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Deepak Dhar: कौन हैं दीपक धर, जिन्होंने रेत के ढेर से समझाई दुनिया की बड़ी वैज्ञानिक पहेली?
Deepak Dhar: प्रोफेसर दीपक धर कौन हैं? प्रतापगढ़ में जन्मे वैज्ञानिक ने एबेलियन सैंडपाइल मॉडल के जरिए जटिल प्रणालियों को समझने में अहम योगदान दिया। जानिए उनका सफर, शोध और उपलब्धियां।
Deepak Dhar Physicist (Image Credit-Social Media)
Deepak Dhar Physicist: अगर रेत के ढेर पर एक एक करके रेत के दाने गिराए जाएं तो आम तौर पर कुछ नहीं होता। ढेर थोड़ा बढ़ता जाता है। लेकिन एक समय ऐसा आता है जब रेत का सिर्फ एक छोटा सा दाना गिरता है और पूरा ढेर अचानक ढह जाता है।
सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों होता है? क्यों किसी बड़े सिस्टम में कई छोटी-छोटी घटनाएं कोई खास असर नहीं डालतीं, लेकिन कभी एक बहुत छोटा बदलाव अचानक बड़े बदलाव की वजह बन जाता है?
इस सवाल को समझने की कोशिश ने भारत के एक वैज्ञानिक को दुनिया के सबसे सम्मानित सैद्धांतिक भौतिकविदों में पहुंचा दिया। नाम है - प्रोफेसर दीपक धर।
अगस्त 2026 में इंटरनेशनल सेंटर फॉर थियोरेटिकल फिजिक्स यानी आईसीटीपी ने उन्हें 2026 ‘डिराक मेडल’ से सम्मानित करने की घोषणा की। उनके साथ बर्नार्ड डेरिडा, मार्क मेजार्ड और हैम सोमपोलिंस्की को भी यह सम्मान दिया गया है। यह सम्मान सैद्धांतिक भौतिकी में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया जाता है और इसकी शुरुआत 1985 में हुई थी। लेकिन दीपक धर की कहानी सिर्फ किसी बड़े पुरस्कार की कहानी नहीं है।
यह कहानी उत्तर प्रदेश के छोटे-छोटे शहरों में पले एक बच्चे की है, जिसने अलग-अलग स्कूलों में पढ़ते हुए विज्ञान में दिलचस्पी पैदा की, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ाई शुरू की, आईआईटी कानपुर पहुंचा, अमेरिका के कैलटेक से पीएचडी की और फिर विदेश में बसने के बजाय भारत लौट आया। और भारत में रहकर उन्होंने ऐसे सवालों पर काम किया, जो आज जटिल प्रणालियों, भूकंप, ट्रैफिक, वित्तीय बाजारों और यहां तक कि एआई जैसे क्षेत्रों को समझने में भी काम आ रहे हैं।
प्रतापगढ़ में जन्म, उत्तर प्रदेश के कई शहरों में बचपन
दीपक धर का जन्म 30 अक्टूबर 1951 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में हुआ था। उनके पिता उत्तर प्रदेश की न्यायिक सेवा में अधिकारी थे। नौकरी के कारण उनका तबादला एक शहर से दूसरे शहर होता रहता था। इस वजह से दीपक धर का बचपन किसी एक शहर में नहीं बीता। उनका परिवार आगरा, मुरादाबाद, मेरठ, गोंडा, बिजनौर, पीलीभीत, मुजफ्फरनगर और फिर वाराणसी जैसे शहरों में रहा। वह खुद एक बातचीत में अपने बचपन को याद करते हुए बताते हैं कि वह किसी एक जगह पर बहुत लंबे समय तक नहीं रहे। आज जब बच्चों की पढ़ाई के लिए परिवार बड़े शहरों और महंगे स्कूलों की तलाश करते हैं, दीपक धर की शुरुआत इससे बिल्कुल अलग थी। उनकी शुरुआती जिंदगी उत्तर प्रदेश के छोटे और मध्यम शहरों में बीती। लेकिन इसी दौरान उनके भीतर विज्ञान को समझने की जिज्ञासा पैदा हुई।
विज्ञान की तरफ कैसे बढ़ा मन?
