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Famous Scientist: जिस वैज्ञानिक ने दुनिया को खाद दी, वही रासायनिक युद्ध के इतिहास से भी जुड़ा
Scientist Fritz Haber Invention Explained: फ्रिट्ज हेबर की कहानी विज्ञान की ताकत और उसके खतरनाक इस्तेमाल का विरोधाभास है।
Famous Scientist Fritz Haber Invention Explained in Hindi
Scientist Fritz Haber Invention Explained: अगर उन वैज्ञानिकों की बात की जाए जिनकी खोज ने करोड़ों लोगों की जिंदगी पर असर डाला, तो फ्रिट्ज हेबर का नाम जरूर आएगा। लेकिन हेबर की कहानी सिर्फ एक महान वैज्ञानिक की कहानी नहीं है। उनके काम में विज्ञान की ताकत और उसके खतरनाक इस्तेमाल, दोनों दिखाई देते हैं। हेबर ने ऐसी रासायनिक विधि विकसित करने में बड़ी भूमिका निभाई, जिससे हवा में मौजूद नाइट्रोजन को अमोनिया में बदला जा सकता था। आगे चलकर इसी अमोनिया से बड़े पैमाने पर खाद बनाना संभव हुआ। आज दुनिया में जितनी बड़ी मात्रा में खेती होती है और जितने लोगों के लिए भोजन पैदा किया जाता है, उसमें इस खोज की बहुत बड़ी भूमिका रही है।
लेकिन दूसरी तरफ प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हेबर ने जहरीली गैसों को युद्ध में इस्तेमाल करने के जर्मन कार्यक्रम में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अप्रैल 1915 में बेल्जियम के यप्रेस के पास जर्मन सेना ने क्लोरीन गैस का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। इस कार्यक्रम से हेबर सीधे जुड़े हुए थे। यही विरोधाभास हेबर की पूरी कहानी का सबसे अहम हिस्सा है - एक तरफ वह वैज्ञानिक जिसने दुनिया की खाद्य उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद की, दूसरी तरफ वही वैज्ञानिक जिसने आधुनिक रासायनिक युद्ध को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
फ्रिट्ज हेबर कौन था?
फ्रिट्ज हेबर का जन्म 1868 में जर्मन साम्राज्य के ब्रेसलाउ शहर में हुआ था। यह शहर अब पोलैंड में है और इसे व्रोकलॉ कहा जाता है। वह एक यहूदी परिवार में पैदा हुए थे और आगे चलकर जर्मनी के सबसे महत्वपूर्ण रसायन वैज्ञानिकों में गिने जाने लगे। उन्होंने रसायन विज्ञान की पढ़ाई की और धीरे-धीरे उस शाखा में पहचान बनाई जिसमें रासायनिक बदलावों के पीछे काम करने वाले नियमों को समझा जाता है। उस समय वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ी चुनौती थी कि प्रयोगशाला में होने वाली रासायनिक क्रियाओं को इतनी बड़ी मात्रा में कैसे कराया जाए कि उनका इस्तेमाल कारखानों में किया जा सके। हेबर इसी सवाल का जवाब खोजने वाले वैज्ञानिकों में सबसे आगे निकल गए।
हवा में नाइट्रोजन तो बहुत है, फिर उसकी कमी क्यों?
