Animals Predict Earthquakes: क्या जानवर भूकंप आने से पहले महसूस कर लेते हैं?

Animals Predict Earthquakes: भूकंप से पहले कुत्तों के भौंकने, साँपों के बिल से निकलने और पक्षियों के अचानक उड़ने की कहानियां सदियों पुरानी हैं।

Yogesh Mishra
Published on: 12 Sept 2026 8:44 PM IST
Animals Predict Earthquakes Explained in Hindi
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Animals Predict Earthquakes Explained in Hindi 

Animals Predict Earthquakes Explained: भूकंप आने से पहले कुत्तों का अचानक लगातार भौंकना, गायों का बेचैन हो जाना, पक्षियों का अचानक उड़ जाना, साँपों का बिलों से बाहर निकलना या मछलियों का अजीब तरह से व्यवहार करना। ऐसी कहानियां दुनिया के लगभग हर भूकंप प्रभावित इलाके में सदियों से सुनाई जाती रही हैं। यह सिर्फ आज के सोशल मीडिया की बनाई हुई बात नहीं है। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार, बड़े भूकंप से पहले जानवरों के असामान्य व्यवहार का सबसे पुराना ज्ञात उल्लेख 373 ईसा पूर्व यूनान का है। इसमें बताया गया था कि एक विनाशकारी भूकंप से कुछ दिन पहले चूहे, नेवले, साँप और कनखजूरे अपने ठिकाने छोड़कर चले गए थे।

इसके बाद कुत्तों, बिल्लियों, हाथियों, पक्षियों, मछलियों और यहां तक कि कीड़ों तक के बारे में ऐसी हजारों कहानियां सामने आईं। लेकिन करीब ढाई हजार साल बाद विज्ञान का जवाब थोड़ा अलग और काफी दिलचस्प है। कुछ जानवर इंसानों से पहले भूकंप की शुरुआती हलचल महसूस कर सकते हैं, लेकिन यह साबित नहीं हुआ है कि वे घंटों या दिनों पहले आने वाले भूकंप की भविष्यवाणी कर सकते हैं। यही अंतर इस पूरे रहस्य को समझने की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी है।

कुत्ता भूकंप से पहले भौंका या भूकंप शुरू होने के बाद?

मान लीजिए आपका कुत्ता अचानक बेचैन होकर भौंकने लगता है और पांच सेकंड बाद घर हिलने लगता है। आपको लगेगा कि कुत्ते को पहले ही पता चल गया था कि भूकंप आने वाला है। लेकिन जरूरी नहीं कि ऐसा हो।

संभव है कि भूकंप उस समय तक शुरू हो चुका था, जब आपको उसका झटका महसूस भी नहीं हुआ था।

भूकंप तब शुरू होता है जब पृथ्वी की ऊपरी परत के अंदर किसी भ्रंश (Fault) पर चट्टानें अचानक खिसकती हैं। इससे ऊर्जा तरंगों के रूप में चारों ओर फैलती है। इन तरंगों की गति एक जैसी नहीं होती। सबसे पहले तेज गति से चलने वाली प्राथमिक तरंग (P-wave) आती है। इसके बाद आम तौर पर ज्यादा तेज झटका देने वाली द्वितीयक तरंग (S-wave) और दूसरी भूकंपीय तरंगें पहुंचती हैं।

इंसान अक्सर शुरुआती कमजोर P-wave को महसूस नहीं कर पाता। लेकिन कई जानवर जमीन के कंपन, आवाज और दूसरी सूक्ष्म हलचलों के प्रति हमसे ज्यादा संवेदनशील होते हैं। इसलिए वे उस शुरुआती संकेत को हमसे कुछ सेकंड पहले महसूस कर सकते हैं।

मान लीजिए भूकंप का केंद्र आपके शहर से कुछ दूरी पर है। पहले कमजोर तरंग आपके घर तक पहुंचती है। आपका कुत्ता अचानक कान खड़े करता है, उठकर दरवाजे की तरफ जाता है और भौंकने लगता है। पांच सेकंड बाद आपको तेज झटका महसूस होता है।

ऐसे में कुत्ते ने भविष्य नहीं देखा। उसने वही भूकंप आपसे कुछ सेकंड पहले महसूस किया।

