Pain Science Explained: दर्द शरीर में पैदा होता है या दिमाग में? जानिए दर्द का असली रहस्य

Pain Science Explained in Hindi: दर्द चोट वाली जगह पर पैदा होता है या दिमाग में? जानिए नोसिसेप्शन, फैंटम लिंब पेन, रेफर्ड पेन, प्लेसीबो और नोसीबो असर के जरिए दर्द का पूरा विज्ञान।

Neel Mani Lal
Published on: 23 Aug 2026 6:09 PM IST
Pain Science Explained in Hindi
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Pain Science Explained in Hindi

Pain Science Explained in Hindi: पैर में कील चुभने पर हमें लगता है कि दर्द ठीक उसी जगह हो रहा है, जहां कील चुभी है। पर क्या यह पूरी तरह सच है? विज्ञान की दुनिया में इस सवाल का जवाब उतना सीधा नहीं, जितना यह लगता है। असल में दर्द का पूरा रहस्य कहीं ज्यादा उलझा हुआ और दिलचस्प है, और इसे समझने के बाद शायद आप दर्द को पूरी तरह अलग नज़रिए से देखने लगें।

चोट लगने पर शरीर में सबसे पहले क्या होता है

जब भी शरीर के किसी हिस्से को चोट लगती है, जैसे कोई कील चुभे, हाथ जल जाए या कोई और नुकसान हो, तो उस जगह मौजूद खास तरह की तंत्रिका कोशिकाएं तुरंत सक्रिय हो जाती हैं, जिन्हें 'नोसिसेप्टर' कहा जाता है। इन कोशिकाओं का काम है खतरनाक या नुकसानदायक संकेतों को पहचानना और उन्हें बिजली जैसे तेज़ विद्युत संकेतों में बदल देना।

यह विद्युत संकेत फिर नसों के जरिए एक लंबी यात्रा शुरू करता है। सबसे पहले यह रीढ़ की हड्डी तक पहुंचता है, और वहां से आगे दिमाग की तरफ भेजा जाता है। यह पूरी प्रक्रिया, यानी चोट लगने की जगह से लेकर दिमाग तक संकेत पहुंचने तक की यात्रा, को वैज्ञानिक भाषा में 'नोसिसेप्शन' कहा जाता है। यहां एक बेहद अहम बात समझनी जरूरी है कि नोसिसेप्शन खुद दर्द नहीं है, बल्कि यह सिर्फ खतरे का संकेत है, जो दिमाग तक पहुंचाया जा रहा है।

दर्द असल में बनता कहां है

यहीं से इस पूरे रहस्य की सबसे दिलचस्प परत खुलती है। जब तक वह विद्युत संकेत दिमाग तक नहीं पहुंच जाता, तब तक उसे "दर्द" नहीं कहा जा सकता। दर्द कोई ऐसी चीज़ नहीं, जो शरीर के किसी हिस्से में पहले से मौजूद हो और वहां से सीधे महसूस हो जाए। असल में दर्द दिमाग द्वारा बनाया गया एक अनुभव है, जो तब पैदा होता है जब दिमाग शरीर से आए खतरे के संकेत का विश्लेषण करके यह फैसला लेता है कि इस स्थिति पर "दर्द" के रूप में प्रतिक्रिया देना जरूरी है।

यानी सीधी भाषा में कहें, तो चोट वाली जगह सिर्फ खतरे का संकेत भेजती है, पर दर्द का असली अनुभव, यानी वह जलन, चुभन या तकलीफ जो हम महसूस करते हैं, वह दिमाग के भीतर बनती है। यही वजह है कि आधुनिक दर्द विज्ञान में यह माना जाता है कि "दर्द शरीर में नहीं, दिमाग में पैदा होता है," भले ही इसका ट्रिगर शरीर के किसी हिस्से से ही क्यों न आया हो।

फैंटम लिंब पेन: इस रहस्य का सबसे बड़ा सबूत

इस पूरे सिद्धांत को समझने के लिए सबसे चौंकाने वाला और सबसे मजबूत सबूत है "फैंटम लिंब पेन" यानी कटे हुए अंग में महसूस होने वाला दर्द। जिन लोगों का कोई हाथ या पैर किसी दुर्घटना या सर्जरी की वजह से कट चुका होता है, उनमें से कई लोग महीनों या सालों बाद भी उसी कटे हुए अंग में तेज़ दर्द, जलन या चुभन जैसा एहसास महसूस करते हैं, जबकि वह अंग शरीर में मौजूद ही नहीं होता।

