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खाना खाने के बाद नींद क्यों आती है? क्या सच में खून पेट की तरफ चला जाता है? क्या है शरीर का सिस्टम?
Sleepy After Eating: खाना खाने के बाद नींद आने की वजह सिर्फ पेट में खून जाना नहीं है। जानिए ग्लूकोज, इंसुलिन, ऑरेक्सिन, जैविक घड़ी और पाचन तंत्र कैसे भोजन के बाद उनींदापन पैदा करते हैं।
Sleepy After Eating (Image Credit-Social Media)
Sleepy After Eating: खाना खाने के बाद नींद आना बहुत सामान्य अनुभव है, खासकर दोपहर के भोजन के बाद। लंबे समय तक इसकी लोकप्रिय व्याख्या यह रही कि खाना पचाने के लिए शरीर का बहुत सा खून पेट और आँतों की तरफ चला जाता है, इसलिए दिमाग में खून कम पहुँचता है और नींद आने लगती है। यह सुनने में तर्कसंगत लगता है, लेकिन आधुनिक शरीर विज्ञान इसकी वजह कुछ और बताता है। जानते हैं इसके बारे में।
असल कहानी पेट से ज्यादा दिमाग और हार्मोन की है
भोजन के बाद नींद की असल कहानी पेट से ज्यादा मस्तिष्क और हार्मोन की है। जब हम खाना खाते हैं, खासकर कार्बोहाइड्रेट वाला भोजन, तो खून में ग्लूकोज बढ़ता है और पैंक्रियास यानी अग्न्याशय इंसुलिन छोड़ता है। यह इंसुलिन ग्लूकोज को सेल्स तक पहुँचाने में मदद करता है, साथ ही शरीर को यह संकेत भी देता है कि एनर्जी मिल गयी है। भोजन के बाद कई दूसरे हार्मोन और आंतों से निकलने वाले संकेत भी बदलते हैं। मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस में कुछ विशेष तंत्रिका कोशिकाएँ हमारी जागरूकता और सतर्कता बनाए रखने में मदद करती हैं। इनमें ऑरेक्सिन नामक रासायनिक संदेशवाहक बनाने वाली कोशिकाएँ महत्वपूर्ण हैं। उपवास और कम ऊर्जा की स्थिति में ये कोशिकाएँ अधिक सक्रिय होकर हमें जागृत और भोजन खोजने के लिए प्रेरित करती हैं, जबकि भोजन के बाद ग्लूकोज और दूसरे चयापचयी संकेत इनके काम को कुछ समय के लिए दबा सकते हैं। यही कारण है कि शरीर को भोजन मिलने के बाद जागरण से जुड़ा एक महत्वपूर्ण तंत्र थोड़ा शांत पड़ सकता है।
पेट भरने के बाद शरीर की पूरी अवस्था बदल जाती है
खाली पेट रहने पर शरीर को भोजन खोजना है, इसलिए उसे सतर्क, सक्रिय और गतिशील रहना लाभकारी है। भोजन मिल जाने के बाद लगातार उसी स्तर की खोज और सतर्कता की जरूरत कम हो जाती है। शरीर अब भोजन पचाने, उसे संग्रहित करने और पोषक पदार्थों को विभिन्न टिश्यू तक पहुँचाने की अवस्था में आता है। इस परिवर्तन में स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (autonomic nervous system) की वह शाखा भी अधिक सक्रिय होती है जिसे सामान्यतः विश्राम और पाचन से जोड़ा जाता है। इसलिए भोजन के बाद शरीर की पूरी अवस्था थोड़ी शांत हो सकती है, हृदय और पाचन की गतिविधियों में बदलाव आता है और मानसिक रूप से भी विश्राम का अनुभव बढ़ सकता है। लेकिन इसे केवल ‘पैरासिम्पेथेटिक तंत्र चालू हुआ इसलिए नींद आई’ कहना भी अधूरा होगा, क्योंकि भोजन के बाद की उनींदापन कई प्रणालियों का संयुक्त परिणाम है।
