Colors Effect: रंगों का दिमाग और शरीर पर असर, लाल भूख क्यों बढ़ाता है, नीला सुकून क्यों देता है?

Colors Effect on Brain: जानिए रंग इंसानी दिमाग, मूड, भूख, नींद और व्यवहार को कैसे प्रभावित करते हैं। लाल रंग और भूख, नीली रोशनी और नींद, हरे रंग की शांति और राशियों से जुड़े रंगों का वैज्ञानिक सच समझिए।

Yogesh Mishra
Published on: 9 Aug 2026 7:44 PM IST
Colors Effect on Brain and Body
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Colors Effect on Brain and Body 

Colors Effect on Brain: हम रंगों को सिर्फ आंखों से नहीं देखते, उनका अर्थ भी महसूस करते हैं। लाल रंग खतरे, प्रेम और ऊर्जा का संकेत बन सकता है, नीला रंग शांति और भरोसे से जुड़ सकता है, जबकि हरा प्रकृति और संतुलन की याद दिलाता है। लेकिन क्या रंग सचमुच हमारे मूड, भूख, नींद और शरीर की कार्यप्रणाली को बदलते हैं? और अगर ऐसा है तो क्या जन्म राशि के हिसाब से किसी व्यक्ति के लिए कोई खास रंग ज्यादा प्रभावी होता है? विज्ञान इन सवालों के बारे में क्या कहता है?

लाल रंग देखकर किसी को प्यार याद आता है, किसी को खतरा और किसी को रेस्तरां या फास्ट-फूड। नीला आसमान और समुद्र की शांति का एहसास करा सकता है, लेकिन वही नीला रंग कुछ संदर्भों में उदासी से भी जुड़ता है। हरा प्रकृति और ताजगी का प्रतीक हो सकता है, तो कई संस्कृतियों में ईर्ष्या का भी। यही रंगों की सबसे दिलचस्प विशेषता है - रंग का असर केवल रंग में नहीं होता। उसका प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करता है कि हम उसे कहां, कितनी रोशनी में, कितनी देर और किस संदर्भ में देख रहे हैं।

आधुनिक शोध से यह जरूर पता चलता है कि रंग हमारी भावनाओं, ध्यान, उत्तेजना, भोजन की धारणा और वातावरण के अनुभव को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन विज्ञान यह नहीं कहता कि लाल हर व्यक्ति को गुस्सा दिलाएगा, नीला हर व्यक्ति को शांत करेगा या पीला हमेशा खुशी पैदा करेगा।

2025 में प्रकाशित 128 वर्षों के शोध की एक बड़ी व्यवस्थित समीक्षा में रंगों और भावनाओं के बीच कई लगातार दिखाई देने वाले संबंध मिले। नीला और हरा सामान्यतः शांति, आराम और सकारात्मक कम-उत्तेजना वाली भावनाओं से जुड़े पाए गए। लाल ऊर्जा, प्रेम और उत्तेजना के साथ-साथ खतरे और क्रोध से भी जुड़ा था। इसका अर्थ है कि रंगों का प्रभाव वास्तविक हो सकता है, लेकिन वह सार्वभौमिक और एक-रेखीय नहीं है।

रंग हमारी आंख और दिमाग तक कैसे पहुंचते हैं?

रंग का अनुभव प्रकाश से शुरू होता है। किसी वस्तु से परावर्तित प्रकाश हमारी आंख की रेटिना तक पहुंचता है। रेटिना में मौजूद शंकु कोशिकाएं अलग-अलग वेवलेंथ के प्रति संवेदनशील होती हैं। मस्तिष्क इन संकेतों को संसाधित करके हमें रंग का अनुभव कराता है।

लेकिन यहीं कहानी खत्म नहीं होती। मस्तिष्क रंग को हमारी स्मृति, अनुभव, संस्कृति और आसपास के वातावरण से जोड़ता है। यही कारण है कि एक ही रंग दो अलग लोगों में अलग प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है।

