Gold Platinum: आपकी सोने की अंगूठी के परमाणु पृथ्वी से भी पुराने हैं, अंतरिक्ष में कैसे हुआ जन्म?

Gold Platinum History Explained: सोना और प्लैटिनम पृथ्वी पर कैसे आए? जानिए न्यूट्रॉन तारों की टक्कर, भारी तत्वों के निर्माण, पृथ्वी के शुरुआती इतिहास और CERN में सोने के परमाणु बनाने के प्रयोग का विज्ञान।

Yogesh Mishra
Published on: 21 Oct 2026 7:06 PM IST
Gold Platinum History Explained in Hindi | Newstrack Latest Hindi News | Breaking News India
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Gold Platinum History Explained in Hindi: हम सोने को गहनों और दौलत से जोड़ते हैं, जबकि प्लैटिनम को दुनिया की दुर्लभ और कीमती धातुओं में गिना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन धातुओं के परमाणु पृथ्वी के जन्म से भी पहले बन चुके थे? इनकी कहानी धरती की खदानों से नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में हुई उन घटनाओं से शुरू होती है जिनमें बेहद घने तारों के अवशेष आपस में टकराते हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, सोने और प्लैटिनम जैसे भारी तत्वों को बनाने में न्यूट्रॉन तारों के आपस में मिलने यानी विलय की अहम भूमिका रही है। ऐसी घटनाओं में भारी तत्व बन सकते हैं और अंतरिक्ष में फैल जाते हैं। बाद में यही पदार्थ गैस और धूल के उन बादलों का हिस्सा बनता है जिनसे नए तारे और ग्रह बनते हैं।

इसका मतलब है कि आज आपकी अंगूठी में मौजूद सोने के परमाणु भी कभी किसी प्राचीन खगोलीय घटना में बने होंगे। लेकिन पृथ्वी का सारा सोना क्या न्यूट्रॉन तारों की टक्कर से ही आया? पृथ्वी के भीतर इसका कितना हिस्सा मौजूद है? और जब सोना इतना पुराना है, तो वह कुछ खास जगहों पर ही खदानों के रूप में क्यों मिलता है? इन सवालों के जवाब ब्रह्मांड और पृथ्वी, दोनों के इतिहास में छिपे हैं।

ब्रह्मांड के जन्म के समय सोना क्यों नहीं बना?

करीब 13.8 अरब साल पहले ब्रह्मांड का विस्तार शुरू हुआ। शुरुआती कुछ मिनटों में हाइड्रोजन और हीलियम जैसे हल्के तत्वों के नाभिक बने। लिथियम की थोड़ी मात्रा भी बनी, लेकिन सोना, प्लैटिनम और यूरेनियम जैसे भारी तत्व उस समय नहीं बन पाए।

उस दौर में ब्रह्मांड बहुत गर्म था, लेकिन तेजी से फैल भी रहा था। तापमान और घनत्व घटने के कारण भारी तत्व बनाने वाली नाभिकीय प्रक्रियाओं के लिए जरूरी परिस्थितियां लंबे समय तक नहीं बनी रह सकीं। बाद में गैस के विशाल बादलों से तारे बने। उनके भीतर हाइड्रोजन से हीलियम और फिर कई दूसरे तत्व बनने लगे। बड़े तारों में कार्बन, ऑक्सीजन और लोहे के आसपास के तत्वों के निर्माण की प्रक्रियाएं भी चलती हैं। लेकिन सोना और प्लैटिनम जैसे भारी तत्वों को बनाने के लिए अलग तरह की परिस्थितियां चाहिए।

तारों के भीतर सोना बनाना इतना मुश्किल क्यों है?

