TRENDING TAGS :
Cement vs Concrete: सीमेंट और कंक्रीट में क्या फर्क है, कंक्रीट दशकों तक मजबूत क्यों रहती है?
Cement vs Concrete Explained: सीमेंट और कंक्रीट में क्या फर्क है? कंक्रीट दशकों तक मजबूत क्यों रहती है?
Cement vs Concrete Difference Between Cement and Concrete
Cement vs Concrete Explained: सीमेंट और कंक्रीट को अक्सर एक ही चीज समझ लिया जाता है। लोग कहते हैं, ‘सड़क सीमेंट की बनी है’ या ‘मकान में सीमेंट की छत है’, जबकि तकनीकी रूप से ऐसी ज्यादातर संरचनाएं कंक्रीट की होती हैं। सीमेंट वास्तव में कंक्रीट का सिर्फ एक हिस्सा है। आसान उदाहरण से समझें तो जिस तरह आटे से रोटी बनती है, लेकिन आटा खुद रोटी नहीं होता, उसी तरह सीमेंट से कंक्रीट बनती है, लेकिन सीमेंट खुद कंक्रीट नहीं है।
सामान्य कंक्रीट में मुख्य रूप से सीमेंट, पानी, रेत और गिट्टी होती है। पानी मिलने के बाद सीमेंट रासायनिक प्रतिक्रिया करता है और ऐसा मजबूत पदार्थ बनाता है जो रेत और गिट्टी के कणों को आपस में बांध देता है। इस तरह एक ऐसी कृत्रिम चट्टान बनती है जो सही निर्माण और अनुकूल परिस्थितियों में दशकों ही नहीं, बल्कि सौ साल या उससे भी ज्यादा समय तक टिक सकती है।
आज की दुनिया के पुल, बांध, सुरंगें, ऊंची इमारतें, रनवे और दूसरी विशाल संरचनाएं इसी सिद्धांत पर खड़ी हैं। लेकिन आखिर सीमेंट ऐसा क्या करता है कि पानी और पाउडर मिलकर कुछ समय बाद पत्थर जैसी मजबूत सामग्री बन जाते हैं?
सीमेंट वास्तव में क्या है?
आधुनिक निर्माण में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला पोर्टलैंड सीमेंट एक बहुत बारीक पाउडर होता है। इसे मुख्य रूप से चूना पत्थर और सिलिका, एल्युमिना तथा लौह वाले कच्चे पदार्थों को एक निश्चित अनुपात में मिलाकर बहुत ज्यादा तापमान पर भट्ठी में गर्म करके बनाया जाता है। इस प्रक्रिया में छोटे-छोटे कठोर दाने बनते हैं, जिन्हें ‘क्लिंकर’ कहा जाता है। क्लिंकर को ठंडा करके उसमें आमतौर पर थोड़ी मात्रा में जिप्सम मिलाया जाता है और फिर उसे बहुत बारीक पीसा जाता है। यही पाउडर सीमेंट होता है। सीमेंट का सबसे महत्वपूर्ण काम खुद कोई बड़ी संरचना बनना नहीं, बल्कि दूसरे पदार्थों को आपस में मजबूती से जोड़ना है। इसी वजह से कंक्रीट में सीमेंट के साथ रेत और गिट्टी मिलाई जाती है।
कंक्रीट में रेत और गिट्टी क्यों डाली जाती है?
अगर पूरी इमारत सिर्फ सीमेंट के पेस्ट से बनाने की कोशिश की जाए तो वह बहुत महंगी भी होगी और तकनीकी रूप से भी सही नहीं होगी। रेत और गिट्टी कंक्रीट का बड़ा हिस्सा बनाती हैं। ये उसके भीतर एक मजबूत खनिज ढांचा तैयार करती हैं और सीमेंट के पेस्ट की मात्रा को कम करती हैं। सीमेंट और पानी से बना पेस्ट रेत और गिट्टी के कणों के बीच की जगह भरता है और उन्हें आपस में जोड़ देता है। इसलिए कंक्रीट को केवल ‘जमा हुआ सीमेंट’ समझना गलत है। यह अलग-अलग आकार के पत्थर और रेत के कणों को सीमेंट के रासायनिक बंधन से जोड़कर बनाई गई एक जटिल मिश्रित सामग्री है। यही व्यवस्था कंक्रीट को एक साथ मजबूत, टिकाऊ और अपेक्षाकृत किफायती बनाती है।
पानी डालते ही पाउडर पत्थर जैसा कैसे हो जाता है?