अगर दर्द वाकई सिर्फ चोट वाली जगह पर पैदा होता, तो यह घटना कभी हो ही नहीं सकती थी, क्योंकि जिस अंग में दर्द महसूस हो रहा है, वह अंग खुद अस्तित्व में ही नहीं है। यह साबित करता है कि दर्द का अनुभव पूरी तरह दिमाग के भीतर बनता है। दिमाग में हर अंग का एक "नक्शा" पहले से मौजूद होता है, और जब वह अंग कट जाता है, तो भी दिमाग का वह नक्शा कई बार पूरी तरह अपडेट नहीं हो पाता, जिससे दिमाग गलती से उस गैर-मौजूद अंग से जुड़े संकेतों को दर्द के रूप में समझता रह सकता है।

रेफर्ड पेन: दर्द कहीं और महसूस होना

एक और दिलचस्प घटना है, जिसे "रेफर्ड पेन" कहा जाता है, यानी दर्द असल समस्या वाली जगह पर नहीं, बल्कि शरीर के किसी बिल्कुल दूसरे हिस्से में महसूस होना। इसका सबसे मशहूर उदाहरण है दिल के दौरे के दौरान अक्सर बाएं हाथ, जबड़े या पीठ में दर्द महसूस होना, जबकि असली समस्या दिल में हो रही होती है।

इसकी वजह यह है कि शरीर के अलग-अलग हिस्सों से आने वाली नसें कई बार रीढ़ की हड्डी में एक ही जगह पर आपस में मिलती हैं, इससे पहले कि वे दिमाग तक पहुंचें। जब दिमाग को यह संकेत मिलता है, तो वह कई बार यह ठीक से अलग नहीं कर पाता कि यह संकेत असल में शरीर के किस हिस्से से आया है, इसलिए वह इसे किसी गलत, पर नज़दीकी जगह से जोड़कर "दर्द" के रूप में महसूस करा देता है। यह भी इसी बात का एक और सबूत है कि दर्द कोई सीधी और सरल शारीरिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि दिमाग की एक जटिल व्याख्या है।

गेट कंट्रोल थ्योरी: दिमाग दर्द को कैसे तय करता है

दर्द के विज्ञान को समझने के लिए एक बेहद अहम सिद्धांत है, जिसे "गेट कंट्रोल थ्योरी" कहा जाता है। इसके मुताबिक रीढ़ की हड्डी में एक तरह का "गेट" यानी द्वार मौजूद होता है, जो यह तय करता है कि शरीर से आने वाले कितने दर्द के संकेत असल में दिमाग तक पहुंचने दिए जाएं, और कितने रोक दिए जाएं। यह गेट पूरी तरह खुला या पूरी तरह बंद नहीं रहता, बल्कि यह अलग-अलग परिस्थितियों में कम या ज्यादा खुलता है।

यही वजह है कि जब हम चोट लगी जगह को सहलाते या रगड़ते हैं, तो दर्द कुछ हद तक कम महसूस होता है, क्योंकि सहलाने से पैदा होने वाले हल्के स्पर्श के संकेत उसी गेट से होकर गुजरते हैं और दर्द के संकेतों के साथ थोड़ी प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे दिमाग तक पहुंचने वाला कुल दर्द संकेत कमजोर पड़ जाता है। यही सिद्धांत यह भी बताता है कि क्यों ध्यान भटकाने वाली गतिविधियां, जैसे संगीत सुनना या किसी और चीज़ में मन लगाना, कई बार हल्के दर्द को सहन करना आसान बना देती हैं।

भावनाएं और मानसिक स्थिति दर्द को कैसे बदल देती हैं

चूंकि दर्द दिमाग की बनाई हुई एक व्याख्या है, इसलिए यह हमारी मानसिक और भावनात्मक स्थिति से भी गहराई से प्रभावित होता है। तनाव, चिंता, डर और अकेलापन अक्सर दर्द को ज्यादा तीव्र महसूस कराते हैं, जबकि खुशी, ध्यान भटकाव या किसी सुरक्षित माहौल में होने का एहसास दर्द की तीव्रता को कम कर सकता है।

यही वजह है कि युद्ध के मैदान में घायल हुए कई सैनिकों को उस वक्त बहुत गंभीर चोट लगने के बावजूद तत्काल कोई तेज़ दर्द महसूस नहीं होता, क्योंकि उस वक्त उनका दिमाग जीवित रहने और खतरे से बचने पर पूरी तरह केंद्रित रहता है, और दर्द के संकेतों को अस्थायी रूप से कम महत्व दे देता है। इसके उलट, कोई बेहद मामूली सी चोट भी, अगर व्यक्ति पहले से बहुत ज्यादा चिंतित या डरा हुआ हो, तो असामान्य रूप से ज्यादा तीव्र महसूस हो सकती है।