सूर्य जैसे तारे अपने केंद्र में हाइड्रोजन के नाभिकों को जोड़कर हीलियम बनाते हैं। इस प्रक्रिया में ऊर्जा निकलती है, जिससे तारे चमकते रहते हैं। बड़े तारों में आगे चलकर दूसरे तत्व भी बनते हैं। लेकिन लोहे के आसपास पहुंचने के बाद स्थिति बदल जाती है। हल्के नाभिकों को जोड़ने से ऊर्जा मिल सकती है, जबकि लोहे से आगे के भारी तत्वों को बनाने के लिए दूसरी नाभिकीय प्रक्रियाओं की जरूरत होती है। इसका मतलब यह नहीं कि भारी तत्व तारों में बन ही नहीं सकते। कुछ भारी तत्व तारों के भीतर बनते हैं, लेकिन सोने और प्लैटिनम की उत्पत्ति को समझने के लिए हमें न्यूट्रॉन की भूमिका पर ध्यान देना होगा।

सोने के परमाणु के केंद्र में 79 प्रोटॉन होते हैं, जबकि प्लैटिनम के नाभिक में 78 प्रोटॉन होते हैं। किसी तत्व की पहचान उसके प्रोटॉनों की संख्या से होती है। भारी तत्वों के निर्माण में नाभिकों का न्यूट्रॉन पकड़ना भी अहम है।

न्यूट्रॉन पकड़ने की दो प्रमुख प्रक्रियाएं हैं। एक धीमी प्रक्रिया है, जिसे एस-प्रोसेस कहा जाता है। दूसरी तेज प्रक्रिया है, जिसे आर-प्रोसेस कहते हैं। सोने के स्थिर समस्थानिक और प्लैटिनम के कई समस्थानिक बनाने में आर-प्रोसेस की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।

न्यूट्रॉन पकड़कर कैसे बनते हैं सोने के परमाणु?

आर-प्रोसेस को आसान भाषा में समझें तो यह ऐसी प्रक्रिया है जिसमें परमाणु नाभिक बहुत तेजी से न्यूट्रॉन पकड़ते हैं। इसके लिए ऐसी जगह चाहिए जहां मुक्त न्यूट्रॉन की संख्या बेहद ज्यादा हो।

नाभिक जब लगातार न्यूट्रॉन पकड़ता है, तो वह अस्थिर हो सकता है। बाद में उसमें रेडियोधर्मी बदलाव होते हैं। इस दौरान कुछ न्यूट्रॉन प्रोटॉन में बदल जाते हैं और नाभिक का परमाणु क्रमांक बदल सकता है। इसी तरह एक तत्व दूसरे तत्व में बदल सकता है। इन बदलावों की लंबी श्रृंखला से सोने और प्लैटिनम जैसे भारी तत्वों के नाभिक बन सकते हैं। लेकिन ऐसी प्रक्रिया के लिए सामान्य तारे के शांत वातावरण से अलग परिस्थितियों की जरूरत होती है। वैज्ञानिक लंबे समय तक यह पता लगाने की कोशिश करते रहे कि ब्रह्मांड में इतनी बड़ी मात्रा में न्यूट्रॉन कहां मिल सकते हैं।

न्यूट्रॉन तारों की टक्कर क्यों है खास?

जब कोई बहुत विशाल तारा अपने जीवन के अंतिम दौर में पहुंचता है, तो कुछ परिस्थितियों में उसका केंद्र ढह जाता है। इसके बाद हुए सुपरनोवा विस्फोट के बाद बेहद घना अवशेष बच सकता है, जिसे न्यूट्रॉन तारा कहते हैं।

न्यूट्रॉन तारे का द्रव्यमान सूर्य के बराबर या उससे भी ज्यादा हो सकता है, लेकिन उसका आकार केवल कुछ दसियों किलोमीटर होता है। यानी सूर्य जितना या उससे ज्यादा पदार्थ एक छोटे से शहर के आकार में सिमटा हो सकता है। कुछ प्रणालियों में दो न्यूट्रॉन तारे एक-दूसरे की परिक्रमा करते हैं। वे गुरुत्वाकर्षण तरंगों के रूप में ऊर्जा खोते हुए धीरे-धीरे करीब आते हैं और आखिरकार आपस में मिल सकते हैं। इस दौरान उनका कुछ बेहद घना पदार्थ अंतरिक्ष में बाहर निकल जाता है।