जितना भारी खाना, उतनी ज्यादा सुस्ती
खाने की मात्रा भी बहुत फर्क डालती है। हल्का भोजन करने के बाद कई लोगों को विशेष उनींदापन नहीं होता, जबकि बहुत भारी भोजन के बाद आंखें बोझिल होने लगती हैं। इसका कारण यह है कि बड़ा भोजन शरीर में अधिक तेज मेटाबोलिज्म प्रतिक्रिया पैदा करता है। ग्लूकोज, इंसुलिन, अमीनो अम्ल और आंतों से निकलने वाले संकेत अधिक बदलते हैं। इसके साथ पेट फैलने और तृप्ति के संकेत भी मस्तिष्क तक पहुँचते हैं। क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार भोजन के बाद उनींदापन आम तौर पर एक से दो घंटे में अधिक महसूस हो सकता है और बड़े तथा अधिक ऊर्जा वाले भोजन के बाद यह प्रभाव मजबूत हो सकता है।
यही कारण है कि बहुत भारी चावल, मिठाई, रोटी, तली हुई चीजों और बड़े भोजन के बाद नींद ज्यादा महसूस हो सकती है। लेकिन यहाँ एक और लोकप्रिय धारणा सावधानी से समझनी चाहिए, कि कार्बोहाइड्रेट खाने से सीधे ‘ट्रिप्टोफैन दिमाग में जाता है, फिर सेरोटोनिन बनता है, फिर मेलाटोनिन बनता है और नींद आ जाती है।’ इस तंत्र में कुछ जैविक आधार जरूर है, लेकिन आम भोजन के बाद आने वाली सामान्य उनींदापन को केवल इसी एक श्रृंखला से समझाना पर्याप्त नहीं है। भोजन की संरचना, कुल ऊर्जा, प्रोटीन, वसा, ग्लूकोज प्रतिक्रिया और व्यक्ति की अपनी नींद की स्थिति सभी महत्वपूर्ण हैं। आहार और नींद पर शोध भी बताता है कि भोजन की संरचना नींद और जागरण को प्रभावित कर सकती है, लेकिन यह संबंध सरल और एक-दिशात्मक नहीं है।
दोपहर में नींद का एक कारण हमारी जैविक घड़ी भी है
दोपहर के भोजन के बाद नींद खास तौर पर क्यों आती है, इसका उत्तर केवल खाना नहीं है। हमारी जैविक घड़ी में दोपहर के शुरुआती हिस्से में स्वाभाविक रूप से सतर्कता में थोड़ी गिरावट आती है। यह वही कारण है कि कई लोगों को बिना भारी भोजन के भी दोपहर में हल्की उनींदापन महसूस हो सकती है। भोजन उस पहले से मौजूद गिरावट को और स्पष्ट कर देता है। इसलिए यदि किसी ने रात को कम नींद ली हो, सुबह से काम किया हो और फिर दोपहर में भारी खाना खाया हो, तो तीनों प्रभाव एक साथ मिल जाते हैं, नींद की कमी, जैविक घड़ी की दोपहर वाली गिरावट और भोजन के बाद का चयापचयी बदलाव। तब व्यक्ति को ऐसा लगता है कि खाने ने अचानक उसे ‘बंद’ कर दिया, जबकि असल में शरीर पहले से नींद का दबाव लिए हुए था।
क्या सच में खाना खाने के बाद दिमाग में खून कम हो जाता है?