लाल रंग का उदाहरण लें। खून और आग जैसी चीजों के कारण लाल का खतरे से संबंध कुछ हद तक प्राकृतिक अनुभवों से बन सकता है। लेकिन भारत में लाल का विवाह और शुभता से संबंध सांस्कृतिक सीख का परिणाम है। पश्चिमी विवाह परंपरा में सफेद रंग प्रमुख है, जबकि कई एशियाई संस्कृतियों में सफेद शोक से भी जुड़ सकता है। इसलिए यह मान लेना कि किसी रंग का एक ही अर्थ पूरी दुनिया में समान है, वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।

चमक और तीव्रता भी मायने रखती है

किसी रंग का मनोवैज्ञानिक प्रभाव समझने के लिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं कि वह लाल, नीला या हरा है। रंग की गहराई, चमक और संतृप्ति भी महत्वपूर्ण हैं। गहरा चमकीला लाल और हल्का गुलाबी दोनों लाल परिवार के रंग हैं, लेकिन उनका अनुभव बहुत अलग हो सकता है। इसी तरह गहरा नेवी ब्लू गंभीर और औपचारिक लग सकता है, जबकि हल्का आसमानी नीला खुलापन और शांति का अनुभव करा सकता है।

उच्च चमक और अधिक संतृप्त रंग सामान्यतः अधिक दृश्य और भावनात्मक उत्तेजना पैदा कर सकते हैं। इसलिए किसी कमरे के लिए केवल ‘नीला अच्छा है’ कहना पर्याप्त नहीं। यह भी देखना होगा कि नीला कितना गहरा है, रोशनी कैसी है और कमरे में दूसरे रंग कौन से हैं।

लाल रंग भूख क्यों बढ़ाता है? क्या यह सच है?

रंगों से जुड़ी सबसे लोकप्रिय धारणाओं में एक है कि लाल रंग भूख बढ़ाता है। फास्ट-फूड कंपनियों और खाद्य ब्रांडों की पैकेजिंग में लाल और पीले रंगों का व्यापक इस्तेमाल देखकर यह धारणा और मजबूत हुई है। लेकिन विज्ञान इस दावे को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं करता कि लाल रंग देखते ही शरीर में कोई ‘भूख का हार्मोन’ बढ़ जाता है। लाल रंग ध्यान खींचता है और भावनात्मक उत्तेजना बढ़ा सकता है। भोजन से जुड़े सांस्कृतिक संकेतों के कारण यह खाने की अपेक्षा को भी प्रभावित कर सकता है। भोजन का रंग हमारी स्वाद संबंधी अपेक्षा को बदल सकता है। किसी पेय का रंग बदलने पर उसकी वास्तविक सामग्री वही रहने के बावजूद व्यक्ति उसे अधिक मीठा, खट्टा या अलग स्वाद वाला महसूस कर सकता है। इसका अर्थ है कि आंखें भोजन को खाने से पहले ही उसके बारे में मस्तिष्क को संकेत देना शुरू कर देती हैं। लेकिन प्रत्यक्ष रूप से लाल रंग हर व्यक्ति में भूख बढ़ाता है, इसका मजबूत सार्वभौमिक प्रमाण नहीं है।

कुछ अध्ययनों में लाल, नीले और दूसरे रंगों के प्रभावों की तुलना की गई और परिणाम लगातार एक जैसे नहीं रहे। यहां तक कि प्रतिभागियों को पहले से यह बताने पर कि कोई खास रंग भूख बढ़ाता है, परिणाम प्रभावित हो सकते हैं। इससे पता चलता है कि हमारी अपेक्षाएं भी रंग के प्रभाव में भूमिका निभा सकती हैं। इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि लाल रंग ध्यान, उत्तेजना और भोजन की दृश्य अपेक्षा को प्रभावित कर सकता है लेकिन इसे सार्वभौमिक ‘भूख बढ़ाने वाला रंग’ कहना अतिशयोक्ति है।

फास्ट-फूड ब्रांड लाल रंग का इस्तेमाल क्यों करते हैं?

