Harshad Mehta Scam: हर्षद मेहता ने शेयर बाजार में ऐसी हलचल क्यों मचाई कि बदलने लगे बाजार के नियम?

Harshad Mehta Scam Kya Tha: हर्षद मेहता कैसे शेयर बाजार का ‘बिग बुल’ बना और 1992 का घोटाला कैसे सामने आया?

Neel Mani Lal
Published on: 26 Sept 2026 3:31 PM IST
Harshad Mehta Stock Market Scam Story
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Harshad Mehta Stock Market Scam Story

Harshad Mehta Scam Kya Tha: एक समय था जब भारत में शेयर बाजार आम आदमी की दुनिया नहीं था। शेयर बाजार का नाम सुनते ही बड़े दलाल, भारी-भरकम रकम, बंद कमरों में होने वाले सौदे और ऐसे लोग याद आते थे जिनकी पहुंच आम निवेशक से कहीं आगे थी। फिर 1990 के दशक की शुरुआत में एक नाम अचानक पूरे देश की जुबान पर आ गया, हर्षद मेहता। उसे लोग "बिग बुल" कहने लगे। उसके बारे में कहा जाने लगा कि वह जिस शेयर को हाथ लगा देता है, उसकी कीमत ऊपर जाने लगती है। उसके पास इतना पैसा था कि वह बाजार के बड़े से बड़े खिलाड़ियों को चुनौती देता दिखाई देता था। मुंबई के समुद्र किनारे उसका आलीशान घर, महंगी कारें और शेयर बाजार में उसकी कथित पकड़ उस दौर में सफलता की नई तस्वीर बन गए थे। लेकिन कुछ ही समय बाद यही कहानी भारत के सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में बदल गई।

हर्षद मेहता की कहानी केवल एक ऐसे शेयर दलाल की कहानी नहीं है जिसने बहुत पैसा कमाया। यह उस दौर के भारतीय बैंकिंग तंत्र, शेयर बाजार, सरकारी नियमों और उस व्यवस्था की कहानी है जिसमें बैंकिंग और शेयर बाजार के बीच पैसों का लेन-देन ऐसी जगह पहुंच गया था जिसकी कल्पना आम निवेशक ने कभी नहीं की थी। और यहां एक दिलचस्प बात है। अक्सर कहा जाता है कि हर्षद मेहता इतना पैसा कमाने लगा कि सरकार को टैक्स के नियम बदलने पड़े। इतिहास को थोड़ा करीब से देखें तो तस्वीर इससे ज्यादा जटिल है।

पहले समझिए, हर्षद मेहता इतना बड़ा कैसे बना?

हर्षद मेहता का जन्म 1954 में हुआ था। वह गुजरात से मुंबई आया और शुरुआत में छोटी-मोटी नौकरियां करने के बाद शेयर बाजार की दुनिया में पहुंचा। धीरे-धीरे उसने बाजार की बारीकियां सीखीं और एक शेयर दलाल के रूप में अपनी पहचान बनाई। उस दौर का शेयर बाजार आज जैसा नहीं था। न मोबाइल पर कुछ सेकंड में शेयर खरीदने की सुविधा थी, न हर निवेशक के हाथ में ऑनलाइन खाते थे और न ही आज जैसी निगरानी व्यवस्था। शेयरों की खरीद-बिक्री की प्रक्रिया काफी हद तक कागजों, दलालों और बैंकिंग व्यवस्था पर निर्भर थी। इसी व्यवस्था की कमजोरियों को हर्षद मेहता ने बहुत अच्छी तरह समझ लिया था। 1990 के आसपास भारतीय अर्थव्यवस्था भी बड़े बदलाव के दौर में थी। 1991 में देश गंभीर विदेशी मुद्रा संकट से गुजर रहा था। इसके बाद आर्थिक सुधार शुरू हुए। बाजार धीरे-धीरे खुलने लगा और शेयर बाजार को भी अर्थव्यवस्था में ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका मिलने लगी। यही वह समय था जब हर्षद मेहता का प्रभाव तेजी से बढ़ा।

शेयरों की कीमतें बढ़ती गईं और हर्षद "बिग बुल" बन गया

हर्षद मेहता कुछ चुनिंदा कंपनियों के शेयरों में बड़े पैमाने पर पैसा लगाता था। जब बड़ी मात्रा में खरीद होती, तो शेयरों की मांग बढ़ती और कीमत ऊपर जाने लगती। बाजार में बढ़ती कीमत देखकर दूसरे निवेशक भी उन शेयरों की तरफ आकर्षित होते। इससे मांग और बढ़ती। कीमतें और ऊपर जातीं। यह एक तरह का चक्र बन गया। हर्षद मेहता की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ शेयर चुनना नहीं थी। असली कहानी उस पैसे की थी जिससे वह बड़े पैमाने पर सौदे कर पा रहा था। यहीं शेयर बाजार और बैंकिंग व्यवस्था के बीच की वह कड़ी सामने आती है जिसने बाद में पूरे देश को हिला दिया।

बैंक का पैसा शेयर बाजार तक कैसे पहुंच गया?