आधुनिक भूकंप चेतावनी भी इसी अंतर का फायदा उठाती है

आधुनिक भूकंप पूर्व-चेतावनी व्यवस्था (Earthquake Early Warning) भी कुछ हद तक इसी सिद्धांत पर काम करती है। यह भूकंप आने से पहले उसका भविष्य नहीं बताती। सेंसर भूकंप शुरू होने के बाद उसकी शुरुआती तरंग को पकड़ते हैं और फिर उन इलाकों तक चेतावनी भेजी जाती है जहां ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाली तरंग अभी पहुंची नहीं है।

इसलिए कुछ मामलों में जानवरों का व्यवहार प्रकृति की अपनी छोटी-सी चेतावनी जैसा लग सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि जानवर इसे अपनी इंद्रियों से महसूस करते हैं और वैज्ञानिक इसे सेंसर से पकड़ने की कोशिश करते हैं।

जानवर हमसे पहले कंपन कैसे महसूस कर लेते हैं?

कुत्ते इंसानों की तुलना में ज्यादा ऊंची आवृत्ति (frequency) की आवाजें सुन सकते हैं। हाथी बहुत कम आवृत्ति वाली ध्वनियों और जमीन में होने वाले कंपन के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं। कई जीव अपने पैरों, शरीर या दूसरे संवेदन तंत्रों के जरिए जमीन और पानी में होने वाली बेहद हल्की हलचल को महसूस कर सकते हैं।

प्रकृति में यह क्षमता उनके लिए बहुत उपयोगी है। जमीन में किसी शिकारी के कदम, दूसरे जीव की गतिविधि या दूर होने वाली हलचल को जल्दी महसूस करना उनके लिए जीवन और मौत का सवाल हो सकता है।

इसलिए यह मानना बिल्कुल असंभव नहीं है कि कुछ जानवर भूकंप की शुरुआती हलचल हमसे पहले महसूस कर लें।

असली रहस्य पांच सेकंड का नहीं, पांच घंटे या पांच दिन का है

अगर कोई कुत्ता इंसान से पांच या दस सेकंड पहले भूकंप की शुरुआती तरंग महसूस कर लेता है तो उसकी वैज्ञानिक व्याख्या काफी आसान है। असली सवाल तब उठता है जब दावा किया जाता है कि जानवरों ने घंटों, दिनों या यहां तक कि हफ्तों पहले भूकंप का संकेत दे दिया था।

क्या जानवर सचमुच ऐसा कर सकते हैं? इस सवाल का जवाब पाने के लिए जर्मनी के जीएफजेड जर्मन रिसर्च सेंटर फॉर जियोसाइंसेज के वैज्ञानिकों ने उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य का बड़ा अध्ययन किया। 2018 में प्रकाशित एक समीक्षा में 160 भूकंपों से जुड़े जानवरों के असामान्य व्यवहार के 729 विवरणों को देखा गया। इनमें हाथियों से लेकर रेशम के कीड़ों तक कई तरह के जीव शामिल थे। पहली नजर में 729 घटनाएं बहुत बड़ा प्रमाण लगती हैं। लेकिन जब वैज्ञानिकों ने इन दावों की गुणवत्ता देखी तो तस्वीर बदल गई। अधिकांश घटनाएं भूकंप के बाद लोगों द्वारा बताए गए अनुभव थे। वे नियंत्रित वैज्ञानिक अध्ययन नहीं थे। केवल 14 मामलों में समय के साथ जानवरों के व्यवहार का व्यवस्थित रिकॉर्ड उपलब्ध था।

‘असामान्य व्यवहार’ आखिर किसे कहेंगे?

मान लीजिए भूकंप से पहले एक कुत्ता ज्यादा भौंका। एक गाय ने खाना कम खाया। कुछ पक्षी अचानक उड़ गए। कोई साँप बिल से बाहर आ गया और कुछ मछलियां अलग दिशा में तैरने लगीं। क्या इन सभी घटनाओं को भूकंप का संकेत मान लिया जाए?

वैज्ञानिक अध्ययन में पहले यह पता करना जरूरी है कि ये जानवर सामान्य दिनों में कितनी बार ऐसा व्यवहार करते हैं। इसके बाद यह देखना होगा कि भूकंप से पहले इस व्यवहार की संख्या वास्तव में बढ़ती है या नहीं।

यानी केवल यह बताना काफी नहीं है कि “भूकंप से पहले मेरा कुत्ता अजीब व्यवहार कर रहा था।”

यह भी बताना जरूरी है कि कुत्ता पिछले 500 दिनों में कितनी बार ऐसा कर चुका था और उन मौकों पर भूकंप आया था या नहीं।

मान लीजिए कुत्ता साल में 40 बार अचानक भौंकता है...

