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Eye Floaters Causes: आंखों के सामने क्यों तैरते हैं काले धब्बे? कब बन सकते हैं अंधेपन का संकेत
Eye Floaters Causes: आंखों के सामने काले धब्बे, धागे या मकड़ी के जाले क्यों तैरते हैं? जानिए आई फ्लोटर्स के कारण, रेटिना में फटाव के लक्षण, इलाज और अंधेपन का खतरा।
Why do Black Spots Float in Front of Eyes| When are Eye Floaters Dangerous | Newstrack Hindi News
Eye Floaters Causes: कभी नीले आसमान को देखते हुए, कभी सफेद दीवार पर नजर डालते समय और कभी किताब पढ़ते हुए आँखों के सामने छोटे-छोटे काले धब्बे, धागे या मकड़ी के जाले जैसी आकृतियाँ तैरती दिखाई देती हैं। आँखें घुमाने पर ये भी इधर-उधर खिसकती नजर आती हैं। इन्हें सीधे देखने की कोशिश करें, तो अक्सर ये सामने से हट जाती हैं। कुछ देर बाद फिर दिखाई देने लगती हैं।
चिकित्सा विज्ञान में इन धब्बों को 'आई फ्लोटर्स' या 'विट्रियस फ्लोटर्स' कहा जाता है। ज्यादातर मामलों में ये उम्र बढ़ने के साथ आँखों के भीतर होने वाले सामान्य बदलावों के कारण दिखाई देते हैं। लेकिन कभी-कभी यही धब्बे रेटिना में छेद या फटाव, आँख के भीतर खून बहने अथवा रेटिना के अपनी जगह से अलग होने जैसी गंभीर समस्याओं का शुरुआती संकेत भी हो सकते हैं।
अमेरिकी नेशनल आई इंस्टीट्यूट के अनुसार, ज्यादातर फ्लोटर्स के लिए किसी इलाज की जरूरत नहीं होती। लेकिन अगर अचानक बहुत सारे नए धब्बे दिखाई देने लगें, आँखों के सामने बिजली चमकने जैसी रोशनी दिखे या नजर के किसी हिस्से पर काला पर्दा आने लगे, तो तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से जाँच करानी चाहिए।
कुछ गंभीर मामलों में लेजर या सर्जरी की मदद से फ्लोटर्स कम किए जा सकते हैं। लेकिन इन उपचारों के अपने जोखिम हैं। ऐसे में सवाल है कि ये धब्बे आँखों के भीतर बनते कैसे हैं, हमें दिखाई क्यों देते हैं और कैसे पहचानें कि कौन-से फ्लोटर्स सामान्य हैं और कौन-से खतरे का संकेत?
आँखों के सामने तैरने वाले धब्बे आखिर होते क्या हैं?
आई फ्लोटर्स छोटी-छोटी आकृतियाँ होती हैं, जो आँखों के सामने तैरती दिखाई देती हैं। ये काले या भूरे बिंदुओं, घुमावदार रेखाओं, धागों, पारदर्शी छल्लों या मकड़ी के जाले जैसी दिख सकती हैं। कुछ लोगों को ये कभी-कभार दिखाई देती हैं, जबकि कुछ को रोज नजर आती हैं। इनकी खास बात यह है कि ये वास्तव में आँखों के सामने हवा में मौजूद नहीं होतीं। न ये दीवार पर होती हैं, न आसमान में और न ही आमतौर पर आँख की बाहरी सतह पर। इनका संबंध आँख के अंदर मौजूद एक पारदर्शी पदार्थ से होता है।
आँख के भीतर एक पारदर्शी, जैल जैसा पदार्थ भरा होता है। इसे 'विट्रियस ह्यूमर' या काचाभ द्रव कहते हैं। यह आँख के बड़े हिस्से में मौजूद रहता है और उसकी बनावट बनाए रखने में मदद करता है। इसमें पानी के साथ कोलेजन नामक प्रोटीन के बेहद महीन रेशे और कुछ दूसरे पदार्थ होते हैं।
कम उम्र में यह जैल आमतौर पर साफ और एकसार रहता है। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ इसके भीतर मौजूद कुछ रेशे आपस में इकट्ठे होने लगते हैं। कहीं छोटे गुच्छे बन जाते हैं, तो कहीं जैल की बनावट बदल जाती है।
जब रोशनी आँख के भीतर प्रवेश करती है, तो ये छोटे गुच्छे उसके रास्ते में आकर रेटिना पर छाया डालते हैं। हमारा मस्तिष्क इसी छाया को काले धब्बे, धागे या तैरती हुई आकृति के रूप में महसूस करता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी के अनुसार, फ्लोटर्स दरअसल आँख के भीतर मौजूद जैल या कोशिकाओं के छोटे समूहों की रेटिना पर पड़ने वाली छायाएँ हैं।
आँख के भीतर मौजूद चीज हमें दिखाई कैसे देती है?
