वह केमिकल जिसकी एक बूंद ने जान ले ली और दुनिया भर की प्रयोगशालाओं का तरीका बदल दिया

Chemical Lab Accident: डाईमिथाइलमरकरी की कुछ बूंदों के संपर्क में आने से वैज्ञानिक केरन वेटरहान की मौत कैसे हुई?

Neel Mani Lal
Published on: 26 Sept 2026 6:30 PM IST
Dimethylmercury Karen Death Explained
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Dimethylmercury Karen Death Explained 

Chemical Lab Accident: 15 अगस्त 1996 का दिन डार्टमाउथ कॉलेज की एक प्रयोगशाला में किसी और आम दिन जैसा ही शुरू हुआ था। कमरे में केरन वेटरहान नाम की एक प्रोफेसर काम कर रही थीं, जो खुद विषैली धातुओं की विशेषज्ञ थीं और डार्टमाउथ में टॉक्सिक मेटल्स रिसर्च प्रोग्राम की संस्थापक निदेशक भी थीं। वे बरसों से खतरनाक रसायनों के साथ काम कर रही थीं, हर सुरक्षा नियम का पालन करना उनके लिए किसी आदत की तरह था। उस दिन वे एक बेहद खतरनाक तरल, ‘डाईमिथाइलमरकरी’, की कुछ बूंदें एक पाइपेट से मापकर एक नमूना तैयार कर रही थीं। काम फ्यूम हुड के नीचे हो रहा था, उन्होंने लेटेक्स के दस्ताने पहन रखे थे, सुरक्षा चश्मा भी लगा था। यानी वह सब कुछ किया गया था जो उस दौर में पूरी तरह सुरक्षित माना जाता था।

और फिर एक छोटी सी दुर्घटना हुई। पाइपेट से एक या दो बूंदें फिसलकर उनके एक हाथ के दस्ताने पर गिर गईं। यह इतनी मामूली बात लगी कि उन्होंने तुरंत हाथ धोए, अपने औज़ार साफ किए और सामान्य ढंग से काम जारी रखा। उस पल उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि वे कुछ ही महीनों में अपनी जान गंवा देंगी, और यह भी नहीं पता था कि उनकी मौत आने वाले सालों में दुनिया भर की रासायनिक प्रयोगशालाओं के काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल देगी।

आखिर यह डाईमिथाइलमरकरी है क्या

डाईमिथाइलमरकरी पारे यानी मरकरी का एक ऑर्गेनिक यौगिक है, जिसमें पारे के एक परमाणु के साथ दो मिथाइल समूह जुड़े होते हैं। देखने में यह एक साफ, रंगहीन तरल जैसा लगता है, लगभग पानी जैसा ही निर्दोष। लेकिन इसकी असली खतरनाक खासियत इसकी रासायनिक बनावट में छिपी है। यह पदार्थ फैट में बेहद घुलनशील है, यानी यह शरीर की चर्बी और झिल्लियों में आसानी से घुल जाता है। यही गुण इसे बेहद आसानी से त्वचा और यहां तक कि दिमाग और शरीर की सुरक्षा करने वाली ब्लड ब्रेन बैरियर नाम की दीवार को भी पार करने की ताकत देता है, जो आमतौर पर ज़्यादातर हानिकारक पदार्थों को दिमाग तक पहुंचने से रोकती है।

रसायन विज्ञान की दुनिया में डाईमिथाइलमरकरी का एक बड़ा इस्तेमाल था। इसे परमाणु चुंबकीय अनुनाद, यानी NMR स्पेक्ट्रोस्कोपी नाम की एक तकनीक में एक संदर्भ मानक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, जो वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद करती है कि किसी अणु के भीतर परमाणु किस तरह व्यवस्थित हैं। वेटरहान असल में पारे के NMR सिग्नल को सटीक तरीके से मापने के लिए एक शुद्ध संदर्भ नमूना तैयार कर रही थीं। उनकी टीम ने पहले कम खतरनाक पारे के लवणों से यह काम करने की कोशिश की थी, लेकिन नतीजे संतोषजनक नहीं मिले। शुद्धता और सटीकता की तलाश में वे उसी पदार्थ की तरफ मुड़ीं जिसे रसायन विज्ञान समुदाय में सबसे भरोसेमंद, लेकिन साथ ही सबसे खतरनाक संदर्भ मानक माना जाता था।