मान लीजिए आपका कुत्ता साल में 40 बार बिना किसी साफ वजह के रात में अचानक भौंकता है। 39 बार कुछ नहीं होता। लेकिन 40वीं बार उसके भौंकने के दो घंटे बाद भूकंप आ जाता है।

आपको कौन-सी घटना याद रहेगी? वही 40वीं।

लेकिन वैज्ञानिक पूरे रिकॉर्ड को देखेगा। वह पूछेगा कि कुत्ता 40 बार ऐसा व्यवहार कर चुका है, जिनमें से केवल एक बार उसके बाद भूकंप आया। बाकी 39 बार क्या हुआ? इसलिए किसी भी संभावित भूकंप संकेत को समझने के लिए सिर्फ सफल घटनाओं की गिनती नहीं, बल्कि झूठी चेतावनियों की गिनती भी जरूरी है।

2018 की वैज्ञानिक समीक्षा में यही बड़ी कमी सामने आई थी। जानवरों के लंबे समय तक लगातार व्यवहार के पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध नहीं थे। एक अध्ययन में तो टोड्स के असामान्य व्यवहार को भूकंप से जोड़ने की कोशिश की गई, लेकिन वे अध्ययन अवधि के करीब आधे समय तक ‘असामान्य’ व्यवहार कर रहे थे, भूकंप से पहले भी और बाद में भी। ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि उनका व्यवहार भूकंप की वजह से बदला था या वे वैसे ही व्यवहार कर रहे थे।

क्या छोटे भूकंप जानवरों को पहले से संकेत दे सकते हैं?

कुछ बड़े भूकंपों से पहले छोटे-छोटे भूकंपीय झटके आते हैं। इन्हें पूर्व-कंपन (Foreshocks) कहा जाता है। ये झटके इतने हल्के हो सकते हैं कि इंसान उन्हें महसूस न करे, लेकिन कोई संवेदनशील जानवर उन्हें महसूस कर सकता है। ऐसे में जानवर मुख्य भूकंप से कुछ समय पहले बेचैन हो सकते हैं। बाद में बड़ा भूकंप आने पर हमें लगेगा कि जानवर ने मुख्य भूकंप की भविष्यवाणी कर दी थी। लेकिन संभव है कि उसने भविष्य में होने वाले भूकंप को नहीं पहचाना, बल्कि पहले से शुरू हो चुकी छोटी भूकंपीय गतिविधि को महसूस किया हो।

2018 की समीक्षा में जानवरों के असामान्य व्यवहार और पूर्व-कंपनों के समय के बीच कुछ मामलों में संबंध दिखाई दिया था। वैज्ञानिकों ने यह संभावना भी मानी कि कुछ घटनाओं की व्याख्या पहले से हो रही छोटी भूकंपीय गतिविधि से की जा सकती है।

भूजल में बदलाव और जमीन से निकलने वाली कुछ गैसों जैसे दूसरे संभावित कारणों पर भी चर्चा हुई है। लेकिन इनमें से कोई भी ऐसा भरोसेमंद और सार्वभौमिक संकेत नहीं बना है जिसके आधार पर भूकंप की भविष्यवाणी की जा सके।

क्या भूकंप से पहले जमीन की गैस या पानी बदल सकता है?

वैज्ञानिकों ने लंबे समय से यह संभावना भी जांची है कि भूकंप से पहले चट्टानों पर पड़ने वाले तनाव के कारण भूजल की रासायनिक संरचना, गैसों या जमीन के आसपास के दूसरे भौतिक गुणों में बदलाव हो सकता है।

रेडॉन जैसी गैसों का नाम भी इस संदर्भ में लिया जाता रहा है। सिद्धांत रूप से अगर जमीन या पानी में ऐसा बदलाव हो और कोई जानवर उसे अपनी गंध या दूसरी इंद्रियों से महसूस कर सके तो उसके व्यवहार में बदलाव आ सकता है। लेकिन यहां भी सबसे बड़ी समस्या यही है कि ऐसा कोई संकेत अभी तक नियमित, दोहराने योग्य और भरोसेमंद तरीके से साबित नहीं हुआ है।