लाल का इस्तेमाल केवल भूख के कारण नहीं होता। लाल दूर से दिखाई देता है, तेजी से ध्यान आकर्षित करता है और ऊर्जा तथा उत्तेजना से जुड़ा है। पीला भी अत्यधिक दिखाई देने वाला रंग है। इसके अलावा दशकों तक एक ही रंग को भोजन और रेस्तरां के साथ देखने से उपभोक्ता के दिमाग में उस रंग और भोजन के बीच संबंध मजबूत हो सकता है। यानी यह रिश्ता दोनों तरफ से बन सकता है। रंग भोजन की याद दिलाता है और ब्रांडिंग रंग को भोजन का संकेत बना देती है।

लाल रंग शरीर को उत्तेजित करता है?

लाल रंग को अक्सर हृदयगति और रक्तचाप बढ़ाने वाला बताया जाता है। लेकिन इस दावे के वैज्ञानिक प्रमाण एक जैसे नहीं हैं। कुछ प्रयोगों में लाल रंग को नीले की तुलना में अधिक उत्तेजक पाया गया, जबकि अन्य अध्ययनों में स्पष्ट अंतर नहीं मिला। इसलिए यह कहना कि लाल कमरे में बैठते ही रक्तचाप निश्चित रूप से बढ़ जाएगा, वैज्ञानिक तथ्य नहीं है।

हां, लाल रंग का खतरे, प्रतिस्पर्धा या भावनात्मक उत्तेजना से संबंध कुछ परिस्थितियों में मानसिक और शारीरिक उत्तेजना को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि रंग मनोविज्ञान में ‘कलर-इन-कॉन्टेक्स्ट’ का विचार महत्वपूर्ण है। रंग का प्रभाव उसके संदर्भ से पैदा होता है। लाल रंग शादी में प्रेम और उत्सव का संकेत हो सकता है। परीक्षा की कॉपी पर वही लाल गलती या असफलता का संकेत बन जाता है।

नीला रंग शांत क्यों लगता है?

नीला रंग साफ आसमान, समुद्र, खुली जगह और दूरी से जुड़ा है। शायद इसी वजह से यह रंग शांति और आराम की भावना से जुड़ता है। रंग और भावनाओं पर उपलब्ध शोध में नीला सामान्यतः सकारात्मक और कम उत्तेजना वाली भावनाओं के साथ जुड़ा पाया गया है। लेकिन नीले का दूसरा अर्थ भी है। अंग्रेजी में ‘feeling blue’ उदासी के लिए इस्तेमाल होता है। यानी नीला शांति और उदासी दोनों का प्रतीक बन सकता है। इससे फिर वही बात सामने आती है कि रंग का अर्थ संदर्भ से तय होता है।

लेकिन नीली रोशनी रात में उल्टा असर क्यों करती है? यहां एक बेहद जरूरी अंतर समझना होगा। नीले रंग की दीवार देखना और नीली तरंगदैर्ध्य वाली तेज रोशनी में रहना एक ही बात नहीं है। मानव शरीर की जैविक घड़ी प्रकाश के प्रति संवेदनशील है। आंख में ऐसी विशेष प्रकाश-संवेदनशील कोशिकाएं होती हैं जो मस्तिष्क की सर्केडियन घड़ी को संकेत भेजती हैं। नीली-समृद्ध रोशनी, खासकर शाम और रात में, मेलाटोनिन को दबा सकती है और शरीर को अधिक जागृत अवस्था में रख सकती है। इसलिए नीली दीवार किसी व्यक्ति को शांत महसूस करा सकती है, लेकिन रात में तेज नीली रोशनी वाली स्क्रीन नींद में बाधा डाल सकती है। यही कारण है कि रंग मनोविज्ञान और प्रकाश जीवविज्ञान को अलग-अलग समझना जरूरी है। दिन में नीला-समृद्ध प्राकृतिक प्रकाश शरीर की जैविक घड़ी के लिए उपयोगी हो सकता है। रात में वही तरह की तेज रोशनी शरीर को ‘अभी दिन है’ जैसा संकेत दे सकती है।

हरा रंग हमें प्रकृति की याद क्यों दिलाता है?

