सेलिबेसी क्या है? क्या यह प्राकृतिक अवस्था है? लंबे समय तक सेक्स न करने से शरीर में वास्तव में क्या होता है?

Celibacy Meaning: क्या लंबे समय तक सेक्स न करने से वीर्य जमा होता है, टेस्टोस्टेरोन बढ़ता है या यौन क्षमता घट जाती है? जानिए लिबेसी, ब्रह्मचर्य और सेक्स न करने के शरीर व मानसिक स्वास्थ्य पर वास्तविक असर।

Yogesh Mishra
Published on: 25 Aug 2026 11:14 PM IST (Updated on: 25 Aug 2026 11:15 PM IST)
Celibacy Meaning
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Celibacy Meaning (Image Credit-Social Media)

सेलिबेसी यानी जानबूझकर यौन संबंधों से दूर रहना। इसका कारण धार्मिक हो सकता है, आध्यात्मिक, व्यक्तिगत, जीवनशैली से जुड़ा या किसी रिश्ते से बाहर रहने का निर्णय। इसे केवल ‘सेक्स न मिलना’ नहीं कहा जाना चाहिए। क्योंकि स्वैच्छिक सेलिबेसी और अनचाही यौन-वंचना दो अलग अनुभव हैं। कोई व्यक्ति स्वयं तय करके वर्षों तक यौन संबंध न बनाए और पूरी तरह संतुष्ट जीवन जी सकता है। वहीं कोई दूसरा व्यक्ति सेक्स या अंतरंगता चाहता हो लेकिन उसे न मिल रही हो, तो उसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव बिल्कुल अलग हो सकते हैं।

सबसे पहले सबसे बड़े भ्रम का उत्तर—क्या सेक्स न करना शरीर के खिलाफ है? नहीं। मनुष्य में यौन इच्छा स्वाभाविक जैविक प्रवृत्ति है। लेकिन नियमित यौन संबंध शरीर की ऐसी अनिवार्य आवश्यकता नहीं है जैसे भोजन, पानी, ऑक्सीजन या नींद। यदि कोई स्वस्थ वयस्क महीनों या वर्षों तक सेक्स नहीं करता, तो शरीर ‘जहर भरने’, वीर्य जमा होकर नुकसान करने या किसी अंग के बंद हो जाने जैसी स्थिति में नहीं पहुँचता। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी यौन स्वास्थ्य को केवल संभोग की आवृत्ति से नहीं, बल्कि शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक कल्याण के व्यापक संदर्भ में परिभाषित करता है।


इसलिए प्रश्न ‘सेक्स करना प्राकृतिक है या न करना?’ का सबसे सही उत्तर है—दोनों मानव व्यवहार की प्राकृतिक सीमा के भीतर हैं। यौन इच्छा होना प्राकृतिक है; उस इच्छा पर कार्य करना या न करना सामाजिक, व्यक्तिगत और जैविक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। मानव इतिहास में संन्यासी, भिक्षु, साधु, नन और दूसरे धार्मिक समुदाय स्वैच्छिक ब्रह्मचर्य अपनाते रहे हैं। दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं जिनकी यौन इच्छा स्वाभाविक रूप से बहुत कम होती है। केवल सेक्स न करने को बीमारी नहीं माना जाता।

लेकिन शरीर के भीतर क्या होता है, यह पुरुष और महिला में कुछ अलग-अलग समझना उपयोगी है।पुरुष के शरीर में वीर्य बनता रहे तो जाता कहाँ है?यह सबसे आम सवाल है। पुरुष के वृषण लगातार शुक्राणु बनाते रहते हैं, चाहे वह यौन संबंध बनाए या नहीं। इसका मतलब यह नहीं कि वीर्य लगातार किसी टंकी में भरता जाता है और अंततः बाहर निकालना जरूरी हो जाता है।पुराने या उपयोग न किए गए शुक्राणुओं को शरीर तोड़कर पुनः अवशोषित कर सकता है। कुछ पुरुषों में नींद के दौरान अनैच्छिक वीर्यस्खलन भी हो सकता है, जिसे स्वप्नदोष या रात्रिकालीन वीर्यस्खलन कहते हैं। 2026 की एक व्यवस्थित समीक्षा ने इसे सामान्य शारीरिक घटना माना है, विशेष रूप से किशोरावस्था और युवावस्था में। दिलचस्प बात यह है कि आधुनिक शोध उस पुरानी धारणा का समर्थन नहीं करता कि स्वप्नदोष केवल इसलिए होता है कि शरीर में “बहुत ज्यादा वीर्य जमा हो गया था और उसे बाहर निकालना जरूरी था।”