वह दस्ताना जो बिल्कुल भी सुरक्षा नहीं दे रहा था

इस पूरी घटना का सबसे चौंकाने वाला और डरावना पहलू यही है। वेटरहान ने कोई लापरवाही नहीं की थी। उन्होंने वही किया जो उस समय के सुरक्षा मानकों के अनुसार बिल्कुल सही था, यानी लेटेक्स के दस्ताने, फ्यूम हुड और सामान्य सावधानी। उस दौर में लेटेक्स को प्रयोगशालाओं में रसायनों से बचाव का एक भरोसेमंद ज़रिया माना जाता था। लेकिन बाद में हुई जांच में एक भयावह सच्चाई सामने आई। जब वैज्ञानिकों ने डाईमिथाइलमरकरी की पारगम्यता, यानी यह किस तरह अलग अलग सामग्री से होकर गुज़र सकता है, इसकी जांच की, तो पाया कि यह पदार्थ लेटेक्स, पीवीसी और नियोप्रीन जैसी सामान्य दस्ताने बनाने वाली सामग्रियों में लगभग तुरंत, यानी सेकंडों के भीतर घुसकर पार हो जाता है।

यानी वेटरहान के हाथ पर जो दस्ताना था, वह असल में किसी सुरक्षा कवच की तरह काम ही नहीं कर रहा था। बूंद गिरते ही डाईमिथाइलमरकरी दस्ताने की सामग्री में घुल गया, उसे पार करके सीधे त्वचा तक पहुंच गया, और वहां से खून में समा गया। यह सब इतनी खामोशी से हुआ कि उन्हें उस वक्त कोई जलन, कोई दर्द, कोई चेतावनी देने वाला लक्षण महसूस ही नहीं हुआ।

एक खामोश ज़हर जो महीनों बाद असर दिखाता है

डाईमिथाइलमरकरी की सबसे डरावनी खासियत यह है कि शरीर में घुसने के बाद यह तुरंत कोई लक्षण नहीं दिखाता। शरीर के भीतर यह धीरे धीरे मिथाइलमरकरी में बदलता है, जो खुद एक बेहद शक्तिशाली न्यूरोटॉक्सिन है, यानी दिमाग और तंत्रिका तंत्र पर सीधा हमला करने वाला ज़हर। यह पदार्थ धीरे धीरे दिमाग की उस सुरक्षा दीवार को पार करता है जो सामान्य हालात में बाहरी नुकसानदेह पदार्थों को रोकती है, और वहां जाकर तंत्रिका कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाना शुरू करता है।

घटना के करीब पांच महीने बाद, यानी लगभग जनवरी उन्नीस सौ सत्तानवे में, वेटरहान को शरीर में संतुलन बिगड़ने, बोलने में दिक्कत और हाथ पैरों में झुनझुनी जैसे लक्षण महसूस होने लगे। शुरुआत में इसे किसी और सामान्य समस्या के तौर पर देखा गया, लेकिन जांच में जल्द ही यह साफ हो गया कि यह पारे की गंभीर विषाक्तता का मामला है। उनके खून में पारे का स्तर इतना ज़्यादा पाया गया कि डॉक्टरों को यकीन हो गया कि नुकसान अब तक बहुत गहरा हो चुका है।

उनके साथी और दुनिया भर के वैज्ञानिक उनकी जान बचाने के लिए दिन रात जुटे रहे। डार्टमाउथ के डॉक्टर और शोधकर्ता पारे पर लिखे गए पुराने वैज्ञानिक शोध पत्रों को खंगालने लगे, यह जानने के लिए कि क्या कोई तरीका है जिससे शरीर से यह ज़हर बाहर निकाला जा सके। उनके बाल, कपड़े, गाड़ी, यहां तक कि उनके छात्रों और परिवार तक की भी जांच की गई ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कहीं कोई और तो इस खतरनाक पदार्थ के संपर्क में नहीं आया। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद, उनके शरीर में पारे का स्तर इतना अधिक था कि कोई भी इलाज असर नहीं दिखा सका। दस महीने की कठिन लड़ाई के बाद, जून उन्नीस सौ सत्तानवे में केरन वेटरहान का निधन हो गया।

एक मौत जिसने पूरी वैज्ञानिक दुनिया को झकझोर दिया

वेटरहान की मौत ने रसायन विज्ञान की दुनिया में एक गहरा सन्नाटा फैला दिया। बात सिर्फ इतनी नहीं थी कि एक होनहार और सम्मानित वैज्ञानिक की जान चली गई, बल्कि इससे भी बड़ी बात यह थी कि उन्होंने वे सभी सावधानियां बरती थीं जिन्हें उस समय पूरी तरह सुरक्षित माना जाता था, और फिर भी उनकी जान नहीं बच सकी। इससे पूरे वैज्ञानिक समुदाय में एक बुनियादी सवाल खड़ा हो गया, कि अगर सबसे सतर्क और अनुभवी वैज्ञानिक भी सुरक्षित नहीं रह सकते, तो असल गलती कहां है।

गौर करने वाली बात यह भी है कि डाईमिथाइलमरकरी से जुड़ी मौत यह पहली घटना नहीं थी। इतिहास में इससे पहले भी कुछ मामले सामने आए थे, जिनमें उन्नीसवीं सदी में इंग्लैंड के कुछ प्रयोगशाला कर्मचारियों और बीसवीं सदी में एक चेक वैज्ञानिक की मौत शामिल थी। लेकिन उन घटनाओं ने उतना व्यापक असर नहीं छोड़ा था जितना वेटरहान की मौत ने छोड़ा, शायद इसलिए क्योंकि वे घटनाएं बहुत पहले हुई थीं और तब तक विज्ञान की दुनिया इतनी आपस में जुड़ी हुई और सूचना के आदान प्रदान में इतनी तेज़ नहीं थी।

