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Cold Drink Health Effects: जीरो शुगर कोल्ड ड्रिंक सच में सुरक्षित है? जानिए डाइट कोक का पूरा सच
Cold Drink Health Effects: कोका-कोला, पेप्सी और कैंपा का कारोबार कितना बड़ा है? जानिए एक लीटर कोल्ड ड्रिंक बनाने में कितना पानी लगता है, इसमें कितनी चीनी होती है और सेहत पर क्या असर पड़ता है।
Cold Drink Health Effects | Pepsi India Market Share | Newstrack Special Hindi
Cold Drink Health Effects: गर्मी हो या सर्दी, कोका-कोला, पेप्सी और दूसरे शीतल पेय भारतीय बाजार का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। कंपनियों के बीच बाजार पर कब्जे की होड़ तेज है। उद्योग अनुमानों के अनुसार भारत के कार्बोनेटेड पेय बाजार में कोका-कोला की हिस्सेदारी लगभग 40–42 प्रतिशत, पेप्सिको की 28–30 प्रतिशत और कैंपा की 7–8 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है। लेकिन इस कारोबार की कहानी सिर्फ बिक्री और मुनाफे तक सीमित नहीं है। एक लीटर शीतल पेय बनाने में एक लीटर से अधिक पानी इस्तेमाल होता है। दूसरी ओर, इन पेयों में मौजूद चीनी, अम्ल और कैफीन को लेकर स्वास्थ्य संबंधी सवाल भी उठते रहे हैं।
आखिर कोल्ड ड्रिंक महीनों तक खराब क्यों नहीं होती? क्या उसमें इस्तेमाल होने वाले रसायन शरीर के लिए नुकसानदेह हैं? क्या जीरो शुगर पेय बेहतर विकल्प हैं? क्या भोजन के बाद कोल्ड ड्रिंक पीने से पाचन सुधरता है? और क्या कभी-कभार पीना भी खतरनाक है? इन सवालों को समझने के लिए कारोबार, खाद्य विज्ञान और स्वास्थ्य संबंधी शोध को साथ रखकर देखना जरूरी है।
भारत के शीतल पेय बाजार में किसकी कितनी हिस्सेदारी?
जुलाई 2026 में प्रकाशित उद्योग अनुमानों के अनुसार कार्बोनेटेड शीतल पेय बाजार में कोका-कोला की हिस्सेदारी लगभग 40–42 प्रतिशत, पेप्सिको की 28–30 प्रतिशत और कैंपा की 7–8 प्रतिशत बताई गई। ये उद्योग अनुमान हैं, सरकारी प्रमाणित आँकड़े नहीं। बाजार हिस्सेदारी की गणना बिक्री की मात्रा या कुल मूल्य के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।
इस बाजार में कंपनियों के वित्तीय आँकड़ों को समझते समय एक अंतर ध्यान रखना जरूरी है। पेप्सिको का कारोबार केवल पेप्सी जैसे पेयों तक सीमित नहीं है। इसमें लेज़, कुरकुरे और दूसरे खाद्य उत्पाद भी शामिल हैं। इसी तरह कोका-कोला की भारतीय सहायक कंपनी, बॉटलिंग साझेदार और वितरक अलग-अलग कारोबार करते हैं। इसलिए किसी एक कंपनी का राजस्व पूरे ब्रांड नेटवर्क की बिक्री नहीं बताता।
कोका-कोला, पेप्सिको और कैंपा का कारोबार कितना बड़ा है?
पेप्सिको इंडिया ने कैलेंडर वर्ष 2025 में लगभग 9,798 करोड़ रुपये का समेकित राजस्व दर्ज किया। कंपनी का शुद्ध लाभ करीब 905 करोड़ रुपये रहा। इसमें खाद्य पदार्थों का कारोबार भी शामिल है।
पेप्सिको के प्रमुख बॉटलिंग साझेदार वरुण बेवरेजेज ने वर्ष 2025 में लगभग 21,685 करोड़ रुपये का वैश्विक परिचालन राजस्व दर्ज किया। इसमें भारत के अलावा दूसरे देशों का कारोबार भी शामिल है। कंपनी के अनुसार भारत में उसने लगभग 83.9 करोड़ यूनिट केस पेय बेचे। एक यूनिट केस में करीब 5.678 लीटर पेय माना जाता है। इस हिसाब से बिक्री की मात्रा लगभग 476 करोड़ लीटर बैठती है। इसमें केवल कोला नहीं, बल्कि कंपनी के अलग-अलग प्रकार के पेय शामिल हैं।
कोका-कोला इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने वित्त वर्ष 2024-25 में लगभग 5,043 करोड़ रुपये की बिक्री दर्ज की। उसकी प्रमुख बॉटलिंग कंपनी हिंदुस्तान कोका-कोला बेवरेजेज का इसी अवधि का राजस्व लगभग 12,751 करोड़ रुपये रहा।
रिलायंस इंडस्ट्रीज की 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार कैंपा की सकल बिक्री 4,700 करोड़ रुपये से अधिक रही। कंपनी ने कई प्रमुख बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ने की जानकारी दी है।
एक लीटर कोल्ड ड्रिंक बनाने में कितना पानी लगता है?
