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Food Interesting Facts: बासी ब्रेड सख्त और खुले चिप्स नरम क्यों हो जाते हैं? विज्ञान ने खोला राज
Food Interesting Facts: बासी ब्रेड सख्त और खुले चिप्स नरम क्यों हो जाते हैं? जानिए स्टार्च, नमी, तापमान और रेट्रोग्रेडेशन के पीछे छिपा रोचक विज्ञान।
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Food Interesting Facts: सुबह की नरम ब्रेड तीसरे दिन लकड़ी जैसी सख़्त हो जाती है, और रात की रोटी सुबह तक चबाने में मुश्किल। दूसरी तरफ़, बारिश के मौसम में पापड़, बिस्किट और नमकीन ऐसे नरम पड़ जाते हैं कि कुरकुरेपन का नामोनिशान नहीं रहता। कॉर्नफ्लेक्स का डिब्बा खुला छूट जाए तो दूध डालने से पहले ही चिमड़े हो जाते हैं। एक चीज़ नरम से सख़्त हो रही है, दूसरी सख़्त से नरम। सवाल उठता है कि क्या इन दोनों के पीछे कोई साझा नियम है?
सीधा जवाब यह है: हाँ, दोनों के केंद्र में स्टार्च और पानी का रिश्ता है, पर कहानियाँ अलग हैं। ब्रेड सूखने से नहीं, बल्कि अपने स्टार्च के भीतर होने वाले बदलाव से सख़्त होती है। चिप्स और कॉर्नफ्लेक्स हवा से नमी सोखने से नरम होते हैं। दोनों को समझने के लिए पहले यह जानना होगा कि इन चीज़ों के भीतर असल में क्या है।
ब्रेड बासी क्यों होती है?
ज़्यादातर लोग मानते हैं कि ब्रेड बासी होकर इसलिए सख़्त होती है कि उसका पानी उड़ जाता है। यह आंशिक रूप से ही सही है। इसका सबूत एक पुराना प्रयोग है। 19वीं सदी में फ़्रांसीसी रसायनशास्त्री बूसिंगो ने दिखाया कि ब्रेड को बंद डिब्बे में रखने पर, जहाँ पानी बाहर निकल ही नहीं सकता, तब भी वह बासी हो जाती है। और उसे हल्के से गर्म करने पर वह कुछ हद तक फिर नरम लगने लगती है। अगर बासीपन सिर्फ़ पानी उड़ने की वजह से होता, तो दोनों बातें संभव नहीं थीं।
असली वजह है स्टार्च का रेट्रोग्रेडेशन, यानी वापस क्रिस्टल बनना। इसे समझने के लिए ब्रेड बनने की प्रक्रिया देखिए। आटे में स्टार्च बारीक दानों के रूप में होता है, जिनके भीतर अणु बहुत व्यवस्थित, कसकर पैक क्रिस्टल जैसे ढंग से सजे होते हैं। जब आटा गूँधकर बेक किया जाता है, तो गर्मी और पानी के साथ ये दाने फूलते हैं और उनकी क्रिस्टल जैसी व्यवस्था टूट जाती है। स्टार्च के अणु ढीले होकर पानी को अपने भीतर थाम लेते हैं। इस प्रक्रिया को "जिलेटिनाइज़ेशन" कहते हैं, और इसी से ब्रेड का भीतरी हिस्सा (क्रम्ब) नरम, लचीला और स्पंजी बनता है।
स्टार्च में दो तरह के अणु होते हैं: अमाइलोज़ (सीधी, कम शाखाओं वाली लड़ियाँ) और अमाइलोपेक्टिन (बहुत शाखाओं वाली बड़ी संरचना)। बेकिंग के बाद ब्रेड ठंडी होती है, तो ये अणु धीरे-धीरे दोबारा एक-दूसरे के पास आकर व्यवस्थित होने लगते हैं, यानी फिर से क्रिस्टल बनाने लगते हैं। अमाइलोज़ यह काम पहले कुछ घंटों में कर लेता है, और अमाइलोपेक्टिन की बारी बाद में, कई दिनों में आती है। यही दूसरा चरण ब्रेड को धीरे-धीरे सख़्त बनाता है। जब अणु वापस क्रिस्टल की क़तार में सज जाते हैं, तो वे पानी को कसकर थामने की जगह छोड़ देते हैं और आपस में चिपककर एक कठोर जाल बना लेते हैं, और ब्रेड का लचीलापन घट जाता है। इसी के साथ पानी स्टार्च से हटकर ब्रेड के दूसरे हिस्सों, जैसे ग्लूटेन के जाल और ऊपरी परत, की ओर सरकता है। नतीजा यह कि भीतर का हिस्सा सख़्त और भुरभुरा होता है, जबकि ऊपर की कुरकुरी परत (क्रस्ट) नमी लेकर चिमड़ी हो जाती है। इसीलिए बासी ब्रेड की पपड़ी चबाने में रबड़ जैसी लगती है, और अंदर का हिस्सा सूखा।
ठंड में ब्रेड और जल्दी क्यों बिगड़ती है?