इस त्रासदी के बाद क्या बदला

वेटरहान की मौत के बाद अमेरिका की व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य प्रशासन, जिसे संक्षेप में OSHA कहा जाता है, ने डाईमिथाइलमरकरी को लेकर नई सिफारिशें जारी कीं। सबसे पहली और सबसे अहम सिफारिश यह थी कि जब तक बिल्कुल ज़रूरी न हो, तब तक इस पदार्थ के इस्तेमाल से ही बचा जाए। जहां इसका इस्तेमाल अनिवार्य हो, वहां साधारण लेटेक्स या रबर के दस्ताने पूरी तरह अस्वीकार्य कर दिए गए। इसकी जगह विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए लैमिनेटेड दस्ताने, जिन्हें अक्सर सिल्वरशील्ड जैसे नामों से जाना जाता है, अनिवार्य किए गए, जो कई परतों से मिलकर बनते हैं और जिन्हें इस तरह के अत्यंत पारगम्य रसायनों को रोकने के लिए खास तौर पर परखा गया है।

इसके साथ ही वैज्ञानिक समुदाय ने डाईमिथाइलमरकरी की जगह सुरक्षित संदर्भ मानकों की तलाश तेज़ कर दी। पारे पर होने वाले NMR प्रयोगों में अब ज़्यादातर वैज्ञानिक कम खतरनाक विकल्पों का इस्तेमाल करने लगे। एक शोध विश्लेषण में यह पाया गया कि वेटरहान की मौत के बाद के पच्चीस सालों में प्रकाशित हुए लगभग नब्बे शोध पत्रों में से सिर्फ मुट्ठी भर ने ही शुद्ध डाईमिथाइलमरकरी का इस्तेमाल किया, बाकी सभी ने सुरक्षित विकल्पों को अपनाया। यह आंकड़ा खुद बताता है कि इस एक घटना ने वैज्ञानिक व्यवहार में कितना गहरा और स्थायी बदलाव ला दिया।

इससे भी बड़ा बदलाव यह आया कि प्रयोगशालाओं में सुरक्षा को लेकर सोचने का पूरा नज़रिया बदल गया। इस घटना से पहले तक यह मान लिया जाता था कि अगर सही सुरक्षा उपकरण पहने जाएं, तो खतरा टल जाता है। वेटरहान की मौत ने यह भ्रम तोड़ दिया कि हर सुरक्षा उपकरण हर तरह के रसायन के खिलाफ बराबर असरदार होता है। इसके बाद अमेरिका की नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज जैसी संस्थाओं ने प्रयोगशाला सुरक्षा को लेकर विस्तृत रिपोर्टें तैयार कीं, जिनमें यह ज़ोर दिया गया कि किसी भी रसायन के साथ काम करने से पहले उस विशेष पदार्थ के लिए सही सुरक्षा सामग्री की जांच करना कितना ज़रूरी है, सिर्फ सामान्य सुरक्षा नियमों का पालन काफी नहीं।

एक वैज्ञानिक विरासत जो आज भी जीवित है

केरन वेटरहान की कहानी सिर्फ एक दुखद दुर्घटना की कहानी नहीं है, बल्कि यह विज्ञान की उस बुनियादी सच्चाई की भी याद दिलाती है कि कोई भी सुरक्षा प्रणाली तब तक अधूरी है जब तक वह हर संभावित खतरे को ध्यान में रखकर न बनाई जाए। उनकी मौत के पच्चीस साल बाद भी वैज्ञानिक पत्रिकाओं में उन्हें याद किया जाता है, न सिर्फ इसलिए कि उन्होंने धातुओं की विषाक्तता को समझने में योगदान दिया, बल्कि इसलिए भी कि उनकी मौत ने अनजाने में ही सही, लेकिन हज़ारों भावी वैज्ञानिकों की जान बचाने का रास्ता खोल दिया।

आज जब भी कोई युवा शोधकर्ता किसी खतरनाक रसायन के साथ काम करने से पहले यह जांचता है कि उसके दस्ताने उस खास पदार्थ के खिलाफ प्रमाणित हैं या नहीं, तो वह जाने अनजाने उसी सीख का पालन कर रहा होता है जो एक साधारण सी दिखने वाली, लेकिन बेहद घातक बूंद ने दुनिया को सिखाई थी। यह घटना याद दिलाती है कि विज्ञान की प्रगति कई बार बहुत भारी कीमत पर मिलती है, और कभी कभी एक इंसान की जान ही वह चेतावनी बन जाती है जो हज़ारों दूसरी जानें बचा लेती है।

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