शीतल पेय उद्योग का सबसे जरूरी कच्चा माल पानी है। लेकिन बोतल में जितना पानी दिखाई देता है, उत्पादन प्रक्रिया में उससे अधिक पानी की जरूरत होती है। मशीनों की सफाई, बोतलों और पाइपलाइनों की धुलाई तथा दूसरी औद्योगिक गतिविधियों में भी पानी इस्तेमाल होता है।
कोका-कोला की प्रकाशित जानकारी के अनुसार वर्ष 2025 में उसकी वैश्विक उत्पादन प्रणाली का औसत जल उपयोग अनुपात 1.77 लीटर प्रति लीटर पेय था। यानी एक लीटर तैयार पेय के लिए कुल मिलाकर लगभग 1.77 लीटर पानी इस्तेमाल हुआ।
वरुण बेवरेजेज की 2025 की वार्षिक रिपोर्ट में यह अनुपात 1.50 लीटर प्रति लीटर पेय बताया गया। कंपनी ने अपने जल पुनर्भरण कार्यक्रमों के माध्यम से लगभग 16.8 अरब लीटर पानी की भरपाई का दावा भी किया है।
इन आँकड़ों का अर्थ यह नहीं कि अतिरिक्त पानी पूरी तरह बर्बाद हो जाता है। कुछ पानी शोधित करके दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है और कुछ निर्धारित प्रक्रिया से बाहर छोड़ा जाता है। लेकिन पानी की वास्तविक पर्यावरणीय लागत समझने के लिए केवल फैक्टरी का अनुपात पर्याप्त नहीं है। चीनी और पैकेजिंग सामग्री के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाला पानी भी पूरी गणना में शामिल होना चाहिए।
भारत में पानी की खपत का पैमाना कितना बड़ा है?
वरुण बेवरेजेज की भारत में वर्ष 2025 की बिक्री को लगभग 476 करोड़ लीटर पेय के बराबर माना जाए और उस पर कंपनी का 1.50 लीटर प्रति लीटर वाला जल उपयोग अनुपात लागू किया जाए, तो लगभग 714 करोड़ लीटर पानी की जरूरत का अनुमान निकलता है।
यह एक सांकेतिक गणना है, भारत में कंपनी की वास्तविक जल निकासी का प्रमाणित आँकड़ा नहीं। इसके लिए उत्पादन, बिक्री और जल उपयोग के आँकड़ों का एक ही भौगोलिक तथा समय संबंधी आधार पर मिलना जरूरी है।
पानी के मामले में केवल कुल मात्रा ही नहीं, बल्कि उसका स्थान भी महत्त्वपूर्ण है। जिस क्षेत्र में भूजल पर्याप्त है, वहाँ औद्योगिक उपयोग का प्रभाव अलग हो सकता है। लेकिन जहाँ गाँवों में हैंडपंप सूख रहे हों और भूजल पहले से कम हो, वहाँ किसी बड़े कारखाने की जल जरूरत स्थानीय समुदायों के लिए गंभीर सवाल बन सकती है।
इसीलिए कंपनियों के जल पुनर्भरण के दावों को स्थानीय जल स्तर और वास्तविक उपयोग के साथ परखना जरूरी है। किसी दूसरे क्षेत्र में पानी भरने का दावा उस गाँव की समस्या अपने आप दूर नहीं करता जहाँ कारखाना स्थित है।
कोल्ड ड्रिंक महीनों तक खराब क्यों नहीं होती?