हेबर की खोज को समझने के लिए पहले नाइट्रोजन की कहानी समझनी होगी। हम जिस हवा में सांस लेते हैं, उसमें करीब 78 प्रतिशत नाइट्रोजन गैस है। यानी धरती के आसपास नाइट्रोजन की कोई कमी नहीं है। समस्या यह है कि हवा की नाइट्रोजन ऐसे रूप में होती है जिसे ज्यादातर पौधे सीधे इस्तेमाल नहीं कर सकते। नाइट्रोजन पौधों के लिए बहुत जरूरी है। पौधे इसका इस्तेमाल प्रोटीन और डीएनए जैसे जरूरी पदार्थ बनाने में करते हैं। लेकिन हवा में मौजूद नाइट्रोजन के दो परमाणु एक-दूसरे से बहुत मजबूत बंधन में जुड़े होते हैं। इस वजह से उसे इस्तेमाल करने लायक रूप में बदलना आसान नहीं है। प्रकृति में कुछ खास जीवाणु यह काम करते हैं। वे हवा की नाइट्रोजन को ऐसे पदार्थों में बदलने में मदद करते हैं जिन्हें पौधे इस्तेमाल कर सकते हैं। बिजली गिरने के दौरान भी कुछ नाइट्रोजन यौगिक बनते हैं। लेकिन बढ़ती आबादी के लिए खेती की जरूरत इससे कहीं ज्यादा थी। इंसान को ऐसी विधि चाहिए थी जिससे बहुत बड़ी मात्रा में पौधों के लिए उपयोगी नाइट्रोजन बनाई जा सके।
हेबर ने हवा से अमोनिया बनाने का रास्ता खोजा
यहीं फ्रिट्ज हेबर की सबसे बड़ी उपलब्धि सामने आती है। उन्होंने दिखाया कि नाइट्रोजन और हाइड्रोजन को एक खास परिस्थिति में मिलाकर अमोनिया बनाया जा सकता है। N₂ + 3H₂ → 2NH₃ - यह समीकरण छोटा दिखाई देता है, लेकिन इसे कामयाब बनाना बहुत मुश्किल था। नाइट्रोजन और हाइड्रोजन को बस एक बर्तन में भर देने से अमोनिया बड़ी मात्रा में नहीं बनने लगती। इसके लिए बहुत अधिक दबाव, ऊंचा तापमान और एक ऐसे पदार्थ की जरूरत होती है जो इस रासायनिक क्रिया को तेज कर सके। ऐसे पदार्थ को उत्प्रेरक कहा जाता है। हेबर ने प्रयोगशाला में इस प्रक्रिया को सफल बनाया। लेकिन एक प्रयोगशाला में कुछ ग्राम अमोनिया बनाना और कारखाने में लगातार हजारों टन अमोनिया बनाना दो बिल्कुल अलग बातें थीं।
कार्ल बॉश ने इसे कारखानों तक पहुंचाया
हेबर की खोज को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने लायक बनाने में जर्मन रसायन वैज्ञानिक और अभियंता कार्ल बॉश की बड़ी भूमिका थी। उन्होंने ऐसी मशीनें और कारखाने विकसित करने में मदद की जो बहुत अधिक दबाव और तापमान पर काम कर सकते थे। इसके बाद अमोनिया का बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हुआ। इसी वजह से इस विधि को आज हेबर-बॉश विधि कहा जाता है। यहीं से दुनिया की खेती में एक बड़ा बदलाव शुरू हुआ।
अमोनिया से कई तरह की नाइट्रोजन वाली खाद बनाई जा सकती है। इससे किसानों को पौधों के लिए जरूरी नाइट्रोजन बड़ी मात्रा में उपलब्ध होने लगी। इसका मतलब था कि सही परिस्थितियों में एक ही जमीन से पहले की तुलना में ज्यादा फसल पैदा की जा सकती थी। पहले खेती के लिए उपयोगी नाइट्रोजन के स्रोत सीमित थे। अब उसे कारखानों में बड़ी मात्रा में बनाया जा सकता था। यही वजह है कि हेबर की खोज को मानव इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण रासायनिक उपलब्धियों में गिना जाता है। दुनिया की आज की विशाल आबादी को भोजन उपलब्ध कराने में कृत्रिम नाइट्रोजन वाली खाद की बड़ी भूमिका रही है।