जब हम किसी चीज को देखते हैं, तो उससे परावर्तित रोशनी सबसे पहले आँख की पारदर्शी बाहरी परत यानी कॉर्निया से गुजरती है। फिर यह लेंस से होकर आँख के भीतर पहुँचती है। इसके बाद रोशनी विट्रियस से गुजरकर रेटिना तक जाती है।
रेटिना आँख के पिछले हिस्से में मौजूद प्रकाश को महसूस करने वाला ऊतक है। इसकी कोशिकाएँ रोशनी को विद्युत संकेतों में बदलती हैं। ये संकेत दृष्टि तंत्रिका के जरिए मस्तिष्क तक पहुँचते हैं। मस्तिष्क इन्हीं संकेतों की मदद से हमें तस्वीर दिखाता है।
अब सोचिए कि रोशनी के रास्ते में विट्रियस के भीतर कोई छोटा-सा कोलेजन का गुच्छा मौजूद है। वह कुछ रोशनी रोक सकता है या उसका रास्ता बदल सकता है। इससे रेटिना के किसी हिस्से पर बाकी जगहों की तुलना में कम रोशनी पहुँचती है।
मस्तिष्क इस बदलाव को आँखों के सामने मौजूद धब्बे की तरह महसूस करता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी वस्तु की छाया दिखाई देती है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां छाया बनाने वाला पदार्थ आँख के भीतर मौजूद होता है। इसीलिए सामान्य आई ड्रॉप डालने या आँख धोने से ये धब्बे बाहर नहीं निकलते। वे आँख की बाहरी सतह पर नहीं, बल्कि भीतर मौजूद विट्रियस में होते हैं।
आँखें घुमाते ही धब्बे भी क्यों भागने लगते हैं?
फ्लोटर्स की सबसे खास पहचान यह है कि वे तैरते हुए दिखाई देते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी धब्बे को सीधे देखने की कोशिश करता है, तो वह अक्सर अपनी जगह से खिसक जाता है। इसका कारण यह है कि फ्लोटर्स आँख के भीतर मौजूद जैल में होते हैं। आँख घुमाने पर जैल और उसमें मौजूद छोटे कण भी हिल सकते हैं। आँख रुक जाने के बाद भी ये कण कुछ समय तक धीरे-धीरे अपनी जगह बदलते रहते हैं।
इसी वजह से किसी धब्बे पर नजर टिकाने की कोशिश करने पर वह आँखों के सामने से हटता हुआ महसूस होता है। कुछ देर बाद उसकी गति धीमी होती है और वह फिर किसी दूसरी जगह दिखाई देने लगता है। यह फ्लोटर्स का सामान्य व्यवहार है। हालांकि, अगर उनके साथ अचानक रोशनी चमकने लगे या धब्बों की संख्या तेजी से बढ़ जाए, तो जाँच कराना जरूरी है।
सफेद दीवार और नीले आसमान पर फ्लोटर्स ज्यादा क्यों दिखते हैं?
