Collagen Supplements: जवानी लौटाने का दावा करने वाले सप्लीमेंट का सच, क्या कहते हैं वैज्ञानिक?

Collagen Supplements: क्या कोलेजन पाउडर और कैप्सूल खाने से झुर्रियाँ कम होती हैं और त्वचा जवां बनती है? जानिए 2025-26 की रिसर्च, प्राकृतिक कोलेजन स्रोत, शाकाहारी भोजन और सप्लीमेंट के संभावित नुकसान।

Yogesh Mishra
Published on: 30 Oct 2026 7:38 PM IST
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Collagen Supplements: चेहरे पर झुर्रियाँ कम करने, ढीली त्वचा में कसाव लाने और बढ़ती उम्र के प्रभावों को रोकने के नाम पर कोलेजन पाउडर, कैप्सूल और पेय पदार्थों का बड़ा बाजार विकसित हो चुका है। विज्ञापनों में दावा किया जाता है कि रोजाना कोलेजन लेने से त्वचा के भीतर उसकी कमी पूरी होने लगती है। लेकिन वैज्ञानिक शोध इस दावे की पूरी पुष्टि नहीं करते। वर्ष 2025 में 1,474 लोगों पर हुए 23 नियंत्रित अध्ययनों की समीक्षा में एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। सभी अध्ययनों को साथ देखने पर त्वचा की नमी, लचीलेपन और झुर्रियों में सुधार दिखाई दिया। लेकिन उच्च गुणवत्ता वाले अध्ययनों और उद्योग से स्वतंत्र वित्तपोषण वाले शोधों में यह लाभ स्पष्ट नहीं मिला। दूसरी ओर वर्ष 2026 में प्रकाशित एक बड़े विश्लेषण ने त्वचा की नमी और लचीलेपन में सीमित लाभ की संभावना बताई। लेकिन झुर्रियाँ कम होने के दावों को मजबूत प्रमाण नहीं मिला। सबसे दिलचस्प बात यह है कि हमारा शरीर अपना कोलेजन स्वयं बनाता है। उसे तैयार करने के लिए केवल महँगे सप्लीमेंट की नहीं, बल्कि पर्याप्त प्रोटीन, विटामिन सी और दूसरे पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। आखिर कोलेजन है क्या, इसे खाने पर यह शरीर में कहाँ जाता है और क्या सामान्य भारतीय भोजन से त्वचा के लिए आवश्यक कोलेजन का निर्माण संभव है?

कोलेजन क्या है और त्वचा के लिए इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है?

मानव शरीर में अनेक प्रकार के प्रोटीन मौजूद हैं। कुछ प्रोटीन कोशिकाओं के भीतर रासायनिक प्रक्रियाएँ संचालित करते हैं, कुछ शरीर के विभिन्न हिस्सों में पदार्थों का परिवहन करते हैं और कुछ ऊतकों को आकार तथा मजबूती प्रदान करते हैं। कोलेजन इसी तीसरी श्रेणी का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक प्रोटीन है। यह शरीर का सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला प्रोटीन माना जाता है। त्वचा, हड्डियों, टेंडन, लिगामेंट, उपास्थि और दूसरे संयोजी ऊतकों की संरचना बनाए रखने में इसकी भूमिका होती है। यदि शरीर की तुलना किसी इमारत से की जाए, तो कोलेजन को उसके भीतर मौजूद सहायक ढाँचे का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा समझा जा सकता है। जिस प्रकार इमारत की मजबूती केवल बाहरी रंग-रोगन से निर्धारित नहीं होती, उसी तरह त्वचा की बनावट भी केवल उसकी सबसे ऊपरी सतह पर निर्भर नहीं करती। त्वचा के भीतर मौजूद प्रोटीन, कोशिकाएँ, जल और दूसरी संरचनाएँ मिलकर उसकी मजबूती तथा लचीलेपन को प्रभावित करती हैं।

मानव त्वचा की प्रमुख परतों में बाहरी 'एपिडर्मिस' और उसके नीचे स्थित 'डर्मिस' शामिल हैं। डर्मिस में कोलेजन के रेशों का जाल मौजूद होता है। यह त्वचा को तन्यता और संरचनात्मक मजबूती प्रदान करता है। इसके साथ 'इलास्टिन' नामक प्रोटीन त्वचा की लचक से जुड़ा है, जबकि हायलूरोनिक एसिड और अन्य पदार्थ नमी बनाए रखने में भूमिका निभाते हैं। इसीलिए कोलेजन, इलास्टिन और हायलूरोनिक एसिड को एक ही पदार्थ समझना गलत होगा। तीनों की जैविक भूमिकाएँ अलग हैं, हालांकि त्वचा की समग्र बनावट में उनका संयुक्त योगदान रहता है। उम्र बढ़ने के साथ इन पदार्थों की मात्रा, गुणवत्ता और व्यवस्था में परिवर्तन हो सकते हैं। परिणामस्वरूप त्वचा में झुर्रियाँ, महीन रेखाएँ, लचीलेपन की कमी और दूसरी उम्र-संबंधी विशेषताएँ दिखाई देने लगती हैं।

कोलेजन की सबसे रोचक विशेषता उसकी आणविक संरचना है। इसके अणुओं में तीन प्रोटीन शृंखलाएँ एक विशेष प्रकार की 'ट्रिपल हेलिक्स' संरचना बनाती हैं। इस व्यवस्था से बनने वाले रेशे ऊतकों को खिंचाव सहने की क्षमता प्रदान करते हैं। कोलेजन में ग्लाइसिन, प्रोलिन और हाइड्रॉक्सीप्रोलिन जैसे अमीनो अम्ल विशेष महत्त्व रखते हैं। लेकिन कोलेजन निर्माण केवल इन अमीनो अम्लों को एक साथ जोड़ देने का नाम नहीं है। कोशिकाओं के भीतर अनेक एंजाइम, रासायनिक प्रतिक्रियाएँ और सहायक पोषक तत्व इस प्रक्रिया में काम करते हैं। इसलिए यह मान लेना सही नहीं कि कोलेजन की मात्रा बढ़ाने के लिए बस तैयार कोलेजन खा लेना पर्याप्त है। शरीर को कोलेजन बनाने के लिए उपयुक्त जैविक परिस्थितियों और पोषण की भी आवश्यकता होती है।

शरीर में कितने प्रकार का कोलेजन पाया जाता है?

वैज्ञानिकों ने मानव शरीर में कोलेजन के अनेक प्रकार पहचाने हैं। सामान्य चर्चा में टाइप-1, टाइप-2 और टाइप-3 सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। टाइप-1 कोलेजन त्वचा, हड्डियों, टेंडन और दूसरे संरचनात्मक ऊतकों में व्यापक रूप से पाया जाता है। त्वचा की मजबूती और उसकी संरचना से इसका विशेष संबंध है। टाइप-2 मुख्यतः उपास्थि अर्थात कार्टिलेज में अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। यह जोड़ों की संरचना में भूमिका निभाता है। टाइप-3 कई मुलायम संयोजी ऊतकों, रक्तवाहिनियों और त्वचा से संबंधित संरचनाओं में उपस्थित होता है। लेकिन शरीर का प्रत्येक ऊतक केवल एक ही प्रकार के कोलेजन से बना हो, ऐसा नहीं है। अनेक ऊतकों में विभिन्न प्रकार के कोलेजन और दूसरे प्रोटीन मिलकर जटिल संरचना बनाते हैं।

बाजार में इन वैज्ञानिक वर्गों का उपयोग उत्पादों के प्रचार में भी किया जाता है। किसी सप्लीमेंट पर टाइप-1 और टाइप-3 लिखा हो सकता है, जबकि कुछ उत्पादों को टाइप-2 कोलेजन के रूप में बेचा जाता है। इससे उपभोक्ता को लग सकता है कि किसी विशेष प्रकार का कोलेजन खाने पर वही प्रकार सीधे संबंधित अंग में पहुँच जाएगा। लेकिन मानव पाचन तंत्र इस प्रकार काम नहीं करता। मुँह से लिया गया कोलेजन सामान्यतः पाचन के दौरान छोटे पेप्टाइड और अमीनो अम्लों में टूटता है। शरीर इन घटकों का उपयोग विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं में कर सकता है। इसलिए किसी सप्लीमेंट का स्रोत और उसमें मौजूद कोलेजन का प्रकार जानना उपयोगी हो सकता है। लेकिन उससे यह निश्चित नहीं होता कि वह उसी रूप में त्वचा या जोड़ के भीतर जमा हो जाएगा।

उम्र बढ़ने के साथ कोलेजन कम क्यों होने लगता है?

