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Dussehra 2026: दशहरे के दिन ही साईं बाबा ने क्यों त्यागा शरीर? तात्या से जुड़ा हैरान करने वाला रहस्य
Dussehra 2026: साईं बाबा ने 15 अक्टूबर 1918 को विजयादशमी पर महासमाधि क्यों ली? जानें तात्या पाटिल, बाबा की प्रिय ईंट और रामविजय पाठ से जुड़े रोचक प्रसंग।
Dussehra 2026: Why Did Sai Baba Take Mahasamadhi on Vijayadashami? The Tatya Story
Dussehra 2026: दशहरा यानी बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व। इस दिन देशभर में भगवान श्रीराम की विजय और रावण दहन की परंपरा निभाई जाती है। विजयादशमी का दिन शिरडी के साईं बाबा के जीवन में भी बेहद खास महत्व रखता है। यही वह दिन है, जब साईं बाबा ने अपने नश्वर शरीर का त्याग किया था। उनकी महासमाधि से जुड़ी कुछ ऐसी घटनाएं हैं, जिन्हें आज भी भक्त श्रद्धा और भावुकता के साथ याद करते हैं। साईं बाबा के जीवन से जुड़ी मान्यताओं में उनके प्रिय भक्त तात्या पाटिल के जीवन और बाबा की महासमाधि को जोड़ने वाला प्रसंग बेहद भावुक माना जाता है। वहीं, उनके पास रहने वाली एक पुरानी ईंट, अंतिम दिनों में रामविजय का पाठ और विजयादशमी के दिन शरीर त्यागने की घटना भी उनके जीवन के महत्वपूर्ण अध्याय हैं। इन प्रसंगों के बीच एक सवाल अक्सर उठता है कि क्या साईं बाबा भगवान श्रीराम के भक्त थे और दशहरे से उनका इतना गहरा संबंध क्यों था? आइए, जानते हैं साईं बाबा के जीवन से जुड़े इन रोचक प्रसंगों के बारे में।
तात्या की जान पर मंडराया खतरा, फिर बाबा के साथ क्या हुआ?
साईं बाबा और उनके भक्त तात्या पाटिल के रिश्ते की कहानी बेहद भावुक है। तात्या की मां बैजाबाई बाबा की बड़ी भक्त थीं। कहा जाता है कि जब बाबा शिरडी आए थे, तब बैजाबाई उनके लिए भोजन लेकर जाया करती थीं। धीरे-धीरे बाबा और तात्या के बीच भी गहरा अपनापन हो गया। तात्या उन्हें मामा कहकर बुलाते थे। साईं बाबा के जीवन से जुड़ी प्रचलित कथा के अनुसार, वर्ष 1918 में दशहरे से कुछ दिन पहले बाबा ने अपने भक्त रामचंद्र पाटिल को एक ऐसी बात बताई, जिसने उन्हें चिंता में डाल दिया। बाबा ने संकेत दिया कि विजयादशमी के दिन तात्या की मृत्यु हो सकती है। उस समय तात्या की तबीयत भी खराब थी। परिवार और भक्तों को डर सताने लगा कि कहीं उनकी आशंका सच न हो जाए। फिर आया 15 अक्टूबर 1918 का दिन। मान्यता के अनुसार, तात्या की हालत में सुधार होने लगा, लेकिन साईं बाबा की तबीयत बिगड़ गई। उसी दिन बाबा ने महासमाधि ले ली। इस घटना को उनके भक्त इस तरह देखते हैं कि बाबा ने अपने प्रिय तात्या को बचाने के लिए स्वयं शरीर त्याग दिया।
बाबा के सिरहाने रखी रहती थी एक ईंट, टूटने पर कही थी यह बात
साईं बाबा के जीवन की एक और दिलचस्प कहानी उस पुरानी ईंट से जुड़ी है, जिसे वे हमेशा अपने पास रखते थे। बताया जाता है कि बाबा इसी ईंट को सिरहाने रखकर आराम किया करते थे। उनके लिए यह कोई मामूली ईंट नहीं थी, बल्कि इससे उनकी पुरानी यादें जुड़ी हुई थीं।
प्रचलित मान्यता के अनुसार, इस ईंट का संबंध बाबा के गुरु वेंकुशा से था। कहा जाता है कि गुरु के आशीर्वाद और उनके प्रति अपने प्रेम की निशानी के रूप में बाबा ने इसे संभालकर रखा था। समय बीतता गया, लेकिन बाबा ने उस ईंट को अपने से दूर नहीं किया। फिर सितंबर 1918 में एक ऐसी घटना हुई, जिसने बाबा के भक्तों को हैरान कर दिया। बताया जाता है कि सफाई के दौरान माधव फासले के हाथ से ईंट छूटकर गिर गई और टूट गई। जब बाबा ने टूटी हुई ईंट देखी, तो वे दुखी हो गए। प्रचलित कथा के अनुसार, उन्होंने कहा कि यह ईंट उनकी जीवनसंगिनी थी। इसके टूटने के साथ ही मेरा भी अंत समय आ गया है। भक्तों का मानना है कि बाबा के लिए इस ईंट का टूटना किसी गहरे संकेत जैसा था। इसके कुछ ही समय बाद उन्होंने महासमाधि ले ली।
आखिरी दिनों में क्यों सुनते थे भगवान श्रीराम की कथा?