यानी आज हम यह नहीं कह सकते कि अगर जमीन में फलां बदलाव हुआ तो अगले छह घंटे में इतने बड़े भूकंप की संभावना है। इसी वजह से USGS भी कहता है कि जानवरों के असामान्य व्यवहार की बहुत-सी घटनाएं दर्ज हैं, लेकिन बड़े भूकंप से पहले ऐसा कोई लगातार और भरोसेमंद पशु व्यवहार नहीं मिला है जिसे वैज्ञानिक भविष्यवाणी की प्रणाली बनाया जा सके।

चीन का 1975 का हाइचेंग भूकंप और जानवरों का रहस्य

जानवरों द्वारा भूकंप की भविष्यवाणी की चर्चा में चीन के 1975 के हाइचेंग भूकंप का उदाहरण अक्सर दिया जाता है। भूकंप से पहले छोटे-छोटे झटकों और कई असामान्य संकेतों की खबरें थीं। अधिकारियों ने चेतावनी जारी की और लोगों को सुरक्षित जगहों पर जाने के लिए कहा। पशुओं के असामान्य व्यवहार की घटनाओं को भी इस कहानी से जोड़ा गया। बड़ा भूकंप आने पर बड़ी संख्या में लोग पहले से खुले इलाकों में थे, जिससे कई जानें बच सकीं। अगर कहानी यहीं खत्म होती तो इसे जानवरों की सफल भूकंप भविष्यवाणी का बड़ा प्रमाण माना जा सकता था।

लेकिन अगले ही साल 1976 में चीन में तांगशान का विनाशकारी भूकंप आया। इस बार ऐसी सफल चेतावनी नहीं दी जा सकी और भारी जनहानि हुई।

यही उदाहरण दिखाता है कि किसी एक सफल घटना को सार्वभौमिक नियम नहीं माना जा सकता। छोटे झटके या दूसरे संभावित संकेत कई बार बड़े भूकंप में नहीं बदलते, जबकि कई बड़े भूकंप बिना किसी स्पष्ट चेतावनी के आ सकते हैं।

साँप भूकंप से पहले बिल क्यों छोड़ते हैं?

साँपों और भूकंप का संबंध लोगों की कल्पना में खास तौर पर मजबूत है। इसकी एक वजह यह है कि साँप जमीन के काफी करीब रहते हैं और कंपन के प्रति संवेदनशील होते हैं। इसलिए जब भूकंप से पहले साँपों के बिल छोड़ने की कोई घटना सामने आती है तो वह कहानी तुरंत लोगों का ध्यान खींचती है। लेकिन साँप के बाहर निकलने के कई दूसरे कारण भी हो सकते हैं - तापमान, नमी, भोजन की तलाश, प्रजनन, शिकारियों से बचना या उनके आसपास का वातावरण बदलना।

इसलिए वैज्ञानिकों को यह साबित करना होगा कि भूकंप से पहले साँप सामान्य दिनों की तुलना में किसी खास तरह का व्यवहार लगातार और असामान्य रूप से ज्यादा करते हैं।

कुत्तों और बिल्लियों की कहानियां ज्यादा क्यों सुनाई देती हैं?

दुनिया भर में करोड़ों लोग कुत्ते और बिल्लियां पालते हैं। हम उनके रोजमर्रा के व्यवहार को देखते हैं। कोई कुत्ता अचानक भौंकता है, कोई छिप जाता है, कोई खाना छोड़ देता है और कोई रात में बेचैन हो जाता है।

अब अगर उसी रात भूकंप आ जाए तो मालिक को दोनों घटनाओं के बीच संबंध नजर आ सकता है।

सोशल मीडिया इस प्रभाव को और मजबूत कर देता है। भूकंप के बाद जिन लोगों के पालतू जानवरों ने अजीब व्यवहार किया, वे अपनी कहानी साझा करते हैं। लेकिन जिनके कुत्ते और बिल्लियां बिल्कुल सामान्य व्यवहार करते रहे, वे आम तौर पर ऐसी पोस्ट नहीं करते।

इसे चयन-पक्षपात (Selection Bias) और पुष्टि-पक्षपात (Confirmation Bias) कहा जा सकता है।

हम उन घटनाओं को ज्यादा याद रखते हैं जो हमारी पहले से बनी धारणा को सही साबित करती हैं।

USGS भी इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि जब लाखों लोग और उनके पालतू पशु भूकंप के संपर्क में आते हैं तो संयोग से कुछ जानवरों का भूकंप से ठीक पहले असामान्य व्यवहार करना असामान्य बात नहीं है।

क्या पक्षी भूकंप से पहले उड़ जाते हैं?

