदाहरण है, जिसमें तीनों सेनाओं के बैंड प्रस्तुति देते हैं।
कॉन्सर्ट बैंड या विंड बैंड। इसमें बाँसुरी, शहनाई, सैक्सोफ़ोन, ट्रंपेट, ट्रॉम्बोन, ट्यूबा और पर्क्यूशन, सब होते हैं। यह स्कूलों, कॉलेजों और शौक़िया समूहों में बहुत लोकप्रिय है और बैठकर कॉन्सर्ट में बजाया जाता है। इसमें 40 से 60 या उससे ज़्यादा वादक हो सकते हैं।
मार्चिंग बैंड। यह चलते-चलते या मैदान में आकृतियाँ बनाते हुए बजाने वाला बैंड है, जिसमें ज़्यादा ज़ोर चलने के लायक़ हल्के वाद्यों, ऊँची आवाज़ और दृश्य-प्रदर्शन पर होता है। अमेरिका में कॉलेज फ़ुटबॉल के हाफ़टाइम शो इसके लिए मशहूर हैं। 'ड्रम एंड बगल कोर' नाम की एक विधा में ज़्यादातर सिर्फ़ पीतल और ताल वाद्य रहते हैं।
पाइप बैंड। स्कॉटलैंड से आई इस परंपरा में बैगपाइप (बीन जैसा वाद्य) और ड्रम होते हैं। भारतीय सेना की कई रेजिमेंटों के पाइप बैंड मशहूर हैं और राष्ट्रीय परेडों में दिखते हैं।
जैज़ बैंड और बिग बैंड। बिग बैंड में आम तौर पर सैक्सोफ़ोन, ट्रंपेट और ट्रॉम्बोन की क़तारें और साथ में पियानो, बास और ड्रम जैसी लय-टोली होती है। 1930-40 के दशक के स्विंग दौर में ये बेहद लोकप्रिय थे। अमेरिका के न्यू ऑरलियन्स की सड़क-बैंड परंपरा, जिसमें पीतल और ड्रम मिलकर जुलूसों में बजते थे, जैज़ की जड़ों में गिनी जाती है।
फ़ैनफ़ेयर बैंड। नीदरलैंड, बेल्जियम और फ़्रांस के कुछ हिस्सों में सैक्सहॉर्न और बगल जैसे वाद्यों वाले ऐसे बैंड मिलते हैं, जो ब्रिटिश ब्रास बैंड से मिलते-जुलते हैं पर बनावट और लिखावट में अलग हैं।
शादी और बारात के बैंड। भारत में "बैंड-बाजा" का अपना अलग रंग है। इसमें ट्रंपेट, सैक्सोफ़ोन, क्लैरिनेट, ट्रॉम्बोन, ट्यूबा, स्नेयर और बास ड्रम और अक्सर ढोल या ताशा मिलकर फ़िल्मी गाने और लोकधुनें बजाते हैं। इनकी ब्रिटिश-शैली की चमकदार वर्दी इनकी पहचान है। यह परंपरा औपनिवेशिक काल की सैन्य बैंड संस्कृति से जुड़ी मानी जाती है, पर इसकी सटीक शुरुआत पर शोध सीमित है।
ब्रास बैंड और ऑर्केस्ट्रा में असली फ़र्क़ क्या है?
वाद्य और बनावट: ऑर्केस्ट्रा शब्द प्राचीन यूनानी रंगमंच के उस घेरे से आया है जहाँ गायक-नर्तक मंडली खड़ी होती थी। आधुनिक सिम्फ़नी ऑर्केस्ट्रा में चार हिस्से होते हैं: तार वाले वाद्य (वायलिन, वायोला, चेलो, डबल बास), वुडविंड (बाँसुरी, ओबो, क्लैरिनेट, बैसून), पीतल (फ़्रेंच हॉर्न, ट्रंपेट, ट्रॉम्बोन, ट्यूबा) और पर्क्यूशन। उसका सबसे बड़ा हिस्सा तार वाले वाद्य होते हैं। ब्रास बैंड में तार और वुडविंड, दोनों ग़ायब होते हैं, और केवल पीतल और ताल होते हैं।
आकार: एक पूर्ण सिम्फ़नी ऑर्केस्ट्रा में अक्सर 60 से 100 वादक होते हैं, जबकि ब्रास बैंड में लगभग 25 वादक और साथ में पर्क्यूशन।
आवाज़ और रंग: ऑर्केस्ट्रा की ताक़त उसकी विविधता है: कोमल तारों से लेकर गरजते पीतल तक रंगों की पूरी पैलेट। ब्रास बैंड की आवाज़ एकरंगी पर बेहद गर्म, गाढ़ी और घुली हुई होती है, मानो एक विशाल अंग (ऑर्गन) बज रहा हो।
वादक और सामाजिक भूमिका: बड़े ऑर्केस्ट्रा अक्सर पेशेवर होते हैं और कॉन्सर्ट हॉल में चलते हैं। ब्रिटेन के ज़्यादातर ब्रास बैंड शौक़िया और सामुदायिक हैं, जिनका जुड़ाव कस्बों, चर्चों, खदानों और स्थानीय पहचान से रहा है, हालाँकि शीर्ष स्तर के कुछ बैंड बेहद पेशेवर माने जाते हैं। इसलिए ब्रास बैंड का रिश्ता प्रतियोगिताओं और सामुदायिक गर्व से ज़्यादा जुड़ा है।
संचालन: दोनों में एक संचालक (कंडक्टर) होता है, पर ब्रास बैंड प्रतियोगिताओं में अलग-अलग बैंडों की तुलना, चयनित "टेस्ट पीस" और निर्णायकों का अनुशासन खेल जैसा रोमांच जोड़ देता है।
भारत में बैंड की अपनी कहानी
भारत में बैंड संस्कृति की जड़ें औपनिवेशिक काल की सैन्य परंपरा में मिलती हैं, पर समय के साथ इसने अपना देसी रंग पाया। शादियों, जुलूसों, राजनीतिक रैलियों और त्योहारों में बैंड की मौजूदगी आम है, और गोवा जैसी जगहों में ब्रास बैंडों की अपनी पुरानी परंपरा रही है। आज यह संगीत-परंपरा कई परिवारों की रोज़ी-रोटी भी है, जिसमें वादक पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह काम करते हैं। पर शौक़िया ब्रास बैंड संस्कृति, जैसी ब्रिटेन में है, भारत में कम दिखती है, और शास्त्रीय पश्चिमी संगीत के संस्थान भी सीमित हैं।
ब्रास बैंड कोई छोटा ऑर्केस्ट्रा नहीं है, बल्कि अपने नियम, इतिहास और संस्कृति वाली अलग परंपरा है। ऑर्केस्ट्रा सुरों की विविधता का मंच है, तो ब्रास बैंड एक ही परिवार के वाद्यों की एकता का। मिलिट्री, मार्चिंग, पाइप और जैज़ बैंड इसी बड़े परिवार की अलग-अलग शाखाएँ हैं, जिनका मक़सद और मिज़ाज अलग है। अगली बार जब आप बारात के आगे बैंड की धुन सुनें या 29 जनवरी को बीटिंग रिट्रीट देखें, तो पहचानिए कि कौन-से वाद्य बज रहे हैं और कौन-सी परंपरा आपके सामने चल रही है।