साईं बाबा के जीवन के अंतिम दिनों से जुड़ी एक और कहानी भगवान श्रीराम की कथा से संबंधित है। भक्तिपरक विवरणों के अनुसार, जब बाबा की महासमाधि का समय नजदीक आ रहा था, तब उन्होंने अपने भक्त श्री वझे से रामविजय ग्रंथ का पाठ करने को कहा।
रामविजय में भगवान श्रीराम के जीवन और उनकी विजय से जुड़े प्रसंगों का वर्णन मिलता है। कहा जाता है कि वझे ने लगातार कई दिनों तक बाबा को यह ग्रंथ सुनाया। बाबा के अंतिम समय में रामविजय का पाठ होने की घटना को उनके भक्त विशेष महत्व देते हैं। साईं बाबा के जीवन में हिंदू और इस्लामी परंपराओं से जुड़ी कई बातें मिलती हैं। वे मस्जिद में रहते थे, धूनी जलाते थे और लोगों को ईश्वर पर विश्वास रखने की सीख देते थे। उनके जीवन से जुड़ी यही विविधता उन्हें दूसरे संतों से अलग पहचान देती है।
दशहरे से साईं बाबा का क्या था खास रिश्ता?
साईं बाबा ने 15 अक्टूबर 1918 को विजयादशमी के दिन महासमाधि ली थी। उनके भक्त इस दिन को केवल उनके शरीर त्यागने की तारीख के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे उनके जीवन की आध्यात्मिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव मानते हैं। दशहरे से जुड़ी एक और परंपरा सीमोल्लंघन की है। इसका अर्थ है गांव की सीमा पार करना। शिरडी की परंपराओं में भी साईं बाबा के सीमोल्लंघन से जुड़े प्रसंग का उल्लेख मिलता है। इस वजह से विजयादशमी का दिन उनके जीवन में महासमाधि से पहले भी खास माना जाता रहा है।
क्या था साईं बाबा का संदेश, जो आज भी लोगों को जोड़ता है?
साईं बाबा के जन्म और शुरुआती जीवन के बारे में पुख्ता ऐतिहासिक जानकारी सीमित है। इसी कारण उनकी धार्मिक पहचान को लेकर अलग-अलग मत सामने आते रहे हैं। कुछ लोग उन्हें हिंदू संत मानते हैं, तो कुछ उनके जीवन में इस्लामी परंपराओं के प्रभाव को महत्वपूर्ण बताते हैं। लेकिन बाबा की शिक्षाओं का केंद्र किसी एक धर्म की पहचान नहीं, बल्कि इंसानियत थी। उनका प्रसिद्ध संदेश 'सबका मालिक एक' इसी विचार को सामने रखता है। वे लोगों को प्रेम करने, जरूरतमंदों की मदद करने और कठिन समय में धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा देते थे।
तात्या की कहानी हो, ईंट टूटने का प्रसंग या अंतिम दिनों में रामविजय का पाठ, इन सभी घटनाओं को भक्त अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुसार देखते हैं। इन कथाओं का ऐतिहासिक आधार हर मामले में समान रूप से प्रमाणित नहीं है, लेकिन साईं बाबा के प्रति लोगों की आस्था में इनका खास स्थान है।
शिरडी में आज भी श्रद्धा से मनाया जाता है यह दिन
साईं बाबा की महासमाधि के बाद शिरडी देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल हो गया। यहां बने समाधि मंदिर में हर साल लाखों श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। विजयादशमी के दिन बाबा की महासमाधि की स्मृति में विशेष पूजा और धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। दशहरा भगवान श्रीराम की विजय का पर्व है, लेकिन साईं भक्तों के लिए यह अपने प्रिय संत को याद करने का दिन भी है। तात्या को लेकर प्रचलित कथा, बाबा की प्रिय ईंट और रामविजय के पाठ के प्रसंग आज भी लोगों को उनके जीवन से जोड़ते हैं। यही कारण है कि दशहरे के दिन उनकी महासमाधि का प्रसंग एक सदी से अधिक समय बाद भी लोगों के मन में गहरी श्रद्धा जगाता है।