इस पदार्थ में न्यूट्रॉन की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। इसलिए यहां आर-प्रोसेस के जरिए भारी तत्व बन सकते हैं। इन तत्वों के रेडियोधर्मी बदलावों से ऊर्जा निकलती है, जिससे एक खास तरह की चमक पैदा होती है। इसे किलोनोवा कहते हैं। इस तरह न्यूट्रॉन तारों का विलय केवल एक असाधारण खगोलीय घटना नहीं है। यह सोने और प्लैटिनम जैसे भारी तत्वों के निर्माण का भी महत्वपूर्ण स्रोत है।

वर्ष 2017 में मिला भारी तत्वों के निर्माण का बड़ा प्रमाण

17 अगस्त 2017 को वैज्ञानिकों ने खगोल विज्ञान में एक ऐतिहासिक खोज की। अमेरिका की लाइगो और यूरोप की विर्गो वेधशालाओं ने गुरुत्वाकर्षण तरंगों का एक संकेत दर्ज किया। इसे GW170817 नाम दिया गया। वैज्ञानिकों ने पाया कि यह संकेत दो न्यूट्रॉन तारों के विलय से आया था।

इसके बाद दुनिया भर की दूरबीनों ने इस घटना से आने वाले प्रकाश और दूसरे संकेतों का अध्ययन किया। वैज्ञानिकों ने पृथ्वी से करीब 13 करोड़ प्रकाश-वर्ष दूर स्थित आकाशगंगा NGC 4993 में उस विलय से जुड़ी किलोनोवा देखी। इस घटना के अध्ययन से पता चला कि न्यूट्रॉन तारों के विलय में भारी तत्व बनने के लिए अनुकूल परिस्थितियां मौजूद हो सकती हैं। किलोनोवा की चमक, उसके रंग और समय के साथ उसमें आए बदलाव भारी तत्वों के बनने के अनुमान से मेल खाते थे।

हालांकि वैज्ञानिकों ने उस घटना में सोने या प्लैटिनम के हर परमाणु को सीधे नहीं देखा था। उन्होंने प्रकाश के विश्लेषण और नाभिकीय गणनाओं के आधार पर भारी तत्वों के निर्माण का निष्कर्ष निकाला। बाद के अध्ययनों में उसी घटना से जुड़े प्रकाश में स्ट्रॉन्शियम जैसे तत्व की पहचान ने इन निष्कर्षों को और मजबूती दी। इस खोज ने पहली बार गुरुत्वाकर्षण तरंगों और प्रकाश, दोनों के जरिए एक ही खगोलीय घटना का अध्ययन करने का मौका दिया। इससे न्यूट्रॉन तारों के विलय और भारी तत्वों के निर्माण के बीच संबंध समझने में बड़ी मदद मिली।

क्या पृथ्वी का सारा सोना तारों की टक्कर से बना था?

इसका पक्का जवाब अभी वैज्ञानिकों के पास नहीं है। इतना जरूर स्पष्ट है कि न्यूट्रॉन तारों के विलय में सोने और प्लैटिनम जैसे भारी तत्व बन सकते हैं। लेकिन ब्रह्मांड में मौजूद इन तत्वों का कितना हिस्सा ऐसी घटनाओं से बना, यह अभी शोध का विषय है।