घर में बनाया गया शरबत कुछ समय बाद खराब हो सकता है, लेकिन बंद बोतल में रखा शीतल पेय कई महीनों तक सुरक्षित रह सकता है। इसका कारण कोई एक जादुई रसायन नहीं, बल्कि खाद्य विज्ञान और नियंत्रित उत्पादन प्रक्रिया है।
कार्बोनेटेड शीतल पेय को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मुख्यतः चार बातें मदद करती हैं - अम्लीय प्रकृति, घुली हुई कार्बन डाइऑक्साइड, साफ-सुथरी उत्पादन प्रक्रिया और बंद पैकेजिंग। कुछ उत्पादों में जरूरत के अनुसार स्वीकृत संरक्षक पदार्थ भी मिलाए जाते हैं।
कई कोला पेयों का पीएच लगभग 2.5 के आसपास होता है। इतना अम्लीय वातावरण अनेक सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को रोकने में मदद करता है। कार्बन डाइऑक्साइड से पेय में बुलबुले बनते हैं और उसकी गुणवत्ता बनाए रखने में भी सहायता मिलती है।
कुछ उत्पादों में सोडियम बेंजोएट या पोटैशियम सोर्बेट जैसे संरक्षक इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इनका उद्देश्य यीस्ट और फफूँद जैसे सूक्ष्मजीवों की वृद्धि सीमित करना है। सभी शीतल पेयों में एक जैसे पदार्थ नहीं होते। इसलिए किसी उत्पाद में क्या मिला है, यह जानने के लिए बोतल पर दी गई सामग्री की सूची देखनी चाहिए।
यहाँ एक अंतर समझना जरूरी है। किसी पेय का महीनों तक सूक्ष्मजीवों से सुरक्षित रहना और उसका स्वास्थ्य के लिए पोषणयुक्त होना दो अलग बातें हैं। कोई पेय खाद्य सुरक्षा के मानकों पर खरा उतर सकता है, लेकिन उसमें अधिक चीनी होने के कारण नियमित सेवन के लिए अच्छा विकल्प नहीं माना जा सकता।
एक बोतल में कितनी चीनी होती है?
शीतल पेयों से जुड़ा सबसे बड़ा स्वास्थ्य सवाल उनमें मौजूद अतिरिक्त चीनी है। अमेरिका के रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र (CDC) के अनुसार लगभग 355 मिलीलीटर सामान्य सोडा में करीब 42 ग्राम अतिरिक्त चीनी हो सकती है। यह लगभग दस चम्मच चीनी के बराबर है। भारतीय उत्पादों में मात्रा अलग हो सकती है, इसलिए सही जानकारी के लिए पैकेट पर पोषण संबंधी विवरण देखना चाहिए।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने वयस्कों और बच्चों के लिए मुक्त शर्करा को दैनिक ऊर्जा आवश्यकता के दस प्रतिशत से कम रखने की सलाह दी है। अतिरिक्त स्वास्थ्य लाभ के लिए इसे पाँच प्रतिशत से कम रखने का सुझाव दिया गया है।
यदि किसी व्यक्ति की दैनिक ऊर्जा आवश्यकता 2,000 कैलोरी है, तो दस प्रतिशत लगभग 50 ग्राम और पाँच प्रतिशत करीब 25 ग्राम चीनी के बराबर होगा। इसमें पूरे दिन के भोजन और पेय से मिलने वाली मुक्त शर्करा शामिल है। इसका मतलब है कि 42 ग्राम चीनी वाला एक डिब्बा ही पूरे दिन की सुझाई गई सीमा का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल कर सकता है। इसके अलावा मिठाई, बिस्कुट, मीठी चाय और दूसरे पैकेज्ड पेय लेने से कुल चीनी की मात्रा और बढ़ सकती है।
क्या कोल्ड ड्रिंक से मधुमेह और हृदय रोग का खतरा बढ़ता है?