बहुत से लोगों को सामान्य परिस्थितियों में फ्लोटर्स दिखाई ही नहीं देते। लेकिन जैसे ही वे सफेद दीवार, सफेद कागज, कंप्यूटर की हल्की स्क्रीन या साफ नीले आसमान को देखते हैं, ये धब्बे साफ नजर आने लगते हैं।
इसका कारण रोशनी और रंगों के बीच का अंतर है।
जब हम किसी एकसार और उजली सतह को देखते हैं, तो आँख के भीतर रेटिना पर लगभग एक जैसी रोशनी पड़ती है। ऐसे में विट्रियस के छोटे गुच्छों की छाया आसपास के उजले हिस्से से अलग दिखाई देने लगती है।
इसके उलट, जब हम किसी रंगीन या बहुत सारी चीजों वाले दृश्य को देखते हैं, तो वहां पहले से ही रोशनी और रंगों के कई तरह के अंतर होते हैं। ऐसे में फ्लोटर्स पर ध्यान कम जाता है।
इसलिए हो सकता है कि किसी व्यक्ति को नीला आसमान देखते समय कई धब्बे दिखाई दें, लेकिन शाम को सामान्य काम करते समय उनका पता भी न चले। इसका मतलब यह नहीं कि आसमान देखने से फ्लोटर्स पैदा होते हैं। वे पहले से आँख के भीतर मौजूद हो सकते हैं और कुछ खास रोशनी में ज्यादा साफ दिखाई देते हैं।
उम्र बढ़ने के साथ फ्लोटर्स ज्यादा क्यों दिखाई देते हैं?
फ्लोटर्स की सबसे आम वजह उम्र बढ़ने के साथ विट्रियस में होने वाले बदलाव हैं। समय के साथ इस जैल की बनावट बदलने लगती है। इसके कुछ हिस्से अधिक तरल हो सकते हैं और महीन रेशे आपस में इकट्ठे होकर छोटे गुच्छे बना सकते हैं।
उम्र बढ़ने के साथ विट्रियस और रेटिना के बीच का जुड़ाव भी बदल सकता है। कुछ लोगों में विट्रियस आँख के पिछले हिस्से में मौजूद रेटिना से धीरे-धीरे अलग होने लगता है। इसे 'पोस्टेरियर विट्रियस डिटैचमेंट' यानी पीवीडी कहते हैं।
इस नाम से घबराने की जरूरत नहीं है। पीवीडी और रेटिना का अपनी जगह से अलग होना दो अलग स्थितियाँ हैं। सामान्य पीवीडी उम्र के साथ होने वाला बदलाव है और ज्यादातर लोगों में इससे कोई गंभीर नुकसान नहीं होता। यह प्रक्रिया 50 साल की उम्र के बाद ज्यादा आम हो जाती है। लेकिन कभी-कभी विट्रियस के अलग होने के दौरान रेटिना पर खिंचाव पड़ सकता है। इस खिंचाव से रेटिना में छेद या फटाव भी हो सकता है। इसीलिए नए फ्लोटर्स दिखाई देने पर उन्हें केवल उम्र का असर मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
क्या कम उम्र के लोगों को भी फ्लोटर्स हो सकते हैं?
हाँ। यह जरूरी नहीं कि फ्लोटर्स सिर्फ बुजुर्गों को ही दिखाई दें। युवाओं की आँखों में भी ये धब्बे हो सकते हैं। खासकर जिन लोगों को मायोपिया यानी निकट दृष्टि दोष है, उनमें ये कम उम्र में भी दिखाई दे सकते हैं।
मायोपिया में पास की चीजें साफ और दूर की चीजें धुँधली दिखाई देती हैं। ऐसे लोगों को आमतौर पर माइनस नंबर का चश्मा लगाना पड़ता है।
जिन लोगों को मायोपिया ज्यादा होता है, उनकी आँखों की बनावट और विट्रियस में कुछ बदलाव अपेक्षाकृत जल्दी हो सकते हैं। इस वजह से उनमें फ्लोटर्स भी जल्दी दिखाई दे सकते हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि चश्मा पहनने वाले हर व्यक्ति को फ्लोटर्स होंगे या हर फ्लोटर किसी गंभीर बीमारी का संकेत है।
एक और जरूरी बात यह है कि अधिक मायोपिया वाले लोगों में रेटिना से जुड़ी कुछ समस्याओं का जोखिम भी बढ़ सकता है। इसलिए अगर ऐसे व्यक्ति को अचानक नए फ्लोटर्स दिखाई दें, तो रेटिना की जाँच कराना खास तौर पर जरूरी है।
क्या फ्लोटर्स दिखाई देने का मतलब है कि रेटिना खराब हो रही है?