अर्थात महीनों तक वीर्यस्खलन न हो तो शरीर संकट में नहीं जाता। वह अपनी कोशिकाओं और द्रवों का प्रबंधन स्वयं करता रहता है।क्या लंबे समय तक सेक्स न करने से टेस्टोस्टेरोन बहुत बढ़ जाता है? इंटरनेट पर इसके बारे में भारी भ्रम है। कुछ लोग दावा करते हैं कि सात दिन, तीस दिन या नब्बे दिन वीर्यस्खलन न करने से टेस्टोस्टेरोन कई गुना बढ़ जाता है और व्यक्ति असाधारण रूप से ताकतवर हो जाता है। इसके लिए ठोस प्रमाण नहीं हैं।

एक छोटा अध्ययन तीन सप्ताह की यौन-विरति के बाद पुरुषों में कुछ अधिक टेस्टोस्टेरोन स्तर की ओर संकेत करता है, लेकिन उसमें केवल दस पुरुष थे। जिस प्रसिद्ध अध्ययन को “सातवें दिन टेस्टोस्टेरोन 145 प्रतिशत हो जाता है” कहकर इंटरनेट पर बार-बार उद्धृत किया जाता है, उसके प्रकाशित अंग्रेजी संस्करण को बाद में वापस ले लिया गया। इसलिए उस दावे को विश्वसनीय वैज्ञानिक तथ्य की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

वास्तविकता यह है कि टेस्टोस्टेरोन मुख्यतः उम्र, नींद, शरीर की संरचना, बीमारी, तनाव, ऊर्जा संतुलन और हार्मोनल नियंत्रण से प्रभावित होता है। सेक्स या वीर्यस्खलन की आवृत्ति उसका कोई सरल ऑन-ऑफ स्विच नहीं है।इसलिए ब्रह्मचर्य से टेस्टोस्टेरोन ‘बचाकर’सशरीर में जमा हो जाता है—यह अवधारणा जैविक रूप से सही नहीं है।

क्या सेक्स न करने से पुरुष की यौन क्षमता कमजोर हो जाती है?



इसका भी सीधा उत्तर ‘हाँ’ नहीं है। स्वस्थ पुरुष लंबे समय तक सेक्स न करने के बाद भी सामान्य यौन क्षमता रख सकता है। सुबह या नींद के दौरान स्वाभाविक स्तंभन होते रह सकते हैं। यौन उत्तेजना मिलने पर शरीर फिर उसी प्रतिक्रिया-व्यवस्था को सक्रिय कर सकता है।लेकिन उम्र बढ़ने, मधुमेह, रक्तवाहिका रोग, हार्मोन संबंधी समस्या या मानसिक तनाव जैसी स्थितियों में लंबे समय तक यौन निष्क्रियता और स्तंभन-क्षमता के बीच संबंध देखना अधिक जटिल हो जाता है। यहाँ कारण और परिणाम अलग करना कठिन है—क्या सेक्स कम होने से स्तंभन समस्या हुई, या पहले से स्तंभन समस्या होने के कारण सेक्स कम हुआ? इसलिए ‘अंग का इस्तेमाल नहीं करेंगे तो वह काम करना बंद कर देगा’ जैसा लोकप्रिय कथन बहुत सरल और भ्रामक है।

क्या सेक्स न करने से प्रोस्टेट कैंसर का खतरा बढ़ जाता है?

यहाँ शोध दिलचस्प है, लेकिन निष्कर्ष को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं कहना चाहिए। लगभग 32 हजार पुरुषों पर एक बड़े दीर्घकालीन अध्ययन में अधिक बार वीर्यस्खलन बताने वाले पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर का निदान कुछ कम पाया गया। उदाहरण के लिए 40–49 वर्ष की आयु में महीने में 21 या उससे अधिक वीर्यस्खलन बताने वालों में 4–7 बार वाले समूह की तुलना में जोखिम कम था। लेकिन यह पर्यवेक्षणात्मक संबंध है। इससे यह साबित नहीं होता कि वीर्यस्खलन न करने से प्रोस्टेट कैंसर होता है या नियमित सेक्स कैंसर से बचाव की दवा है। जीवनशैली, स्वास्थ्य, हार्मोन और दूसरी कई चीजें अंतर पैदा कर सकती हैं।इसलिए किसी सेलिबेट व्यक्ति को यह नहीं सोचना चाहिए कि सेक्स न करने के कारण उसका प्रोस्टेट अनिवार्य रूप से खतरे में है।

महिलाओं के शरीर में क्या होता है?