यही कंक्रीट का असली विज्ञान है। सीमेंट को मजबूत करने के लिए पानी सिर्फ उसे गीला करने या बाद में सुखाने का काम नहीं करता। पानी सीमेंट के अलग-अलग पदार्थों के साथ हाइड्रेशन नाम की रासायनिक प्रतिक्रिया करता है। इस प्रतिक्रिया के दौरान नए ठोस पदार्थ बनते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कैल्शियम-सिलिकेट-हाइड्रेट, यानी सी-एस-एच, होता है। यही वह मुख्य पदार्थ है जो सूक्ष्म स्तर पर सीमेंट के कणों को जोड़ता है और कंक्रीट को उसकी मजबूती देने में बड़ी भूमिका निभाता है। इसके साथ कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड और दूसरे पदार्थ भी बनते हैं। जैसे-जैसे हाइड्रेशन आगे बढ़ता है, सीमेंट के कणों के आसपास सी-एस-एच बनता जाता है। यह सूक्ष्म खाली जगहों में फैलता है और रेत तथा गिट्टी को आपस में बांधता जाता है। धीरे-धीरे पूरा मिश्रण एक ठोस ढांचे में बदलने लगता है।
इसलिए कंक्रीट का मजबूत होना मिट्टी के सूखने जैसा नहीं है। अगर केवल पानी के उड़ जाने से कंक्रीट मजबूत होती तो उसे बाद में पानी देना नुकसानदायक होता। जबकि वास्तव में निर्माण के शुरुआती दिनों में कंक्रीट को पर्याप्त नमी देना उसकी मजबूती के लिए बहुत जरूरी होता है।
नई छत पर कई दिन पानी क्यों डाला जाता है?
नई छत या स्लैब पर आपने कई बार पानी भरा हुआ देखा होगा। आम तौर पर इसे ‘क्योरिंग’ कहा जाता है। बहुत से लोगों को लगता है कि पानी इसलिए डाला जाता है ताकि कंक्रीट ठंडी रहे। तापमान का असर जरूर होता है, लेकिन मुख्य उद्देश्य यह है कि कंक्रीट से पानी बहुत तेजी से बाहर न निकले और सीमेंट की हाइड्रेशन प्रक्रिया ठीक से चलती रहे। अगर नई कंक्रीट तेज धूप, गर्म हवा या बहुत कम नमी के कारण जल्दी सूख जाए तो हाइड्रेशन पर्याप्त रूप से आगे नहीं बढ़ पाती। इससे कंक्रीट की मजबूती प्रभावित हो सकती है और सतह पर सिकुड़ने से महीन दरारें भी बन सकती हैं। इसके उलट पर्याप्त नमी और सही तापमान मिलने पर सीमेंट की अंदरूनी संरचना धीरे-धीरे बेहतर बनती रहती है। इसलिए क्योरिंग कोई पुरानी निर्माण परंपरा नहीं है। यह कंक्रीट के रसायन विज्ञान का जरूरी हिस्सा है।
28 दिन की बात क्यों होती है?
निर्माण की दुनिया में 28 दिन का आंकड़ा बहुत प्रसिद्ध है, लेकिन इसका मतलब अक्सर गलत समझा जाता है। कंक्रीट 28वें दिन अचानक पूरी तरह मजबूत होकर उसके बाद बदलना बंद नहीं करती। वास्तव में उसकी मजबूती शुरुआती दिनों में तेजी से बढ़ती है और फिर यह बढ़ोतरी धीरे-धीरे कम होती जाती है। 28 दिन को एक मानक उम्र के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जिस पर कंक्रीट की तय की गई दबाव सहने की क्षमता की जांच की जाती है। अलग-अलग सीमेंट, मिश्रण, तापमान, क्योरिंग और दूसरे पदार्थों के कारण कंक्रीट की मजबूती बढ़ने की गति अलग हो सकती है। अच्छी तरह बनी कंक्रीट 28 दिन के बाद भी लंबे समय तक धीरे-धीरे मजबूती हासिल कर सकती है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि 28 दिन के बाद कंक्रीट के अंदर रासायनिक प्रक्रिया पूरी तरह बंद हो जाती है। 28 दिन मुख्य रूप से इंजीनियरिंग और गुणवत्ता की जांच के लिए एक समान तुलना बिंदु है।
ज्यादा पानी नुकसान भी करता है, ऐसा क्यों?
