चंद्रशेखर आजाद शहीद दिवस 2026: ‘मेरा नाम आजाद है…’ अदालत में गूंजे शब्द जिन्होंने रचा इतिहास

Chandra Shekhar Azad Martyrdom Day 2026: 27 फरवरी शहीद दिवस पर जानें चंद्रशेखर आजाद के जीवन के अनसुने किस्से, भगत सिंह के साथ उनका संघर्ष और ‘आजाद’ रहने की अंतिम प्रतिज्ञा

Jyotsana Singh
Published on: 27 Feb 2026 1:16 PM IST
चंद्रशेखर आजाद शहीद दिवस 2026: ‘मेरा नाम आजाद है…’ अदालत में गूंजे शब्द जिन्होंने रचा इतिहास
X

Chandra Shekhar Azad Martyrdom Day 2026

Chandra Shekhar Azad Martyrdom Day 2026: हर साल 27 फरवरी को देश उस अमर क्रांतिकारी को याद करता है जिसने अपने नाम की तरह जीवन भी ‘आजाद’ जिया और अंतिम सांस तक गुलामी स्वीकार नहीं की। चंद्र शेखर आजाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन नायकों में से हैं, जिनका जीवन संघर्ष, साहस, रणनीति और त्याग की अद्भुत मिसाल है। उनका व्यक्तित्व केवल बंदूक और बम तक सीमित नहीं था, बल्कि वे विद्वान, अनुशासित, संवेदनशील और दूरदर्शी नेता भी थे। शहीद दिवस के अवसर पर आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़े रोचक, प्रेरक और कम चर्चित तथ्यों के साथ उनके यो

चंद्र शेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्यप्रदेश के भाबरा (अब अलीराजपुर) में हुआ था। उनके पिता सीताराम तिवारी और माता जगरानी देवी साधारण परिवार से थे, लेकिन संस्कारों और स्वाभिमान में बेहद समृद्ध थे। बचपन से ही आजाद में अन्याय के प्रति गुस्सा और देशभक्ति की भावना दिखाई देने लगी थी।

जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया, तब मात्र 15 वर्ष की आयु में आजाद भी उसमें कूद पड़े। गिरफ्तारी के बाद जब उन्हें अदालत में पेश किया गया, तो उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वतंत्रता’ और निवास स्थान ‘जेल’ बताया। अंग्रेज जज ने क्रोधित होकर 15 कोड़ों की सजा सुनाई। हर कोड़े पर उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ का नारा लगाया। तभी से वे ‘आजाद’ कहलाए।

संस्कृत के विद्वान और तेजस्वी छात्र

कम लोग जानते हैं कि आजाद केवल हथियारों के उस्ताद ही नहीं, बल्कि संस्कृत के अच्छे जानकार भी थे। उनके पिता चाहते थे कि वे संस्कृत के विद्वान बनें, इसलिए उन्हें काशी (वाराणसी) पढ़ने भेजा गया। वहां उन्होंने वेद, शास्त्र और व्याकरण का अध्ययन किया।

उनका व्यक्तित्व संत और सैनिक का अद्भुत संगम था। एक ओर वे वेदों के श्लोक जानते थे, दूसरी ओर पिस्तौल चलाने में माहिर थे। यह संयोजन ही उन्हें बाकी क्रांतिकारियों से अलग बनाता है।

‘क्विक सिल्वर’ की फुर्ती और सटीक निशाना

क्रांतिकारी दल में उनकी फुर्ती और चतुराई के कारण उन्हें ‘क्विक सिल्वर’ कहा जाता था। उनकी निशानेबाजी इतनी सटीक थी कि अंधेरे में भी आवाज सुनकर निशाना साध सकते थे। वे अपने हथियारों की साफ-सफाई और गोलियों के रख-रखाव को लेकर बेहद अनुशासित थे।

उनकी प्रिय कोल्ट पिस्तौल को वे ‘बमतुल बुखारा’ कहते थे। उनका वचन था कि यह पिस्तौल कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं लगेगी, और उन्होंने अपने अंतिम क्षण तक इस प्रतिज्ञा को निभाया।

भेष बदलने में माहिर

आजाद भेष बदलने की कला में अद्भुत थे। अंग्रेज पुलिस उन्हें पहचान नहीं पाती थी। वे झांसी के पास ओरछा के जंगलों में ‘ब्रह्मचारी’ बनकर रहे। वहां उन्होंने बच्चों को पढ़ाया और साधु का जीवन जिया।

इस दौरान उन्होंने स्थानीय लोगों का विश्वास जीता और गुप्त रूप से क्रांतिकारी गतिविधियां जारी रखीं। उनकी यही चतुराई उन्हें लंबे समय तक गिरफ्तारी से बचाती रही।