महिलाओं के बारे में भी कई मिथक हैं—जैसे लंबे समय तक सेक्स न करने पर योनि ‘बंद’सहो जाती है, बहुत छोटी हो जाती है या शरीर में कोई विषाक्त पदार्थ जमा होने लगता है। ऐसा नहीं होता।योनि एक लचीला पेशीय अंग है। सेक्स न करने के कारण वह स्थायी रूप से बंद नहीं होती।हालाँकि रजोनिवृत्ति के बाद स्थिति अलग हो सकती है। एस्ट्रोजन कम होने से योनि की दीवारें पतली, सूखी और कम लचीली हो सकती हैं। इसे रजोनिवृत्ति से जुड़ा जनन-मूत्रीय परिवर्तन कहा जाता है। नियमित यौन गतिविधि—चाहे साथी के साथ हो या अन्य प्रकार की उत्तेजना—कुछ महिलाओं में रक्त प्रवाह और ऊतक की लचक बनाए रखने में मदद कर सकती है, लेकिन मूल कारण सेक्स की कमी नहीं बल्कि मुख्यतः हार्मोन का कम होना है।युवा स्वस्थ महिला में केवल कुछ महीनों या वर्षों तक सेक्स न करने से योनि “खराब” नहीं हो जाती।

फिर लंबे अंतराल के बाद पहली बार सेक्स में दर्द क्यों हो सकता है?

ऐसा कुछ लोगों में हो सकता है। लेकिन कारण आमतौर पर यह नहीं कि शरीर सेक्स ‘भूल गया।’ यदि व्यक्ति चिंतित है तो श्रोणि की मांसपेशियाँ अनजाने में ज्यादा कस सकती हैं। पर्याप्त उत्तेजना न हो तो प्राकृतिक चिकनाई कम हो सकती है। रजोनिवृत्ति या कुछ दवाओं से सूखापन हो सकता है। लंबे समय बाद व्यक्ति जल्दी करने की कोशिश करे तो असुविधा हो सकती है।


इसलिए शरीर को समय, उत्तेजना और पर्याप्त चिकनाई देने पर समस्या अक्सर कम हो जाती है। लगातार दर्द हो तो उसे ‘बहुत दिनों बाद सेक्स हुआ है’ कहकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए; संक्रमण, श्रोणि की मांसपेशियों की समस्या, एंडोमेट्रियोसिस या दूसरी चिकित्सकीय स्थितियाँ भी कारण हो सकती हैं।

क्या सेक्स न करने से यौन इच्छा बढ़ती है या घटती है?

दोनों हो सकते हैं।कुछ लोगों में लंबे समय तक सेक्स न करने पर इच्छा अधिक महसूस होती है। यौन कल्पनाएँ बढ़ सकती हैं, हस्तमैथुन की इच्छा हो सकती है या सामान्य संकेत भी अधिक उत्तेजक लग सकते हैं।दूसरे लोगों में उलटा होता है। धीरे-धीरे सेक्स उनकी रोजमर्रा की मानसिक प्राथमिकता से बाहर चला जाता है और इच्छा कम महसूस होने लगती है।यह विरोधाभास इसलिए है क्योंकि यौन इच्छा केवल हार्मोन नहीं है। इसमें मस्तिष्क, आदत, संबंध, स्मृति, तनाव, अवसर और ध्यान सभी शामिल हैं।

यदि आपका जीवन लगातार काम, साधना, व्यायाम और दूसरी गतिविधियों से भरा है तो यौन विचार कम प्रमुख हो सकते हैं। यदि आप लगातार यौन सामग्री देखते या उसी पर सोचते रहते हैं तो बिना यौन संबंध के भी कामेच्छा बहुत तीव्र रह सकती है।अर्थात संयम अपने-आप कामेच्छा मिटा नहीं देता।

ब्रेन में क्या होता है?