ज्यादातर मामलों में फ्लोटर्स का मतलब यह नहीं होता कि रेटिना खराब हो रही है। कई लोगों की आँखों में लंबे समय से कुछ धब्बे मौजूद रहते हैं, लेकिन उनकी नजर सामान्य रहती है। यहां सबसे जरूरी बात है कि धब्बे कब से दिखाई दे रहे हैं और उनमें कोई बदलाव हुआ है या नहीं। मसलन, किसी व्यक्ति को कई साल से एक-दो छोटे धब्बे दिखाई दे रहे हैं और उनकी संख्या या आकार में कोई बदलाव नहीं हुआ है, तो उसकी स्थिति उस व्यक्ति से अलग है जिसे अचानक काले बिंदुओं की बारिश जैसी दिखाई देने लगी हो।
अगर एकाएक बहुत सारे नए धागे या काले धब्बे दिखाई देने लगें और साथ में बिजली चमकने जैसी रोशनी भी नजर आए, तो यह रेटिना की समस्या का संकेत हो सकता है। बिना आँखों की जाँच किए यह तय करना संभव नहीं है कि कोई नया फ्लोटर सामान्य उम्र संबंधी बदलाव के कारण है या रेटिना पर खिंचाव की वजह से।
रेटिना में फटाव क्या होता है और इसका फ्लोटर्स से क्या संबंध है?
रेटिना आँख के पिछले हिस्से में मौजूद एक बेहद जरूरी ऊतक है। यह रोशनी को महसूस करके मस्तिष्क तक संकेत पहुँचाने में मदद करता है। अगर इसमें छेद या फटाव हो जाए, तो आँखों की रोशनी को खतरा हो सकता है।
विट्रियस कुछ जगहों पर रेटिना से जुड़ा रहता है। उम्र बढ़ने पर जब यह रेटिना से अलग होने लगता है, तो कभी-कभी रेटिना को खींच सकता है। अगर खिंचाव ज्यादा हो या रेटिना का कोई हिस्सा कमजोर हो, तो उसमें फटाव हो सकता है।
ऐसी स्थिति में अचानक नए फ्लोटर्स दिखाई दे सकते हैं। अगर इस दौरान आँख की कोई छोटी रक्तवाहिका भी फट जाए, तो आँख के भीतर खून बह सकता है। खून की कोशिकाएँ रेटिना पर छाया डालती हैं और व्यक्ति को कई नए काले धब्बे दिखाई देने लगते हैं।
समस्या तब और गंभीर हो सकती है, जब आँख के भीतर मौजूद तरल रेटिना के फटाव से उसके पीछे पहुँचने लगे। इससे रेटिना अपनी सामान्य जगह से अलग होने लगती है। इस स्थिति को 'रेटिनल डिटैचमेंट' कहते हैं।
रेटिनल डिटैचमेंट एक गंभीर आपातस्थिति है। समय पर इलाज न मिले, तो स्थायी रूप से नजर जा सकती है। इसलिए ऐसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से जाँच कराना जरूरी है।
आँखों के सामने बिजली चमकने जैसी रोशनी क्यों दिखाई देती है?
कभी-कभी फ्लोटर्स के साथ ऐसा लगता है जैसे आँख के किनारे बिजली चमक रही हो। जबकि कमरे में वास्तव में कोई रोशनी नहीं चमकती। व्यक्ति को कुछ पल के लिए प्रकाश जैसा अनुभव होता है। चिकित्सा विज्ञान में इसे 'फोटोप्सिया' कहते हैं। इसका एक कारण विट्रियस का रेटिना पर खिंचाव डालना हो सकता है। रेटिना आमतौर पर रोशनी पड़ने पर मस्तिष्क को संकेत भेजती है। लेकिन कभी-कभी उस पर शारीरिक दबाव या खिंचाव पड़ने से भी चमक जैसा अनुभव हो सकता है।
इसी वजह से अचानक नए फ्लोटर्स के साथ रोशनी चमकना रेटिना में खिंचाव या फटाव का संकेत हो सकता है। हालांकि, हर बार ऐसा होने का मतलब रेटिनल डिटैचमेंट नहीं होता।
माइग्रेन में भी कुछ लोगों को चमकती रेखाएँ, टेढ़ी-मेढ़ी आकृतियाँ या लहराती रोशनी दिखाई दे सकती है। इसे दृश्य ऑरा कहते हैं। इसका अनुभव सामान्य फ्लोटर्स से अलग हो सकता है। लेकिन अगर पहली बार ऐसा हो रहा है, नजर अचानक बदल गई है या एक आँख में नए धब्बों के साथ चमक दिखाई दे रही है, तो इसे खुद से माइग्रेन मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
किन लक्षणों में तुरंत अस्पताल जाना चाहिए?