पक्षियों के बारे में भी ऐसी कई घटनाएं दर्ज हैं जिनमें उनके अचानक उड़ जाने या अपना बसेरा छोड़ने की बात कही गई। यह संभव है कि पक्षी जमीन के कंपन, आवाज या वातावरण में होने वाले बदलाव को महसूस कर लें। लेकिन पक्षियों का व्यवहार वैसे भी लगातार बदलता रहता है। मौसम, हवा, तापमान, रोशनी, भोजन, शिकारी और दूसरे पक्षियों की गतिविधियां उनके व्यवहार को प्रभावित करती हैं।

इसलिए किसी एक घटना को भूकंप से जोड़ना आसान है, लेकिन वैज्ञानिक प्रमाण बनाना मुश्किल।

इसके लिए हजारों पक्षियों की गतिविधि को लंबे समय तक लगातार रिकॉर्ड करना होगा और उसी दौरान होने वाली भूकंपीय गतिविधि से उसका मिलान करना होगा।

यानी भविष्य का बेहतर अध्ययन ऐसा नहीं होगा जिसमें भूकंप आने के बाद लोगों से पूछा जाए कि उनके पक्षी ने क्या किया था। बेहतर तरीका होगा कि भूकंप आने से पहले ही जानवरों के व्यवहार का लगातार रिकॉर्ड रखा जाए।

क्या आधुनिक तकनीक इस रहस्य को सुलझा सकती है?

आज जानवरों की गतिविधि रिकॉर्ड करने के लिए जीपीएस, गति मापने वाले सेंसर, त्वरणमापी और दूसरे जैविक सेंसर इस्तेमाल किए जा सकते हैं। गायों, कुत्तों, पक्षियों और वन्यजीवों की गतिविधि को लंबे समय तक रिकॉर्ड किया जा सकता है। कल्पना कीजिए कि हजारों जानवरों की गतिविधि कई वर्षों तक रिकॉर्ड हो। वैज्ञानिक फिर यह देख सकते हैं कि बड़े भूकंप से पहले क्या उनकी गतिविधि में कोई खास बदलाव आता है।

क्या वे ज्यादा चलते हैं? क्या अचानक एक जगह इकट्ठा होते हैं? क्या उनके आराम और गतिविधि के समय में बदलाव आता है? क्या अलग-अलग प्रजातियां एक ही समय पर असामान्य व्यवहार करती हैं?

सिर्फ यह पता चलना पर्याप्त नहीं होगा कि भूकंप से तीन घंटे पहले गायें बेचैन थीं। वैज्ञानिकों को यह भी देखना होगा कि पिछले 500 दिनों में गायें कितनी बार उतनी ही बेचैन हुईं और उन मौकों पर भूकंप आया था या नहीं।

अगर जानवर कोई संकेत महसूस करते हैं तो मशीनें क्यों नहीं पकड़ पातीं?

अगर कोई जानवर भूकंप से कई घंटे पहले किसी वास्तविक भौतिक संकेत को महसूस कर रहा है तो वह संकेत किसी न किसी रूप में मौजूद होना चाहिए। वह जमीन का कंपन हो सकता है, आवाज, भूजल में बदलाव, गैस, विद्युत प्रभाव, चुंबकीय बदलाव या कोई और पर्यावरणीय परिवर्तन।

अगर वैज्ञानिक उस संकेत को पहचान लेते हैं तो जानवरों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं होगी। उसी संकेत को वैज्ञानिक उपकरणों से मापा जा सकेगा।

इसीलिए जानवरों का अध्ययन पूरी तरह बेकार नहीं है। हो सकता है कि जानवर स्वयं भूकंप की भविष्यवाणी करने वाले ‘सेंसर’ न हों, लेकिन उनके असामान्य व्यवहार से वैज्ञानिकों को किसी वास्तविक भूभौतिकीय संकेत की खोज का सुराग मिल सकता है।

क्या विज्ञान आज भूकंप की भविष्यवाणी कर सकता है?