शीतल पेयों के स्वास्थ्य प्रभावों पर बड़े वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध हैं। जनवरी 2025 में चिकित्सा पत्रिका Nature Medicine में प्रकाशित एक अध्ययन ने 184 देशों में चीनी मिले पेयों से जुड़े रोगभार का विश्लेषण किया। शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि वर्ष 2020 में दुनिया भर में टाइप-2 मधुमेह के लगभग 22 लाख नए मामलों और हृदय संबंधी बीमारियों के लगभग 12 लाख नए मामलों का संबंध ऐसे पेयों से था।
ये सांख्यिकीय मॉडल पर आधारित अनुमान हैं। इनका अर्थ यह नहीं कि किसी एक व्यक्ति की बीमारी का कारण निश्चित रूप से कोल्ड ड्रिंक ही थी।
CDC के अनुसार चीनी वाले पेयों का नियमित और अधिक सेवन वजन बढ़ने, मोटापे, टाइप-2 मधुमेह, हृदय रोग, फैटी लिवर और दाँतों की सड़न जैसी समस्याओं से जुड़ा पाया गया है। इसका मतलब यह नहीं कि जीवन में एक बार कोल्ड ड्रिंक पीने से कोई गंभीर बीमारी हो जाएगी। मुख्य चिंता लंबे समय तक अधिक मात्रा में सेवन की है। व्यक्ति का कुल भोजन, शारीरिक गतिविधि, वजन और पारिवारिक स्वास्थ्य इतिहास भी बीमारी का जोखिम प्रभावित करते हैं।
क्या कोल्ड ड्रिंक दाँतों और हड्डियों को नुकसान पहुँचाती है?
शीतल पेय दाँतों को दो तरह से प्रभावित कर सकते हैं। उनमें मौजूद चीनी मुँह के बैक्टीरिया को अम्ल बनाने में मदद करती है, जिससे दाँतों में सड़न का खतरा बढ़ता है। दूसरी ओर, सिट्रिक एसिड और फॉस्फोरिक एसिड जैसे पदार्थ दाँतों की बाहरी परत यानी इनेमल को कमजोर कर सकते हैं।
जीरो शुगर पेय में चीनी न होने से कैविटी का एक जोखिम कम हो सकता है, लेकिन उसकी अम्लीय प्रकृति बनी रह सकती है। इसलिए उसे भी दिनभर बार-बार पीना दाँतों के लिए अच्छा विकल्प नहीं है।
हड्डियों को लेकर भी एक आम दावा है कि कोल्ड ड्रिंक पीने से उनका कैल्शियम निकल जाता है। वैज्ञानिक प्रमाण इस दावे को इतनी सीधी प्रक्रिया के रूप में साबित नहीं करते। कुछ अध्ययनों में अधिक कोला सेवन और कम अस्थि घनत्व के बीच संबंध पाया गया है, लेकिन इसमें कैफीन, फॉस्फोरिक एसिड, कुल पोषण और दूध जैसे पोषणयुक्त पेयों की जगह कोला लेने जैसे कारक भी भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए सामान्य कार्बोनेटेड पानी और चीनी, कैफीन तथा दूसरे अवयवों वाले कोला पेय को एक जैसा नहीं मानना चाहिए।
क्या जीरो शुगर या डाइट कोक सुरक्षित विकल्प है?
जीरो शुगर और डाइट पेयों में सामान्य चीनी के स्थान पर एस्पार्टेम, सुक्रालोज या दूसरे मिठास देने वाले पदार्थ इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इनका व्यावहारिक लाभ यह है कि सामान्य शक्कर वाले पेयों की तुलना में इनमें कैलोरी कम हो सकती है। लेकिन कम कैलोरी वाला होना और स्वास्थ्यवर्धक होना एक ही बात नहीं है।
मई 2023 में WHO ने वजन नियंत्रित करने या गैर-संचारी रोगों का जोखिम घटाने के उद्देश्य से गैर-शर्करा मिठास देने वाले पदार्थों के नियमित इस्तेमाल के विरुद्ध सशर्त सलाह दी थी। WHO के अनुसार उपलब्ध शोध में लंबे समय तक वजन घटाने का स्पष्ट लाभ साबित नहीं हुआ। हालाँकि इस सलाह को पहले से मधुमेह वाले लोगों पर उसी तरह लागू नहीं किया गया था।
जुलाई 2023 में WHO से संबद्ध अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी (IARC) ने एस्पार्टेम को 'संभवतः मनुष्यों में कैंसर पैदा करने वाला' पदार्थ, यानी समूह 2B में रखा। वहीं WHO और FAO की संयुक्त विशेषज्ञ समिति JECFA ने उपलब्ध प्रमाणों की समीक्षा के बाद इसकी स्वीकार्य दैनिक सेवन सीमा 40 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम शरीर वजन बनाए रखी। अमेरिकी FDA ने भी अनुमोदित उपयोग स्तर पर एस्पार्टेम को लेकर सुरक्षा संबंधी चिंता नहीं जताई है।
यहाँ एक जरूरी अंतर है। किसी पदार्थ को संभावित कैंसरकारी श्रेणी में रखना और सामान्य सेवन से वास्तव में कैंसर का जोखिम कितना बढ़ता है, ये दो अलग प्रश्न हैं। समूह 2B में शामिल होने का अर्थ यह नहीं कि अनुमत मात्रा में कभी-कभार डाइट पेय पीने से कैंसर हो जाएगा।
इसलिए जीरो शुगर पेय को सामान्य चीनी वाले पेय से अलग जरूर देखा जाना चाहिए, लेकिन उसे पानी का बेहतर विकल्प मानना भी उचित नहीं है।
क्या कोल्ड ड्रिंक पाचन सुधारती और गैस दूर करती है?