अगर हेबर सिर्फ खाद बनाने वाली इस विधि के लिए जाने जाते, तो शायद उनका नाम विज्ञान के इतिहास में एक महान वैज्ञानिक के रूप में ही याद किया जाता। लेकिन प्रथम विश्व युद्ध ने उनकी जिंदगी और उनकी पहचान दोनों बदल दीं। युद्ध के दौरान हेबर जर्मनी के लिए रासायनिक हथियारों के विकास से जुड़ गए। उनका मानना था कि जहरीली गैसों का इस्तेमाल युद्ध को जल्दी खत्म करने में मदद कर सकता है। उन्होंने रासायनिक हथियारों के विकास और उनके इस्तेमाल की योजना में सक्रिय भूमिका निभाई।
बेल्जियम में क्लोरीन गैस का हमला
22 अप्रैल 1915 को बेल्जियम के यप्रेस इलाके में जर्मन सेना ने क्लोरीन गैस का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। क्लोरीन गैस सांस के साथ शरीर में जाने पर फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। जर्मन सेना ने हवा की दिशा का फायदा उठाकर गैस को विरोधी सैनिकों की तरफ छोड़ा। गैस का बादल सैनिकों की ओर बढ़ा और बड़ी संख्या में सैनिक इसकी चपेट में आए। हेबर इस हमले और जर्मनी के रासायनिक युद्ध कार्यक्रम से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिकों में थे। यही वह घटना थी जिसने उनके नाम को विज्ञान के इतिहास के सबसे विवादित हिस्सों में पहुंचा दिया।
हेबर का तर्क था कि अगर रासायनिक हथियार युद्ध को जल्दी खत्म कर दें तो इससे कुल नुकसान कम हो सकता है। लेकिन इस सोच का कड़ा विरोध भी हुआ। आलोचकों के लिए जहरीली गैस कोई कम खतरनाक हथियार नहीं थी। वह सैनिकों को सांस लेने में असमर्थ कर सकती थी और फेफड़ों को बुरी तरह नुकसान पहुंचा सकती थी। इसलिए हेबर की भूमिका को लेकर उस समय भी और बाद में भी बहुत बहस हुई। यहां एक बात साफ है कि हेबर सिर्फ ऐसे वैज्ञानिक नहीं थे जिनकी खोज का किसी ने बाद में गलत इस्तेमाल कर दिया। उन्होंने खुद जर्मनी के रासायनिक युद्ध कार्यक्रम में सक्रिय भूमिका निभाई थी।
उनकी पत्नी क्लारा भी वैज्ञानिक थीं
हेबर की पत्नी क्लारा इमरवार खुद रसायन विज्ञान की वैज्ञानिक थीं। उन्होंने डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की थी और जर्मनी की शुरुआती महिला रसायन वैज्ञानिकों में उनका नाम लिया जाता है। 1915 में उनकी मृत्यु हो गई, यप्रेस में गैस हमले के कुछ ही समय बाद। उनकी मृत्यु की परिस्थितियों और उसके पीछे के कारणों को लेकर इतिहास में अलग-अलग बातें कही गई हैं। इसलिए इस बारे में बहुत निश्चित निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होगा। इतना जरूर है कि हेबर के युद्ध संबंधी काम और उनके निजी जीवन के बीच संबंध को लेकर इतिहासकारों ने लंबे समय से चर्चा की है।
फिर भी हेबर को नोबेल पुरस्कार मिला