1990 के दशक की शुरुआत में बैंकों के बीच सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद-बिक्री के लिए कई तरह की व्यवस्थाएं थीं। इसमें बैंक रसीद (Bank Receipt) जैसी व्यवस्था भी इस्तेमाल होती थी। कागज पर इसका काम वैध लेन-देन को आसान बनाना था। लेकिन व्यवस्था की कमजोरियों का इस्तेमाल करके पैसों को ऐसी जगह पहुंचाया जा सकता था जहां उनका इस्तेमाल नहीं होना चाहिए था। जांच में सामने आया कि कुछ बैंकों और दलालों के बीच ऐसे लेन-देन हुए जिनमें बैंकिंग व्यवस्था का पैसा शेयर बाजार में लगाया गया। हर्षद मेहता इस व्यवस्था का फायदा उठाने वाले सबसे चर्चित नामों में शामिल था। यहीं से उसकी कहानी सिर्फ "शेयर बाजार में सफल दलाल" की कहानी नहीं रह गई।

फिर आया वह दौर जब शेयरों की कीमतें आसमान छूने लगीं

1991 और 1992 के बीच भारतीय शेयर बाजार में जबरदस्त तेजी आई। हर्षद मेहता इस तेजी का सबसे चर्चित चेहरा बन गया। उस समय उसके बारे में ऐसी छवि बन गई थी कि वह बाजार की दिशा समझने वाला असाधारण खिलाड़ी है। उसका नाम कुछ बड़े शेयरों से जुड़ा और बाजार में तेजी का माहौल बनता गया। लेकिन किसी भी बाजार में कीमतें हमेशा एक ही दिशा में नहीं जातीं। जब शेयरों की कीमतें वास्तविक कारोबारी प्रदर्शन से बहुत दूर निकल जाती हैं, तो एक समय ऐसा आता है जब भरोसा टूटता है। 1992 में यही हुआ। और जब बाजार गिरना शुरू हुआ तो पता चलने लगा कि इस पूरी तेजी के पीछे सिर्फ निवेश का पैसा नहीं था। बैंकिंग व्यवस्था और शेयर बाजार के बीच पैसों का ऐसा जाल बन चुका था जिसकी जांच जरूरी थी।

1992 का घोटाला

पत्रकार सुचेता दलाल की रिपोर्टों ने इस मामले को सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में ला दिया। इसके बाद जांच शुरू हुई और बैंकिंग तथा शेयर बाजार से जुड़े कई लेन-देन सामने आने लगे। सरकार ने जांच कराई। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी मामले की जांच की। संसद की संयुक्त संसदीय समिति ने भी पूरे प्रकरण की पड़ताल की। सरकार ने जून 1992 में विशेष अदालत बनाने और संदिग्ध लोगों की संपत्तियां कब्जे में लेकर उनकी देखरेख के लिए कस्टोडियन नियुक्त करने की व्यवस्था की। संसद के रिकॉर्ड के अनुसार उस समय बड़ी संख्या में तलाशी और गिरफ्तारियां हुईं तथा कई लोगों और संस्थाओं की संपत्तियां अटैच की गईं। हर्षद मेहता की संपत्तियां भी इस कार्रवाई के दायरे में आईं। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

क्या सरकार ने सचमुच हर्षद मेहता की वजह से टैक्स नियम बदले?

1992 के बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने शेयर, प्रतिभूतियों, बांड और बैंक जमा जैसी वित्तीय संपत्तियों को संपत्ति कर से बाहर रखने का प्रस्ताव किया था। बजट भाषण में उन्होंने कहा था कि शेयरों के बहुत ऊंचे बाजार मूल्य के कारण लंबे समय के निवेशकों पर भारी बोझ पड़ सकता है और चेेलैया समिति ने उत्पादक संपत्तियों में निवेश बढ़ाने के लिए ऐसी वित्तीय संपत्तियों को संपत्ति कर से बाहर रखने की सिफारिश की थी। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर्षद मेहता ने बहुत पैसा कमाया और सरकार ने उसके कारण शेयरों पर टैक्स नियम बदल दिए। असल में वह कर बदलाव व्यापक आर्थिक और कर सुधारों का हिस्सा था। और एक बेहद दिलचस्प बात यह है कि यह बजट 29 फरवरी 1992 को आया था, यानी घोटाले के पूरी तरह सामने आने से पहले। इसलिए घटनाओं का सही क्रम समझना जरूरी है।

फिर हर्षद मेहता की वजह से क्या बदला?