त्वचा की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया दो व्यापक कारणों से प्रभावित होती है। पहला, शरीर के भीतर समय के साथ होने वाले सामान्य जैविक परिवर्तन। दूसरा, बाहरी वातावरण के कारण होने वाली क्षति। समय बीतने के साथ त्वचा में कोलेजन बनाने वाली 'फाइब्रोब्लास्ट' कोशिकाओं की गतिविधि और उनके आसपास की जैविक संरचनाओं में परिवर्तन हो सकते हैं। पहले से मौजूद कोलेजन रेशों की गुणवत्ता भी बदल सकती है। इस प्रक्रिया के कारण त्वचा धीरे-धीरे कम लचीली और पतली दिखाई दे सकती है। लेकिन यह परिवर्तन सभी व्यक्तियों में एक समान गति से नहीं होता। आनुवंशिकी, हार्मोन, स्वास्थ्य की स्थिति, पोषण और जीवनशैली से भी त्वचा की उम्र बढ़ने का स्वरूप प्रभावित होता है।

बाहरी कारणों में सूर्य की पराबैंगनी किरणें विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। यूवी विकिरण त्वचा में ऐसी जैविक प्रक्रियाएँ सक्रिय कर सकता है जिनसे कोलेजन के रेशों का विघटन बढ़ता है। इनमें 'मैट्रिक्स मेटालोप्रोटीनेज़' नामक एंजाइमों की भूमिका भी होती है। लगातार असुरक्षित सूर्य संपर्क से त्वचा की संरचना में समय से पहले परिवर्तन विकसित हो सकते हैं। इसे 'फोटोएजिंग' कहा जाता है। धूम्रपान भी त्वचा की उम्र बढ़ने और कोलेजन से संबंधित क्षति में योगदान कर सकता है। इसीलिए केवल भोजन से नया कोलेजन बनाने की कोशिश करना पर्याप्त रणनीति नहीं है। यदि लगातार सूर्य की तेज किरणों, धूम्रपान या दूसरे नुकसान पहुँचाने वाले प्रभावों के कारण त्वचा की संरचना प्रभावित हो रही है, तो उन कारणों को कम करना भी महत्त्वपूर्ण है। मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर की चिकित्सकीय समीक्षा में उम्र, सूर्य से हुई क्षति और धूम्रपान को प्राकृतिक कोलेजन संबंधी परिवर्तनों से जुड़े कारकों में शामिल किया गया है।

कोलेजन सप्लीमेंट वास्तव में क्या होते हैं?

बाजार में कोलेजन पाउडर, कैप्सूल, टैबलेट, पेय पदार्थ और कुछ विशेष खाद्य उत्पादों के रूप में उपलब्ध है। इनमें सबसे अधिक चर्चा 'हाइड्रोलाइज्ड कोलेजन' अथवा 'कोलेजन पेप्टाइड्स' की होती है। सामान्य कोलेजन का अणु बड़ा होता है। औद्योगिक प्रक्रिया में उसे पानी तथा विशेष एंजाइमों या दूसरे तरीकों की सहायता से छोटे हिस्सों में तोड़ा जाता है। इस प्रक्रिया को 'हाइड्रोलिसिस' कहते हैं। इसके बाद बनने वाले अपेक्षाकृत छोटे पेप्टाइड्स को सप्लीमेंट के रूप में उपयोग किया जाता है। उत्पाद बनाने वाली कंपनियाँ दावा करती हैं कि ये पेप्टाइड्स शरीर द्वारा अपेक्षाकृत आसानी से अवशोषित किए जा सकते हैं और त्वचा की कोलेजन संबंधी प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं।

लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इन पेप्टाइड्स का शरीर में वास्तविक व्यवहार क्या होता है। भोजन या सप्लीमेंट के रूप में लिए गए प्रोटीन पाचन के दौरान टूटते हैं। उनके अमीनो अम्ल और कुछ छोटे पेप्टाइड आँतों से अवशोषित हो सकते हैं। उसके बाद वे रक्त परिसंचरण के माध्यम से शरीर के विभिन्न ऊतकों तक पहुँचते हैं। कुछ प्रयोगात्मक अध्ययन संकेत देते हैं कि कोलेजन से संबंधित विशिष्ट पेप्टाइड्स कोशिकाओं की गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन यह सिद्ध करना अलग प्रश्न है कि किसी व्यक्ति द्वारा लिया गया कोलेजन उसकी त्वचा में ठीक उसी मात्रा में जमा हुआ, जितना उसने सप्लीमेंट के रूप में खाया था। अभी इस प्रकार का सीधा और व्यापक रूप से प्रमाणित संबंध स्थापित नहीं है। हार्वर्ड हेल्थ की समीक्षा भी स्पष्ट करती है कि मौखिक कोलेजन का सीधे त्वचा, बाल या नाखूनों में पहुँचकर उनका निर्माण करने का दावा विश्वसनीय मानव अध्ययनों में स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं हुआ है।

इस बात को समझने के लिए एक साधारण उदाहरण लिया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति दूध, दाल या अंडा खाता है, तो उसमें मौजूद प्रोटीन सीधे उसी रूप में शरीर की मांसपेशियों या त्वचा में नहीं पहुँच जाता। पाचन के दौरान वह छोटे घटकों में टूटता है और शरीर आवश्यकता के अनुसार उनका उपयोग करता है। कोलेजन के मामले में भी यही मूल सिद्धांत लागू होता है। हालांकि कुछ विशिष्ट कोलेजन पेप्टाइड्स की संभावित जैविक संकेत संबंधी भूमिका अनुसंधान का विषय है। इसलिए कोलेजन को सामान्य प्रोटीन का बिल्कुल समान विकल्प कहना भी अधूरा होगा और उसे सीधे त्वचा में पहुँचने वाला चमत्कारी पदार्थ बताना भी गलत होगा।

क्या कोलेजन सप्लीमेंट से त्वचा की नमी और लचीलापन वास्तव में बढ़ता है?