फ्लोटर्स से जुड़ी सबसे जरूरी बात यह है कि कुछ लक्षणों में जाँच कराने में बिल्कुल देर नहीं करनी चाहिए। अगर अचानक बहुत सारे नए काले धब्बे दिखाई देने लगें, आँखों के सामने बिजली चमकने जैसी रोशनी आए, नजर के किसी हिस्से में काली छाया या पर्दा दिखाई देने लगे अथवा अचानक नजर धुँधली हो जाए, तो उसी दिन नेत्र विशेषज्ञ या आँखों की आपातकालीन सेवा में जाँच कराएँ।
आँखों के सामने काला पर्दा आने का अनुभव खास तौर पर गंभीर हो सकता है। कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि नजर के किनारे से कोई छाया धीरे-धीरे बीच की ओर बढ़ रही है। यह रेटिना के अपनी जगह से अलग होने का संकेत हो सकता है। अगर आँख में चोट लगने या सर्जरी के बाद अचानक फ्लोटर्स दिखाई देने लगें, तो भी तुरंत जाँच करानी चाहिए। यह बात याद रखें कि रेटिना में फटाव या उसके अलग होने पर हमेशा दर्द नहीं होता। इसलिए आँख में दर्द न होने का मतलब यह नहीं कि कोई खतरा नहीं है।
क्या मधुमेह से भी आँखों के सामने काले धब्बे दिखाई देते हैं?
मधुमेह के कुछ मरीजों में फ्लोटर्स की वजह उम्र से जुड़ा सामान्य बदलाव नहीं, बल्कि रेटिना की रक्तवाहिकाओं में होने वाली परेशानी हो सकती है। लंबे समय तक खून में शुगर का स्तर ज्यादा रहने से रेटिना की बारीक रक्तवाहिकाएँ खराब हो सकती हैं। इसे 'डायबिटिक रेटिनोपैथी' कहते हैं। इस बीमारी के गंभीर रूप में आँख के भीतर नई और कमजोर रक्तवाहिकाएँ बन सकती हैं। इनसे खून बहने का खतरा रहता है। अगर खून विट्रियस में पहुँच जाए, तो व्यक्ति को अचानक काले धब्बे, धुँधलापन या कई गहरी आकृतियाँ दिखाई दे सकती हैं।
ऐसी स्थिति में यह सोचकर इंतजार नहीं करना चाहिए कि धब्बे अपने आप कम हो जाएँगे। रेटिना की जाँच और जरूरत के अनुसार इलाज जरूरी हो सकता है।
मधुमेह के अलावा यूवाइटिस यानी आँख के भीतर सूजन, संक्रमण, चोट और कुछ दूसरी बीमारियाँ भी फ्लोटर्स की वजह बन सकती हैं।
क्या मोबाइल और कंप्यूटर देखने से फ्लोटर्स बनते हैं?