कंक्रीट का यह सबसे महत्वपूर्ण विरोधाभास है। सीमेंट की हाइड्रेशन प्रक्रिया के लिए पानी जरूरी है, लेकिन जरूरत से ज्यादा पानी कंक्रीट को कमजोर कर सकता है। निर्माण के दौरान ज्यादा पानी डालने से मिश्रण पतला और आसानी से फैलने वाला हो जाता है। इसलिए मजदूरों या निर्माण स्थल पर काम करने वालों को कभी-कभी इसमें और पानी डालने का मन होता है। लेकिन बाद में यही अतिरिक्त पानी निकल जाता है या वाष्पित हो जाता है और उसकी जगह बहुत छोटे छेद रह जाते हैं। जितने ज्यादा और जितने ज्यादा जुड़े हुए छेद होंगे, उतनी आसानी से पानी, हवा, नमक और दूसरे नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थ कंक्रीट के अंदर जा सकेंगे। इससे समय के साथ कंक्रीट और उसके अंदर मौजूद सरिया दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
इसीलिए जल-सीमेंट अनुपात कंक्रीट की मजबूती और टिकाऊपन के सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है। बहुत कम पानी होने पर मिश्रण को सही ढंग से डालना और दबाकर सघन करना मुश्किल हो सकता है, जबकि बहुत ज्यादा पानी कंक्रीट को ज्यादा छिद्रयुक्त बना सकता है। इसी कारण आज ऐसी रासायनिक मिलावटें इस्तेमाल की जाती हैं जो ज्यादा पानी डाले बिना कंक्रीट को काम करने लायक और आसानी से फैलने वाला बना सकती हैं।
कंक्रीट दबाने पर मजबूत, लेकिन खींचने पर कमजोर क्यों होती है?
कंक्रीट की एक मूल कमजोरी है। वह दबाव को बहुत अच्छी तरह सहती है, लेकिन खिंचाव को उतनी अच्छी तरह नहीं सह पाती। मान लीजिए कंक्रीट की एक लंबी पट्टी को बीच से मोड़ा जाए। उसके एक हिस्से पर दबाव पड़ेगा, जबकि दूसरे हिस्से पर खिंचाव पैदा होगा। इसी खिंचाव वाले हिस्से में दरार आने की संभावना ज्यादा होती है। यहीं स्टील की सरिया काम आती है। भवनों में जिस सामग्री को आरसीसी (reinforced cement concrete) यानी प्रबलित सीमेंट कंक्रीट कहा जाता है, उसमें कंक्रीट के अंदर स्टील की सरिया डाली जाती है। कंक्रीट दबाव का भार अच्छी तरह संभालती है और स्टील खिंचाव का भार संभालता है। दोनों को साथ इस्तेमाल करने से ऐसी संरचनात्मक सामग्री बनती है जो अकेली कंक्रीट की तुलना में कहीं ज्यादा उपयोगी होती है। यही कारण है कि बीम, स्लैब, कॉलम और पुलों में कंक्रीट के अंदर सरिया डाली जाती है।
कंक्रीट के अंदर स्टील है तो उसमें जंग क्यों नहीं लगती?