वैज्ञानिकों को कुछ बहुत पुराने तारों में भी भारी तत्व मिले हैं। इससे पता चलता है कि ब्रह्मांड के शुरुआती दौर में ही ऐसी घटनाएं होने लगी थीं जिनसे आर-प्रोसेस के जरिए भारी तत्व बन सकते थे। शोधकर्ता यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि न्यूट्रॉन तारों के विलय कितनी जल्दी शुरू हुए और क्या उनसे शुरुआती ब्रह्मांड में मिले भारी तत्वों की पूरी व्याख्या हो सकती है। कुछ खास तरह के सुपरनोवा विस्फोट भी भारी तत्वों के संभावित स्रोत माने जाते हैं। इनमें तेज गति से घूमने वाले और बेहद शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र वाले तारों से जुड़ी घटनाएं शामिल हैं। मैग्नेटार नाम के अत्यधिक चुंबकीय न्यूट्रॉन तारों की विशाल ज्वालाओं से भारी तत्व बनने की संभावना पर भी अध्ययन हो रहे हैं। फिलहाल सबसे सही निष्कर्ष यही है कि न्यूट्रॉन तारों का विलय भारी तत्वों के निर्माण का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, लेकिन पृथ्वी के समस्त सोने और प्लैटिनम का एक ही तरह की घटना से बनना साबित नहीं हुआ है।

सूर्य और पृथ्वी बनने से पहले ही मौजूद था सोना

करीब 4.6 अरब साल पहले सूर्य और सौरमंडल का निर्माण गैस और धूल के एक विशाल बादल से हुआ। इसमें हाइड्रोजन और हीलियम के अलावा पहले की तारकीय पीढ़ियों से बने भारी तत्व भी मौजूद थे।

पुराने तारों और उनकी अंतिम अवस्थाओं में हुई घटनाओं ने इन तत्वों को अंतरिक्ष में फैलाया था। समय के साथ यह पदार्थ आकाशगंगा की गैस और धूल में मिल गया। इसी सामग्री के एक हिस्से से सूर्य, पृथ्वी और दूसरे ग्रह बने। इसलिए पृथ्वी पर सोने के परमाणु पृथ्वी बनने से पहले ही मौजूद थे। वे ग्रह के निर्माण के दौरान उसके पदार्थ का हिस्सा बन गए। आज सोना जिस चट्टान या खनिज में मिलता है, वह बाद में बना हो सकता है, लेकिन उसके परमाणुओं का इतिहास उससे कहीं पुराना है।

पृथ्वी का ज्यादातर सोना कहां चला गया?

पृथ्वी के शुरुआती दौर में उसका बड़ा हिस्सा बहुत गर्म था। धीरे-धीरे भारी धातुएं और हल्के पदार्थ अलग होने लगे। लोहा और निकेल जैसे घने तत्व पृथ्वी के केंद्र की ओर चले गए। सोना और प्लैटिनम भी लोहे के साथ रहने की प्रवृत्ति दिखाते हैं। वैज्ञानिक ऐसे तत्वों को लौह-प्रिय कहते हैं। पृथ्वी के शुरुआती विकास के दौरान इन धातुओं का बड़ा हिस्सा लोहे के साथ गहराई में चला गया होगा। इसी वजह से माना जाता है कि पृथ्वी के कुल सोने और प्लैटिनम का बड़ा भाग उसके केंद्र में हो सकता है। लेकिन वहां तक पहुंचना आज की खनन तकनीक से संभव नहीं है। फिर सवाल उठता है कि पृथ्वी की ऊपरी परत में सोना बचा कैसे? इसका एक संभावित जवाब उन उल्कापिंडों में छिपा है जो पृथ्वी के शुरुआती इतिहास में उस पर गिरे थे।

क्या उल्कापिंड भी पृथ्वी पर सोना लेकर आए?