दीपक धर के पिता को विज्ञान में उनकी रुचि दिखाई देती थी। उनके पिता विज्ञान से जुड़ी पत्रिकाएं लाकर उन्हें पढ़ने के लिए देते थे। यहीं से विज्ञान उनके लिए केवल स्कूल का एक विषय नहीं रहा। वह सवाल पूछने और चीजों को समझने का तरीका बनने लगा। 1968 में वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहुंचे। वहां उन्होंने पढ़ाई की और 1970 में स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने आईआईटी कानपुर से फिजिक्स में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। आईआईटी कानपुर से उनका जुड़ाव बाद में भी बना रहा। संस्थान ने 2022 में उन्हें प्रतिष्ठित ‘डिस्टिंग्विश्ड एलुमनस अवॉर्ड’ से सम्मानित किया था।
आईआईटी कानपुर से कैलटेक तक
पोस्टग्रेजुएशन के बाद दीपक धर अमेरिका चले गए और विश्वविख्यात कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानी कैलटेक से फिजिक्स में पीएचडी की। उन्होंने 1978 में पीएचडी पूरी की। कैलटेक दुनिया के उन संस्थानों में है जहां आधुनिक भौतिकी के कई बड़े वैज्ञानिकों ने काम किया है। दीपक धर को वहां महान भौतिक विज्ञानी रिचर्ड फेनमैन के साथ काम करने का अवसर भी मिला। पीएचडी पूरी करने के बाद दीपक के सामने वह रास्ता था जो उस दौर में भारत से अमेरिका जाने वाले कई प्रतिभाशाली वैज्ञानिक चुनते थे - वहीं रह जाना और विदेश में वैज्ञानिक करियर बनाना।
अमेरिका में करियर बनाने के बजाय भारत लौटे
1978 में पीएचडी पूरी करने के बाद दीपक धर भारत लौट आए और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च यानी टीआईएफआर से जुड़ गए। आगे कई दशकों तक उनका वैज्ञानिक करियर इसी संस्थान से जुड़ा रहा। यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उस समय भारत में वैज्ञानिक शोध के संसाधन आज की तुलना में काफी सीमित थे। फिर भी उन्होंने भारत में रहकर बुनियादी विज्ञान के ऐसे सवालों पर काम करना जारी रखा जिनका तत्काल कोई व्यावसायिक फायदा दिखाई नहीं देता था। उनका विषय था - सांख्यिकीय भौतिकी और जटिल प्रणालियां (Statistical Physics and Complex Systems)। यहीं से उनकी असली वैज्ञानिक कहानी शुरू होती है।
सांख्यिकीय भौतिकी आखिर होती क्या है?
फिजिक्स में किसी एक वस्तु को समझना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। लेकिन जब लाखों-करोड़ों कण एक साथ व्यवहार करते हैं, तब मामला बेहद जटिल हो जाता है। मिसाल के लिए एक गैस को ही लें। उसमें अनगिनत अणु लगातार इधर-उधर घूम रहे होते हैं। हर अणु की स्थिति और गति अलग है। हर अणु को अलग-अलग ट्रैक करना लगभग असंभव है। लेकिन वैज्ञानिकों को पूरी गैस का तापमान, दबाव और दूसरी विशेषताएं समझनी होती हैं। यहीं सांख्यिकीय भौतिकी (Statistical Physics )काम आती है। यह व्यक्तिगत कणों की जगह बड़ी संख्या में कणों के सामूहिक व्यवहार को समझने की कोशिश करती है। और यही सोच आगे चलकर उन प्रणालियों को समझने में भी उपयोगी होती है जिनमें बहुत सारे हिस्से मिलकर ऐसा व्यवहार करते हैं, जिसे किसी एक हिस्से को देखकर समझना मुश्किल होता है।
रेत के ढेर ने दुनिया को क्या समझाया?
