Gandhi Janyanti: गांधीजी के विचारों का विश्वव्यापी असर -विस्तार से जानिए उनके विचारों की आवश्यकता

Mahatma Gandhi life story: गांधीजी की सोच केवल भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए मार्गदर्शक है।

Shivani Jawanjal
Published on: 2 Oct 2025 10:25 AM IST
Gandhi Janyanti: गांधीजी के विचारों का विश्वव्यापी असर -विस्तार से जानिए उनके विचारों की आवश्यकता
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Pic Credit - Social Media

Gandhi’s philosophy of non-violence: भारत के इतिहास में कुछ ऐसे महान लोग हुए हैं जिनका नाम कभी भुलाया नहीं जा सकता। महात्मा गांधी जिन्हें हम 'राष्ट्रपिता' कहते हैं उन्हीं में से एक हैं। हर साल 2 अक्टूबर को उनकी जयंती पर पूरा देश ही नहीं बल्कि दुनिया भी उन्हें याद करती है। यह दिन सिर्फ उनके जन्म का नहीं, बल्कि उनके बताए हुए रास्ते और विचारों को याद करने का भी दिन है। गांधीजी के अहिंसा और सत्य के सिद्धांत आज भी उतने ही ज़रूरी और काम के हैं जितने हमारे आज़ादी के समय थे।

बचपन और शिक्षा

महात्मा गांधी जिनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। उनके पिता करमचंद गांधी पोरबंदर और राजकोट रियासत में दीवान थे। उनकी माता पुतलीबाई बहुत धार्मिक और त्यागमयी थीं। उनसे गांधीजी ने सादगी, उपवास, शाकाहार और धर्म का महत्व सीखा। बचपन से ही गांधीजी जिज्ञासु और सादगीप्रिय स्वभाव के थे। उनकी शुरुआती पढ़ाई पोरबंदर और राजकोट में हुई। बाद में 1888 में वे इंग्लैंड गए और वहां से बैरिस्टर की पढ़ाई पूरी की। इस पढ़ाई ने उनके जीवन में अनुशासन, आत्मविश्वास और तर्क से सोचने की क्षमता को बढ़ाया।

दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष

कानून की पढ़ाई के बाद गांधीजी 1893 में वकालत के लिए दक्षिण अफ्रीका गए। वहाँ उन्होंने नस्लभेद और रंगभेद की अन्यायपूर्ण नीतियों को करीब से देखा। एक बार ट्रेन यात्रा के दौरान सिर्फ रंग के कारण उन्हें पीटरमैरिट्जबर्ग स्टेशन पर प्रथम श्रेणी डिब्बे से बाहर निकाल दिया गयाथा । यह घटना उनके जीवन का बड़ा मोड़ बनी और उन्होंने अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने का निश्चय किया। दक्षिण अफ्रीका में ही उन्होंने अहिंसक आंदोलन और 'सत्याग्रह' की शुरुआत की, जिसका मतलब है सत्य के लिए आग्रह। और उनका यही विचार आगे चलकर भारत की आज़ादी की लड़ाई की नींव बना।

भारत वापसी और स्वतंत्रता संग्राम

गांधीजी 9 जनवरी 1915 को दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। भारत आने के बाद उन्होंने अलग-अलग प्रांतों का दौरा किया और किसानों, मजदूरों व आम लोगों की परेशानियाँ समझीं। 1917 में चंपारण आंदोलन उनकी पहली बड़ी सफलता थी, जहाँ उन्होंने नील की खेती करने वाले किसानों को न्याय दिलाया। इसके बाद खेड़ा सत्याग्रह और अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन से उन्हें पूरे देश में पहचान मिली। आगे चलकर 1920 का असहयोग आंदोलन, 1930 का नमक सत्याग्रह और 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन गांधीजी के नेतृत्व में हुए जिन्होंने अंग्रेजों की सत्ता को कमजोर कर दिया और आज़ादी की राह को तेज़ किया।

गांधीजी के विचार

गांधीजी का पूरा जीवन सत्य और अहिंसा पर टिका था। वे कहते थे कि 'सत्य ही ईश्वर है' और मानते थे कि हिंसा केवल विनाश लाती है, जबकि अहिंसा से शांति और इंसानियत की राह खुलती है। उनके लिए सत्य और अहिंसा एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। उनका विश्वास था कि बिना हिंसा के भी बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं और इन मूल्यों से दुश्मन को भी दोस्त बनाया जा सकता है। स्वदेशी आंदोलन के दौरान उन्होंने खादी और देशी वस्तुओं के प्रयोग का संदेश दिया और अंग्रेजी सामान के बहिष्कार का आह्वान किया। गांधीजी का 'सर्वोदय' का विचार यानी सबके हित और भलाई का संदेश सिर्फ भारत तक सीमित नहीं था बल्कि पूरी मानवता के लिए था।