हरा रंग पेड़-पौधों, जंगल, घास और जीवन से जुड़ा है। इसलिए यह सामान्यतः प्रकृति, ताजगी, संतुलन और आराम की भावना पैदा कर सकता है। रंग-भावना शोध में हरा भी नीले की तरह सकारात्मक और कम उत्तेजना वाली भावनाओं से जुड़ा पाया गया है।

लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है। पार्क में घूमने से तनाव कम हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि केवल हरी दीवार देखकर वही लाभ मिल जाएगा। प्रकृति के लाभ में हरियाली के साथ खुली जगह, प्राकृतिक आवाजें, शारीरिक गतिविधि, धूप और रोजमर्रा के तनाव से दूरी जैसे कई तत्व शामिल होते हैं। इसलिए ‘प्रकृति का लाभ’ और ‘हरे रंग का लाभ’ एक ही चीज नहीं हैं।

पीला और नारंगी: ऊर्जा और गर्माहट के रंग?

पीला सूर्य, रोशनी और गर्मी से जुड़ा है। इसलिए इसे अक्सर ऊर्जा और प्रसन्नता के साथ जोड़ा जाता है। लेकिन चमकीला पीला लंबे समय तक देखने पर कुछ लोगों को अत्यधिक उत्तेजक भी लग सकता है।

नारंगी लाल की उत्तेजना और पीले की गर्माहट के बीच का अनुभव देता है। इसलिए इसका इस्तेमाल भोजन, खेल और मनोरंजन से जुड़े ब्रांडों में खूब दिखाई देता है। लेकिन सड़क निर्माण कर्मियों की जैकेट नारंगी इसलिए नहीं होती कि नारंगी खुशी पैदा करता है। उसका सबसे महत्वपूर्ण गुण उच्च दृश्यता है।

गुलाबी रंग क्या सचमुच गुस्सा कम करता है?

गुलाबी को कोमलता, प्रेम और देखभाल से जोड़ा जाता है। एक समय ‘Baker-Miller Pink’ नामक रंग को जेलों और संस्थानों में आक्रामकता कम करने के दावे के साथ इस्तेमाल किया गया था। लेकिन बाद के शोधों में इसका प्रभाव लगातार और विश्वसनीय रूप से साबित नहीं हो सका। इसलिए गुलाबी कमरे में किसी व्यक्ति को रखने से उसका गुस्सा वैज्ञानिक रूप से नियंत्रित हो जाएगा, ऐसा कहना सही नहीं है। गुलाबी का प्रभाव अधिकतर सामाजिक अर्थ और व्यक्ति की धारणा से जुड़ा हो सकता है।

काला, सफेद, बैंगनी और ग्रे क्या संदेश देते हैं?

- काला रंग शक्ति, औपचारिकता, नियंत्रण, गंभीरता, भय और शोक से जुड़ सकता है। फैशन में वही काला रंग आधुनिक और सुरुचिपूर्ण दिखाई देता है।

- सफेद स्वच्छता, प्रकाश, शांति और पवित्रता का प्रतीक हो सकता है। लेकिन अलग संस्कृतियों में इसका संबंध शोक से भी हो सकता है।

- बैंगनी इतिहास में दुर्लभ और महंगे रंगद्रव्यों से जुड़ा था। इसलिए यह राजसत्ता, विलासिता और विशेषाधिकार का प्रतीक बना।

- ग्रे तटस्थता, गंभीरता और आधुनिकता का संकेत दे सकता है। लेकिन अत्यधिक ग्रे वातावरण कुछ लोगों को नीरस और भावनात्मक रूप से ठंडा लग सकता है।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि रंगों के अर्थ सिर्फ शरीर के अंदर पैदा नहीं होते। उनमें इतिहास और सामाजिक स्मृति भी शामिल होती है।

क्या रंग हमारी पढ़ाई और काम करने की क्षमता बढ़ा सकते हैं?

कुछ शोधों में लाल को विवरण और सावधानी से जुड़े कार्यों में लाभकारी तथा नीले को रचनात्मक सोच से जोड़ने वाले परिणाम मिले हैं। लेकिन ऐसे परिणाम हर अध्ययन में दोहराए नहीं गए हैं। इसलिए यह कहना कि गणित पढ़ते समय लाल कमरे में और कविता लिखते समय नीले कमरे में बैठने से निश्चित रूप से प्रदर्शन बढ़ जाएगा, विज्ञान का अतिरंजित इस्तेमाल होगा। रंग ध्यान और अपेक्षा में छोटे बदलाव ला सकता है। लेकिन नींद, अभ्यास, कार्यभार, शोर, तापमान और प्रेरणा जैसे कारक प्रदर्शन पर कहीं अधिक महत्वपूर्ण असर डालते हैं।

क्या रंग शरीर का इलाज कर सकते हैं?