प्रथम विश्व युद्ध के बाद हेबर की छवि बहुत विवादित हो चुकी थी। लेकिन 1918 में उन्हें रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार दिया गया। पुरस्कार उन्हें अमोनिया बनाने की उनकी विधि के लिए दिया गया था, जिसने नाइट्रोजन वाले यौगिकों को बड़े पैमाने पर बनाना संभव किया। इस फैसले पर विवाद भी हुआ, क्योंकि रासायनिक युद्ध में हेबर की भूमिका लोगों के सामने थी। यहीं से एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या किसी वैज्ञानिक की दुनिया बदल देने वाली उपयोगी खोज को उसके दूसरे काम से अलग करके देखा जा सकता है? इसका कोई आसान जवाब नहीं है। हेबर-बॉश विधि ने खेती के लिए नाइट्रोजन उपलब्ध कराने की क्षमता बहुत बढ़ा दी। लेकिन इसके साथ कुछ पर्यावरणीय समस्याएं भी सामने आईं। जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन वाली खाद खेतों से बहकर नदियों और झीलों में पहुंच सकती है। इससे पानी में पोषक तत्वों की मात्रा बहुत बढ़ सकती है और शैवाल तेजी से बढ़ने लगते हैं। बाद में पानी में ऑक्सीजन कम हो सकती है और जलीय जीवों को नुकसान पहुंच सकता है। नाइट्रोजन वाली खाद के इस्तेमाल से ‘नाइट्रस ऑक्साइड’ जैसी गैस का उत्सर्जन भी होता है। यह जलवायु परिवर्तन में योगदान देने वाली शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है। इसलिए हेबर की खोज को सिर्फ वरदान या सिर्फ नुकसान कहना सही नहीं होगा। इसने खेती की क्षमता को बहुत बढ़ाया, लेकिन इसके बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से पर्यावरण पर दबाव भी बढ़ा।
जिस जर्मनी के लिए काम किया, उसी से निकलना पड़ा
हेबर जर्मनी से गहराई से जुड़े हुए थे। प्रथम विश्व युद्ध में उन्होंने जर्मन सरकार और सेना के लिए काम किया था। लेकिन 1933 में हिटलर के सत्ता में आने के बाद जर्मनी में यहूदियों के खिलाफ भेदभावपूर्ण कानून लागू होने लगे। यहूदी वैज्ञानिकों और कर्मचारियों पर भी दबाव बढ़ा। हेबर ने जर्मनी छोड़ दिया। यह उनके जीवन का एक बड़ा विरोधाभास था। जिस देश की विज्ञान और उद्योग व्यवस्था को मजबूत बनाने में उन्होंने इतना बड़ा योगदान दिया था, उसी देश में बदलती राजनीतिक व्यवस्था के कारण उन्हें वहां से जाना पड़ा। 1934 में स्विट्जरलैंड में उनकी मृत्यु हो गई। वह 65 वर्ष के थे।
आखिर फ्रिट्ज हेबर को कैसे याद किया जाए?
फ्रिट्ज हेबर की कहानी इसलिए खास है क्योंकि इसमें विज्ञान की ताकत के दोनों चेहरे एक साथ दिखाई देते हैं। उन्होंने हवा में मौजूद नाइट्रोजन को अमोनिया में बदलने की ऐसी विधि विकसित की जिसे बाद में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। इससे नाइट्रोजन वाली खाद बनाना आसान हुआ और दुनिया की खेती की क्षमता बहुत बढ़ी।लेकिन इसी वैज्ञानिक ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जहरीली गैसों को युद्ध में इस्तेमाल करने के काम में भी सक्रिय भूमिका निभाई। इसलिए हेबर को सिर्फ "महान वैज्ञानिक" या सिर्फ "खतरनाक वैज्ञानिक" कहना उनकी पूरी कहानी को बहुत छोटा कर देता है। उनकी जिंदगी यह दिखाती है कि एक ही वैज्ञानिक ज्ञान इंसानों के लिए भोजन बढ़ाने का साधन भी बन सकता है और युद्ध में विनाश का हथियार भी।
फ्रिट्ज हेबर की सबसे बड़ी विरासत शायद यही विरोधाभास है। उनकी एक खोज ने धरती की भोजन पैदा करने की क्षमता को बहुत बढ़ाया, जबकि उनके दूसरे काम ने रसायन विज्ञान के युद्ध में इस्तेमाल का एक खतरनाक रास्ता खोल दिया। इसीलिए उनका नाम विज्ञान के इतिहास में एक साथ मशहूर भी है और बदनाम भी।