वैज्ञानिकों के मुताबिक, पृथ्वी का केंद्र बनने के बाद भी अंतरिक्ष से उल्कापिंडीय पदार्थ पृथ्वी पर गिरता रहा। इस पदार्थ में सोना, प्लैटिनम और दूसरी लौह-प्रिय धातुएं मौजूद थीं। इस विचार को समझने के लिए वैज्ञानिक पृथ्वी के मेंटल यानी केंद्र और ऊपरी परत के बीच मौजूद चट्टानी हिस्से में इन धातुओं की मात्रा और उनके अनुपात का अध्ययन करते हैं। इससे संकेत मिलता है कि पृथ्वी का केंद्र बनने के बाद भी बाहरी अंतरिक्ष से आया पदार्थ उसकी संरचना में शामिल हुआ होगा।

इस प्रक्रिया को लेट अक्रीशन कहा जाता है। इसके मुताबिक, बाद में आए उल्कापिंडीय पदार्थ ने पृथ्वी के मेंटल में सोने और प्लैटिनम की मात्रा बढ़ाने में योगदान दिया हो सकता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि पृथ्वी का सारा सोना उल्कापिंडों से आया था। शुरुआती पृथ्वी में मौजूद सोने का कुछ हिस्सा केंद्र की ओर चला गया, जबकि बाद में आए पदार्थ ने ऊपरी हिस्सों में इन धातुओं की उपलब्धता को प्रभावित किया होगा। दोनों के योगदान का सही अनुपात अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

सोना पूरी धरती पर बराबर क्यों नहीं फैला?

अगर सोने के परमाणु पृथ्वी बनने के समय से मौजूद थे, तो वे हर जगह बराबर मात्रा में क्यों नहीं मिलते? इसकी वजह पृथ्वी के भीतर चलने वाली भूगर्भीय प्रक्रियाएं हैं।

पृथ्वी की ऊपरी चट्टानों में सोना आमतौर पर बहुत कम मात्रा में होता है। लेकिन गर्म पानी और दूसरे द्रव चट्टानों की दरारों से गुजरते हुए सोने को एक जगह से दूसरी जगह ले जा सकते हैं। जब तापमान, दबाव या रासायनिक परिस्थितियां बदलती हैं, तो सोना चट्टानों की दरारों और क्वार्ट्ज की नसों में जमा हो सकता है।

चट्टानों के टूटने और घिसने से निकला सोना नदियों की रेत में भी जमा हो सकता है। सोना भारी धातु है, इसलिए पानी के बहाव में हल्के कण आगे निकल सकते हैं, जबकि सोने के कण कुछ खास जगहों पर जमा रह जाते हैं। इसी तरह सोने की खदानें बनती हैं। यानी सोने के परमाणुओं का ब्रह्मांड में बनना और पृथ्वी पर उनका खदानों में जमा होना दो अलग प्रक्रियाएं हैं। पहली प्रक्रिया अंतरिक्ष की नाभिकीय घटनाओं से जुड़ी है, जबकि दूसरी पृथ्वी के भूगर्भीय इतिहास का हिस्सा है।

प्लैटिनम की कहानी भी कुछ ऐसी ही है

प्लैटिनम भी एक भारी तत्व है। उसके कई प्राकृतिक समस्थानिकों के निर्माण में आर-प्रोसेस की अहम भूमिका मानी जाती है, हालांकि सभी समस्थानिकों का इतिहास एक जैसा नहीं है। कुछ में धीमी न्यूट्रॉन-पकड़ प्रक्रिया का भी योगदान होता है।

पृथ्वी पर प्लैटिनम के भंडार बनने का तरीका सोने से कुछ अलग है। प्लैटिनम के साथ पैलेडियम, रोडियम, रूथेनियम, इरिडियम और ऑस्मियम जैसी धातुएं भी एक समूह बनाती हैं। ये धातुएं पृथ्वी के भीतर पिघली चट्टानों यानी मैग्मा से जुड़ी प्रक्रियाओं के दौरान कुछ खास जगहों पर जमा हो सकती हैं। दक्षिण अफ्रीका का बुशवेल्ड कॉम्प्लेक्स प्लैटिनम समूह की धातुओं के दुनिया के प्रमुख भंडारों में शामिल है। यहां इन धातुओं का जमाव मैग्मा के ठंडा होने और अलग-अलग खनिजों के जमा होने जैसी प्रक्रियाओं से जुड़ा है। इसलिए प्लैटिनम के परमाणुओं का जन्म अंतरिक्ष की घटनाओं में हुआ होगा, लेकिन पृथ्वी पर उसके बड़े भंडार बनने के पीछे भूगर्भीय प्रक्रियाएं हैं।

क्या आज भी अंतरिक्ष में सोना बन रहा है?