कोलेजन सप्लीमेंट से संबंधित वैज्ञानिक प्रमाणों का इतिहास दिलचस्प है क्योंकि अलग-अलग समय पर प्रकाशित अध्ययनों से कुछ भिन्न निष्कर्ष सामने आए हैं। वर्ष 2023 में 'न्यूट्रिएंट्स' में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में 26 नियंत्रित अध्ययनों तथा 1,721 प्रतिभागियों के आँकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि हाइड्रोलाइज्ड कोलेजन लेने वाले समूहों में तुलना समूहों की अपेक्षा त्वचा की नमी और लचीलेपन के कुछ परीक्षणों में सांख्यिकीय सुधार दिखाई दिया। लेकिन अध्ययन के लेखकों ने यह भी माना कि उपलब्ध परीक्षणों में कई प्रकार की सीमाएँ और संभावित पक्षपात मौजूद थे। उन्होंने अधिक बड़े और उच्च गुणवत्ता वाले नियंत्रित अध्ययनों की आवश्यकता बताई। यह निष्कर्ष महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे कोलेजन सप्लीमेंट के कुछ लाभों की संभावना सामने आई, लेकिन उसे अंतिम और निर्विवाद प्रमाण नहीं माना गया।

वर्ष 2025 में 'इंडियन जर्नल ऑफ डर्मेटोलॉजी, वेनेरियोलॉजी एंड लेप्रोलॉजी' में प्रकाशित एक अन्य मेटा-विश्लेषण ने दस नियंत्रित अध्ययनों के 646 प्रतिभागियों से संबंधित परिणामों का मूल्यांकन किया। इसमें त्वचा की नमी और लचीलेपन के परीक्षणों में सुधार का संबंध पाया गया। इन अध्ययनों में सामान्यतः प्रतिदिन कुछ ग्राम कोलेजन का उपयोग किया गया था। शोधकर्ताओं ने एक से दस ग्राम प्रतिदिन की मात्रा वाले अध्ययनों में सकारात्मक परिणाम बताए। लेकिन उन्होंने मौसम जैसे संभावित प्रभावकारी कारकों पर नियंत्रण की कमी, प्रतिभागियों में महिलाओं की अधिक संख्या, अध्ययनों के बीच भिन्नता और संभावित पक्षपात जैसी सीमाएँ भी स्वीकार कीं। इसलिए यह परिणाम केवल इतना संकेत देता है कि कुछ अध्ययन परिस्थितियों में त्वचा की नमी और लचीलेपन से संबंधित माप बेहतर हुए। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन एक निश्चित मात्रा में कोलेजन लेकर समान लाभ मिलेगा।

यहाँ एक बहुत महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक अंतर है। किसी अध्ययन में त्वचा की नमी मापने वाली मशीन पर सुधार दिखाई देना और व्यक्ति के चेहरे पर स्पष्ट रूप से झुर्रियाँ कम हो जाना एक ही बात नहीं है। शोध में कई बार ऐसे उपकरण उपयोग किए जाते हैं जो त्वचा की नमी, खिंचाव या जल हानि में छोटे परिवर्तन दर्ज कर सकते हैं। ऐसे परिवर्तन सांख्यिकीय दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं। लेकिन उनका दैनिक जीवन में दिखाई देने वाला लाभ सीमित हो सकता है। यदि किसी उत्पाद को लेने के बाद त्वचा की नमी में मामूली सुधार हो भी जाए, तो उससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि उम्र बढ़ने की प्रक्रिया रुक गई या त्वचा कई वर्ष युवा हो गई। इसलिए वैज्ञानिक अध्ययन में दर्ज लाभ के आकार और उसके वास्तविक सौंदर्य संबंधी महत्त्व को अलग-अलग समझना आवश्यक है।

वर्ष 2025 का शोध इतना विवादास्पद क्यों रहा?

कोलेजन सप्लीमेंट के प्रचार पर सबसे गंभीर वैज्ञानिक प्रश्न वर्ष 2025 में प्रकाशित एक व्यापक समीक्षा से सामने आया। 'द अमेरिकन जर्नल ऑफ मेडिसिन' में सितंबर 2025 में प्रकाशित इस अध्ययन का नेतृत्व दक्षिण कोरिया के शोधकर्ता स्युंग-क्वोन म्युंग ने किया था। इसमें 23 यादृच्छिक नियंत्रित अध्ययनों और कुल 1,474 प्रतिभागियों के आँकड़ों का विश्लेषण किया गया। शुरुआत में जब सभी अध्ययनों के परिणामों को एक साथ देखा गया, तो त्वचा की नमी, लचीलेपन और झुर्रियों से संबंधित कुछ सकारात्मक प्रभाव दिखाई दिए। लेकिन शोधकर्ताओं ने एक महत्त्वपूर्ण अतिरिक्त विश्लेषण किया। उन्होंने अध्ययनों को उनके वित्तपोषण के स्रोत और वैज्ञानिक गुणवत्ता के आधार पर अलग-अलग देखा। परिणाम उल्लेखनीय थे। जिन अध्ययनों को संबंधित कंपनियों से वित्तीय सहायता नहीं मिली थी, उनमें कोलेजन सप्लीमेंट के स्पष्ट लाभ नहीं मिले। इसी तरह उच्च गुणवत्ता वाले अध्ययनों में भी नमी, लचीलेपन और झुर्रियों के लिए सांख्यिकीय रूप से विश्वसनीय लाभ नहीं दिखाई दिया।

इस अध्ययन के लेखकों ने निष्कर्ष निकाला कि उपलब्ध चिकित्सकीय प्रमाणों के आधार पर कोलेजन सप्लीमेंट को त्वचा की उम्र बढ़ने की रोकथाम या उपचार के लिए समर्थित नहीं माना जा सकता। यह निष्कर्ष कोलेजन उद्योग के लोकप्रिय दावों के विपरीत था। लेकिन इसका अर्थ समझने में भी सावधानी आवश्यक है। शोधकर्ताओं ने यह नहीं कहा कि कोलेजन का कोई अणु कभी मानव शरीर की किसी जैविक प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर सकता। उन्होंने उपलब्ध नियंत्रित अध्ययनों के आधार पर यह प्रश्न उठाया कि प्रचारित सौंदर्य लाभ विश्वसनीय और उच्च गुणवत्ता वाले प्रमाणों पर कितना टिकते हैं। इस अध्ययन का विशेष महत्त्व इस बात में है कि उसने केवल सकारात्मक और नकारात्मक परिणामों की गिनती नहीं की, बल्कि शोध की गुणवत्ता और वित्तीय हितों से जुड़े संभावित प्रभावों का मूल्यांकन भी किया।

यह एक व्यापक वैज्ञानिक समस्या की ओर संकेत करता है। जब किसी उत्पाद को बेचने वाली कंपनियाँ उसी उत्पाद की प्रभावशीलता पर अनुसंधान में धन लगाती हैं, तो उससे अध्ययन अनिवार्य रूप से गलत नहीं हो जाता। लेकिन हितों के टकराव की संभावना उत्पन्न हो सकती है। अध्ययन की रूपरेखा, प्रतिभागियों का चयन, परिणाम मापने की विधि और किन निष्कर्षों को प्रकाशित किया गया, इन सब पर विशेष सावधानी आवश्यक होती है। स्वतंत्र वित्तपोषण अपने आप किसी अध्ययन को सही नहीं बनाता। लेकिन शोध के परिणामों का मूल्यांकन करते समय उसका महत्त्व हो सकता है। कोलेजन सप्लीमेंट के मामले में 2025 की समीक्षा ने इसी कारण उद्योग समर्थित दावों पर दोबारा विचार करने की आवश्यकता पैदा की।

वर्ष 2026 की नई समीक्षा ने क्या बताया?