जहां टैक्स की कहानी को सीधे हर्षद से जोड़ना सही नहीं है, वहीं शेयर बाजार के नियमों और निगरानी व्यवस्था पर 1992 के घटनाक्रम का असर बहुत बड़ा था। सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक था सेबी को कानूनी ताकत मिलना। सेबी 1988 में बनी थी, लेकिन शुरुआत में उसके पास आज जैसी वैधानिक ताकत नहीं थी। 1992 में संसद ने सेबी अधिनियम पारित किया और उसे प्रतिभूति बाजार को नियंत्रित करने, निवेशकों के हितों की रक्षा करने तथा बाजार से जुड़े लोगों और संस्थाओं को नियंत्रित करने की व्यापक शक्तियां मिलीं। कानून का उद्देश्य ही निवेशकों की सुरक्षा और प्रतिभूति बाजार के नियमन को मजबूत करना था। इसके बाद शेयर दलालों और सब-ब्रोकरों के लिए नियम बनाए गए। 1992 में सेबी ने स्टॉक ब्रोकर और सब-ब्रोकर नियम जारी किए। यानी जिस बाजार में पहले कई काम अपेक्षाकृत ढीली निगरानी में होते थे, वहां धीरे-धीरे औपचारिक नियमन मजबूत होने लगा।

1992 के बाद बाजार की पूरी व्यवस्था में कई बदलाव हुए। शेयर जारी करने की प्रक्रिया में सुधार हुआ। कंपनियों के लिए जानकारी सार्वजनिक करने के नियम मजबूत किए गए। शेयर दलालों की निगरानी बढ़ी। अंदरूनी कारोबार और कीमतों में हेरफेर जैसे मामलों को नियंत्रित करने की कोशिश तेज हुई। सेबी के अपने ऐतिहासिक विवरण में 1992 से 1996 के बीच हुए सुधारों में सेबी को वैधानिक शक्तियां मिलना, पूंजी जारी करने की पुरानी व्यवस्था खत्म होना और बाजार आधारित कीमत निर्धारण जैसी चीजें शामिल हैं। मई 1992 में ही सेबी ने स्टॉक एक्सचेंजों को छोटे और ज्यादा समान निपटान चक्र, दलालों के खातों की बेहतर जांच, निवेशक शिकायतों के तेजी से निपटारे, अंदरूनी कारोबार पर नियंत्रण और कीमतों में हेरफेर रोकने जैसे कदम उठाने को कहा था। यानी हर्षद मेहता प्रकरण के बाद केवल एक व्यक्ति की जांच नहीं हुई। पूरे बाजार के काम करने के तरीके पर सवाल उठा।

हर्षद मेहता की असली कमाई कितनी थी?

यह सवाल आज भी बहुत पूछा जाता है और यहीं सबसे ज्यादा भ्रम है। घोटाला सामने आने के बाद आयकर विभाग ने हर्षद मेहता के 1992-93 के आकलन में लगभग 2,014 करोड़ की कुल आय निर्धारित की थी। 1993-94 के लिए भी लगभग 1,396 करोड़ का आकलन किया गया। सुप्रीम कोर्ट के एक मामले के रिकॉर्ड में ये आंकड़े दर्ज हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि हर्षद मेहता ने सचमुच इतनी रकम अपनी जेब में मुनाफे के रूप में कमा ली थी।

आयकर विभाग की गणना में कई तरह की रकम और लेन-देन को आय माना गया था। बाद में लंबी कानूनी लड़ाई चली और इन आकलनों का बड़ा हिस्सा चुनौती में आया। 2019 में आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण ने मेहता परिवार के मामलों में 2,000 करोड़ से ज्यादा की अतिरिक्त आय संबंधी जोड़ हटा दिए थे। अदालत और कर विवादों में यह मुद्दा भी सामने आया कि हर लेन-देन की पूरी रकम को कर योग्य आय नहीं माना जा सकता। इसलिए इंटरनेट पर दिखाई देने वाला यह दावा कि "हर्षद मेहता ने 2,000 करोड़ कमा लिए थे" बहुत सावधानी से समझने की जरूरत है। वह एक समय आयकर विभाग द्वारा किए गए आकलन का आंकड़ा था, अंतिम रूप से उसकी जेब में आया हुआ मुनाफा नहीं।

उसे इतना बड़ा क्यों माना गया?

