Footi Kaudi Meaning: 'फूटी कौड़ी भी न देना' मुहावरा कैसे बना? क्या होती थी 'फूटी कौड़ी' और क्यों था इसका इतना खास महत्व

Footi Kaudi Meaning: क्या आपने कभी इस बात पर विचार किया है कि आखिर फूटी कौड़ी क्या होती थी और इसका संबंध इस मुहावरे से किस प्रकर जुड़ा है?

Priya Singh Bisen
Published on: 30 Jun 2026 2:40 PM IST (Updated on: 30 Jun 2026 2:40 PM IST)
Footi Kaudi Meaning
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Footi Kaudi Meaning

Footi Kaudi Meaning: आपने अक्सर हिंदी मुहावरें लोगों को बोलते हुए सुना होगा, जिनका प्रयोग सभी रोजमर्रा की बातचीत में करते हैं, लेकिन उनके पीछे छिपा इतिहास बहुत कम लोग जानते हैं। ऐसा ही एक बेहद प्रचलित मुहावरा है 'फूटी कौड़ी भी न देना' या 'फूटी कौड़ी भी न मिलना'। आज भी जब किसी व्यक्ति के बहुत गरीब होने या किसी को बिल्कुल भी पैसे न देने की बात होती है, तो इस मुहावरे का प्रयोग किया जाता है।

लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर विचार किया है कि आखिर फूटी कौड़ी क्या होती थी और इसका संबंध इस मुहावरे से किस प्रकर जुड़ा है? आइए जानते हैं इस रोचक कहानी के बारे में।

क्या होती थी फूटी कौड़ी?

वर्तमान में हम रुपये, सिक्कों, नोटों और डिजिटल पेमेंट का प्रयोग करते हैं, लेकिन सदियों पहले भारत में मुद्रा व्यवस्था बिल्कुल अलग थी। उस दौर में समुद्र से मिलने वाली छोटी-छोटी कौड़ियां (Cowrie Shells) भी लेन-देन का महत्वपूर्ण माध्यम थीं। इन कौड़ियों का बाजार में निश्चित मूल्य होता था और इनके माध्यम से छोटी-मोटी खरीदारी की जाती थी।

जब किसी कौड़ी में दरार आ जाती थी, वह टूट जाती थी या उसमें छेद हो जाता था, तो उसे 'फूटी कौड़ी' कहा जाता था। ऐसी कौड़ी का मूल्य लगभग समाप्त हो जाता था और इसे सबसे कम कीमत वाली मुद्रा माना जाता था।

पुराने वक़्त में कैसे चलता था पैसों का हिसाब?

प्राचीन भारतीय मुद्रा प्रणाली बहुत ही दिलचस्प थी। सबसे छोटी इकाई कौड़ी मानी जाती थी और धीरे-धीरे कई इकाइयों को मिलाकर बड़ी मुद्रा बनती थी।

मुद्रा का क्रम कुछ इस प्रकार था -

- 3 कौड़ी मिलकर एक साबुत कौड़ी बनती थी।

- 10 कौड़ियां मिलकर एक दमड़ी होती थी।

- 2 दमड़ी मिलकर एक ढेला बनता था।

- लगभग डेढ़ ढेला एक पाई के बराबर माना जाता था।

- 3 पाई मिलकर एक पैसा बनता था।

- 4 पैसे मिलकर एक आना होता था।

- 16 आने मिलकर एक रुपया बनता था।

इस व्यवस्था से पता चलता है कि उस वक़्त भी मुद्रा का एक सुव्यवस्थित ढांचा मौजूद था।

कैसे बना 'फूटी कौड़ी' का मुहावरा?

चूंकि फूटी कौड़ी सबसे कम मूल्य वाली मुद्रा मानी जाती थी, इसलिए अगर किसी व्यक्ति के पास 'फूटी कौड़ी भी नहीं' होती थी, तो उसका अर्थ होता था कि उसके पास बिल्कुल भी धन नहीं है। धीरे-धीरे यही बात एक मुहावरे के रूप में प्रचलित हो गई।

आज 'फूटी कौड़ी भी न देना' का अर्थ होता है कि किसी व्यक्ति को अपने हिस्से से एक पैसा भी न देना या बिल्कुल भी आर्थिक सहायता न करना। वहीं 'फूटी कौड़ी भी न होना' का अर्थ है कि व्यक्ति पूरी तरह कंगाल या आर्थिक रूप से बेहद कमजोर है।

दो कौड़ी का इंसान' भी इसी से जुड़ा है

'फूटी कौड़ी' की तरह ही 'दो कौड़ी का इंसान' मुहावरा भी उसी दौर की मुद्रा प्रणाली से जुड़ा माना जाता है। इसका मतलब किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि उसके चरित्र और नैतिक मूल्यों से होता है। जब किसी के आचरण या व्यवहार को बेहद निम्न स्तर का माना जाता है, तब यह मुहावरा प्रयोग किया जाता है।

आज भी जिंदा हैं सदियों पुराने मुहावरे

भले ही आज कौड़ियों का चलन पूरी तरह समाप्त हो चुका है और उनकी जगह आधुनिक मुद्रा व डिजिटल भुगतान ने ले ली है, लेकिन उनसे जुड़े मुहावरे आज भी हिंदी भाषा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। 'फूटी कौड़ी भी न देना' जैसे मुहावरे न सिर्फ हमारी भाषा को समृद्ध बनाते हैं, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति और प्राचीन आर्थिक व्यवस्था की झलक भी दिखाते हैं। यही वजह है कि सदियों पुराने ये मुहावरे आज भी आम बोलचाल में उतने ही लोकप्रिय हैं, जितने पहले हुआ करते थे।

Priya Singh Bisen
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Priya Singh Bisen

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Priya Singh Bisen is a journalist with over five years of experience in the news and digital media industry. She covers a wide range of topics, including weather, lifestyle, health, politics, and international affairs. In addition to news writing, Priya has experience in news script writing, voice-overs, anchoring, field reporting, and social media management. She holds a Bachelor's degree in Mass Communication and a Master's degree in Advertising and Public Relations. Priya also enjoys writing, traveling, and playing sports, pursuits that reflect her curiosity and passion for exploring new perspectives.

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