वैज्ञानिक किसी क्षेत्र में लंबे समय के भूकंप जोखिम का अनुमान लगा सकते हैं। वे यह बता सकते हैं कि किसी भ्रंश या इलाके में आने वाले वर्षों या दशकों में बड़े भूकंप की संभावना कितनी है। बड़े भूकंप के बाद आफ्टरशॉक की संभावना भी अनुमानित की जा सकती है।

लेकिन किसी बड़े भूकंप का सटीक समय, स्थान और तीव्रता पहले से बताना अभी संभव नहीं है।

तो कुत्ता अचानक भौंके तो क्या घर से बाहर भाग जाना चाहिए?

सिर्फ इसलिए कि आपका कुत्ता अचानक भौंक रहा है, घर से बाहर भागना या इसे भूकंप की चेतावनी मान लेना सही नहीं होगा। कुत्ते के बेचैन होने के दर्जनों दूसरे कारण हो सकते हैं। कोई आवाज, गंध, डर, बीमारी, दूसरा जानवर या आसपास की कोई हलचल।

भूकंप की स्थिति में आधिकारिक चेतावनी और प्रमाणित सुरक्षा निर्देशों पर भरोसा करना चाहिए। जानवरों के व्यवहार को भूकंप चेतावनी का विकल्प मानना उलटा नुकसानदेह हो सकता है, क्योंकि बार-बार गलत चेतावनियां लोगों को असली खतरे के समय भी लापरवाह बना सकती हैं।

तो क्या जानवरों से जुड़ी सदियों पुरानी सारी कहानियां झूठी हैं?

इनमें से कुछ घटनाएं बिल्कुल वास्तविक हो सकती हैं। कोई कुत्ता सच में शुरुआती P-wave महसूस करके भौंका होगा। कोई हाथी जमीन में होने वाले सूक्ष्म कंपन पर प्रतिक्रिया कर सकता है। कोई जानवर छोटे पूर्व-कंपन से बेचैन हुआ होगा। समस्या यह नहीं है कि हर कहानी झूठी है। समस्या यह है कि हम अभी यह तय करने के लिए पर्याप्त मजबूत आंकड़े नहीं रखते कि कौन-सी घटना वास्तविक संकेत थी और कौन-सी सिर्फ संयोग। यही वजह है कि विज्ञान अभी जानवरों को भरोसेमंद भूकंप भविष्यवक्ता नहीं मानता।

असली रहस्य अभी भी बाकी है

जानवरों के पास कोई ऐसी सिद्ध ‘छठी इंद्रिय’ है जो उन्हें कई दिन पहले आने वाले भूकंप का पता दे देती है,इसका वैज्ञानिक प्रमाण अभी नहीं मिला है।

लेकिन यह बात पूरी तरह वैज्ञानिक है कि कई जानवरों की इंद्रियां इंसानों से ज्यादा संवेदनशील होती हैं। वे जमीन की सूक्ष्म हलचल, आवाज या कंपन हमसे पहले महसूस कर सकते हैं। इसलिए भूकंप से कुछ सेकंड पहले उनका बेचैन होना बिल्कुल संभव है।

असली अनसुलझा सवाल सेकंड का नहीं, घंटों और दिनों का है। अगर भविष्य में लंबे समय तक किए गए बड़े अध्ययनों से यह साबित हो जाता है कि कई अलग-अलग प्रजातियां बड़े भूकंप से घंटों पहले एक जैसा व्यवहार करती हैं और यह व्यवहार बिना भूकंप के बहुत कम होता है, तो वैज्ञानिकों के सामने अगला बड़ा सवाल होगा कि वे आखिर कौन-सा संकेत महसूस कर रही हैं?

शायद वह कोई ऐसा भौतिक बदलाव हो जिसे हमारे मौजूदा उपकरण अभी ठीक से पकड़ नहीं पा रहे।

फिलहाल विज्ञान का निष्कर्ष संतुलित लेकिन साफ है:

जानवर भूकंप की शुरुआती हलचल इंसानों से पहले महसूस कर सकते हैं, लेकिन यह साबित नहीं हुआ है कि वे भूकंप आने से घंटों या दिनों पहले उसकी भरोसेमंद भविष्यवाणी कर सकते हैं।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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