यह बात चौंकाती है कि फ़्रिज में रखने से ब्रेड सुरक्षित नहीं होती, बल्कि बासी होने की रफ़्तार बढ़ जाती है। स्टार्च का क्रिस्टल बनना शून्य के ज़रा ऊपर के तापमान (लगभग फ़्रिज के तापमान) पर सबसे तेज़ होता है। कमरे के तापमान पर यह धीमा चलता है, और जमा देने पर (फ़्रीज़र में) लगभग रुक जाता है, क्योंकि अणुओं की हलचल ही बंद हो जाती है। इसीलिए रोटी या ब्रेड को लंबे समय के लिए बचाना हो तो फ़्रीज़र बेहतर है, फ़्रिज नहीं। यही वजह है कि फ़्रिज में रखा पका चावल या इडली भी सख़्त और दानेदार हो जाते हैं, क्योंकि वहाँ भी वही स्टार्च वापस क्रिस्टल बना रहा है।
बासी ब्रेड को कैसे जगाएँ?
चूँकि बासीपन में बने क्रिस्टल गर्मी से पिघल जाते हैं (लगभग 60 डिग्री या उससे ऊपर), इसलिए तवे पर गर्म की गई रोटी या टोस्ट की हुई ब्रेड फिर से नरम और ताज़ा लगती है। पर यह अस्थायी है, क्योंकि ठंडा होते ही प्रक्रिया फिर शुरू हो जाती है, और कुछ घंटों में वही हाल लौट आता है। इसीलिए रोटी गरम परोसना स्वाद ही नहीं, विज्ञान की भी बात है।
व्यावसायिक डबलरोटी कई दिन नरम रहती है, क्योंकि कई कंपनियाँ इसमें एंज़ाइम और इमल्सिफ़ायर जैसे तत्व मिलाती हैं, जो स्टार्च के दोबारा क्रिस्टल बनने की गति धीमी करते हैं। इसमें हर पैकेट पर क्या मिलाया गया है, यह उसके लेबल से जाँचें।
चिप्स और कॉर्नफ्लेक्स: कुरकुरापन असल में है क्या?
कुरकुरापन सूखेपन का दूसरा नाम नहीं है बल्कि एक ख़ास ढाँचा है। आलू के चिप्स को बहुत पतला काटकर तेल में तला जाता है जिससे उनका लगभग सारा पानी उड़ जाता है।
कॉर्नफ्लेक्स और दूसरे अनाज के स्नैक्स को पकाने के बाद सुखाया या भूना जाता है, जिससे वे बेहद सूखे और झरझरे बनते हैं। यह सूखा, फैला हुआ स्टार्च-ढाँचा एक ख़ास अवस्था में होता है जिसे वैज्ञानिक "ग्लासी अवस्था" कहते हैं। इसे बिल्कुल खिड़की के काँच की तरह समझिए: अणु जमे हुए, बेतरतीब, पर हिल-डुल नहीं पाते। ऐसी चीज़ कठोर, भंगुर और कुरकुरी होती है, मोड़ने पर लचकने की जगह टूटती है, और टूटते समय चटकने की आवाज़ करती है, जो हमारे लिए कुरकुरेपन का अहसास बनाती है।
खुला छोड़ते ही नरम क्यों?
