Ganesh Visarjan Kaise Karen: नदी-तालाब में नहीं करना चाहते विसर्जन? ये हैं घर बैठे विकल्प

Ganesh Visarjan Kaise Karen: मूर्ति विसर्जन को लेकर अब हालात और सोच दोनों बदल रहे हैं।

Jyotsana Singh
Published on: 28 Aug 2025 12:13 PM IST
Ganesh Visarjan Kaise Karen
X

Ganesh Visarjan Kaise Karen (Photo - Social Media)

Ganesh Visarjan Kaise Karen: 2025 गणेश चतुर्थी पर्व का अब शुभारंभ हो चुका है। भारत में यह त्यौहार बड़े हर्षा - उल्लास और श्रद्धा से मनाया जाता है। इस साल यह पर्व 27 अगस्त 2025, बुधवार से शुरू होकर 6 सितंबर 2025, शनिवार तक चलेगा। परंपरा के अनुसार प्रतिमा स्थापना के दस दिन बाद विसर्जन किया जाता है। लेकिन अब समय के बदलाव के साथ परंपराओं में भी परिवर्तन होते देखे जा रहे हैं। मूर्ति विसर्जन को लेकर अब हालात और सोच दोनों बदल रहे हैं। कई लोग पर्यावरणीय कारणों, प्रशासनिक रोक और निजी भावनाओं की वजह से विसर्जन से हिचकिचाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बिना विसर्जन के भी गणपति पूजा संभव है? आइए इस विषय को परंपरा और आधुनिक दृष्टिकोण और विसर्जन से जुड़ी परंपराओं के बारे में जानते हैं विस्तार से -

गणेश विसर्जन से जुड़ी कहानियां

गणेश विसर्जन के पीछे मुख्य कहानी यह है कि वेद व्यास जी ने भगवान गणेश को 10 दिनों तक महाभारत कथा सुनाई, और गणेश जी ने उसे लिखा। कथा सुनाते समय, वेद व्यास जी ने अपनी आंखें बंद कर ली थीं, और जब उन्होंने 10 दिन बाद आंखें खोलीं, तो उन्होंने देखा कि गणेश जी का शरीर बहुत गर्म हो गया है। इसलिए, वेद व्यास जी ने गणेश जी को सरोवर के पानी में स्नान करा कर उनका शरीर ठंडा किया। तभी विसर्जन की यह प्रथा चली आ रही है।


गणेश विसर्जन के पीछे एक और कहानी यह है कि गणेश जी कुछ समय के लिए अपने भाई कार्तिकेय से मिलने दक्षिण भारत गए थे। जहां से 10 दिन बाद अपने धाम वापस लौटे। इस विदाई के समय, सभी लोग बहुत भावुक हो गए थे और उन्होंने गणेश जी से अगले साल फिर से आने का अनुरोध किया था।

गणेश विसर्जन एक ऐसा उत्सव है जो, भगवान गणेश को सम्मान और खुशी के साथ विदाई देने के लिए मनाया जाता है। यह भी माना जाता है कि विसर्जन के साथ, भक्त अपनी सभी परेशानियों और बाधाओं को भगवान गणेश के साथ विसर्जित कर देते हैं और उनसे अगले साल फिर से आने की प्रार्थना करते हैं।

गणपति स्थापना का महत्व और उसकी परंपरा

गणेश प्रतिमा स्थापना का उद्देश्य यह होता है कि भक्त विघ्नहर्ता को घर या पंडाल में आमंत्रित करके दस दिनों तक उनकी पूजा करें और फिर सम्मानपूर्वक विदाई दें। मूर्ति विसर्जन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह जीवन के अस्थायी होने का संदेश भी देता है। प्रतिमा का जल में विलय यह याद दिलाता है कि हर वस्तु अंततः पंचतत्व में मिल जाती है।

समय के साथ क्यों बदलती जा रही विसर्जन की परंपरा

समय के साथ विसर्जन की परंपरा को लेकर लोगों की सोच बदली है। कई परिवारों को यह भावनात्मक रूप से असहज लगता है कि जिस मूर्ति की दस दिनों तक पूजा की, उसे जल में विसर्जित कर दिया जाए। दूसरी ओर, तालाब और नदियों में विसर्जन से प्रदूषण बढ़ता है, जिस कारण कई जगह प्रशासन ने इस पर रोक लगा दी है। इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण की जागरूकता ने भी लोगों को विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित किया है।