आजकल बहुत से लोगों को लगता है कि मोबाइल या कंप्यूटर ज्यादा देखने से आँखों के भीतर काले धब्बे बनने लगते हैं। लेकिन सामान्य आई फ्लोटर्स सीधे स्क्रीन देखने से पैदा होते हैं, इसका पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आँखों में थकान, सूखापन, सिरदर्द और कुछ समय के लिए धुँधलापन हो सकता है। लेकिन ये समस्याएँ विट्रियस के भीतर कोलेजन के रेशे इकट्ठे होने की प्रक्रिया से अलग हैं।
हाँ, चमकदार सफेद स्क्रीन पर पहले से मौजूद फ्लोटर्स ज्यादा साफ दिखाई दे सकते हैं। जो लोग घंटों सफेद पृष्ठभूमि पर पढ़ने या लिखने का काम करते हैं, उनका ध्यान भी इन धब्बों पर ज्यादा जा सकता है। इससे उन्हें लग सकता है कि कंप्यूटर इस्तेमाल करने के कारण फ्लोटर्स बढ़ गए हैं, जबकि असल में उनकी दृश्यता और उन पर ध्यान बढ़ा हो सकता है।
क्या आँखों में मौजूद फ्लोटर्स अपने आप खत्म हो जाते हैं?
ज्यादातर सामान्य फ्लोटर्स समय के साथ कम परेशान करते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे हमेशा पूरी तरह गायब हो जाते हैं। कभी-कभी विट्रियस के भीतर मौजूद गुच्छों की स्थिति बदल जाती है और उनकी छाया नजर के बीच वाले हिस्से से हट जाती है। दूसरी ओर, मस्तिष्क भी धीरे-धीरे इन धब्बों का आदी हो सकता है। इससे व्यक्ति को वे पहले की तुलना में कम दिखाई देने लगते हैं।
इसीलिए कुछ लोगों को शुरुआत में फ्लोटर्स बहुत परेशान करते हैं, लेकिन कुछ महीनों बाद उनका ध्यान उन पर कम जाने लगता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी के अनुसार, उम्र से जुड़े सामान्य फ्लोटर्स समय के साथ कम स्पष्ट दिखाई दे सकते हैं। इसलिए ज्यादातर लोगों को इनके लिए किसी इलाज की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन अगर फ्लोटर्स इतने ज्यादा हों कि पढ़ने, गाड़ी चलाने या रोजमर्रा के काम करने में परेशानी होने लगे, तो नेत्र विशेषज्ञ से उपचार के विकल्पों पर बात की जा सकती है।
क्या कोई आई ड्रॉप फ्लोटर्स को खत्म कर सकती है?
सामान्य उम्र संबंधी फ्लोटर्स को भरोसेमंद तरीके से खत्म करने वाली कोई प्रमाणित आई ड्रॉप या सामान्य दवा उपलब्ध नहीं है। इसकी वजह यह है कि फ्लोटर्स आँख की बाहरी सतह पर नहीं, बल्कि भीतर मौजूद विट्रियस में होते हैं। सामान्य आई ड्रॉप आँखों का सूखापन कम कर सकती हैं, लेकिन वे विट्रियस में मौजूद कोलेजन के गुच्छों को खत्म नहीं करतीं।
बाजार में कुछ उत्पाद आँखों के भीतर तैरते धब्बे हटाने या विट्रियस को साफ करने के दावे करते हैं। लेकिन किसी भी उत्पाद को प्रभावी मानने के लिए विश्वसनीय वैज्ञानिक परीक्षणों में उसका फायदा साबित होना जरूरी है। विटामिन और पोषक तत्व आँखों की सामान्य सेहत के लिए जरूरी हैं। लेकिन अगर किसी व्यक्ति को पर्याप्त पोषण मिल रहा है, तो सिर्फ अतिरिक्त विटामिन लेने से उसके फ्लोटर्स खत्म हो जाएँगे, इसका पुख्ता प्रमाण नहीं है। अगर फ्लोटर्स की वजह आँख के भीतर सूजन, संक्रमण या कोई दूसरी बीमारी है, तो उस मूल समस्या का इलाज करना जरूरी हो सकता है। यह सामान्य उम्र संबंधी फ्लोटर्स के इलाज से अलग बात है।
क्या लेजर से फ्लोटर्स हटाए जा सकते हैं?
