Bal Gangadhar Tilak: गणेश उत्सव मनाने के साथ याद करें बाल गंगाधर तिलक को भी

इतिहास बताता है कि 1893 से पहले गणेश उत्सव एक दिन का पर्व हुआ करता था ।

Newstrack Network
Published on: 27 Aug 2025 6:12 PM IST
Bal Gangadhar Tilak
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Bal Gangadhar Tilak

Bal Gangadhar Tilak: दस दिवसीय गणेश उत्सव की शुरुआत हो चुकी है और देश भर में गणेश चतुर्थी पूरे उल्लास से मनाया जा रहा है। पूरे भारत में और ख़ास कर देश के पश्चिमी क्षेत्रों में अगाध श्रद्धा के साथ मनाया जाने वाला यह उत्सव एक विशाल सार्वजनिक आयोजन है जिसमें बड़े पैमाने पर जनभागीदारी देखी जाती है। लेकिन ये उत्सव हमेशा से ऐसा नहीं था, इसका स्वरुप कुछ और ही हुआ करता था। इतिहास बताता है कि 1893 से पहले गणेश उत्सव एक दिन का पर्व हुआ करता था जिसे मुख्यतः ब्राह्मण और उच्च जातियों के लोग निजी तौर पर मनाते थे। उसी साल एक ऐसा बदलाव आया जिसने गणेश उत्सव को व्यापकता और भव्यता प्रदान कर दी। और इसके लिए मुख्य रूप से ज़िम्मेदार थे महान राष्ट्रवादी और देशभक्त बाल गंगाधर तिलक, जिन्हें 'लोकमान्य' या जननेता कहा जाता है।

तिलक के बारे में


बाल गंगाधर तिलक एक मराठी पत्रकार, शिक्षक, और राजनीतिक - सामाजिक कार्यकर्ता थे। 1881 में तिलक ने जी.जी. अगरकर के साथ मिलकर मराठी में 'केसरी' और अंग्रेजी में 'मराठा' नामक समाचार पत्रों की स्थापना की और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रवादी प्रतिरोध फैलाने के लिए इनका इस्तेमाल किया। महात्मा गांधी के उदय से पहले के दौर में लोकमान्य तिलक ही भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के सबसे बड़े जननेता और सबसे क्रांतिकारी नेताओं में से एक थे। उस दौर में तिलक ने मराठी में प्रसिद्ध घोषणा की थी: "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूँगा।"

गणेश उत्सव की परम्परा

1893 में तिलक ने विघ्नहर्ता और सौभाग्य लाने वाले भगवान गणपति की पूजा की एक नई परंपरा शुरू की। उन्होंने पंडालों में गणेश प्रतिमा की स्थापना और सामूहिक पूजा को बढ़ावा दिया। उन्होंने एक ऐसी परम्परा की शुरुआत की जहाँ गणेश उत्सव के पंडालों में देशभक्ति के गीत गाए जाते थे और राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार किया जाता था। बाल गंगाधर तिलक ने गणेश चतुर्थी को एक ऐसा स्वरूप दिया जिसमें समाज के हर तबके के लोग मिल जुल कर भागीदारी करे सकें। उन्होंने ही गणेश उत्सव के दसवें दिन गणेश प्रतिमाओं को जल में विसर्जित करने की परंपरा शुरू की।


तिलक की कोशिशों का उद्देश्य ये भी था कि ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों के बीच की खाई को खत्म किया जा सके और एक समान हिंदू पहचान को बढ़ावा मिल सके। हिंदू देवी-देवताओं और सांस्कृतिक प्रतीकों का उपयोग करके तिलक ने ब्रिटिश उत्पीड़न के विरुद्ध प्रतिरोध को मज़बूत करने और राष्ट्रीय गौरव और एकता की भावना का संचार करने का प्रयास किया। तिलक के प्रयासों से पूरे महाराष्ट्र में गणेश उत्सव समितियों की स्थापना की गई और देखते देखते ये महाराष्ट्र का सबसे प्रमुख पर्व बन गया। राष्ट्रवादी प्रतिरोध को आगे बढ़ाने के लिए तिलक ने 1896 में शिवाजी उत्सव की शुरुआत की।

1893 में देश भर में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा की लहर चली। उस साल 11 अगस्त को बंबई शहर में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। पूना में रहने वाले तिलक ने सांप्रदायिक तनाव भड़काने के लिए अंग्रेजों को दोषी ठहराया और उन पर मुस्लिमों का पक्ष लेने का भी आरोप लगाया। तिलक के अनुसार, अंग्रेजों ने मुसलमानों का पक्ष इसलिए लिया क्योंकि उन्हें धीरे-धीरे जागृत हो रहे हिंदू बहुमत का खतरा दिखाई दे रहा था। उन हालातों को देखते हुए भी तिलक ने हिंदुओं को गणेश उत्सव जैसी सामुदायिक गतिविधियों के जरिये एकजुट बनाने की कोशिश की।

आज हम गणेश उत्सव का जो स्वरूप देख रहे हैं उसकी कल्पना शायद तिलक ने भी नहीं की होगी। पिछले कुछ वर्षों में गणेश उत्सव में व्यापक बदलाव आये हैं और अब ये सामाजिक पर्व की बजाये एक धार्मिक अनुष्ठान का अवसर बन गया है।

Before 1893

• गणेश चतुर्थी एक निजी उत्सव था।

• केवल ब्राह्मण और उच्च जातियों के घरों में सीमित।

• सार्वजनिक भागीदारी नहीं के बराबर।

1893 – Tilak’s Transformation

• लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने सार्वजनिक पंडाल परंपरा शुरू की।

• गणेश प्रतिमाएँ सामूहिक रूप से स्थापित होने लगीं।

• देशभक्ति के गीत, राष्ट्रवादी भाषण, और एकता का संदेश फैला।

• पहली बार गणेश विसर्जन की परंपरा शुरू हुई।

1896 – Shivaji Utsav

• तिलक ने शिवाजी महोत्सव की शुरुआत की।

• गणेशोत्सव + शिवाजी उत्सव → राष्ट्रवादी चेतना का दोहरा माध्यम।

1900s – Growing Nationalism

• गणेश उत्सव समितियाँ महाराष्ट्र में फैलीं।

• उत्सव सांस्कृतिक और राजनीतिक दोनों मंच बना।

• “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” जैसे नारे गूँजने लगे।

Independence Era

• सार्वजनिक गणेशोत्सव ने सामाजिक एकजुटता और स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत किया।

Today (2025)

• गणेशोत्सव अब वैश्विक स्तर पर मनाया जाता है।

• विशाल पंडाल, झांकियाँ, और लाखों की भागीदारी।

• परंतु इसका मूल संदेश – एकता और राष्ट्रवाद – याद रखना ज़रूरी है।

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