मूर्ति विसर्जन न करना चाहें तो क्या हैं विकल्प


यदि किसी को विसर्जन पारंपरिक तरीके से करना कठिन लगे तो भी पूजा का महत्व कम नहीं होता। इसके समाधान के कई तरीके हैं। कुछ लोग घर में पीतल या पत्थर की स्थायी प्रतिमा रखते हैं, जिन्हें हर साल विसर्जित करने की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे में दस दिन पूजा के बाद मूर्ति को जलाभिषेक करके पुनः पूजाघर में स्थापित कर दिया जाता है। यह परंपरा भी निभ जाती है और भावनाएं भी सुरक्षित रहती हैं।

जबकि कई लोग गणेश चतुर्थी पर मिट्टी की प्रतिमा लाकर घर पर ही बाल्टी, टब या गमले में विसर्जन करते हैं। उसके बाद मिट्टी को पौधों या गार्डन में किसी ऐसी जगह पर सुरक्षित डाल देते हैं, जहां ये लोगों के पैर के नीचे न आए। फिर यह प्रतिमा मिट्टी में मिलकर प्रकृति का हिस्सा बन जाती है। मूर्ति विसर्जन का यह नया तरीका पर्यावरण के लिहाज से सबसे बेहतर माना जाता है। वहीं, कुछ परिवार हर साल खुद मिट्टी से छोटे गणपति बनाते हैं और पूजा के बाद उसी मिट्टी को घर के गमलों में ही रख देते हैं।

कुछ भक्त गणपति की प्रतिमा न लाकर केवल पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन और व्रत करते हैं। इससे मूर्ति विसर्जन का प्रश्न ही नहीं उठता, लेकिन श्रद्धा और आस्था पूरी तरह बनी रहती है। जिनके पास जगह या साधन नहीं होते, वे नगर निगम या मंदिर द्वारा बनाए गए विशेष टैंकों में विसर्जन करते हैं। हालांकि, कई लोग इसे देखकर भावुक हो जाते हैं क्योंकि बाद में उन मूर्तियों का सही तरह से प्रबंधन नहीं होता।

गणपति प्रतिमा की विदाई और विसर्जन की विधि

यदि आप बप्पा का आशीर्वाद और कृपा पाना चाहते हैं तो बहुत जरूरी है कि आप उनकी विदाई की परम्परा को विधिवत पूर्ण करें। घर पर विसर्जन करना चाहें तो परंपरा के अनुसार कुछ चरण पूरे करना जरूरी हैं। विसर्जन के दिन गणेशजी की पूजा और हवन के साथ स्वस्तिवाचन करें। इसके बाद चौकी पर स्वस्तिक बनाकर वस्त्र बिछाएं और मूर्ति को पूजास्थल से उठाकर सम्मानपूर्वक उस पर विराजमान करें। भोग, फूल, फल और मोदक अर्पित करने के बाद क्षमा याचना करें कि पूजा के दौरान कोई भूल-चूक हुई हो। अंत में जयकारों के साथ मूर्ति को टब या गमले में विसर्जित करें और उस मिट्टी को बगीचे या पौधों में डाल दें।

सच्ची भावना और श्रद्धा ही सबसे बड़ी पूजा

10 दिनों तक लगातार चलने वाली पूजा के पश्चात गणपति विसर्जन का सार यह है कि जीवन में आगमन और विदाई दोनों ही सत्य हैं। लेकिन यदि कोई विसर्जन न करना चाहे, तो स्थायी मूर्ति रखना, घर में विसर्जन करना या केवल पूजा-पाठ करना भी पूरी तरह मान्य है। असल मायने मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि आपकी श्रद्धा और आस्था के रूप में हैं। अगर सच्ची भावनाओं के साथ दिल से बप्पा को बुलाएंगे और अगले साल फिर आमंत्रित करने का व्रत करेंगे, तो उनका आशीर्वाद अवश्य मिलेगा।

1 / 5
Your Score0/ 5
Admin 2

Admin 2

Next Story