यौन उत्तेजना और संभोग मस्तिष्क के पुरस्कार, प्रेरणा, स्पर्श और भावनात्मक तंत्रों को सक्रिय करते हैं। डोपामिन, ऑक्सीटोसिन, अंतर्जात ओपिऑइड और अन्य रासायनिक संदेशवाहक अलग-अलग चरणों में भूमिका निभाते हैं।यदि कोई सेक्स नहीं करता तो ये प्रणालियाँ बंद नहीं हो जातीं। यही पुरस्कार तंत्र भोजन, संगीत, व्यायाम, सामाजिक निकटता, उपलब्धि और दूसरे सुखद अनुभवों में भी सक्रिय होते हैं। इसलिए सेक्स की अनुपस्थिति का अर्थ यह नहीं कि ‘डोपामिन नहीं मिलेगा’ या ‘ऑक्सीटोसिन समाप्त हो जाएगा।’ गले लगना, मित्रता, पारिवारिक निकटता, पालतू पशु के साथ संपर्क, व्यायाम और सामाजिक संबंध भी शरीर और मस्तिष्क के कई कल्याणकारी तंत्रों को सक्रिय कर सकते हैं।

यही कारण है कि सेक्स और अंतरंगता को एक ही चीज नहीं समझना चाहिए।

कोई व्यक्ति यौन संबंध न रखते हुए भी गहरी भावनात्मक निकटता, स्पर्श, प्रेम और सामाजिक जुड़ाव पा सकता है।और कोई दूसरा व्यक्ति बहुत सेक्स करते हुए भी भावनात्मक रूप से अकेला हो सकता है।

क्या सेक्स तनाव कम करता है?



कुछ लोगों में संभोग या चरमोत्कर्ष के बाद विश्राम, बेहतर नींद और तनाव में कमी महसूस हो सकती है। इसका संबंध स्वायत्त तंत्रिका तंत्र और कई न्यूरो-रासायनिक परिवर्तनों से है।लेकिन इसका उलटा निष्कर्ष सही नहीं—कि जो सेक्स नहीं करेगा वह लगातार तनावग्रस्त रहेगा।तनाव कम करने के बहुत से दूसरे प्रभावी तरीके हैं—व्यायाम, नींद, ध्यान, सामाजिक संपर्क, संगीत और प्रकृति में समय बिताना।इसलिए सेक्स तनाव घटाने का एक रास्ता हो सकता है, शरीर की अनिवार्य तनाव-दवा नहीं।

क्या ब्रह्मचर्य से ऊर्जा बचती है?

यह धारणा अनेक आध्यात्मिक परंपराओं में मिलती है, लेकिन यहाँ जैविक और आध्यात्मिक दावे अलग रखने चाहिए।वीर्य बनाने में शरीर ऊर्जा खर्च करता है, लेकिन वह मात्रा इतनी नहीं कि वीर्यस्खलन से शरीर की विशाल ‘जीवन-ऊर्जा’ससमाप्त हो जाए। वीर्य में प्रोटीन, शर्करा, खनिज और शुक्राणु होते हैं, लेकिन सामान्य वीर्यस्खलन से होने वाली पोषक-हानि नगण्य होती है और शरीर आसानी से उसे पूरा कर देता है।

यदि किसी व्यक्ति को ब्रह्मचर्य से ज्यादा एकाग्रता महसूस होती है, तो इसका कारण मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक हो सकता है—वह यौन संबंध खोजने, डेटिंग, पोर्नोग्राफी या यौन विचारों में कम समय लगा रहा है और वही ध्यान दूसरे लक्ष्य पर केंद्रित हो रहा है।यह वास्तविक अनुभव हो सकता है, लेकिन उसे ‘वीर्य में जमा हुई वैज्ञानिक ऊर्जा सीधे मस्तिष्क में चली गई’ कहना उचित नहीं।

क्या हस्तमैथुन भी सेलिबेसी को तोड़ता है?

यह चिकित्सा का नहीं बल्कि परिभाषा और व्यक्तिगत संकल्प का प्रश्न है।कुछ धार्मिक परंपराओं में ब्रह्मचर्य का अर्थ सभी यौन गतिविधियों और हस्तमैथुन से दूर रहना है। दूसरी परिभाषाओं में सेलिबेसी मुख्यतः किसी दूसरे व्यक्ति के साथ यौन संबंध न बनाने को कहा जाता है।चिकित्सा की दृष्टि से हस्तमैथुन और साथी के साथ सेक्स दोनों अलग व्यवहार हैं, लेकिन दोनों यौन प्रतिक्रिया और चरमोत्कर्ष उत्पन्न कर सकते हैं।इसलिए ‘सेलिबेसी’ की सीमा व्यक्ति के धार्मिक या व्यक्तिगत संदर्भ पर निर्भर करती है।

स्वैच्छिक ब्रह्मचर्य और मजबूरी का अकेलापन इतना अलग क्यों है?