कोलेजन से संबंधित अनुसंधान 2025 के बाद भी जारी रहा। जुलाई 2026 में प्रकाशित एक अद्यतन मेटा-विश्लेषण में 35 यादृच्छिक नियंत्रित अध्ययनों और 2,534 प्रतिभागियों के परिणामों का मूल्यांकन किया गया। इस अध्ययन में कोलेजन पेप्टाइड्स लेने वाले समूहों में त्वचा की नमी, लचीलेपन और त्वचा से जल के नुकसान को मापने वाले कुछ संकेतकों में सांख्यिकीय सुधार पाया गया। शोधकर्ताओं ने यह भी संकेत दिया कि कुछ लाभ विशेष रूप से बारह सप्ताह या उससे अधिक अवधि के उपयोग के बाद स्पष्ट हो सकते हैं। लेकिन झुर्रियों, त्वचा की खुरदरी बनावट और डर्मिस की घनत्व संबंधी माप के परिणाम उतने मजबूत नहीं थे। जब शोधकर्ताओं ने असामान्य रूप से प्रभावशाली अध्ययनों और अध्ययनों के बीच अत्यधिक भिन्नता के प्रभाव को अलग करने का प्रयास किया, तो झुर्रियाँ कम होने जैसे दावों का सांख्यिकीय आधार कमजोर पड़ गया।

इससे एक अपेक्षाकृत संतुलित तस्वीर सामने आती है। कुछ अध्ययन बताते हैं कि कोलेजन सप्लीमेंट से त्वचा की नमी और लचीलेपन में मामूली लाभ संभव है। लेकिन उच्च गुणवत्ता वाले अध्ययनों में स्पष्ट लाभ न मिलने का प्रश्न अभी बना हुआ है। दूसरी ओर त्वचा की झुर्रियाँ कम होने और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया रोकने के दावों के लिए प्रमाण और भी कमजोर हैं। जुलाई 2026 की समीक्षा ने कुछ मापों में लाभ पाया। लेकिन वह 2025 में उठाए गए उद्योग वित्तपोषण और अध्ययन की गुणवत्ता संबंधी प्रश्नों को पूरी तरह समाप्त नहीं करती। इसलिए दोनों अध्ययनों को परस्पर विरोधी समाचारों की तरह देखने के बजाय उनकी पद्धति और प्रश्नों का अंतर समझना आवश्यक है। एक ने उपलब्ध अध्ययनों को वित्तीय हित तथा गुणवत्ता के आधार पर विशेष रूप से परखा, जबकि दूसरे ने व्यापक आँकड़ों में त्वचा से संबंधित विभिन्न परीक्षणों के प्रभावों का विश्लेषण किया।

जून 2026 में प्रकाशित एक अन्य व्यवस्थित समीक्षा में 25 नियंत्रित अध्ययनों का मूल्यांकन किया गया। इसमें कुछ अध्ययनों में नमी, लचीलेपन और झुर्रियों से संबंधित सकारात्मक परिणाम मिले।लेकिन अधिकांश शामिल परीक्षणों में पक्षपात का जोखिम अधिक पाया गया। शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि संभावित लाभों की पुष्टि के लिए अधिक बड़े, मानकीकृत और लंबे समय तक चलने वाले उच्च गुणवत्ता के अध्ययन आवश्यक हैं। इस प्रकार अक्टूबर 2026 तक वैज्ञानिक स्थिति यह नहीं है कि कोलेजन सप्लीमेंट को पूरी तरह प्रभावहीन सिद्ध कर दिया गया है। लेकिन यह भी सही नहीं कि उसके त्वचा संबंधी लाभ निर्विवाद रूप से प्रमाणित हो चुके हैं।

कोलेजन से झुर्रियाँ कितनी कम हो सकती हैं?

उपभोक्ता के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यही है कि यदि वह महीनों तक कोलेजन सप्लीमेंट ले, तो उसके चेहरे पर कितना वास्तविक परिवर्तन दिखाई दे सकता है। उपलब्ध शोध का उत्तर बहुत सीमित है। कुछ छोटे अध्ययनों में त्वचा की महीन रेखाओं, नमी और लचीलेपन के परीक्षणों में सुधार दर्ज हुआ है। लेकिन विभिन्न अध्ययनों में मापने की पद्धतियाँ इतनी अलग हैं कि सभी लोगों के लिए किसी एक निश्चित प्रतिशत लाभ का दावा नहीं किया जा सकता। उदाहरण के लिए यह कहना कि तीन महीने कोलेजन लेने से चेहरे की झुर्रियाँ तीस प्रतिशत कम हो जाएँगी या त्वचा दस वर्ष युवा हो जाएगी, उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों के अनुरूप नहीं है। इसी तरह किसी अध्ययन की मशीन-आधारित माप को सीधे चेहरे पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाले सौंदर्य परिणाम में बदल देना गलत होगा।

त्वचा की झुर्रियों के अनेक कारण होते हैं। कुछ झुर्रियाँ चेहरे की मांसपेशियों की नियमित गतिविधियों से जुड़ी होती हैं। कुछ सूर्य के दीर्घकालिक प्रभाव से विकसित होती हैं। कुछ उम्र बढ़ने के साथ त्वचा की संरचना में बदलाव और शरीर के वसा वितरण से प्रभावित होती हैं। इसलिए केवल शरीर में कोलेजन से संबंधित कुछ जैविक संकेत बदल जाने से झुर्रियों के सभी कारण समाप्त नहीं हो सकते। त्वचा की बनावट एक जटिल संरचनात्मक और जैविक प्रक्रिया का परिणाम है। यही कारण है कि चिकित्सकीय त्वचा उपचार में भी विभिन्न प्रकार की समस्याओं के लिए अलग उपाय अपनाए जाते हैं। कोलेजन सप्लीमेंट को इन सभी उपचारों का सामान्य विकल्प मानना उचित नहीं होगा।

कोलेजन प्राकृतिक रूप से किन खाद्य पदार्थों में मिलता है?

अब इस विषय के सबसे व्यावहारिक प्रश्न पर आते हैं। क्या कोलेजन प्राकृतिक भोजन से प्राप्त किया जा सकता है? इसका उत्तर हाँ है। लेकिन एक महत्त्वपूर्ण तथ्य के साथ। वास्तविक कोलेजन मूलतः पशुओं के संयोजी ऊतकों में पाया जाने वाला प्रोटीन है। इसलिए कोलेजन के प्रत्यक्ष खाद्य स्रोतों में मछली की त्वचा, पशुओं की त्वचा, हड्डियों के आसपास मौजूद संयोजी ऊतक, टेंडन और कुछ प्रकार के मांस शामिल हैं। चिकन की त्वचा और उसके संयोजी ऊतकों में भी कोलेजन पाया जाता है। मछली के विभिन्न भागों, विशेष रूप से त्वचा और हड्डियों के आसपास के ऊतकों में कोलेजन मौजूद हो सकता है। लेकिन किसी खाद्य पदार्थ में कोलेजन की उपस्थिति और उसे खाने से मानव त्वचा के भीतर नया कोलेजन बन जाना अलग प्रश्न हैं। पाचन के दौरान भोजन का कोलेजन भी टूटता है और शरीर प्राप्त घटकों का उपयोग अपनी आवश्यकताओं के अनुसार करता है।

हड्डियों और संयोजी ऊतकों को लंबे समय तक पकाकर तैयार किया गया शोरबा, जिसे अंग्रेजी में 'बोन ब्रॉथ' कहते हैं, कोलेजन संबंधी चर्चा में विशेष लोकप्रिय है। पकाने के दौरान कुछ कोलेजन टूटकर जिलेटिन और दूसरे घुलनशील घटकों के रूप में शोरबे में आ सकता है। लेकिन हर प्रकार के बोन ब्रॉथ में समान मात्रा में प्रोटीन या कोलेजन-संबंधी पदार्थ मौजूद होंगे, ऐसा आवश्यक नहीं है। पशु का प्रकार, उपयोग किए गए हिस्से, पानी की मात्रा, पकाने का समय और तापमान परिणाम बदल सकते हैं। इसलिए यह कहना कि प्रतिदिन एक कटोरी बोन ब्रॉथ पीने से त्वचा की झुर्रियाँ निश्चित रूप से कम हो जाएँगी, उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों से समर्थित नहीं है। इसी तरह हड्डियों का शोरबा किसी व्यक्ति के संपूर्ण पोषण का पर्याप्त विकल्प भी नहीं है। उसकी वास्तविक उपयोगिता उसमें मौजूद पोषक तत्वों और व्यक्ति के कुल आहार पर निर्भर करेगी।