अच्छी और नई कंक्रीट आमतौर पर बहुत क्षारीय होती है। यह वातावरण स्टील की सतह पर एक बेहद पतली सुरक्षात्मक परत बनाने में मदद करता है। यह परत स्टील को तेजी से जंग लगने से बचाती है। इसके अलावा कंक्रीट की पर्याप्त मोटी परत स्टील को बाहर के पानी, हवा और दूसरे नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थों से भी काफी हद तक बचाती है। लेकिन समय के साथ यही सुरक्षा कमजोर हो सकती है। अगर दरारों या बहुत ज्यादा छिद्र वाली कंक्रीट से पानी और क्लोराइड अंदर पहुंच जाएं, तो स्टील की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। इसी तरह हवा में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड धीरे-धीरे कंक्रीट के अंदर जाकर उसकी क्षारीयता कम कर सकती है।
जब स्टील की सुरक्षात्मक स्थिति खत्म होने लगती है तो उसमें जंग लग सकती है। समस्या यह है कि जंग लगी स्टील का आयतन मूल स्टील से ज्यादा होता है। इसलिए वह आसपास की कंक्रीट पर अंदर से दबाव डालती है। पहले महीन दरारें आती हैं, फिर वे चौड़ी हो सकती हैं और अंततः कंक्रीट के टुकड़े बाहर निकलने लगते हैं। समुद्र के किनारे या नमक के संपर्क में आने वाले पुलों और दूसरी संरचनाओं में क्लोराइड इसी कारण बड़ी समस्या बन सकता है।
कंक्रीट दशकों तक मजबूत क्यों रहती है?
अच्छी कंक्रीट की अंदरूनी संरचना काफी घनी होती है। सी-एस-एच और हाइड्रेशन से बने दूसरे पदार्थ रेत और गिट्टी के बीच मजबूत बंधन बनाते हैं। रेत और गिट्टी खुद भी टिकाऊ खनिज पदार्थ होते हैं। इसके अलावा कम और नियंत्रित जल-सीमेंट अनुपात से कंक्रीट के अंदर छेद कम किए जा सकते हैं। अच्छी क्योरिंग उसकी संरचना को और मजबूत बनाने में मदद करती है। पर्याप्त कंक्रीट आवरण सरिया को लंबे समय तक बाहरी वातावरण से बचाता है और सही डिजाइन भार को ठीक तरीके से बांटता है। इसलिए कंक्रीट की लंबी उम्र केवल इस वजह से नहीं होती कि ‘सीमेंट बहुत मजबूत है’। इसके पीछे कई चीजों का एक साथ सही होना जरूरी है। सही सामग्री, सही अनुपात, पर्याप्त सघनता, अच्छी क्योरिंग, सरिया का पर्याप्त आवरण, सही डिजाइन और पानी की उचित निकासी, सभी मिलकर उसकी उम्र तय करते हैं। इनमें से किसी एक में गंभीर गलती हो तो लंबे समय तक चलने वाली कंक्रीट कुछ दशकों में ही खराब हो सकती है।
रोमन कंक्रीट हजारों साल कैसे बची हुई है?
कंक्रीट की टिकाऊपन की बात आते ही प्राचीन रोम का उदाहरण अक्सर दिया जाता है। रोमनों ने चूने और ज्वालामुखीय राख जैसे पदार्थों से निर्माण सामग्री बनाई थी। उनकी कई समुद्री संरचनाएं लगभग दो हजार साल बाद भी मौजूद हैं। आधुनिक शोध में रोमन कंक्रीट की अंदरूनी संरचना में ऐसे खनिजीय बदलाव मिले हैं जो लंबे समय तक उसके टिके रहने में योगदान कर सकते हैं। कुछ अध्ययनों में चूने के खास कणों और दरारों के भीतर बाद में बनने वाले कैल्शियम वाले पदार्थों के कारण बहुत छोटी दरारों के आंशिक रूप से भरने की क्षमता के संकेत भी मिले हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि रोमन कंक्रीट हर मामले में आज की कंक्रीट से बेहतर थी। आधुनिक प्रबलित कंक्रीट को गगनचुंबी इमारतों, बड़े पुलों, भारी यातायात और बहुत ज्यादा भार के लिए डिजाइन किया जाता है। रोमन संरचनाओं की सामग्री, डिजाइन और उन पर पड़ने वाला भार अलग था। फिर भी रोमन कंक्रीट यह जरूर दिखाती है कि सही रसायन और सही वातावरण मिलने पर खनिज आधारित निर्माण सामग्री असाधारण रूप से लंबे समय तक टिक सकती है।
क्या कंक्रीट अपनी दरार खुद भर सकती है?