यहीं इस विषय की मनोविज्ञान सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।यदि किसी व्यक्ति ने स्वयं निर्णय लिया है कि वह यौन संबंध नहीं रखेगा और वह अपने निर्णय से संतुष्ट है, तो यह आत्मनियंत्रण, धार्मिक पहचान या व्यक्तिगत जीवनशैली का हिस्सा हो सकता है। वहाँ सेक्स की अनुपस्थिति अपने-आप तनाव नहीं है।लेकिन यदि कोई व्यक्ति संबंध और यौन निकटता चाहता है, उसे लगातार अस्वीकृति मिलती है और वह स्वयं को अकेला या अयोग्य महसूस करता है, तो समस्या केवल ‘वीर्यस्खलन न होने’ की नहीं है। वास्तविक समस्या अकेलापन, अस्वीकृति, सामाजिक अलगाव और unmet intimacy needs हो सकती है।

शरीर दोनों स्थितियों में समान रूप से सेक्स नहीं कर रहा, लेकिन मस्तिष्क का अनुभव बिल्कुल अलग है।इसलिए यह कहना कि ‘सेक्स न करने से अवसाद होता है’ बहुत सरल होगा। अधिक सही बात है कि अनचाही अकेलापन और संबंधों की कमी मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।

क्या सेक्स करने वाले लोग ज्यादा स्वस्थ रहते हैं?

कई जनसंख्या अध्ययनों में अधिक यौन गतिविधि बेहतर स्वास्थ्य, खुशी या कम मृत्यु जोखिम से जुड़ी पाई गई है। लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ी समस्या है—कारण उलटा भी हो सकता है।स्वस्थ लोग अधिक सेक्स कर पाते हैं।गंभीर बीमारी वाले लोग कम सेक्स करते हैं।अच्छे रिश्ते वाले लोग अधिक अंतरंग हो सकते हैं और उनका मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर हो सकता है।अधिक आय और बेहतर स्वास्थ्य वाले लोग संबंधों में भी अलग परिस्थितियाँ रखते हैं।इसलिए केवल यह देखकर कि अधिक सेक्स करने वाले लोग औसतन स्वस्थ निकले, यह साबित नहीं किया जा सकता कि सेक्स की कमी ने दूसरों को बीमार किया।यही कारण है कि चिकित्सा विज्ञान किसी स्वस्थ व्यक्ति को यह नहीं कहता कि “स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए सप्ताह में इतनी बार सेक्स करना अनिवार्य है।”ऐसा कोई निर्धारित चिकित्सकीय न्यूनतम नहीं है।

सेक्स न करने का एक स्पष्ट स्वास्थ्य लाभ भी है

यदि कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार का यौन संपर्क नहीं करता तो यौन संपर्क से फैलने वाले संक्रमण और यौन संबंध से होने वाली अनचाही गर्भावस्था का जोखिम स्वाभाविक रूप से समाप्त या अत्यंत कम हो जाता है। WHO यौन स्वास्थ्य में सुरक्षित यौन अनुभव, संक्रमणों की रोकथाम और प्रजनन संबंधी निर्णय—इन सबको शामिल करता है। इसका अर्थ यह नहीं कि सेक्स खतरनाक है। सुरक्षित और सहमति-आधारित सेक्स सामान्य मानव जीवन का स्वस्थ हिस्सा हो सकता है। केवल इतना कि संयम के अपने जैविक लाभ और नुकसान का संतुलन है, और संक्रमण-जोखिम में कमी उनमें से एक स्पष्ट लाभ है।

क्या लंबे सेलिबेसी के बाद शरीर दोबारा सामान्य सेक्स कर सकता है?


अधिकांश स्वस्थ लोगों में हाँ।महिला की योनि स्थायी रूप से बंद नहीं होती।पुरुष का लिंग केवल सेक्स न करने से निष्क्रिय नहीं हो जाता।कामेच्छा जरूरत पड़ने पर वापस बढ़ सकती है।तंत्रिका तंत्र यौन उत्तेजना पर फिर प्रतिक्रिया दे सकता है।यदि बहुत लंबे अंतराल के बाद चिंता हो, उम्र बढ़ चुकी हो, रजोनिवृत्ति हो या कोई बीमारी जुड़ गई हो तो कुछ कठिनाई हो सकती है—लेकिन वह केवल सेलिबेसी का परिणाम होना जरूरी नहीं।इसलिए दस वर्ष तक सेक्स न करने वाले स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में ऐसा कोई “रीसेट बटन” नहीं दब जाता जिससे यौन क्षमता समाप्त हो जाए।

और क्या ‘यूज़ इट ऑर लूज़ इट’ बिल्कुल गलत है?