गांधीजी के विचारों के विश्वव्यापी प्रभाव

गांधीजी के विचारों ने उस समय के युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। वे अनुशासन, सादगी, मेहनत, नैतिकता और सेवा भाव को अपनाने का संदेश देते थे, ताकि युवा समाज में अच्छे बदलाव ला सकें। गांधीजी चाहते थे कि युवा अपनी ऊर्जा सही दिशा में लगाएँ और रचनात्मक काम करें। उनके प्रभाव सिर्फ भारत तक सीमित नहीं थे, बल्कि पूरी दुनिया में फैले। अमेरिकी नेता मार्टिन लूथर किंग जूनियर, दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला और म्यांमार की आंग सान सू ची जैसे नेता गांधीजी से प्रेरित हुए। उनके अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों ने दुनिया भर में शांति और न्याय के आंदोलन को मजबूती दी।

आज के संदर्भ में गांधीजी

आज स्वतंत्रता के 75 साल से अधिक समय बाद भी गांधीजी के विचार और अहिंसा का संदेश दुनिया में शांति बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी हैं खासकर जब हिंसा, आतंकवाद और युद्ध बढ़ रहे हैं। उपभोक्तावाद और भौतिकवादी जीवन में उनका सादगी और स्वदेशी का संदेश हमें पर्यावरण बचाने और सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की सीख देता है। राजनीति में ईमानदारी, पारदर्शिता और नैतिकता की जरूरत आज भी गांधीजी के सत्य और ईमानदारी के सिद्धांत से समझी जा सकती है। उनके विचार आज भी युवाओं और समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं जो अनुशासन, सत्य, अहिंसा, सेवा और स्वावलंबन की ताकत देते हैं।

फिल्मों में गांधीजी

महात्मा गांधी के जीवन पर कई फिल्में और डॉक्यूमेंट्री बनाई गई हैं। 1982 में रिचर्ड एटनबरो ने बनाई फिल्म 'Gandhi' को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खूब सराहा गया और इसने 8 ऑस्कर पुरस्कार जीते। इसमें बेन किंग्सले ने गांधीजी का किरदार निभाया। यह फिल्म उनके जीवन और संघर्ष को बहुत अच्छे से दिखाती है। भारतीय सिनेमा में भी गांधीजी पर कई फिल्में बनी हैं जैसे 'गांधी माई फादर' (2007) जो गांधीजी और उनके बेटे हीरालाल के संबंधों पर आधारित है। इसके अलावा 'लगे रहो मुन्नाभाई' ने उनके विचारों को आम जनता तक पहुँचाया। इसके अलावा 'मैंने गांधी को नहीं मारा' जैसी फिल्में और 1968 की डॉक्यूमेंट्री 'Mahatma: Life of Gandhi, 1869 - 1948' भी उनके सत्याग्रह, अहिंसा और जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को दिखाती हैं।

फिल्मों के जरिये गांधीजी का प्रभाव

रिचर्ड एटनबरो की फिल्म 'Gandhi' (1982) बहुत बड़ी हिट रही। इस फिल्म का बजट लगभग 22 मिलियन अमेरिकी डॉलर था। दुनिया भर में इसने लगभग 127.8 मिलियन अमेरिकी डॉलर कमाए। केवल अमेरिका और कनाडा से ही 52.7 मिलियन डॉलर की कमाई हुई जो 1982 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में 12वें नंबर पर थी। यूनाइटेड किंगडम में इसने लगभग 7.7 मिलियन पाउंड की कमाई की। भारत में यह फिल्म रिलीज़ होने पर सबसे ज्यादा कमाई करने वाली विदेशी फिल्मों में से एक बनी और लगभग 100 करोड़ रुपये से अधिक कमाई की। इस फिल्म ने 8 ऑस्कर पुरस्कार भी जीते और व्यावसायिक और आलोचनात्मक रूप से बहुत सफल रही। इस प्रकार गांधीजी का प्रभाव उनके फिल्मों के माध्यम से भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

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Shivani Jawanjal is a former Senior Content Writer at Newstrack.com.

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