कुछ खास मामलों में फ्लोटर्स कम करने के लिए लेजर का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया को 'YAG लेजर विट्रियोलाइसिस' कहते हैं। इसमें डॉक्टर एक खास लेजर किरण को आँख के भीतर मौजूद फ्लोटर पर केंद्रित करते हैं। इसका उद्देश्य उस गुच्छे को छोटे हिस्सों में तोड़ना या उसे कम दिखाई देने लायक बनाना होता है।
लेकिन यह इलाज हर तरह के फ्लोटर्स के लिए सही नहीं है। फ्लोटर का आकार, उसकी जगह और आँख के लेंस तथा रेटिना से उसकी दूरी बहुत मायने रखती है।
अगर लेजर की ऊर्जा गलत जगह पहुँच जाए, तो आँख के संवेदनशील हिस्सों को नुकसान हो सकता है। इसके अलावा, इस इलाज से कितनी राहत मिलेगी, इसे लेकर वैज्ञानिक अध्ययनों के नतीजे भी एक जैसे नहीं हैं। कुछ मरीजों को फायदा होता है, जबकि कुछ को बहुत कम राहत मिलती है। इसलिए YAG लेजर को सभी फ्लोटर्स का पक्का और जोखिममुक्त इलाज नहीं माना जा सकता।
एक बात और समझना जरूरी है। रेटिना में फटाव होने पर उसे सुरक्षित करने के लिए इस्तेमाल होने वाला लेजर और फ्लोटर्स कम करने के लिए किया जाने वाला YAG लेजर अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं। दोनों का उद्देश्य एक नहीं है।
क्या सर्जरी से फ्लोटर्स पूरी तरह हटाए जा सकते हैं?
कुछ गंभीर मामलों में डॉक्टर 'विट्रेक्टॉमी' नाम की सर्जरी कर सकते हैं। इसमें आँख के भीतर मौजूद विट्रियस का ज्यादातर हिस्सा निकाल दिया जाता है। इसके साथ फ्लोटर्स पैदा करने वाले कई छोटे गुच्छे भी हट सकते हैं।
जिन मरीजों को बहुत ज्यादा फ्लोटर्स की वजह से रोजमर्रा के काम करने में परेशानी होती है, उनके लिए यह सर्जरी राहत देने का एक तरीका हो सकती है।
लेकिन विट्रेक्टॉमी कोई मामूली प्रक्रिया नहीं है। इसमें आँख के भीतर सर्जरी की जाती है और इसके अपने जोखिम होते हैं। इनमें संक्रमण, खून बहना, रेटिना में फटाव या उसका अलग होना और मोतियाबिंद बनने या तेजी से बढ़ने का खतरा शामिल है।
यह भी जरूरी नहीं कि सर्जरी के बाद सभी फ्लोटर्स पूरी तरह खत्म हो जाएँ। इसीलिए जिन लोगों को केवल एक-दो छोटे धब्बे दिखाई देते हैं और उनकी नजर पर कोई खास असर नहीं पड़ता, उन्हें आमतौर पर सर्जरी की सलाह नहीं दी जाती। लेकिन अगर फ्लोटर्स इतने ज्यादा हैं कि पढ़ने, काम करने या दूसरी जरूरी गतिविधियों में परेशानी हो रही है, तो रेटिना विशेषज्ञ से इसके फायदे और जोखिम समझकर फैसला लिया जा सकता है।
नेत्र विशेषज्ञ फ्लोटर्स की जाँच कैसे करते हैं?
फ्लोटर्स की जाँच का सबसे जरूरी उद्देश्य यह पता लगाना है कि उनके पीछे रेटिना की कोई गंभीर समस्या तो नहीं है। इसके लिए डॉक्टर आमतौर पर आँख में ऐसी ड्रॉप डालते हैं, जिससे पुतली कुछ समय के लिए फैल जाती है। इसे 'डायलेटेड आई एग्जामिनेशन' कहते हैं।
पुतली फैलने के बाद डॉक्टर विशेष उपकरणों की मदद से आँख के पिछले हिस्से में मौजूद रेटिना और विट्रियस को अच्छी तरह देख सकते हैं। इससे रेटिना में फटाव, खून बहने, सूजन या उसके अलग होने के संकेतों का पता लगाया जा सकता है। कुछ मरीजों में ओसीटी यानी ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी या आँख के अल्ट्रासाउंड की भी जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, हर मरीज को ये सभी जाँचें करानी जरूरी नहीं होतीं।
अगर पहली जाँच में रेटिना सामान्य मिलती है, लेकिन हाल ही में पीवीडी हुआ है, तो डॉक्टर कुछ समय बाद दोबारा जाँच कराने की सलाह दे सकते हैं। इसकी वजह यह है कि कभी-कभी शुरुआती जाँच के बाद भी रेटिना से जुड़ी परेशानी सामने आ सकती है। अगर जाँच के बाद भी अचानक धब्बों की संख्या बढ़ जाए या रोशनी चमकने जैसे नए लक्षण दिखाई दें, तो अगली तय तारीख का इंतजार नहीं करना चाहिए।
क्या आँखों के व्यायाम से फ्लोटर्स हटाए जा सकते हैं?