कोलेजन और जिलेटिन के बीच संबंध भी समझना उपयोगी है। जिलेटिन कोलेजन से प्राप्त एक पदार्थ है, जो कोलेजन की मूल संरचना के आंशिक रूप से टूटने या बदलने पर बनता है। खाद्य उद्योग में जिलेटिन का उपयोग कई प्रकार की मिठाइयों, डेजर्ट और दूसरे उत्पादों में किया जाता है। लेकिन जिलेटिन युक्त हर मिठाई त्वचा के लिए स्वास्थ्यवर्धक होगी, ऐसा मानना गलत है। उसमें चीनी तथा दूसरे घटक भी अधिक मात्रा में हो सकते हैं। केवल इस कारण कि किसी उत्पाद में जिलेटिन है, वह त्वचा की उम्र बढ़ने को रोकने वाला खाद्य पदार्थ नहीं बन जाता। यही तर्क कोलेजन युक्त दूसरे प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर भी लागू होता है।

इस संदर्भ में पशु-उत्पत्ति वाले कोलेजन के स्रोत की जानकारी महत्त्वपूर्ण है। बाजार में उपलब्ध कोलेजन कभी समुद्री स्रोतों से, कभी गोवंशीय ऊतकों से, कभी सूअर से और कभी चिकन से प्राप्त किया जाता है। इसलिए धार्मिक, सांस्कृतिक या व्यक्तिगत आहार संबंधी प्राथमिकताओं वाले व्यक्तियों के लिए उत्पाद का मूल स्रोत जानना आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति मछली से एलर्जी के कारण समुद्री कोलेजन नहीं लेना चाहता या किसी विशेष पशु से प्राप्त उत्पाद से परहेज करता है, तो केवल 'कोलेजन' शब्द पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। उत्पाद पर स्रोत और अन्य घटकों से संबंधित जानकारी देखनी होगी।

क्या शाकाहारी भोजन में भी कोलेजन मिलता है?

यहाँ सबसे अधिक भ्रम पैदा होता है। कोलेजन पशुओं का संरचनात्मक प्रोटीन है। सामान्य फल, सब्जियाँ, दालें, मेवे और अनाज सीधे तैयार पशु-कोलेजन के स्रोत नहीं हैं। इसलिए आंवला, संतरा, अमरूद, पालक या बादाम में प्राकृतिक रूप से वही तैयार कोलेजन मौजूद है जो पशुओं की त्वचा और संयोजी ऊतकों में पाया जाता है, ऐसा दावा गलत होगा। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि शाकाहारी व्यक्ति के शरीर में कोलेजन का निर्माण नहीं हो सकता। मानव शरीर कोलेजन स्वयं बनाता है। इसके लिए उसे आवश्यक अमीनो अम्ल और दूसरे पोषक तत्व चाहिए। ये अनेक शाकाहारी खाद्य पदार्थों से भी प्राप्त किए जा सकते हैं।

उदाहरण के लिए दालें, चना, राजमा, सोयाबीन, दूध, दही, पनीर, मेवे और बीज शरीर को प्रोटीन तथा विभिन्न अमीनो अम्ल उपलब्ध कराने में योगदान दे सकते हैं। इनका सेवन शरीर की सामान्य प्रोटीन संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता करता है। लेकिन कोलेजन निर्माण में केवल प्रोटीन पर्याप्त नहीं है। विटामिन सी भी विशेष महत्त्वपूर्ण है। इसी कारण आंवला, अमरूद, नींबू, संतरा और शिमला मिर्च जैसे पदार्थ कोलेजन निर्माण से संबंधित चर्चा में उपयोगी हैं। ये कोलेजन के प्रत्यक्ष स्रोत नहीं हैं, बल्कि शरीर को वह पोषण उपलब्ध करा सकते हैं जिसकी सहायता से वह अपना कोलेजन बनाता है। इसलिए 'कोलेजन युक्त भोजन' और 'कोलेजन निर्माण में सहायक भोजन' के बीच स्पष्ट अंतर रखना चाहिए।

यह अंतर भारत के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है क्योंकि यहाँ बड़ी आबादी शाकाहारी भोजन करती है। यदि किसी विज्ञापन में कहा जाए कि शाकाहारी लोगों के शरीर में कोलेजन की कमी हो जाएगी क्योंकि वे मछली या मांस नहीं खाते, तो यह दावा गलत होगा। पर्याप्त और विविध शाकाहारी आहार से शरीर को प्रोटीन और आवश्यक पोषक तत्व मिल सकते हैं। इस विषय में किसी विशेष उत्पाद की आवश्यकता का निर्णय व्यक्ति के आहार, स्वास्थ्य और पोषण संबंधी स्थिति पर निर्भर करेगा। शाकाहार अपने आप त्वचा में कोलेजन निर्माण की असमर्थता पैदा नहीं करता।

विटामिन सी और कोलेजन के बीच इतना गहरा संबंध क्यों है?

कोलेजन निर्माण में विटामिन सी की भूमिका चिकित्सा विज्ञान में स्थापित है। शरीर के भीतर कोलेजन की संरचना तैयार करते समय कुछ अमीनो अम्लों में विशेष रासायनिक परिवर्तन आवश्यक होते हैं। इन प्रतिक्रियाओं में विटामिन सी सहायक कारक के रूप में काम करता है। विशेष रूप से प्रोलिन और लाइसिन से संबंधित कुछ प्रक्रियाएँ कोलेजन की स्थिर संरचना बनने में महत्त्वपूर्ण हैं। यदि लंबे समय तक विटामिन सी की गंभीर कमी बनी रहे, तो शरीर के संयोजी ऊतकों की सामान्य कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है। अमेरिका के राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान के आहार पूरक कार्यालय के अनुसार विटामिन सी कोलेजन के जैविक निर्माण के लिए आवश्यक है और घाव भरने की प्रक्रिया में भी उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

इस संबंध का ऐतिहासिक उदाहरण 'स्कर्वी' नामक बीमारी है। लंबे समुद्री अभियानों के दौरान पुराने समय के नाविकों में यह बीमारी विशेष रूप से देखी जाती थी। जब कई महीनों तक ताजे फल और सब्जियाँ उपलब्ध नहीं होते थे, तो उनमें विटामिन सी की गंभीर कमी विकसित हो सकती थी। स्कर्वी में मसूड़ों से खून आना, घाव भरने में कठिनाई, कमजोरी और संयोजी ऊतकों से संबंधित दूसरी समस्याएँ दिखाई दे सकती हैं। इसके पीछे कोलेजन निर्माण की प्रभावित प्रक्रियाएँ भी महत्त्वपूर्ण थीं। बाद में ताजे खट्टे फलों और दूसरे विटामिन सी स्रोतों के महत्त्व को समझने से इस समस्या पर नियंत्रण पाने में सहायता मिली। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि त्वचा और संयोजी ऊतकों के स्वास्थ्य के लिए शरीर के भीतर कोलेजन निर्माण की प्रक्रिया को समझना कितना आवश्यक है।

लेकिन यहाँ भी एक सामान्य भ्रम दूर करना चाहिए। विटामिन सी की कमी दूर करने से शरीर की सामान्य कोलेजन निर्माण क्षमता को सहायता मिल सकती है। लेकिन यदि किसी व्यक्ति में विटामिन सी की कमी नहीं है, तो बहुत अधिक मात्रा में विटामिन सी लेने से उसकी त्वचा में कोलेजन अनिवार्य रूप से बढ़ता जाएगा, ऐसा प्रमाण नहीं है। शरीर की अनेक जैविक प्रक्रियाएँ एक सीमा तक ही पोषण संबंधी लाभ प्राप्त करती हैं। इसलिए पर्याप्त पोषण और अत्यधिक सप्लीमेंट लेने के बीच अंतर महत्त्वपूर्ण है।

क्या आंवला, अमरूद और नींबू महँगे कोलेजन सप्लीमेंट का विकल्प हो सकते हैं?