भोजन के बाद कोल्ड ड्रिंक पीने की आदत भारत में आम है। कई लोग मानते हैं कि इससे भारी खाना जल्दी पचता है या गैस दूर होती है।
वास्तव में कार्बोनेटेड पेय में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड पेट में पहुँचकर डकार आने का कारण बन सकती है। इससे कुछ लोगों को अस्थायी हल्कापन महसूस होता है। लेकिन डकार आने का अर्थ यह नहीं कि भोजन का पाचन बेहतर हो गया है।
कुछ लोगों में कार्बोनेटेड पेय पेट फूलने और डकार की समस्या बढ़ा सकते हैं। एसिड रिफ्लक्स या सीने में जलन की शिकायत वाले लोगों को भी इनसे परेशानी हो सकती है। इसलिए भोजन के बाद कोल्ड ड्रिंक पीना पाचन सुधारने का कोई स्थापित चिकित्सा उपाय नहीं है।
कोल्ड ड्रिंक से जुड़े कुछ लोकप्रिय दावे और उनकी सच्चाई
दावा 1 : कोल्ड ड्रिंक में जहर होता है, इसलिए वह महीनों खराब नहीं होती।
यह दावा प्रमाणित नहीं है। अम्लीय वातावरण, कार्बोनेशन, स्वच्छ उत्पादन और बंद पैकेजिंग उसकी शेल्फ लाइफ बढ़ाते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अधिक सेवन स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।
दावा 2 : कोल्ड ड्रिंक पेट का खाना जल्दी पचा देती है।
डकार आने से हल्कापन महसूस हो सकता है, लेकिन पाचन बेहतर होने का यह प्रमाण नहीं है।
दावा 3 : हर कोल्ड ड्रिंक में कैफीन होती है।
यह गलत है। कई कोला पेयों में कैफीन होती है, लेकिन सभी नींबू या फल-स्वाद वाले पेयों में इसका होना जरूरी नहीं। सही जानकारी लेबल पर मिलती है।
दावा 4 : जीरो शुगर का मतलब बिल्कुल सुरक्षित पेय।
जीरो शुगर पेय में चीनी कम या नहीं होती, लेकिन उनमें अम्ल, कैफीन और दूसरे मिठास देने वाले पदार्थ हो सकते हैं। इसलिए उनका भी नियमित और अत्यधिक सेवन जरूरी नहीं कि बेहतर हो।
दावा 5 : कार्बन डाइऑक्साइड होने से कोल्ड ड्रिंक जहरीली है।
खाद्य मानकों के अनुसार इस्तेमाल की गई कार्बन डाइऑक्साइड को केवल गैस होने के कारण जहरीला नहीं कहा जा सकता। कुछ लोगों में इससे डकार या पेट फूलने की समस्या हो सकती है।
दावा 6 : महीने में एक बार कोल्ड ड्रिंक पीने से भी गंभीर बीमारी हो जाएगी।
वैज्ञानिक प्रमाण ऐसी निश्चित भविष्यवाणी का समर्थन नहीं करते। मुख्य चिंता अधिक चीनी वाले पेयों के नियमित और अधिक सेवन को लेकर है।
प्लास्टिक की बोतलें और पर्यावरण का सवाल
शीतल पेय उद्योग का पर्यावरणीय प्रभाव केवल पानी की खपत तक सीमित नहीं है। प्लास्टिक की बोतलें, कैन, पैकेजिंग, परिवहन और कचरा प्रबंधन भी इसका हिस्सा हैं।
PET बोतलों का उपयोग खाद्य-संपर्क संबंधी मानकों के अंतर्गत किया जाता है, लेकिन उनका अनुचित निस्तारण प्लास्टिक कचरे की समस्या बढ़ाता है। कंपनियाँ पुनर्चक्रण, बोतलों के संग्रह और दोबारा इस्तेमाल की व्यवस्था बढ़ाने का दावा करती हैं। लेकिन केवल लक्ष्य घोषित कर देना उसकी वास्तविक उपलब्धि का प्रमाण नहीं है। यह देखना जरूरी है कि कितनी बोतलें वास्तव में इकट्ठी होती हैं, कितनी पुनर्चक्रित की जाती हैं और कितनी कचरे के रूप में पर्यावरण में पहुँचती हैं।
कंपनियों की जिम्मेदारी और उपभोक्ता का अधिकार