पूरी तरह नहीं, लेकिन इसे संदर्भ में समझना चाहिए।मांसपेशी की तरह यौन अंगों को रोज ‘अभ्यास’ की आवश्यकता नहीं होती। फिर भी रक्तवाहिका स्वास्थ्य, हार्मोन और ऊतकों की स्थिति यौन प्रतिक्रिया पर असर डालते हैं। उम्र और रजोनिवृत्ति के संदर्भ में नियमित उत्तेजना कुछ लोगों में रक्त प्रवाह और आराम बनाए रखने में सहायक हो सकती है।लेकिन ‘सेक्स बंद = अंग खराब’ विज्ञान नहीं है।

अधिक सटीक सूत्र है—समग्र स्वास्थ्य स्वस्थ रहेगा तो यौन क्षमता आम तौर पर बनी रह सकती है, चाहे यौन गतिविधि की आवृत्ति कम ही क्यों न हो।

तो क्या सेलिबेसी ‘स्वास्थ्यवर्धक’ है?

न अपने-आप स्वास्थ्यवर्धक, न अपने-आप नुकसानदेह।यदि स्वैच्छिक है, व्यक्ति उससे संतुष्ट है, सामाजिक संबंध अच्छे हैं और वह अपनी यौन इच्छाओं से संघर्ष में नहीं है—तो वर्षों का ब्रह्मचर्य भी स्वस्थ जीवन के साथ पूरी तरह संगत हो सकता है।

यदि वही संयम लगातार अपराधबोध, जबरदस्ती, चिंता, अकेलेपन या तीव्र इच्छाओं को दबाने के संघर्ष से जुड़ा है तो मानसिक अनुभव कठिन हो सकता है।इसी तरह बहुत सक्रिय यौन जीवन भी स्वस्थ हो सकता है—यदि वह सहमति, सुरक्षा और संतोष पर आधारित हो। और वही व्यवहार बाध्यकारी, जोखिमपूर्ण या दुखद भी हो सकता है। इसलिए स्वास्थ्य का सवाल ‘सेक्स कितना?’ से ज्यादा “आपका उससे संबंध कैसा है?” है।

यही WHO की व्यापक यौन-स्वास्थ्य अवधारणा का सार भी है—यौन स्वास्थ्य केवल बीमारी न होने का नाम नहीं, बल्कि शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक कल्याण से जुड़ा है। अंत में इसे बहुत सरल तरीके से समझें। लंबे समय तक सेक्स न करने पर शरीर में वीर्य जहर नहीं बनता, टेस्टोस्टेरोन अनंत नहीं बढ़ता, महिला की योनि बंद नहीं होती और यौन क्षमता अपने-आप समाप्त नहीं होती। पुरुष शरीर पुराने शुक्राणुओं का पुनः अवशोषण कर सकता है और कभी स्वप्नदोष हो सकता है; कामेच्छा किसी में बढ़ सकती है, किसी में कम, मानसिक प्रभाव इस बात पर बहुत निर्भर करता है कि संयम स्वैच्छिक है या अनचाहा। अधिक वीर्यस्खलन और कुछ स्वास्थ्य परिणामों के बीच संबंध जरूर मिले हैं, जैसे प्रोस्टेट कैंसर के कम निदान का एक पर्यवेक्षणात्मक संबंध, लेकिन इससे सेक्स को अनिवार्य चिकित्सा नहीं बनाया जा सकता।

इसलिए शायद सबसे सटीक निष्कर्ष यह है—मनुष्य यौन प्राणी है। लेकिन संभोग शरीर की अनिवार्य दैनिक आवश्यकता नहीं है। इच्छा प्राकृतिक है; संयम भी मानव क्षमता का हिस्सा है। शरीर दोनों परिस्थितियों के अनुकूल हो सकता है। फर्क सबसे अधिक इस बात से पड़ता है कि व्यक्ति अपने निर्णय, इच्छाओं, संबंधों और भावनात्मक जीवन के साथ कितना सहज है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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