भोजन के बाद वास्तव में पाचन तंत्र को ज्यादा खून की सप्लाई होती है इसलिए पुरानी चिकित्सा व्याख्या ने सहज रूप से मान लिया कि वह खून ब्रेन से छिन रहा होगा। लेकिन शरीर की व्यवस्था इतनी साधारण नहीं है कि एक अंग को खून पहुँचाने के लिए दूसरे महत्वपूर्ण अंग को लगभग खाली कर दिया जाए। स्वस्थ व्यक्ति में हृदय की धड़कन, रक्तवाहिकाओं का संकुचन और दूसरे नियंत्रण तंत्र यह सुनिश्चित करते हैं कि मस्तिष्क को पर्याप्त रक्त मिलता रहे। यदि भोजन के बाद सचमुच मस्तिष्क में इतना रक्त कम हो जाता कि नींद पैदा हो, तो हमें केवल उनींदापन नहीं, बल्कि चक्कर, भ्रम, कमजोरी और बेहोशी जैसी समस्याएँ भी व्यापक रूप से दिखाई देतीं। भोजन के बाद की नींद को मस्तिष्क से खून हट जाने की पुरानी व्याख्या अब सही नहीं मानी जाती।
कुछ लोगों में खाना खाने के बाद रक्तचाप गिर सकता है
हालाँकि बुजुर्गों या कुछ बीमारियों वाले लोगों में भोजन के बाद रक्तचाप सचमुच गिर सकता है। इसे पोस्ट फ़ूड लो ब्लड प्रेशर कहा जाता है। ऐसी स्थिति में खाने के बाद चक्कर, कमजोरी, धुंधलापन या गिरने का खतरा हो सकता है। इसका कारण यह है कि पाचन तंत्र में बढ़े रक्त प्रवाह की भरपाई शरीर पर्याप्त रूप से नहीं कर पाता। यह सामान्य भोजन-पश्चात नींद से अलग चिकित्सा स्थिति है। इसलिए यदि किसी को सिर्फ हल्की उनींदापन नहीं बल्कि बार-बार खाने के बाद चक्कर, लगभग बेहोशी या गंभीर कमजोरी हो रही हो, तो इसे सामान्य ‘फूड कोमा’ समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
क्या ज्यादा चीनी खाने से ‘शुगर क्रैश’ होता है?
एक और रोचक पहलू है ब्लड शुगर का उतार-चढ़ाव। बहुत ज्यादा प्रोसेस्ड कार्बोहाइड्रेट या मीठा भोजन ब्लड शुगर को तेजी से ऊपर ले जा सकता है, फिर शरीर इंसुलिन के माध्यम से उसे नीचे लाता है। इस उतार-चढ़ाव के दौरान कुछ लोगों को थकान या सुस्ती महसूस हो सकती है। लेकिन हर व्यक्ति में यही कारण नहीं होता और सामान्य भोजन-पश्चात नींद को केवल ‘शुगर क्रैश’ कहना भी गलत है। जिन लोगों में मधुमेह, इंसुलिन प्रतिरोध या मेटाबोलिज्म की समस्या है, उनमें भोजन के बाद बहुत ज्यादा शुगर बढ़ना खुद थकान और उनींदापन से जुड़ सकता है। ऑरेक्सिन जैसी जागरण कोशिकाएँ भी ग्लूकोज के संकेतों के प्रति संवेदनशील होती हैं, इसलिए चयापचय और जागरण का संबंध वास्तविक है, लेकिन इसका पूरा तंत्र अभी भी शोध का विषय है।
कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और फैट का असर एक जैसा नहीं होता
प्रोटीन और फैट की भूमिका भी अलग होती है। फैट वाला भारी भोजन पेट को खाली होने में अधिक समय लगा सकता है और लंबे समय तक तृप्ति पैदा कर सकता है। प्रोटीन अमीनो अम्लों की संरचना बदलता है। कार्बोहाइड्रेट इंसुलिन प्रतिक्रिया को प्रभावित करते हैं। इसलिए एक प्लेट सफेद चावल और मिठाई का प्रभाव वही नहीं होगा जो समान कैलोरी वाले दाल, सब्जी, साबुत अनाज और प्रोटीन वाले संतुलित भोजन का हो। सामान्यतः बहुत बड़े, अत्यधिक ऊर्जा वाले और परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट से भरपूर भोजन के बाद सुस्ती अधिक महसूस हो सकती है, जबकि अपेक्षाकृत संतुलित और छोटी मात्रा वाला भोजन सतर्कता पर कम प्रभाव डाल सकता है।
रात की नींद कम हो तो खाना नींद को और सामने ला देता है
नींद की कमी लगभग हर चीज को बढ़ा देती है। यदि आपने रात में केवल पाँच घंटे सोया है, तो सुबह से मस्तिष्क में नींद का दबाव जमा हो रहा है। दोपहर का भोजन केवल उस दबे हुए दबाव को सामने ला सकता है। इसलिए बहुत बार लोग सोचते हैं, ‘मुझे चावल खाने से नींद आती है’, जबकि वास्तविकता यह हो सकती है कि वही व्यक्ति छुट्टी के दिन पूरी नींद लेने के बाद समान भोजन खाए और उतनी नींद न आए। शरीर की नींद की जरूरत और भोजन का प्रभाव आपस में जुड़ते हैं।
क्या खाना खाने के बाद सोना गलत है?