ब्रह्मांड में तारे आज भी बनते और नष्ट होते हैं। न्यूट्रॉन तारों का विलय भी होता रहता है। इसलिए सोने और प्लैटिनम जैसे भारी तत्वों का बनना केवल अरबों साल पुरानी घटना नहीं है। हालांकि किसी दूर की आकाशगंगा में आज बना सोना सीधे पृथ्वी पर आ जाएगा, ऐसा नहीं है। खगोलीय घटनाओं से निकला पदार्थ आसपास की गैस और धूल में मिल सकता है। बहुत लंबे समय बाद यही पदार्थ नए तारों और ग्रहों के निर्माण में शामिल हो सकता है। हमारी पृथ्वी भी इसी लंबी प्रक्रिया का नतीजा है। उसके भीतर मौजूद कई तत्व पिछली पीढ़ियों के तारों में बने और फिर अंतरिक्ष में फैलकर उस पदार्थ का हिस्सा बने जिससे सौरमंडल बना।

क्या प्रयोगशाला में भी सोना बनाया जा सकता है?

वैज्ञानिक प्रयोगों में एक तत्व को दूसरे तत्व में बदलना संभव है। किसी तत्व की पहचान उसके नाभिक में मौजूद प्रोटॉनों की संख्या से होती है। यदि नाभिकीय प्रतिक्रिया से यह संख्या बदल जाए, तो नया तत्व बन सकता है।

वर्ष 2025 में यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन सर्न के लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर में किए गए एक अध्ययन से पता चला कि सीसे के नाभिकों की खास तरह की टक्करों के दौरान सोने के नाभिक बन सकते हैं। हालांकि इनसे बनने वाली मात्रा बेहद कम होती है। ऐसे नाभिक बहुत जल्दी दूसरी प्रक्रियाओं में बदल या नष्ट भी हो सकते हैं।

इसलिए प्रयोगशाला में सोने के कुछ नाभिक बना लेना और गहने बनाने लायक सोना तैयार करना बिल्कुल अलग बातें हैं। फिलहाल यह तरीका सोने की खदानों का विकल्प नहीं बन सकता।

सोने की असली कहानी धरती से बहुत पुरानी है

सोने और प्लैटिनम की कहानी बताती है कि पृथ्वी पर मौजूद पदार्थों का इतिहास उसके जन्म से भी पुराना हो सकता है। ब्रह्मांड की शुरुआत में मुख्य रूप से हल्के तत्व बने। बाद में तारों के भीतर और उनके जीवन के अंतिम दौर में हुई घटनाओं से कई भारी तत्व बने। सोने और प्लैटिनम जैसे तत्वों के निर्माण में न्यूट्रॉन तारों के विलय जैसी घटनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

इन घटनाओं से निकला पदार्थ अंतरिक्ष में फैला और गैस तथा धूल के बादलों में मिल गया। करीब 4.6 अरब साल पहले इन्हीं पदार्थों से सौरमंडल बना और सोना तथा प्लैटिनम पृथ्वी का हिस्सा बन गए। पृथ्वी के केंद्र के निर्माण, उल्कापिंडों से आए पदार्थ और अरबों साल की भूगर्भीय प्रक्रियाओं ने तय किया कि ये धातुएं कहां और कितनी मात्रा में जमा होंगी। इसलिए जब हम सोने की अंगूठी देखते हैं, तो वह सिर्फ एक कीमती धातु नहीं होती। उसके परमाणुओं की कहानी पृथ्वी से बहुत पहले, अंतरिक्ष की उन घटनाओं में शुरू हुई थी जिन्होंने ब्रह्मांड को भारी तत्वों से समृद्ध बनाया।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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