भारत में शीतल पेय उद्योग खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के नियमों के अंतर्गत आता है। इन नियमों में सामग्री, मिठास देने वाले पदार्थों, संरक्षकों, कैफीन और लेबलिंग से संबंधित मानक निर्धारित हैं।
लेकिन किसी उत्पाद का कानूनी रूप से बिक्री योग्य होना और उसका नियमित अधिक सेवन स्वास्थ्य के लिए उचित होना अलग बातें हैं।
कंपनियों को यह स्पष्ट बताना चाहिए कि उनके उत्पाद में प्रति 100 मिलीलीटर कितनी चीनी है, कैफीन की मात्रा कितनी है और कौन-से संरक्षक या मिठास देने वाले पदार्थ इस्तेमाल किए गए हैं। इसी तरह कारखानों के स्तर पर भूजल और सतही जल के उपयोग, शोधित पानी के दोबारा इस्तेमाल और वास्तविक जल पुनर्भरण का विवरण भी सार्वजनिक होना चाहिए।
सरकार की जिम्मेदारी है कि खाद्य सुरक्षा, बच्चों को लक्षित विज्ञापन, पोषण संबंधी जानकारी और औद्योगिक जल उपयोग पर प्रभावी निगरानी रखे। उपभोक्ताओं को भी केवल ब्रांड या विज्ञापन के आधार पर नहीं, बल्कि उत्पाद की सामग्री और पोषण संबंधी जानकारी देखकर चुनाव करना चाहिए।
ठंडक की कीमत सिर्फ बोतल पर लिखी रकम नहीं
भारत में कोका-कोला, पेप्सी, कैंपा और दूसरे शीतल पेय ब्रांडों का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। इससे उत्पादन, रोजगार और वितरण का बड़ा नेटवर्क जुड़ा है। लेकिन बाजार के विस्तार के साथ स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को समझना भी जरूरी है।
कंपनियों के अपने आँकड़े बताते हैं कि एक लीटर तैयार पेय बनाने में एक लीटर से अधिक पानी इस्तेमाल होता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि अधिक चीनी वाले पेयों का नियमित सेवन मोटापे, मधुमेह, हृदय रोग और दाँतों की समस्याओं के जोखिम से जुड़ा है। वहीं खाद्य विज्ञान यह भी स्पष्ट करता है कि किसी पेय का महीनों तक सुरक्षित रहना अपने आप में उसके जहरीले होने का प्रमाण नहीं है।
इसलिए अतिशयोक्ति से बचना जरूरी है। यह कहना गलत होगा कि कोल्ड ड्रिंक का एक घूँट पीते ही शरीर को गंभीर नुकसान हो जाता है। लेकिन इसे पाचन सुधारने या स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए जरूरी पेय बताना भी सही नहीं है।
सुरक्षित पेयजल शरीर की आवश्यकता है, जबकि चीनी वाला शीतल पेय मुख्यतः स्वाद और सुविधा के लिए चुना जाने वाला उत्पाद है। दोनों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
जिस देश में सुरक्षित पानी की उपलब्धता अब भी बड़ी चुनौती है, वहाँ शीतल पेय उद्योग से जुड़ा सवाल केवल यह नहीं कि कौन-सी कंपनी कितने करोड़ रुपये कमा रही है। बड़ा सवाल यह भी है कि वह पानी का इस्तेमाल कितनी जिम्मेदारी से कर रही है, अपने उत्पादों के स्वास्थ्य संबंधी तथ्य कितनी पारदर्शिता से बता रही है और उसके कारोबार की पर्यावरणीय कीमत कौन चुका रहा है।
ठंडा पेय खरीदना व्यक्तिगत पसंद है, लेकिन उसमें मौजूद चीनी और दूसरे अवयवों की जानकारी पाना तथा उसके उत्पादन में इस्तेमाल हुए पानी के बारे में पारदर्शिता की माँग करना उपभोक्ता का अधिकार है।