खाना खाने के बाद थोड़ी देर सोना गलत है, यह भी परिस्थिति पर निर्भर करता है। हल्की उनींदापन सामान्य है। छोटी दोपहर की झपकी कुछ लोगों के लिए ताजगी देने वाली हो सकती है। लेकिन बहुत लंबी या देर शाम की नींद रात की नींद बिगाड़ सकती है। यदि हर भोजन के बाद इतनी तीव्र नींद आती है कि काम करना मुश्किल हो जाए, खासकर साथ में खर्राटे, रात में सांस रुकना, सुबह सिरदर्द, अत्यधिक प्यास, बार-बार पेशाब, वजन बढ़ना या बहुत अधिक थकान हो, तो मधुमेह, नींद में सांस रुकने की बीमारी, रक्ताल्पता, थायरॉयड की समस्या या दूसरी स्थितियों की जाँच उचित हो सकती है। सामान्य भोजन-पश्चात उनींदापन और पूरे दिन की अत्यधिक नींद में फर्क है।
भोजन के बाद नींद कम करनी हो तो क्या करें?
भोजन के बाद उनींदापन कम करना हो तो सबसे प्रभावी उपाय किसी जादुई पेय में नहीं, भोजन की मात्रा और दिनचर्या में हैं। बहुत भारी एकमुश्त भोजन के बजाय संतुलित मात्रा, पर्याप्त प्रोटीन और फाइबर, अत्यधिक मिठाई और प्रोसेस्ड कार्बोहाइड्रेट कम करना, पर्याप्त पानी पीना, रात की नींद पूरी करना और भोजन के बाद कुछ मिनट हल्का चलना कई लोगों में सुस्ती कम कर सकता है। भोजन के तुरंत बाद तीव्र व्यायाम जरूरी नहीं, लेकिन दस-पंद्रह मिनट की सहज चाल ब्लड शुगर नियंत्रण और सतर्कता दोनों में मदद कर सकती है।
आखिर खाना खाने के बाद नींद क्यों आती है?
पूरे प्रश्न का उत्तर एक वाक्य में यह है, खाना खाने के बाद नींद इसलिए नहीं आती कि दिमाग का खून पेट में चला गया, बल्कि इसलिए आती है कि भोजन शरीर को ‘खोज और जागरण’ की अवस्था से ‘तृप्ति और पाचन’ की अवस्था में ले जाता है, ग्लूकोज, इंसुलिन, आंतों के संकेत और मस्तिष्क के जागरण तंत्र बदलते हैं और दोपहर में हमारी जैविक घड़ी पहले से ही थोड़ी नींद की ओर झुकी होती है। पेट में रक्त प्रवाह बढ़ना वास्तविक है, लेकिन सामान्य व्यक्ति की भोजन-पश्चात नींद का मुख्य कारण मस्तिष्क में रक्त की कमी नहीं है। और शायद इस घटना को सबसे सरल रूप में ऐसे समझा जा सकता है, खाली पेट मस्तिष्क कहता है, ‘जागो, भोजन खोजो’, पेट भरने के बाद शरीर का संदेश बदल जाता है, ‘ऊर्जा मिल गई है, अब थोड़ी गति धीमी की जा सकती है।’ यही सूक्ष्म बदलाव हमें खाने के बाद पलकों में महसूस होता है।