यहीं रंग मनोविज्ञान और ‘कलर थेरेपी’ के बीच अंतर करना बेहद जरूरी है। क्रोमोथेरेपी में अलग-अलग रंगों को अलग-अलग बीमारियों के उपचार से जोड़ा जाता है। लेकिन सामान्य कमरे का लाल, नीला या हरा रंग किसी बीमारी को ठीक कर देता है, इसके लिए विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि चिकित्सा में प्रकाश का कोई उपयोग नहीं है। विशिष्ट परिस्थितियों में नियंत्रित प्रकाश चिकित्सा वास्तविक चिकित्सा उपचार है। उदाहरण के लिए नवजात शिशुओं के पीलिया में विशेष नीली रोशनी का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ त्वचा रोगों में फोटोथेरेपी और कुछ सर्केडियन समस्याओं में नियंत्रित प्रकाश का उपयोग भी किया जाता है। लेकिन ये उपचार विशिष्ट तरंगदैर्ध्य, तीव्रता, समय और चिकित्सकीय प्रोटोकॉल पर आधारित होते हैं। इन्हें ‘नीला रंग अच्छा है’ या ‘लाल रंग शरीर में ऊर्जा बढ़ाता है’ जैसी सामान्य धारणाओं का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

क्या राशियों के भी अपने रंग होते हैं?

भारतीय ज्योतिष में राशियों और ग्रहों को अलग-अलग रंगों से जोड़ा जाता है। मेष को लाल, वृषभ को सफेद या गुलाबी, मिथुन को हरा, कर्क को सफेद, सिंह को सुनहरा या पीला, कन्या को हरा-भूरा, तुला को गुलाबी, वृश्चिक को गहरा लाल या काला, धनु को पीला, मकर को काला या गहरा नीला, कुंभ को नीला और मीन को समुद्री हरा या हल्का नीला बताया जाता है। लेकिन यहां विज्ञान और परंपरा की सीमा बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए। इन राशि-रंग संबंधों का आधुनिक न्यूरोसाइंस, चिकित्सा या मनोविज्ञान में ऐसा प्रमाण नहीं है कि जन्म राशि किसी व्यक्ति के शरीर पर किसी खास रंग का प्रभाव बदल देती है।

मेष और लाल

मेष का स्वामी मंगल माना जाता है। मंगल को लाल रंग से जोड़ना स्वाभाविक है क्योंकि मंगल ग्रह स्वयं लाल दिखाई देता है और पारंपरिक रूप से युद्ध, शक्ति और साहस का प्रतीक माना गया है। लाल का ऊर्जा और उत्तेजना से मनोवैज्ञानिक संबंध वास्तविक है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मेष राशि वाले व्यक्ति के शरीर पर लाल रंग का प्रभाव दूसरों से जैविक रूप से अलग होगा।

वृषभ और गुलाबी-सफेद

वृषभ का संबंध शुक्र से माना जाता है। इसलिए सफेद, क्रीम, हल्का गुलाबी और कुछ परंपराओं में हरा रंग उससे जोड़े जाते हैं। इन रंगों का सौंदर्य, कोमलता और प्रकृति से संबंध मनोवैज्ञानिक रूप से समझ में आता है। लेकिन यह प्रभाव वृषभ राशि के लोगों के लिए विशिष्ट है, इसका वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

मिथुन और हरा

मिथुन के स्वामी बुध माने जाते हैं। हरे रंग को बुद्धि, संवाद और अनुकूलन से जोड़ा जाता है।

हरा वास्तव में प्रकृति और आराम से जुड़ सकता है। लेकिन ‘बुध का हरा रंग संचार क्षमता बढ़ाता है’ जैसी ज्योतिषीय धारणा वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है।