ये चीज़ें पानी के प्रति बेहद भूखी होती हैं। जब पैकेट खुला रह जाता है, तो हवा में मौजूद नमी की भाप धीरे-धीरे चिप्स और फ्लेक्स की सतह और भीतर के बारीक छिद्रों में घुसने लगती है। एक सामान्य नियम है कि कोई भी खाद्य पदार्थ अपने आस-पास की हवा की नमी के साथ संतुलन बनाना चाहता है। हवा में नमी ज़्यादा हो और वह चीज़ बहुत सूखी, तो पानी हवा से चीज़ की ओर बहता है।
अब असली खेल यह है कि पानी यहाँ "प्लास्टिसाइज़र" का काम करता है, यानी अणुओं के बीच घुसकर उन्हें हिलने-डुलने की आज़ादी देता है। हर ग्लासी पदार्थ का एक ग्लास ट्रांज़िशन तापमान होता है, जिसके नीचे वह कठोर काँच जैसा रहता है और ऊपर आने पर रबर जैसा नरम और लचीला हो जाता है। जैसे-जैसे चिप्स में पानी की थोड़ी-सी मात्रा बढ़ती है, यह तापमान गिरता जाता है। एक बिंदु पर वह इतना गिर जाता है कि कमरे का सामान्य तापमान उससे ऊपर निकल जाता है, और पदार्थ काँच से रबर में बदल जाता है। इसी पल चिप्स कुरकुरे से चिमड़े हो जाते हैं। यह बदलाव बहुत थोड़ी-सी नमी बढ़ने पर भी आ सकता है, इसीलिए इतनी जल्दी लगता है कि चीज़ अचानक ख़राब हो गई।
यही कारण है कि सख़्त टॉफ़ी, चिक्की या गजक नमी वाले मौसम में चिपचिपी हो जाती हैं। वह भी काँच जैसी अवस्था से रबर जैसी अवस्था में जाने का वही नियम है।
दोनों कहानियाँ आमने-सामने
अब तुलना साफ़ दिखती है। ब्रेड में पहले से बहुत पानी है, और बासीपन में असली बदलाव स्टार्च का ढीले से व्यवस्थित होना है, जिसमें पानी बाहर नहीं, भीतर ही एक जगह से दूसरी जगह खिसकता है। चिप्स में पानी बहुत कम है, और स्टार्च एक कठोर ग्लासी अवस्था में फँसा है। बाहर से पानी आने पर वह अवस्था टूटती है। दिशा उलटी है: ब्रेड में अणु व्यवस्था की ओर जाते हैं और कठोर होते हैं, जबकि चिप्स में अणुओं को पानी से "ढील" मिलती है और वे नरम होते हैं। दोनों में नियंत्रण करने वाले वही तीन खिलाड़ी हैं: स्टार्च, पानी और तापमान।
एक रोचक बात यह है कि अगर आप ब्रेड को पूरी तरह सुखा दें (जैसे रस्क या टोस्ट), तो वह भी कुरकुरी हो जाती है, यानी चिप्स की तरह की ग्लासी, सूखी अवस्था में पहुँच जाती है। और अगर उस रस्क को नमी वाली जगह खुला छोड़ दें, तो वह भी नरम पड़ जाएगा। इसलिए कड़क बनाम नरम असल में एक ही पैमाने पर दो छोर हैं।
तेल की भी एक अलग कहानी
चिप्स की ख़राबी सिर्फ़ नमी से नहीं होती। उनमें मौजूद तेल हवा की ऑक्सीजन और रोशनी से धीरे-धीरे ऑक्सीकृत होता है, जिससे बासी तेल वाली बदबू और कड़वा स्वाद आता है। इसीलिए चिप्स के पैकेट में हवा नहीं, आम तौर पर नाइट्रोजन गैस भरी जाती है, जो ऑक्सीजन को हटाती है और चिप्स को टूटने से भी बचाती है, और पैकेट की चमकीली धात्विक परत रोशनी और नमी को रोकती है।