क्योंकि उसने एक ऐसे समय में बाजार में असाधारण प्रभाव पैदा किया था जब भारतीय शेयर बाजार तेजी से बदल रहा था। उसका नाम बाजार की तेजी का पर्याय बन गया था। उस समय निवेशकों का एक वर्ग यह मानने लगा था कि हर्षद मेहता जिस शेयर को खरीद रहा है, उसमें पैसा लगाना लगभग निश्चित सफलता का रास्ता है। यहीं बाजार मनोविज्ञान काम करता है। जब किसी बड़े खिलाड़ी की सफलता दिखाई देती है तो लोग उसके पीछे चलने लगते हैं। शेयर की कीमत बढ़ती है। बढ़ती कीमत देखकर और लोग आते हैं। फिर उस तेजी को देखकर मीडिया में चर्चा होती है और चर्चा से भरोसा और बढ़ सकता है। लेकिन शेयर की कीमत बढ़ना और कंपनी की वास्तविक कीमत बढ़ना हमेशा एक ही चीज नहीं होती। 1992 में जब बाजार का भरोसा टूटा तो यह अंतर बहुत साफ दिखाई दिया।

"बिग बुल" से घोटाले के आरोपी तक

हर्षद मेहता की सार्वजनिक छवि कुछ ही महीनों में पूरी तरह बदल गई। जिस व्यक्ति को कुछ समय पहले बाजार का जादूगर कहा जा रहा था, वही देश के सबसे बड़े वित्तीय घोटाले के केंद्र में आ गया। उसके खिलाफ कई मामले चले। उसकी संपत्तियां लंबे समय तक कानूनी विवादों में फंसी रहीं। हर्षद मेहता की मृत्यु 2001 में हुई, लेकिन उसके नाम से जुड़े कर और संपत्ति विवाद कई वर्षों तक चलते रहे। 2019 के आयकर अपीलीय फैसले ने उसके परिवार से जुड़े पुराने कर मामलों में एक बड़ा मोड़ दिया। यानी जिस कहानी को लोग 1992 में खत्म समझ रहे थे, उसका कानूनी अध्याय कई दशक तक चलता रहा।

आज का शेयर बाजार उस दौर से कितना अलग है?

आज किसी निवेशक के मोबाइल पर शेयर खरीदने के कुछ सेकंड बाद उसकी जानकारी इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था में दर्ज हो जाती है। शेयर कागज के प्रमाणपत्र के रूप में घर में रखे रहने के बजाय डीमैट व्यवस्था में रहते हैं। कारोबार का निपटान, दलालों की निगरानी, निवेशक शिकायतें और बाजार में संदिग्ध गतिविधियों की निगरानी के लिए कहीं ज्यादा विकसित ढांचा मौजूद है। यह पूरा ढांचा केवल हर्षद मेहता की वजह से नहीं बना। भारतीय शेयर बाजार में तकनीकी और नियामकीय बदलाव एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम हैं। लेकिन 1992 का घोटाला इस बदलाव के इतिहास में एक बड़ा मोड़ जरूर था।

जहां तक टैक्स नियमों का सवाल है, 1992 का वह बदलाव हर्षद मेहता के कारण नहीं हुआ था। शेयरों को संपत्ति कर से बाहर रखने का प्रस्ताव व्यापक कर सुधारों और उत्पादक वित्तीय संपत्तियों में निवेश को बढ़ावा देने की सोच का हिस्सा था।

हर्षद मेहता की कहानी इसलिए सिर्फ एक अमीर शेयर दलाल की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब भारत का शेयर बाजार पुराने कागजी और सीमित दायरे वाले बाजार से निकलकर आधुनिक पूंजी बाजार बनने की तरफ जा रहा था, और उसी रास्ते में उसे अपनी सबसे बड़ी कमजोरियों का सामना करना पड़ा। शायद इसी वजह से हर्षद मेहता का नाम आज भी भारतीय शेयर बाजार के इतिहास में बना हुआ है। वह सिर्फ इसलिए याद नहीं किया जाता कि उसने कितने पैसे के शेयर खरीदे या उसकी संपत्ति कितनी थी। उसे इसलिए याद किया जाता है क्योंकि उसकी कहानी के बाद बाजार के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया था: अगर एक आदमी व्यवस्था की कमजोरियों को इतनी दूर तक इस्तेमाल कर सकता है, तो खुद व्यवस्था कितनी मजबूत है?

1992 के बाद भारत ने इस सवाल का जवाब नियमों, सेबी की बढ़ी हुई ताकत, दलालों की निगरानी और बाजार की तकनीकी व्यवस्था को बदलकर देने की कोशिश की। और यही हर्षद मेहता की कहानी का वह हिस्सा है जो सिर्फ एक घोटाले से कहीं बड़ा है।

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