दीपक धर के सबसे चर्चित वैज्ञानिक कामों में से एक ‘एबेलियन सैंडपाइल मॉडल’ (Abelian Sandpile Model ) है। इसे समझने के लिए रेत का एक ढेर सोचिए। आप उस पर धीरे-धीरे रेत डालते जा रहे हैं। ज्यादातर समय कुछ नहीं होगा। कभी थोड़ा सा रेत नीचे खिसकेगा। लेकिन जैसे-जैसे ढेर बड़ा होता जाएगा, वह एक ऐसी स्थिति में पहुंच सकता है जहां वह बेहद अस्थिर हो जाए। अब अगर सिर्फ एक दाना और गिरा तो छोटा सा हिस्सा खिसकने के बजाय पूरा ढेर बड़े पैमाने पर ढह सकता है। यानी बहुत छोटा कारण और बहुत बड़ा परिणाम।
दीपक धर ने इसी तरह के व्यवहार को गणितीय तरीके से समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने दिखाया कि इस मॉडल में रेत के कणों के गिरने और ढेर के हिस्सों के बदलने की प्रक्रिया में एक खास गणितीय संरचना होती है। इसी वजह से इस मॉडल को समझना और हल करना संभव हुआ। यह काम इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिली कि जटिल प्रणालियां खुद-ब-खुद ऐसी स्थिति में कैसे पहुंच सकती हैं जहां छोटे बदलाव बड़े परिणाम पैदा कर सकते हैं।
एक दाना, बड़ा बदलाव और भूकंप
रेत के ढेर का मॉडल सिर्फ रेत के ढेर की कहानी नहीं है। यह उस तरह के व्यवहार को समझने का एक मॉडल है जो कई जटिल प्रणालियों में दिखाई देता है। आईसीटीपी के अनुसार, सैंडपाइल मॉडल से मिली समझ का इस्तेमाल भूकंप, ट्रैफिक जाम और वित्तीय बाजारों में होने वाले उतार-चढ़ाव जैसी अलग-अलग घटनाओं को समझने के लिए किया गया है। मसलन, सड़क पर हजारों गाड़ियां चल रही हैं। एक कार अचानक थोड़ी धीमी हुई। उसके पीछे वाली कार ने भी ब्रेक लगाया। उसके पीछे वाली ने थोड़ा और ब्रेक लगाया। कभी-कभी यह मामूली बदलाव कुछ ही मिनट में कई किलोमीटर लंबे ट्रैफिक जाम में बदल सकता है। इसी तरह वित्तीय बाजार में किसी छोटी घटना का असर कभी-कभी बहुत बड़ा हो सकता है। भूकंप में भी जमीन के भीतर तनाव लंबे समय तक जमा होता रहता है। फिर एक बिंदु पर छोटा सा बदलाव बड़े पैमाने की हलचल को जन्म दे सकता है। यही वह सोच है जिसमें दीपक धर का काम बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
उन्होंने सिर्फ सैंडपाइल पर काम नहीं किया। आईसीटीपी के अनुसार उन्होंने सांख्यिकीय भौतिकी और जटिल प्रणालियों के कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके शुरुआती काम में निर्देशित जाली संरचनाओं और बहुलकों से जुड़े सवाल शामिल थे। उन्होंने भिन्नात्मक संरचनाओं के अध्ययन में स्पेक्ट्रल डाइमेंशन जैसी अवधारणाओं पर भी काम किया और बाद में एबेलियन सैंडपाइल मॉडल को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका शोध क्षेत्र मुख्य रूप से उन प्रणालियों को समझने से जुड़ा रहा जिनमें बहुत सारे छोटे हिस्सों का सामूहिक व्यवहार अचानक जटिल रूप ले सकता है। यानी उनका काम हमें यह समझने में मदद करता है कि दुनिया हमेशा सीधी रेखा में क्यों नहीं चलती।