अलग बात: बासी बनाम ख़राब
बासी होना ख़राब होना नहीं है। बासी ब्रेड सख़्त ज़रूर है, पर सुरक्षित रह सकती है। ख़राब होना सूक्ष्मजीवों (फफूँद, बैक्टीरिया) का काम है, और नमी भरे मौसम में ब्रेड पर फफूँद लगना आम है। अगर ब्रेड पर हरे, काले या सफ़ेद रोएँ दिखें, तो उसे फेंक दें, सिर्फ़ फफूँद वाला हिस्सा काटकर खाने की कोशिश न करें।
घर पर बचाने के तरीक़े
ब्रेड और रोटी को फ़्रिज में न रखें। कुछ दिनों के लिए कपड़े या ब्रेड-बैग में कमरे के तापमान पर रखें, और लंबे समय के लिए स्लाइस अलग-अलग करके फ़्रीज़र में रखें और ज़रूरत पर सीधे टोस्ट कर लें। बासी रोटी को हल्का पानी छिड़ककर तवे पर या ढककर भाप में गर्म करने से वह काफ़ी नरम हो जाती है। चावल को फ़्रिज से निकालकर थोड़े पानी के साथ ढककर गर्म करने से दाने फिर खुलते हैं।
चिप्स, कॉर्नफ्लेक्स, नमकीन, पापड़ और बिस्किट को पैकेट खुलने के बाद क्लिप या हवाबंद डिब्बे में रखें। रसोई की भाप वाली जगह, गैस के पास या सिंक के नज़दीक न रखें, और बरसात में यह ध्यान और ज़रूरी हो जाता है। अगर वे नरम पड़ भी गए हों, तो उन्हें ओवन या तवे पर धीमी आँच पर कुछ मिनट सुखाने से सूखी अवस्था लौट आती है और कुरकुरापन काफ़ी हद तक वापस आ जाता है, क्योंकि आपने सिर्फ़ सोखा हुआ पानी बाहर निकाला है। पर ज़्यादा गर्म करके जलाने से बचें।
घर पर करने लायक़ छोटा प्रयोग
एक ही ब्रेड की चार स्लाइस लीजिए: एक खुली रखिए, एक हवाबंद थैली में, एक फ़्रिज में और एक फ़्रीज़र में। दो-तीन दिन बाद देखिए कि किसका क्या हाल है। बंद थैली वाली स्लाइस नरम रहकर भी धीरे-धीरे सख़्त होगी, फ़्रिज वाली सबसे जल्दी, और फ़्रीज़र वाली टोस्ट करने पर लगभग ताज़ा लगेगी। इसी तरह चिप्स की दो मुट्ठियाँ एक कटोरी में खुली और एक बंद डिब्बे में रखकर कुछ घंटे देखिए।
ब्रेड और चिप्स की कहानियाँ अलग-अलग लगती हैं, पर दोनों एक ही सच्चाई बताती हैं: खाने की बनावट सिर्फ़ उसकी सामग्री पर नहीं, उसमें मौजूद पानी की मात्रा और उसकी "अवस्था" पर टिकी है। ब्रेड में अणुओं के व्यवस्थित होने से सख़्ती आती है, और चिप्स में अणुओं को पानी की ढील मिलने से नरमी। अगली बार रसोई में कुछ बिगड़ता दिखे तो याद रखिए कि यह उसके अणुओं की चुपचाप चल रही हलचल है, और कई बार थोड़ी गर्मी या एक हवाबंद डिब्बा सब सुधार सकता है।