कर्क और सफेद

कर्क राशि चंद्रमा से जुड़ी मानी जाती है। इसलिए सफेद, क्रीम और चांदी जैसे रंग इसके पारंपरिक रंग हैं। यह संबंध चंद्रमा की चमक और रात के आकाश की दृश्य छवि से समझा जा सकता है। लेकिन कर्क राशि के व्यक्ति पर सफेद रंग का कोई विशिष्ट हार्मोनल प्रभाव सिद्ध नहीं है।

सिंह और सुनहरा

सिंह का संबंध सूर्य से है। इसलिए सुनहरा, पीला और नारंगी इसके प्रमुख रंग माने जाते हैं। सूर्य शक्ति और प्रकाश का प्रतीक है और चमकीले गर्म रंग वास्तव में ध्यान आकर्षित करते हैं। लेकिन सिंह राशि के कारण सुनहरे रंग का जैविक प्रभाव अलग हो जाता है, ऐसा विज्ञान नहीं कहता।

कन्या और हरा-भूरा

कन्या का संबंध भी बुध से जोड़ा जाता है। हरा और धरती जैसे रंग इसके लिए सुझाए जाते हैं। प्राकृतिक रंग स्थिर और आरामदायक वातावरण दे सकते हैं, लेकिन कन्या राशि के कारण यह प्रभाव विशेष हो जाता है, इसका प्रमाण नहीं है।

तुला और गुलाबी

तुला शुक्र से जुड़ी है और गुलाबी, हल्का नीला तथा सफेद इसके पारंपरिक रंग हैं। गुलाबी का प्रेम और कोमलता से संबंध आधुनिक रंग शोध में भी मिलता है। लेकिन यह संबंध तुला राशि तक सीमित नहीं है।

वृश्चिक और गहरा लाल

वृश्चिक को तीव्रता, शक्ति और रहस्य से जोड़ने के कारण गहरा लाल, मैरून और काला इसके रंग माने जाते हैं। लाल और काले का शक्ति तथा गंभीरता से संबंध मनोवैज्ञानिक रूप से समझा जा सकता है। लेकिन वृश्चिक राशि के कारण इन रंगों की कोई विशेष जैविक प्रतिक्रिया सिद्ध नहीं है।

धनु और पीला

धनु का संबंध बृहस्पति से माना जाता है। पीला और सुनहरा ज्ञान, विस्तार और गुरु की प्रतीकात्मकता से जोड़े जाते हैं। यह सुंदर सांस्कृतिक प्रतीकवाद है, लेकिन वैज्ञानिक जैविक प्रभाव नहीं।

मकर और काला

मकर के स्वामी शनि माने जाते हैं। इसलिए काला, गहरा नीला और ग्रे इसके पारंपरिक रंग हैं। ये रंग गंभीरता और अनुशासन के प्रतीक हो सकते हैं, लेकिन मकर राशि के व्यक्ति पर इनका प्रभाव दूसरे व्यक्ति से अलग होने का कोई प्रमाण नहीं है।

कुंभ और नीला

कुंभ को पारंपरिक भारतीय ज्योतिष में शनि और आधुनिक पश्चिमी ज्योतिष में यूरेनस से भी जोड़ा जाता है। गहरा नीला, आसमानी और बैंगनी इसके साथ जुड़े रंग हैं। यह आधुनिकता और नवीनता के प्रतीकवाद से मेल खाता है, लेकिन न्यूरोसाइंस में कुंभ और नीले रंग के बीच कोई विशेष जैविक संबंध ज्ञात नहीं है।

मीन और समुद्री हरा

मीन का संबंध बृहस्पति और पश्चिमी ज्योतिष में नेप्च्यून से माना जाता है। इसलिए समुद्री हरा, हल्का नीला, बैंगनी और सफेद इसके रंग माने जाते हैं। जल और आध्यात्मिकता के प्रतीक के रूप में इन रंगों का चयन सांस्कृतिक रूप से स्वाभाविक है। लेकिन नीला और हरा यदि शांति से जुड़े हैं तो उसका अर्थ यह नहीं कि मीन राशि वालों पर इनका प्रभाव विशेष होगा।

क्या राशि के अनुसार रंग पहनना गलत है?