इस प्रश्न का उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि विकल्प से हमारा आशय क्या है। यदि उद्देश्य सीधे तैयार कोलेजन को भोजन में शामिल करना है, तो आंवला और अमरूद उसके स्रोत नहीं हैं। लेकिन यदि उद्देश्य शरीर को प्राकृतिक रूप से कोलेजन बनाने के लिए आवश्यक पोषण उपलब्ध कराना है, तो विटामिन सी युक्त फल और सब्जियाँ उपयोगी हैं। भारत में आंवला, अमरूद, नींबू, संतरा, पपीता और शिमला मिर्च जैसे खाद्य पदार्थ उपलब्ध हैं। इनमें विटामिन सी की मात्रा अलग-अलग होती है। इनके अतिरिक्त अन्य पोषक तत्व, रेशा और पौधों से मिलने वाले विभिन्न लाभकारी घटक भी मौजूद हो सकते हैं। इसलिए स्वस्थ आहार के हिस्से के रूप में इन खाद्य पदार्थों का सेवन शरीर की सामान्य संरचनात्मक और चयापचय संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता कर सकता है।

विशेष रूप से अमरूद और आंवला भारत में विटामिन सी से संबंधित पोषण के उल्लेखनीय स्रोत हैं। लेकिन इनके सेवन को किसी विशिष्ट चिकित्सकीय उपचार या झुर्रियाँ घटाने की निश्चित विधि के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन आंवला खाना शुरू करे, तो इससे उसकी त्वचा कितने प्रतिशत युवा दिखाई देगी, इस प्रकार का कोई विश्वसनीय सार्वभौमिक आँकड़ा उपलब्ध नहीं है। भोजन का उद्देश्य केवल किसी एक प्रोटीन को बढ़ाना नहीं, बल्कि शरीर की व्यापक पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करना है। पर्याप्त प्रोटीन, विटामिन सी और संतुलित आहार शरीर की सामान्य कोलेजन निर्माण प्रक्रियाओं को बनाए रखने में सहायता करते हैं। इससे अलग यह दावा करना कि किसी एक फल के सेवन से उम्र बढ़ने की प्रक्रिया रुक जाएगी, वैज्ञानिक प्रमाणों से समर्थित नहीं है।

कोलेजन बनाने के लिए जिंक, कॉपर और प्रोटीन की क्या भूमिका है?

विटामिन सी के अतिरिक्त दूसरे पोषक तत्व भी संयोजी ऊतकों के सामान्य स्वास्थ्य में भूमिका निभाते हैं। प्रोटीन से मिलने वाले अमीनो अम्ल कोलेजन निर्माण के मूल घटक हैं। कॉपर कुछ ऐसे एंजाइमों के लिए आवश्यक है जो कोलेजन और इलास्टिन के रेशों के बीच क्रॉस-लिंक बनने में भूमिका निभाते हैं। इन संबंधों के कारण ऊतकों की मजबूती बढ़ती है। जिंक शरीर की अनेक एंजाइम संबंधी प्रक्रियाओं, कोशिकाओं की वृद्धि और ऊतकों की मरम्मत में महत्त्वपूर्ण है। लेकिन इन सभी पदार्थों का उपयोग यह नहीं दर्शाता कि कोई व्यक्ति जितना अधिक जिंक या कॉपर खाएगा, उतना अधिक कोलेजन बनता जाएगा। अत्यधिक मात्रा में कुछ खनिज लेने से नुकसान भी हो सकता है। इसलिए लक्ष्य शरीर की सामान्य आवश्यकता पूरी करना होना चाहिए, न कि किसी एक पदार्थ का अनियंत्रित सेवन।

भारतीय भोजन में ये पोषक तत्व अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त किए जा सकते हैं। दालें, साबुत अनाज, मेवे, बीज, दूध तथा दूसरे प्रोटीन स्रोत उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन पोषण का वास्तविक प्रभाव व्यक्ति की पूरी आहार व्यवस्था और उसमें मौजूद विविधता पर निर्भर करेगा। केवल एक खाद्य पदार्थ को 'कोलेजन बूस्टर' कहकर बेच देना शरीर के जटिल पोषण विज्ञान का सरलीकरण है। इसी तरह पर्याप्त पोषण वाले स्वस्थ व्यक्ति को बिना किसी कमी की पहचान किए बहुत अधिक मल्टीविटामिन या खनिज सप्लीमेंट लेने से त्वचा की गुणवत्ता में अतिरिक्त लाभ होगा, यह आवश्यक नहीं है।

बाजार में मिलने वाले 'वेजिटेरियन कोलेजन' की वास्तविकता क्या है?

पिछले कुछ वर्षों में कोलेजन के नाम पर ऐसे अनेक उत्पाद भी बाजार में आए हैं जिन्हें 'वेजिटेरियन कोलेजन', 'वीगन कोलेजन' या 'प्लांट-बेस्ड कोलेजन बूस्टर' कहा जाता है। इन नामों को समझने में सावधानी आवश्यक है। पारंपरिक कोलेजन सप्लीमेंट पशुओं से प्राप्त प्रोटीन पर आधारित होते हैं। पौधों में सामान्यतः वही तैयार कोलेजन मौजूद नहीं होता जो मानव और दूसरे पशुओं के संयोजी ऊतकों में पाया जाता है। इसलिए अधिकांश वनस्पति-आधारित 'कोलेजन बूस्टर' में वास्तव में कोलेजन के बजाय विटामिन सी, अमीनो अम्ल, खनिज और दूसरे पोषक तत्व होते हैं, जिन्हें शरीर की प्राकृतिक कोलेजन निर्माण प्रक्रियाओं में सहायता देने के उद्देश्य से मिलाया जाता है। यह तैयार कोलेजन खाने से अलग अवधारणा है।

जैव प्रौद्योगिकी की सहायता से सूक्ष्मजीवों और विशेष उत्पादन प्रणालियों में कोलेजन-सदृश या कोलेजन संबंधित प्रोटीन बनाने पर भी अनुसंधान हो रहा है। ऐसी प्रणालियों में पशुओं से सीधे ऊतक प्राप्त करने के बजाय आनुवंशिक तथा औद्योगिक तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है। लेकिन किसी उत्पाद को 'वीगन कोलेजन' बताने से यह अपने आप स्पष्ट नहीं होता कि उसमें वास्तव में कोलेजन प्रोटीन मौजूद है या केवल कोलेजन निर्माण में सहायक पोषक तत्व। इसलिए उत्पाद की वास्तविक सामग्री और निर्माण प्रक्रिया समझना आवश्यक है। विशेष रूप से शाकाहारी उपभोक्ताओं के लिए लेबल पर लिखी बड़ी प्रचार पंक्ति के बजाय वास्तविक घटकों की जानकारी अधिक उपयोगी होगी।

कितने दिनों तक कोलेजन लेने से फर्क दिखाई दे सकता है?