कुछ परिस्थितियों में हां। कंक्रीट में बहुत महीन दरारों के अंदर पानी पहुंचने पर बचा हुआ सीमेंट फिर से प्रतिक्रिया कर सकता है। कुछ कैल्शियम वाले पदार्थ भी वहां जमा होकर छोटी दरारों को आंशिक रूप से भर सकते हैं। इसे स्वतः दरार भरना या ‘ऑटोजेनस हीलिंग’ कहा जाता है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि किसी भवन की बड़ी संरचनात्मक दरार अपने आप ठीक हो जाएगी। यह प्रभाव मुख्य रूप से बहुत छोटी दरारों तक सीमित होता है।
आज वैज्ञानिक सेल्फ क्योरिंग कंक्रीट पर भी काम कर रहे हैं। इसमें खास तरह के जीवाणु, सूक्ष्म कैप्सूल या दूसरे पदार्थ मिलाए जाते हैं। दरार आने और पानी पहुंचने पर ये पदार्थ सक्रिय होकर ऐसे पदार्थ बना सकते हैं जो दरार को भरने में मदद करें। यह तकनीक अभी विकास के दौर में है। इसलिए किसी बड़ी दरार को देखकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि कंक्रीट खुद उसे ठीक कर लेगी।
कंक्रीट की सबसे बड़ी दुश्मन अक्सर पानी ही क्यों बन जाता है?
यह कंक्रीट का एक और दिलचस्प विरोधाभास है। निर्माण के शुरुआती दौर में पानी उसका साथी है, क्योंकि सीमेंट की हाइड्रेशन प्रक्रिया के लिए पानी जरूरी है। लेकिन संरचना तैयार होने के बाद बाहर का पानी अपने साथ कई नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थ अंदर ला सकता है। पानी क्लोराइड, सल्फेट और दूसरे पदार्थों को कंक्रीट के अंदर पहुंचा सकता है। लगातार गीला और सूखा होने से भी नुकसान बढ़ सकता है। ठंडे देशों में कंक्रीट की दरारों और छेदों में जमा पानी जमने पर फैलता है। बार-बार जमने और पिघलने से कंक्रीट धीरे-धीरे टूट सकती है। इसलिए अच्छी कंक्रीट बनाने का लक्ष्य उसे पूरी तरह पानी से अछूता बनाना नहीं, बल्कि उसकी पारगम्यता कम करना होता है, ताकि पानी और नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थ बहुत धीरे-धीरे अंदर पहुंचें। यही वजह है कि दो इमारतों में लगभग समान मात्रा में सीमेंट इस्तेमाल होने के बावजूद उनकी उम्र बहुत अलग हो सकती है।
नई इमारत में दरार दिखे तो क्या कंक्रीट कमजोर है?
हर दरार खतरे का संकेत नहीं होती। कंक्रीट सूखने पर थोड़ी सिकुड़ती है और तापमान बदलने पर फैलती और सिकुड़ती रहती है। शुरुआती दिनों में अगर नमी बहुत तेजी से निकल जाए तो सतह पर महीन दरारें बन सकती हैं। दूसरी ओर लगातार चौड़ी होती दरार, तिरछी दरार या बीम और कॉलम के महत्वपूर्ण हिस्से में दिखाई देने वाली दरार किसी संरचनात्मक समस्या का संकेत हो सकती है। इसलिए सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि दरार है या नहीं। उसकी चौड़ाई, दिशा, गहराई, जगह और समय के साथ उसमें होने वाला बदलाव भी देखना जरूरी है। किसी गंभीर दरार का सही कारण समझने के लिए इंजीनियर की जांच की जरूरत पड़ सकती है। कंक्रीट की दरार को एक तरह की भाषा भी समझ सकते हैं। उसका आकार और दिशा यह संकेत दे सकते हैं कि संरचना के अंदर किस तरह का दबाव या खिंचाव काम कर रहा है।
क्या ज्यादा सीमेंट डालने से कंक्रीट ज्यादा मजबूत हो जाएगी?