सोशल मीडिया पर कई बार दावा किया जाता है कि आँखों को खास दिशाओं में घुमाने, पलकों को दबाने या कुछ विशेष व्यायाम करने से फ्लोटर्स खत्म हो जाते हैं। लेकिन सामान्य फ्लोटर्स को हमेशा के लिए हटाने में ऐसे व्यायामों के असर का कोई भरोसेमंद वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। आँखें घुमाने से फ्लोटर्स की स्थिति कुछ समय के लिए बदल सकती है। इससे धब्बा नजर के बीच से हट सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आँख के भीतर मौजूद पदार्थ खत्म हो गया है।
आँखों पर जोर से दबाव डालना भी ठीक नहीं है। इससे कोई साबित चिकित्सकीय लाभ नहीं मिलता।
अगर डॉक्टर की जाँच में फ्लोटर्स सामान्य पाए गए हैं और कोई गंभीर समस्या नहीं है, तो व्यक्ति रोजमर्रा के काम जारी रख सकता है। बार-बार धब्बों को ढूँढ़ने के बजाय उन पर ध्यान कम देना कुछ लोगों के लिए मददगार हो सकता है। हालांकि, अगर धब्बों की वजह से सचमुच देखने में परेशानी हो रही है, तो इसे सिर्फ ध्यान या मानसिकता की समस्या कहकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
क्या फ्लोटर्स का मतलब भविष्य में अंधापन हो सकता है?
ज्यादातर सामान्य फ्लोटर्स से अंधापन नहीं होता। वे परेशान जरूर कर सकते हैं, लेकिन बहुत से लोगों की नजर लंबे समय तक सामान्य बनी रहती है। खतरा तब होता है, जब फ्लोटर्स किसी गंभीर बीमारी का संकेत हों। खासकर रेटिना में फटाव या उसके अपनी जगह से अलग होने की स्थिति में जल्दी इलाज जरूरी है।
अगर रेटिना अलग होने पर उपचार में देरी हो जाए, तो आँख का ज्यादा हिस्सा प्रभावित हो सकता है और हमेशा के लिए नजर जाने का खतरा बढ़ सकता है। लेकिन समय पर बीमारी की पहचान और इलाज से कई मामलों में दृष्टि बचाई जा सकती है। इसलिए फ्लोटर्स देखकर घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन उनके अचानक होने वाले बदलावों को नजरअंदाज भी नहीं करना चाहिए।
सबसे जरूरी बात यह है कि अगर अचानक बहुत सारे नए फ्लोटर्स दिखाई देने लगें, बिजली चमकने जैसी रोशनी नजर आए, दृष्टि धुँधली हो या आँखों के सामने काला पर्दा आने लगे, तो उसी दिन नेत्र विशेषज्ञ से जाँच कराएँ। ये रेटिना में फटाव या उसके अलग होने के संकेत हो सकते हैं। समय पर इलाज मिलने से नजर बचाई जा सकती है।
आँखों के सामने तैरते ज्यादातर धब्बे सामान्य शारीरिक बदलाव का हिस्सा होते हैं। लेकिन उनमें अचानक होने वाला बदलाव आँखों की सेहत के बारे में गंभीर चेतावनी भी हो सकता है। इसलिए न तो हर फ्लोटर से डरें और न ही किसी चेतावनी संकेत को अनदेखा करें।