उपलब्ध नियंत्रित अध्ययनों में कोलेजन सप्लीमेंट की मात्रा और उपयोग अवधि एक समान नहीं रही है। अनेक अध्ययनों में प्रतिदिन लगभग 2.5 से 10 ग्राम तक हाइड्रोलाइज्ड कोलेजन का उपयोग किया गया, जबकि कुछ अध्ययनों में इससे अलग मात्रा भी ली गई। अधिकांश शोध आठ से बारह सप्ताह या कुछ महीनों की अवधि के रहे हैं। वर्ष 2026 की अद्यतन समीक्षा ने संकेत दिया कि त्वचा के लचीलेपन और उसकी प्राकृतिक अवरोधक क्षमता से संबंधित कुछ संभावित लाभ कम से कम बारह सप्ताह के उपयोग के बाद अधिक स्पष्ट हो सकते हैं। लेकिन यह अध्ययन परिणामों का वर्णन है, सभी व्यक्तियों के लिए चिकित्सकीय खुराक निर्धारित करने की सलाह नहीं। वर्तमान प्रमाण किसी एक मात्रा को हर व्यक्ति के लिए सर्वोत्तम या अनिवार्य नहीं ठहराते।

यदि कोई व्यक्ति कोलेजन सप्लीमेंट लेने का विचार कर रहा है, तो उसे सबसे पहले यह समझना चाहिए कि यह त्वचा की उम्र बढ़ने के लिए स्थापित और आवश्यक चिकित्सा उपचार नहीं है। सामान्यतः संतुलित आहार लेने वाले स्वस्थ व्यक्ति को केवल त्वचा सुंदर बनाए रखने के लिए कोलेजन सप्लीमेंट लेना अनिवार्य नहीं माना जाता। यदि कोई व्यक्ति संभावित मामूली लाभ के लिए इसका उपयोग करना चाहे, तो उत्पाद की गुणवत्ता, स्रोत, स्वास्थ्य की स्थिति और चिकित्सकीय आवश्यकता पर विचार करना उचित होगा। लेकिन लंबे समय तक महँगा उत्पाद लेने के बाद भी स्पष्ट परिवर्तन दिखाई न दे, तो यह आश्चर्य की बात नहीं होगी। वैज्ञानिक प्रमाण अभी इतने मजबूत नहीं हैं कि हर व्यक्ति के लिए निश्चित परिणाम का वादा किया जा सके।

क्या कोलेजन सप्लीमेंट से कोई नुकसान भी हो सकता है?

उपलब्ध छोटे और मध्यम अवधि के अनेक नियंत्रित अध्ययनों में कोलेजन सप्लीमेंट सामान्यतः सहनीय पाए गए हैं। कुछ लोगों को पेट संबंधी हल्की परेशानी, स्वाद से असुविधा या दूसरे सामान्य दुष्प्रभाव हो सकते हैं। लेकिन सभी उत्पाद और सभी व्यक्तियों की स्थिति एक समान नहीं होती। उदाहरण के लिए समुद्री स्रोतों से तैयार कोलेजन उन व्यक्तियों के लिए समस्या बन सकता है जिन्हें मछली या संबंधित समुद्री उत्पादों से एलर्जी है। हाइड्रोलाइज्ड होने के बाद भी कुछ एलर्जी पैदा करने वाले अंश मौजूद रह सकते हैं। इसलिए किसी ज्ञात गंभीर खाद्य एलर्जी वाले व्यक्ति को उत्पाद का स्रोत और चिकित्सकीय जोखिम समझे बिना उसका उपयोग नहीं करना चाहिए।

उत्पाद की शुद्धता भी महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। समुद्री स्रोतों से प्राप्त उत्पादों में भारी धातुओं और दूसरे संदूषकों की संभावना के कारण गुणवत्ता परीक्षण आवश्यक हैं। लेकिन यह कहना कि सभी समुद्री कोलेजन सप्लीमेंट भारी धातुओं से प्रदूषित होते हैं, गलत होगा। वर्ष 2025 के एक अध्ययन में विभिन्न समुद्री कोलेजन उत्पादों में कुछ धातुओं की मात्रा जाँची गई। शोधकर्ताओं ने उत्पादों के बीच अंतर पाया। लेकिन परीक्षण किए गए नमूनों में निर्धारित यूरोपीय सुरक्षा सीमाओं से अधिक स्तर नहीं मिले। इसके बावजूद दीर्घकालिक सेवन और विभिन्न उत्पादों से कुल संपर्क के संदर्भ में निगरानी महत्त्वपूर्ण मानी गई। इससे स्पष्ट होता है कि गुणवत्ता संबंधी चिंता वास्तविक है, लेकिन उसका मूल्यांकन परीक्षण और प्रमाणों से होना चाहिए, केवल आशंका से नहीं।

गर्भावस्था, स्तनपान, गंभीर किडनी या लिवर रोग और अन्य विशेष चिकित्सकीय परिस्थितियों में बिना आवश्यकता सप्लीमेंट लेने के बजाय विशेषज्ञ सलाह लेना उचित है। इसका अर्थ यह नहीं कि कोलेजन हर ऐसी स्थिति में हानिकारक सिद्ध हो चुका है। वास्तविक प्रश्न पर्याप्त सुरक्षा प्रमाणों और व्यक्ति की स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं का है। किसी भी सप्लीमेंट में अन्य विटामिन, खनिज, जड़ी-बूटियाँ या अतिरिक्त घटक मिले हो सकते हैं। इसलिए केवल 'कोलेजन' शब्द देखकर पूरे उत्पाद को सुरक्षित मान लेना उचित नहीं होगा।

क्या कोलेजन क्रीम लगाने से त्वचा के भीतर कोलेजन बढ़ सकता है?

मौखिक सप्लीमेंट के अतिरिक्त बाजार में कोलेजन युक्त क्रीम और सीरम भी उपलब्ध हैं। इनके बारे में अक्सर दावा किया जाता है कि वे त्वचा के भीतर कोलेजन की कमी पूरी कर देते हैं। लेकिन सामान्य कोलेजन अणुओं का आकार इतना बड़ा होता है कि उन्हें त्वचा की बाहरी अवरोधक परत के पार पहुँचाकर सीधे डर्मिस के कोलेजन ढाँचे में शामिल कर देना आसान नहीं है। इसलिए कोलेजन वाली किसी क्रीम से त्वचा पर नमी या अस्थायी मुलायमपन महसूस होना और उससे त्वचा के भीतर नया संरचनात्मक कोलेजन बन जाना दो अलग परिणाम हैं। कुछ उत्पाद त्वचा की सतह पर नमी बनाए रखने या अस्थायी रूप से उसकी बनावट सुधारने में सहायता कर सकते हैं। लेकिन यह दावा कि सामान्य कोलेजन क्रीम त्वचा के भीतर जाकर पुरानी झुर्रियों को भर देगी, मजबूत चिकित्सकीय प्रमाण की माँग करता है।

इसके विपरीत त्वचा की उम्र बढ़ने से संबंधित कुछ स्थापित उपायों के पक्ष में अपेक्षाकृत अधिक प्रमाण मौजूद हैं। सूर्य की पराबैंगनी किरणों से सुरक्षा इनमें विशेष महत्त्वपूर्ण है। नियमित रूप से उपयुक्त ब्रॉड-स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन का उपयोग त्वचा को अतिरिक्त यूवी क्षति से बचाने में सहायता करता है। कुछ व्यक्तियों में चिकित्सकीय सलाह से रेटिनॉइड जैसे त्वचा पर लगाए जाने वाले उपचार उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन उनकी उपयोगिता, सहनशीलता और सावधानियाँ व्यक्ति की परिस्थिति पर निर्भर करती हैं। हार्वर्ड हेल्थ ने भी कोलेजन सप्लीमेंट के अनिश्चित लाभों की तुलना में सूर्य से सुरक्षा और उपयुक्त चिकित्सकीय त्वचा उपचारों को अधिक प्रमाण आधारित विकल्पों के रूप में महत्त्व दिया है।

क्या कोलेजन के लिए महँगे सप्लीमेंट से अधिक महत्त्वपूर्ण सामान्य भोजन है?

