History of Alcohol: इंसान ने पहली बार शराब क्यों बनाई? 13,000 साल पुरानी कहानी

History of Alcohol: इंसान ने पहली बार शराब कैसे बनाई? जानिए 13,000 साल पुराने बीयर के प्रमाण, 9,000 साल पुरानी चीन की शराब, किण्वन की खोज और हर संस्कृति में शराब पहुंचने की कहानी।

Neel Mani Lal
Published on: 24 Aug 2026 7:31 PM IST
History of Alcohol Origin of Alcohol
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History of Alcohol Origin of Alcohol 

History of Alcohol: शराब को हम आज बीयर, वाइन, व्हिस्की, रम, वोदका या देसी शराब के नाम से जानते हैं। लेकिन इंसान के साथ इसका रिश्ता इन आधुनिक बोतलों से कहीं ज्यादा पुराना है। इतना पुराना कि जब इंसान ने शहर बसाने, लिखना सीखने और बड़े पैमाने पर खेती शुरू करने से भी पहले की दुनिया में कदम रखा था, तब भी वह अनाज, फल, शहद और दूसरे पौधों से बने नशीले पेय पी रहा था।

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोगों ने एक-दूसरे से सीखे बिना शराब जैसी चीजें बनाना शुरू कर दीं। चीन में चावल, शहद और फलों से बना फरमेंटेड (किण्वित) पेय मिला, पश्चिम एशिया में अनाज से बीयर बनी, भूमध्यसागर में अंगूर की शराब ने जगह बनाई, अफ्रीका में अलग-अलग अनाज और पेड़ों के रस से पेय बने और अमेरिका में मक्का से किण्वित पेय तैयार किए गए। यानी शराब किसी एक सभ्यता की खोज नहीं थी।

तो आखिर सवाल यह है कि इंसान ने पहली बार शराब बनाई ही क्यों? क्या उसने जानबूझकर नशे के लिए कोई पेय तैयार किया था या शराब गलती से खोजी गई? क्या शराब ने खेती और सभ्यता के विकास में कोई भूमिका निभाई? और दुनिया की लगभग हर संस्कृति में किसी न किसी रूप में शराब क्यों दिखाई देती है?

इस कहानी का जवाब इंसान की भूख, उसकी जिज्ञासा, प्रकृति के साथ उसके प्रयोग और दिमाग पर पड़ने वाले शराब के असर - इन चारों के मेल में छिपा है।

शराब किसने खोजी, इसका नाम नहीं पता

शराब का आविष्कार किसी एक व्यक्ति ने नहीं किया। हमारे पास ऐसा कोई पुराना रिकॉर्ड नहीं है जिसमें लिखा हो कि फलां व्यक्ति ने पहली बार शराब बनाई।

असल में इसकी खोज शायद किसी प्रयोगशाला में हुई ही नहीं थी। प्रकृति खुद शराब बनाने का काम पहले से कर रही थी।

जब किसी मीठे फल का रस या अनाज से निकली शर्करा कुछ खास परिस्थितियों में खमीर के संपर्क में आती है तो खमीर उस शर्करा को तोड़कर मुख्य रूप से अल्कोहल और कार्बन डाइऑक्साइड बनाता है। इस प्रक्रिया को किण्वन यानी fermentation कहते हैं।

आदिम इंसान को न खमीर के बारे में पता था, न शर्करा के रसायन के बारे में और न यह मालूम था कि सूक्ष्म जीव शराब पैदा कर रहे हैं। उसने बस इतना देखा होगा कि कोई मीठा फल या अनाज वाला मिश्रण कुछ समय पड़े रहने के बाद पहले जैसा नहीं रहा।

उसका स्वाद बदल गया, गंध बदल गई और उसे पीने के बाद शरीर और दिमाग पर भी अलग असर होने लगा।

यहीं से शायद कहानी शुरू हुई।

हो सकता है पहली शराब इंसान ने बनाई ही नहीं थी

यह शराब के इतिहास का सबसे मजेदार हिस्सा है।कल्पना कीजिए कि हजारों साल पहले किसी पेड़ से पका हुआ फल नीचे गिरा। फल टूट गया, उसमें मौजूद रस बाहर आया और कुछ समय तक गर्म और नम माहौल में पड़ा रहा। हवा और आसपास मौजूद सूक्ष्म जीवों की वजह से उसमें किण्वन शुरू हो गया। किसी इंसान ने उसे चखा होगा। फल मीठा तो था ही, लेकिन अब उसमें एक अलग स्वाद और हल्का नशा भी था।

ऐसी प्राकृतिक किण्वन प्रक्रिया आज भी प्रकृति में होती है। कुछ जानवर भी किण्वित फलों को खाते देखे गए हैं। इंसानों के पूर्वजों को भी प्राकृतिक रूप से हल्के किण्वित फल मिलते रहे होंगे, ऐसा वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है।

यानी संभव है कि शराब की पहली खोज “रेसिपी” से नहीं बल्कि संयोग से हुई हो।

बाद में इंसान ने यह समझना शुरू किया कि अगर किसी मीठी चीज को एक खास तरीके से रखा जाए तो ऐसा पेय दोबारा बनाया जा सकता है। यही वह मोड़ था जहां प्राकृतिक किण्वन धीरे-धीरे इंसानी तकनीक बन गया।

अब तक मिली सबसे पुरानी शराब कितनी पुरानी है?