झांसी में मोटर मैकेनिक बने क्रांतिकारी

क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए तेज भागने वाली गाड़ियों की जरूरत थी। आजाद ने झांसी में मोटर मैकेनिक का काम करते हुए गाड़ी चलाना सीखा। यह काम उन्होंने गुपचुप तरीके से किया, ताकि जरूरत पड़ने पर वे साथियों को सुरक्षित निकाल सकें।

उनका जीवन दिखाता है कि वे केवल जोशीले युवा नहीं थे, बल्कि एक कुशल रणनीतिकार भी थे।

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के स्तंभ

आजाद का नाम Hindustan Socialist Republican Association (HSRA) से गहराई से जुड़ा है। यह संगठन अंग्रेजी हुकूमत के पास खिलाफ सशस्त्र क्रांति का पक्षधर था।

भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर जैसे क्रांतिकारियों के वे मार्गदर्शक थे। काकोरी कांड और लाहौर में सांडर्स वध जैसी घटनाओं की योजना में उनकी अहम भूमिका रही। भगत सिंह और आजाद की जोड़ी ने क्रांतिकारी आंदोलन को नई दिशा दी। जहां भगत सिंह विचारों की क्रांति के प्रतीक बने, वहीं आजाद संगठन और अनुशासन के आधार स्तंभ थे।

काकोरी कांड के बाद नेतृत्व

1925 के काकोरी कांड के बाद जब कई क्रांतिकारी गिरफ्तार हो गए या फांसी पर चढ़ा दिए गए, तब संगठन को संभालने की जिम्मेदारी आजाद पर आ गई। उन्होंने संगठन को टूटने नहीं दिया और नए युवाओं को जोड़ा।

उनकी नेतृत्व क्षमता का ही परिणाम था कि क्रांतिकारी आंदोलन 1930 के दशक में भी सक्रिय रहा।

‘आजाद’ रहने की आखिरी प्रतिज्ञा

27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क अब चंद्र शेखर आजाद पार्क में अंग्रेज पुलिस ने उन्हें घेर लिया। लंबे समय तक मुठभेड़ चली। जब उनकी पिस्तौल में आखिरी गोली बची, तो उन्होंने अंग्रेजों के हाथों पकड़े जाने के बजाय खुद को गोली मार ली।

उन्होंने जीवन भर यह प्रण लिया था कि वे कभी जिंदा गिरफ्तार नहीं होंगे। अपने नाम ‘आजाद’ को उन्होंने अंतिम क्षण तक सार्थक किया।

मां जगरानी देवी का स्वाभिमान

आजाद की शहादत के बाद उनकी मां जगरानी देवी अत्यंत गरीबी में रहीं। कई लोगों ने मदद की पेशकश की, लेकिन उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि उनके बेटे ने देश के लिए बलिदान दिया है, वे किसी का एहसान लेकर उस बलिदान को छोटा नहीं करेंगी। यह प्रसंग बताता है कि देशभक्ति और स्वाभिमान उनके परिवार की रगों में था।

पुलिस भी डरी रही

कहा जाता है कि शहादत के बाद भी अंग्रेज पुलिस उनके पार्थिव शरीर के पास जाने से डर रही थी। उन्हें आशंका थी कि कहीं आजाद कोई चाल न चल रहे हों। यह डर उनके व्यक्तित्व और साहस की गवाही देता है।

व्यक्तित्व के अन्य रोचक पहलू

वे सादा जीवन जीते थे और अनुशासन को सर्वोपरि मानते थे। संगठन में धन का उपयोग बेहद सावधानी से करते थे। साथियों के प्रति सख्त, लेकिन अंदर से बेहद संवेदनशील थे। उन्हें शारीरिक व्यायाम और घुड़सवारी का शौक था।

वे धार्मिक आस्था रखते थे, जनेऊ धारण करते थे और भारतीय संस्कृति पर गर्व करते थे।

आजाद की विरासत

आज चंद्र शेखर आजाद केवल इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं हैं। उनका नाम साहस, बलिदान और स्वतंत्रता की प्रेरणा का प्रतीक है। प्रयागराज का अल्फ्रेड पार्क उनके नाम पर रखा गया है। देशभर में उनकी प्रतिमाएं युवाओं को प्रेरित करती हैं।

उनका जीवन यह संदेश देता है कि स्वतंत्रता केवल शब्द नहीं, बल्कि उसके लिए त्याग और साहस की आवश्यकता होती है।

Jyotsana Singh
ABOUT THE AUTHOR

Jyotsana Singh

Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

Next Story