प्लेसीबो और नोसीबो असर

दर्द के दिमागी स्वभाव को समझने का एक और बेहतरीन उदाहरण है "प्लेसीबो असर।" कई वैज्ञानिक अध्ययनों में यह देखा गया है कि अगर किसी मरीज को यह बताकर कि "यह एक असरदार दर्द निवारक दवा है," असल में कोई बेअसर, नकली गोली भी दी जाए, तो भी बड़ी संख्या में मरीज सच में कम दर्द महसूस करने लगते हैं। यह इसलिए होता है क्योंकि सिर्फ यह विश्वास होना कि राहत मिलने वाली है, दिमाग की उस प्रक्रिया को बदल देता है, जो दर्द के संकेतों की व्याख्या करती है।

इसका उल्टा असर भी उतना ही असली है, जिसे "नोसीबो असर" कहा जाता है, यानी अगर किसी को यह विश्वास दिलाया जाए कि कोई प्रक्रिया दर्दनाक होगी, तो वह वाकई उससे ज्यादा दर्द महसूस करने लगता है, भले ही वह प्रक्रिया वास्तव में उतनी दर्दनाक न हो। यह दोनों घटनाएं इस बात का पक्का सबूत हैं कि दर्द सिर्फ शरीर की एक यांत्रिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि दिमाग की एक जटिल, विश्वास और अपेक्षा से प्रभावित होने वाली व्याख्या है।

क्रॉनिक दर्द: जब समस्या शरीर में नहीं रह जाती

दर्द के इस दिमागी स्वभाव को समझना खासतौर पर उन लोगों के लिए बेहद अहम है, जो लंबे समय से चलने वाले, यानी क्रॉनिक दर्द से जूझ रहे हैं। कई बार ऐसा होता है कि शुरुआती चोट पूरी तरह ठीक हो चुकी होती है, शरीर में कोई सक्रिय नुकसान भी नहीं बचा होता, फिर भी व्यक्ति को लगातार दर्द महसूस होता रहता है।

इसकी एक बड़ी वजह यह मानी जाती है कि दिमाग की नसों का तंत्र कई बार दर्द के संकेतों को भेजने और महसूस करने की आदत में इस कदर ढल जाता है कि वह इस पैटर्न को दोहराता रहता है, भले ही उसके पीछे कोई नई या ताज़ा शारीरिक वजह मौजूद न हो। यह किसी भी तरह से यह नहीं दिखाता कि दर्द "काल्पनिक" या "असली नहीं" है, बल्कि इसका मतलब यह है कि दिमाग का दर्द बनाने वाला तंत्र खुद ही अतिसंवेदनशील हो चुका होता है, और इसी समझ के आधार पर आज क्रॉनिक दर्द के इलाज में दिमाग को दोबारा प्रशिक्षित करने वाली थेरेपी को भी एक अहम हिस्सा माना जाने लगा है।

तो क्या इसका मतलब दर्द असली नहीं है

यहां एक बेहद जरूरी गलतफहमी दूर कर लेनी चाहिए। यह कहना कि दर्द दिमाग में बनता है, इसका बिल्कुल यह मतलब नहीं कि दर्द असली नहीं होता या यह सिर्फ "मन का वहम" है। दर्द उतना ही असली अनुभव है, जितना कोई भी और शारीरिक एहसास, बस इसका निर्माण दिमाग के भीतर होता है, चाहे इसका ट्रिगर शरीर के किसी हिस्से से आया हो, कोई भावनात्मक तनाव हो, या सिर्फ कोई विश्वास ही क्यों न हो। यह समझ दर्द को कमतर नहीं आंकती, बल्कि यह हमें यह समझने में मदद करती है कि दर्द के इलाज में सिर्फ शरीर पर ध्यान देना काफी नहीं, बल्कि दिमाग और भावनात्मक सेहत का ख्याल रखना भी उतना ही जरूरी है।

दर्द शरीर के किसी एक हिस्से में पैदा नहीं होता, बल्कि यह दिमाग द्वारा बनाया गया एक जटिल अनुभव है, जो शरीर से आने वाले खतरे के संकेतों, हमारी भावनाओं, विश्वासों और पुराने अनुभवों को मिलाकर तैयार होता है। फैंटम लिंब पेन, रेफर्ड पेन, गेट कंट्रोल थ्योरी और प्लेसीबो असर, यह सब मिलकर साबित करते हैं कि चोट लगी जगह सिर्फ एक संदेशवाहक है, जबकि असली दर्द का जन्म दिमाग के भीतर होता है। यह समझ न सिर्फ विज्ञान की एक दिलचस्प पहेली सुलझाती है, बल्कि यह हमें यह भी सिखाती है कि दर्द से निपटने के लिए शरीर के साथ-साथ मन की देखभाल भी उतनी ही जरूरी है, क्योंकि आखिरकार दर्द का असली मुख्यालय दिमाग ही है।

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