Dussehra 2026: दशहरे पर यहां बांटे जाते हैं मंदोदरी के कपड़े, जानें राजस्थान की अनोखी परंपरा

Dussehra 2026: राजस्थान के झालरापाटन में दशहरे पर मंदोदरी के वस्त्रों का प्रसाद बांटने की अनोखी परंपरा निभाई जाती है। जानें रावण दरबार का इतिहास और इस मान्यता के पीछे की कहानी।

Jyotsana Singh
Published on: 19 Oct 2026 2:20 PM IST
Dussehra 2026: Rajasthan’s Unique Tradition of Distributing Mandodari’s Clothes as Prasad
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Dussehra 2026: Rajasthan’s Unique Tradition of Distributing Mandodari’s Clothes as Prasad

Dussehra 2026: दशहरे के दिन जब देशभर में रावण के पुतले जलाए जाते हैं और बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया जाता है, तब राजस्थान के एक शहर में आस्था की ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जो लोगों को हैरान भी करती है और अपनी ओर खींचती भी है। यहां रावण की पत्नी मंदोदरी को नए कपड़े पहनाए जाते हैं और फिर उन्हीं वस्त्रों के छोटे-छोटे टुकड़े श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में बांटे जाते हैं। मान्यता है कि इस प्रसाद को घर में रखने से सुख-समृद्धि आती है और परिवार में खुशहाली बनी रहती है। सदियों पुरानी इस परंपरा के पीछे केवल धार्मिक विश्वास ही नहीं, बल्कि रामायण की एक ऐसी स्त्री की कहानी भी जुड़ी है, जिसने अपने पति को गलत रास्ते से लौटने की सलाह दी थी। आखिर राजस्थान में कहां निभाई जाती है यह अनोखी परंपरा और क्यों मंदोदरी के कपड़ों को इतना शुभ माना जाता है? आइए जानते हैं।

राजस्थान के झालरापाटन में निभाई जाती है यह अनोखी परंपरा

राजस्थान के झालावाड़ जिले में स्थित

झालरापाटन शहर अपने ऐतिहासिक रावण दरबार के लिए जाना जाता है। यहां रावण के साथ उसके परिवार के दूसरे सदस्यों की भी स्थायी प्रतिमाएं मौजूद हैं। इनमें रावण की पत्नी मंदोदरी, भाई कुंभकरण, बेटे मेघनाद और बहन शूर्पणखा की प्रतिमाएं शामिल हैं। दशहरे के मौके पर यह स्थान स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण बन जाता है।

देश के अधिकतर हिस्सों में विजयदशमी पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, लेकिन झालरापाटन में रावण के परिवार की प्रतिमाओं से जुड़ी परंपराएं भी निभाई जाती हैं। इनमें मंदोदरी को नए वस्त्र अर्पित करना और बाद में उन वस्त्रों के टुकड़ों को प्रसाद के रूप में बांटना सबसे खास माना जाता है।

1840 में स्थापित हुआ था रावण दरबार

झालरापाटन के रावण दरबार का इतिहास वर्ष 1840 से जुड़ा बताया जाता है। स्थानीय जानकारियों के अनुसार, तत्कालीन शासक महाराजा मदन सिंह ने यहां रावण और उसके परिवार की प्रतिमाएं स्थापित करवाई थीं। शुरुआत में ये प्रतिमाएं मिट्टी से बनाई गई थीं। समय के साथ इनका रखरखाव किया गया और बाद में इन्हें पक्का स्वरूप दिया गया।

स्थानीय विवरणों के मुताबिक, वर्ष 1920 में महाराजा भवानी सिंह के शासनकाल में प्रतिमाओं का जीर्णोद्धार कराया गया था। इसके बाद भी इनकी देखभाल की परंपरा जारी रही। दशहरे के आसपास प्रतिमाओं की साफ-सफाई, रंगाई-पुताई और सजावट की जाती है। इस तरह रावण दरबार केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि झालरापाटन की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का भी हिस्सा है।

दशहरे पर मंदोदरी को पहनाए जाते हैं नए वस्त्र

झालरापाटन के रावण दरबार में विजयदशमी के अवसर पर मंदोदरी की प्रतिमा को नए वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। इस परंपरा को उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा से जोड़कर देखा जाता है। आयोजन के दौरान इन वस्त्रों या चुनरी के छोटे-छोटे टुकड़े श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में दिए जाते हैं। स्थानीय स्तर पर इसे वस्त्र प्रसादी कहा जाता है। इस प्रसाद को पाने के लिए लोगों में खास उत्साह रहता है। श्रद्धालु कपड़े के छोटे से टुकड़े को अपने घर ले जाते हैं और संभालकर रखते हैं। कई लोग इसे अपने पूजा स्थल में रखते हैं, जबकि कुछ परिवार इसे सुख-शांति और खुशहाली का प्रतीक मानते हैं। यही परंपरा झालरापाटन के दशहरे को देश के दूसरे हिस्सों में होने वाले आयोजनों से अलग बनाती है।

मंदोदरी के कपड़ों का प्रसाद घर में रखना क्यों माना जाता है शुभ?

स्थानीय मान्यता है कि मंदोदरी के वस्त्रों का प्रसाद घर में रखने से परिवार में सुख-समृद्धि आती है और घर का माहौल शांतिपूर्ण बना रहता है। कुछ श्रद्धालु इसे वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और आपसी समझ से भी जोड़ते हैं। उनका विश्वास है कि इस प्रसाद को घर में रखने से दांपत्य जीवन में खुशहाली बनी रहती है।

रामायण की कथाओं में मंदोदरी को एक बुद्धिमान और विवेकशील स्त्री के रूप में याद किया जाता है। वह रावण की पत्नी थीं, लेकिन जब रावण ने माता सीता का हरण किया, तब मंदोदरी ने उसे सीता को वापस लौटाने और भगवान राम से युद्ध न करने की सलाह दी थी। उन्होंने अपने पति को समझाने की कोशिश की कि अहंकार और गलत फैसलों का परिणाम विनाशकारी हो सकता है।

मंदोदरी की यही भूमिका उन्हें रामायण की महत्वपूर्ण स्त्री पात्रों में स्थान देती है। हिंदू परंपरा में उनका नाम पंचकन्याओं में भी शामिल है। उन्हें निष्ठा, विवेक और सही रास्ता दिखाने वाली स्त्री के रूप में देखा जाता है।

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Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

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