यह निर्माण से जुड़ी आम गलत धारणाओं में से एक है। कंक्रीट की मजबूती सिर्फ सीमेंट की मात्रा से तय नहीं होती। जरूरत से ज्यादा सीमेंट लागत बढ़ा सकता है और हाइड्रेशन के दौरान ज्यादा गर्मी पैदा कर सकता है। कुछ परिस्थितियों में इससे सिकुड़ने और दरार की समस्या भी बढ़ सकती है। कंक्रीट की मजबूती के लिए सही जल-सीमेंट अनुपात, उपयुक्त रेत और गिट्टी, कणों का सही आकार और वितरण, पर्याप्त सघनता और उचित क्योरिंग भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसीलिए आधुनिक इंजीनियरिंग में केवल यह नहीं देखा जाता कि एक बोरी सीमेंट में कितनी रेत और गिट्टी मिलानी है। आवश्यक मजबूती और टिकाऊपन के आधार पर मिक्स डिजाइन तैयार किया जाता है। पुल, ऊंची इमारत, सामान्य मकान और बांध के लिए एक जैसी कंक्रीट जरूरी नहीं होती।
कोई इमारत सौ साल चलती है और कोई दस साल में खराब क्यों हो जाती है?
यहीं सामग्री और निर्माण की गुणवत्ता का असली फर्क सामने आता है। अगर कंक्रीट में जरूरत से ज्यादा पानी डाल दिया गया, उसे ठीक से सघन नहीं किया गया, क्योरिंग अधूरी रही, सरिया के ऊपर पर्याप्त कंक्रीट आवरण नहीं दिया गया, खराब सामग्री इस्तेमाल हुई या पानी की निकासी ठीक नहीं रही तो उसकी उम्र तेजी से घट सकती है। इसके अलावा संरचना जिस वातावरण में है, उसका भी बहुत असर पड़ता है। समुद्र के पास नमक और नमी, बहुत ठंडे इलाकों में जमने-पिघलने का चक्र और औद्योगिक क्षेत्रों में कुछ रासायनिक पदार्थ कंक्रीट को सामान्य वातावरण की तुलना में ज्यादा तेजी से नुकसान पहुंचा सकते हैं। दूसरी तरफ अच्छी डिजाइन और अच्छे निर्माण वाली कंक्रीट दशकों तक बहुत कम मरम्मत के साथ काम कर सकती है।
इसलिए किसी भवन की उम्र सिर्फ सीमेंट के ब्रांड से तय नहीं होती। उसकी उम्र का एक बड़ा हिस्सा उसी समय तय होने लगता है जब कंक्रीट को मिलाया, डाला, सघन किया और क्योर किया जा रहा होता है। निर्माण के शुरुआती दिनों की छोटी गलती कई बार ऐसी कमजोरी छोड़ जाती है जिसका असर वर्षों बाद दिखाई देता है।
सीमेंट ‘गोंद’ है और कंक्रीट ‘कृत्रिम चट्टान’
दोनों के अंतर को याद रखने का सबसे आसान तरीका यही है। सीमेंट एक बंधनकारी पाउडर है, जबकि कंक्रीट सीमेंट, पानी, रेत, गिट्टी और जरूरत के अनुसार दूसरे पदार्थों से बनी अंतिम निर्माण सामग्री है।पानी मिलने के बाद सीमेंट सिर्फ सूखता नहीं, बल्कि रासायनिक प्रतिक्रिया करता है। इससे सी-एस-एच जैसे पदार्थ बनते हैं, जो पूरे मिश्रण को मजबूत खनिज ढांचे में बदलने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। स्टील जोड़ने पर यही सामग्री प्रबलित कंक्रीट बन जाती है, जिसमें कंक्रीट दबाव और स्टील खिंचाव का भार संभालकर एक-दूसरे की कमजोरी को पूरा करते हैं।और कंक्रीट के दशकों तक टिकने का रहस्य किसी एक चमत्कारी पदार्थ में नहीं है। उसका असली रहस्य उसके अंदर बनने वाली सूक्ष्म संरचना और पूरे निर्माण की गुणवत्ता में है। सीमेंट और पानी की सही रासायनिक प्रतिक्रिया, मजबूत पत्थर के कण, कम छिद्र, पर्याप्त क्योरिंग, सरिया की सुरक्षा, सही डिजाइन और पानी की अच्छी निकासी, ये सभी मिलकर कंक्रीट को लंबे समय तक टिकाऊ बनाते हैं।
कुल मिला कर, अच्छी कंक्रीट इसलिए वर्षों तक मजबूत नहीं रहती कि वह कभी बदलती नहीं। वह इसलिए लंबे समय तक टिकती है क्योंकि उसे इस तरह बनाया जाता है कि पानी, हवा, नमक, तापमान और समय की धीमी मार उसके अंदर बहुत देर से पहुंच सके।