ये जरूरी नहीं। अगर कोई व्यक्ति लाल पहनकर आत्मविश्वास महसूस करता है, तो उसका आत्मविश्वास वास्तविक हो सकता है। लेकिन इसका कारण यह नहीं कि मंगल ग्रह उसके शरीर में कोई विशेष जैविक प्रक्रिया शुरू कर रहा है। यह विश्वास, अपेक्षा, व्यक्तिगत पसंद और आत्म-धारणा का प्रभाव हो सकता है। इसलिए राशि के अनुसार रंग पहनना व्यक्तिगत विश्वास, परंपरा या स्टाइल के रूप में पूरी तरह अलग बात है। समस्या तब शुरू होती है जब कोई इसे बीमारी का इलाज, भाग्य बदलने या स्वास्थ्य संबंधी निर्णय का वैज्ञानिक आधार बताने लगे।

रंगों का शरीर पर सबसे वास्तविक प्रभाव कहां दिखाई देता है?

रंगों के शरीर पर प्रभाव को तीन हिस्सों में समझना सबसे उपयोगी है।

पहला है दृश्य और भावनात्मक प्रभाव। लाल खतरे या प्रेम की याद दिला सकता है। हरा प्रकृति की। नीला शांति की। दूसरा है व्यवहारिक प्रभाव। किसी रेस्तरां का रंग भोजन की अपेक्षा और वातावरण को प्रभावित कर सकता है। किसी कमरे का रंग उसे गर्म, ठंडा, औपचारिक या आरामदायक महसूस करा सकता है। तीसरा और सबसे स्पष्ट जैविक रास्ता है प्रकाश। खासकर नीली-समृद्ध रोशनी शरीर की सर्केडियन घड़ी और मेलाटोनिन को प्रभावित कर सकती है। इस तीसरे प्रभाव का वैज्ञानिक आधार सामान्य ‘रंग मनोविज्ञान’ की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट है।

क्या घर में रंग चुनने का कोई वैज्ञानिक तरीका है?

हां, लेकिन इसे चिकित्सा नहीं बल्कि environment design समझना बेहतर है। शयनकक्ष में हल्का नीला, हरा या तटस्थ रंग कुछ लोगों को आरामदायक लग सकता है। भोजन कक्ष में गर्म रंग जीवंत और सामाजिक वातावरण बना सकते हैं। काम या पढ़ाई की जगह में ऐसा रंग चुनना बेहतर है जो व्यक्ति को पसंद हो और अत्यधिक विचलित न करे।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्तिगत अनुभव वैज्ञानिक औसत से ज्यादा मायने रख सकता है।

अगर किसी व्यक्ति को नीला रंग पसंद ही नहीं और उसे नीला कमरा बेचैन करता है, तो केवल इसलिए उसे नीले कमरे में रखना कि शोध में नीला औसतन शांत पाया गया है, व्यावहारिक नहीं होगा।

रंग असर करते हैं, लेकिन जादू नहीं करते

विज्ञान की मौजूदा तस्वीर को एक वाक्य में कहें तो रंग इंसानी मन और व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन कोई भी रंग हर व्यक्ति पर एक जैसा असर नहीं डालता। रंग हमारे ध्यान को दिशा दे सकते हैं। किसी भोजन को अधिक आकर्षक या अप्राकृतिक दिखा सकते हैं। किसी कमरे को गर्म या ठंडा महसूस करा सकते हैं। यादें और भावनाएं जगा सकते हैं। प्रकाश के रूप में हमारी नींद और जैविक घड़ी तक प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन रंग बीमारी का इलाज नहीं हैं, भाग्य का रिमोट कंट्रोल नहीं हैं और जन्म राशि के आधार पर शरीर की जैविक प्रतिक्रिया तय नहीं करते।

रंग मनुष्य के दिमाग पर असर डालते हैंलेकिन मनुष्य भी अपने अनुभव, संस्कृति और विश्वास से रंगों को अर्थ देता है। असली रंग मनोविज्ञान इसी दोतरफा रिश्ते में छिपा है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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