यह प्रश्न भारत के उपभोक्ताओं के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है। यदि किसी व्यक्ति के भोजन में पर्याप्त प्रोटीन नहीं है, विटामिन सी की कमी है या वह कई आवश्यक पोषक तत्वों से वंचित है, तो केवल एक विशेष कोलेजन पाउडर उसके संपूर्ण पोषण की कमी का समाधान नहीं होगा। शरीर की मरम्मत और नई संरचनाएँ बनाने के लिए अनेक प्रकार के पोषक तत्व आवश्यक होते हैं। इसलिए सामान्य स्वस्थ व्यक्ति के लिए विविध और संतुलित भोजन को प्राथमिकता देना अधिक तर्कसंगत है। पर्याप्त प्रोटीन, ताजे फल और सब्जियाँ, स्वस्थ जीवनशैली तथा सूर्य की हानिकारक किरणों से सुरक्षा त्वचा के सामान्य स्वास्थ्य से जुड़ी व्यापक आवश्यकताओं को संबोधित करती हैं।

इसका एक आर्थिक पक्ष भी है। सौंदर्य उद्योग अक्सर उम्र बढ़ने के स्वाभाविक परिवर्तनों को ऐसी समस्या के रूप में प्रस्तुत करता है जिसे विशेष उत्पाद खरीदकर रोका जा सकता है। इससे उपभोक्ता में यह धारणा बन सकती है कि सामान्य भोजन और जीवनशैली पर्याप्त नहीं हैं और महँगा सप्लीमेंट आवश्यक है। लेकिन उपलब्ध वैज्ञानिक शोध ऐसा निष्कर्ष नहीं देता। कुछ छोटे परीक्षणों में लाभ मिलने की संभावना के बावजूद उच्च गुणवत्ता वाले प्रमाण अभी विवादित हैं। इसलिए महँगे उत्पाद की कीमत को उसकी चिकित्सकीय प्रभावशीलता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। कोई सप्लीमेंट जितना अधिक महँगा होगा, उससे त्वचा को उतना अधिक लाभ मिलेगा, यह वैज्ञानिक नियम नहीं है।

क्या कोलेजन खाने से त्वचा फिर युवा हो सकती है?

वर्ष 2026 तक उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर इसका उत्तर स्पष्ट है कि कोलेजन सप्लीमेंट त्वचा की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को उलट देने वाला सिद्ध उपचार नहीं है। कुछ अध्ययनों में नमी, लचीलेपन और त्वचा की अवरोधक क्षमता से जुड़े मापों में सीमित लाभ मिले हैं। लेकिन उच्च गुणवत्ता वाले स्वतंत्र अध्ययनों में यह लाभ लगातार नहीं मिला। झुर्रियों को वास्तविक रूप से कम करने और त्वचा को कई वर्ष युवा बनाने के प्रचारित दावों के लिए प्रमाण विशेष रूप से कमजोर हैं। इसलिए कोलेजन को चमत्कारी 'एंटी-एजिंग' औषधि के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।

इस पूरी चर्चा में एक और बात महत्त्वपूर्ण है। त्वचा का युवा या वृद्ध दिखाई देना केवल कोलेजन की मात्रा से निर्धारित नहीं होता। चेहरे की हड्डियों, मांसपेशियों, वसा की परत, हार्मोन, त्वचा की नमी, आनुवंशिकी और सूर्य के संपर्क सहित अनेक कारक उसमें भूमिका निभाते हैं। इसलिए यह मान लेना कि अधिक कोलेजन उपलब्ध कराकर उम्र से संबंधित सभी परिवर्तन रोके जा सकते हैं, त्वचा विज्ञान की जटिलता को अनदेखा करना होगा। शरीर की जैविक उम्र बढ़ना एक व्यापक प्रक्रिया है, जिसका संबंध केवल एक प्रोटीन से नहीं है।

शरीर को कोलेजन चाहिए, लेकिन क्या उसे कोलेजन का डिब्बा भी चाहिए?

कोलेजन मानव शरीर का एक अत्यंत आवश्यक संरचनात्मक प्रोटीन है। यह त्वचा को मजबूती देता है, हड्डियों और टेंडन की संरचना में योगदान करता है और कई प्रकार के संयोजी ऊतकों के सामान्य कामकाज के लिए महत्त्वपूर्ण है। उम्र बढ़ने के साथ इसके निर्माण और गुणवत्ता में परिवर्तन होते हैं। इसी वैज्ञानिक तथ्य ने कोलेजन सप्लीमेंट के विशाल बाजार को जन्म दिया है। लेकिन किसी पदार्थ का शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक होना और उसी पदार्थ को सप्लीमेंट के रूप में खाने से अतिरिक्त स्वास्थ्य लाभ होना, दोनों अलग बातें हैं। शरीर स्वयं कोलेजन बनाता है। उसे आवश्यक पोषण उपलब्ध कराना और उसकी संरचनाओं को अनावश्यक क्षति से बचाना, सामान्य स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।

प्राकृतिक रूप से तैयार कोलेजन पशु-उत्पत्ति वाले खाद्य पदार्थों, विशेष रूप से त्वचा, हड्डियों के आसपास मौजूद संयोजी ऊतकों और कुछ प्रकार के मांस तथा मछली में पाया जाता है। दूसरी ओर शाकाहारी भोजन शरीर को कोलेजन बनाने के लिए आवश्यक अमीनो अम्ल, विटामिन सी और दूसरे पोषक तत्व उपलब्ध करा सकता है। इसलिए शाकाहारी व्यक्ति को यह मानकर चिंतित होने की आवश्यकता नहीं कि उसके भोजन में तैयार पशु-कोलेजन नहीं है तो शरीर अपना कोलेजन बना ही नहीं पाएगा। विविध भोजन, पर्याप्त प्रोटीन और सामान्य पोषण संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति इस प्रक्रिया को समर्थन देते हैं।

कोलेजन सप्लीमेंट के बारे में आज विज्ञान का सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि उसके कुछ सीमित लाभ संभव हैं। लेकिन त्वचा की झुर्रियाँ मिटाने या उम्र बढ़ने की प्रक्रिया रोकने का दावा अभी विश्वसनीय रूप से सिद्ध नहीं हुआ है। वर्ष 2025 और 2026 के अध्ययनों ने संभावित लाभों के साथ शोध की गुणवत्ता, उद्योग के वित्तीय हितों और लंबे समय के परिणामों की कमी पर भी गंभीर प्रश्न उठाए हैं। इसलिए त्वचा के स्वास्थ्य को केवल एक पाउडर या कैप्सूल से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। पर्याप्त पोषण, सूर्य से सुरक्षा, धूम्रपान से परहेज और आवश्यकतानुसार प्रमाण आधारित त्वचा उपचार अधिक व्यापक आधार प्रदान करते हैं। विज्ञान हमें यह नहीं बताता कि जवानी को एक डिब्बे में बंद करके खरीदा जा सकता है। वह यह बताता है कि शरीर की प्राकृतिक मरम्मत और सुरक्षा प्रणालियों को समझकर उनकी बेहतर देखभाल की जा सकती है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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