2022 में मिला बोल्ट्जमैन मेडल
दीपक धर की वैज्ञानिक उपलब्धियों को दुनिया ने लंबे समय से पहचाना है। लेकिन 2022 उनके करियर का खास साल था। उन्हें ‘बोल्ट्जमैन मेडल’ के लिए चुना गया। वह यह सम्मान पाने वाले पहले भारतीय वैज्ञानिक बने। यह सांख्यिकीय भौतिकी के क्षेत्र के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में गिना जाता है। इस सम्मान ने उन्हें भारत के वैज्ञानिक समुदाय से बाहर भी व्यापक पहचान दिलाई।
2023 में पद्म भूषण
बोल्ट्जमैन मेडल के अगले ही साल भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। आईआईटी कानपुर के रिकॉर्ड के अनुसार उन्हें 2023 में विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में पद्म भूषण मिला। इससे पहले उन्हें शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार, सत्येंद्रनाथ बोस पदक, टीडब्ल्यूएएस पुरस्कार और कई अन्य सम्मान भी मिल चुके थे। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान पुरस्कार नहीं, बल्कि बुनियादी विज्ञान के उन सवालों पर काम करना है जिनका असर कई दूसरे क्षेत्रों तक पहुंचता है।
अब डिराक मेडल
अगस्त 2026 में उनके नाम एक और बड़ी उपलब्धि जुड़ गई। इंटरनेशनल सेंटर फॉर थियोरेटिकल फिजिक्स ने 2026 डिराक मेडल के लिए चार वैज्ञानिकों के नाम घोषित किए। इनमें दीपक धर भी शामिल हैं। डिराक मेडल की शुरुआत 1985 में हुई थी। यह महान भौतिक विज्ञानी पी.ए.एम. डिराक की स्मृति में दिया जाता है। यह पुरस्कार हर साल सैद्धांतिक भौतिकी में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले वैज्ञानिकों को दिया जाता है।
दीपक धर की कहानी खास क्यों है?
दीपक धर की कहानी इसलिए दिलचस्प नहीं है कि उन्होंने बड़े-बड़े पुरस्कार जीते। असल दिलचस्पी उनकी यात्रा में है। एक बच्चा उत्तर प्रदेश के छोटे-छोटे शहरों में बड़ा होता है। उसके पिता की नौकरी के कारण परिवार बार-बार जगह बदलता है। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ता है। फिर आईआईटी कानपुर पहुंचता है। अमेरिका के कैलटेक जैसे दुनिया के शीर्ष संस्थान से पीएचडी करता है। और जब उसके पास अमेरिका में रहने और करियर बनाने का मौका होता है, तो वह भारत वापस आ जाता है। फिर वह दशकों तक ऐसे सवालों पर काम करता है जिनका जवाब तुरंत किसी मशीन, दवा या उत्पाद के रूप में नहीं मिलता। यह बुनियादी विज्ञान है। ऐसा विज्ञान जो पहले यह पूछता है कि दुनिया काम कैसे करती है। बाद में उसी समझ से दूसरी तकनीकें और नए क्षेत्र विकसित हो सकते हैं।
उनकी यात्रा यह दिखाती है कि वैज्ञानिक प्रतिभा केवल बड़े स्कूलों, महानगरों या विदेशी विश्वविद्यालयों से पैदा नहीं होती। प्रतापगढ़, आगरा, मुरादाबाद, मेरठ, गोंडा, बिजनौर, पीलीभीत और दूसरे शहरों में बीता बचपन भी किसी बच्चे को दुनिया के सबसे कठिन वैज्ञानिक सवालों तक पहुंचा सकता है।