यहां अक्सर इंटरनेट पर एक भ्रम दिखाई देता है कि “सबसे पहली शराब 9,000 साल पुरानी थी।” कहानी थोड़ी ज्यादा दिलचस्प है। चीन के जियाहू क्षेत्र में करीब 9,000 साल पुराने बर्तनों से चावल, शहद और फलों से बने किण्वित पेय के संकेत मिले हैं। यह दुनिया में शराब जैसे पेय के सबसे पुराने मजबूत प्रमाणों में शामिल है।

लेकिन बीयर की कहानी इससे भी पीछे जाती दिखाई देती है।

इजरायल की रक़ेफेत गुफा में नाटुफियन लोगों से जुड़े अवशेषों में करीब 13,000 साल पुराने बीयर जैसे पेय के संकेत मिले हैं। शोधकर्ताओं ने पत्थर के बर्तनों में अनाज से जुड़े अवशेषों का अध्ययन किया और अनुमान लगाया कि वहां अनाज को अंकुरित करके, पीसकर, गर्म करके और फिर किण्वित करके एक बीयर जैसा पेय बनाया जाता था।

लेकिन यहां एक सावधानी जरूरी है। 13,000 साल पुरानी बीयर का मतलब यह नहीं कि उस समय के लोग आज वाली ठंडी, झागदार बीयर पीते थे। वह पेय शायद काफी गाढ़ा था और आज की बीयर से स्वाद और रूप में बहुत अलग रहा होगा।

क्या बीयर शराब से भी पुरानी हो सकती है?

यह सवाल थोड़ा अजीब लगेगा, क्योंकि बीयर खुद शराब है। लेकिन यहां बात शराब के अलग-अलग रूपों की है।

पुराने प्रमाणों के आधार पर बीयर जैसे अनाज वाले पेय की कहानी बहुत पुरानी है। इजरायल के करीब 13,000 साल पुराने प्रमाण इसके लिए अहम हैं। चीन में लगभग 9,000 साल पुराना मिश्रित किण्वित पेय मिला है और अंगूर से शराब बनाने की परंपरा भी हजारों साल पुरानी है।

असल में शुरुआती इंसान के लिए “बीयर” और “वाइन” आज की तरह अलग-अलग उद्योग नहीं थे। वह आसपास मिलने वाली चीजों से किण्वित पेय बना रहा था।

जहां अनाज आसानी से मिलता था, वहां अनाज से पेय बना। जहां अंगूर या दूसरे मीठे फल ज्यादा थे, वहां उनसे शराब बनी। जहां शहद मिलता था, वहां शहद का इस्तेमाल हुआ। यानी शराब का रूप जगह के खाने और खेती पर निर्भर था।

इंसान ने शराब बनाई ही क्यों? सिर्फ नशे के लिए?

यह मान लेना आसान है कि इंसान ने शराब सिर्फ इसलिए बनाई क्योंकि उसे नशा पसंद था। नशा निश्चित रूप से एक बड़ा कारण रहा होगा। शराब दिमाग पर असर डालती है, इसलिए लोगों को उसका अनुभव आकर्षक लग सकता था। लेकिन शुरुआती समाजों में शराब की उपयोगिता इससे कहीं ज्यादा थी।

किण्वन खाने-पीने की चीजों को बदल देता है। कुछ मामलों में इससे उन्हें लंबे समय तक रखने में मदद मिल सकती थी। अनाज को किण्वित करने से उसके पोषण की प्रकृति भी बदलती थी। प्राचीन मेसोपोटामिया में बीयर रोजमर्रा के भोजन और सामाजिक जीवन का हिस्सा थी।

यानी शराब हमेशा मस्ती की चीज नहीं थी। कई समाजों में यह भोजन, सामाजिक समारोह, धार्मिक रस्म, मेहमाननवाजी और व्यापार का हिस्सा बन गई।

शायद शराब ने इंसान को एक साथ बैठना सिखाया

यह विचार इतिहास में काफी दिलचस्प है। मानव समाज में सामूहिक दावतों की भूमिका बहुत पुरानी है। लोग साथ बैठकर खाना खाते हैं, पेय साझा करते हैं, रस्में करते हैं और रिश्ते मजबूत करते हैं।

किण्वित पेय इन सामूहिक आयोजनों का हिस्सा बन गए।

प्राचीन मेसोपोटामिया में बीयर का सामाजिक और धार्मिक महत्व था। सुमेरियन सभ्यता में बीयर बनाने से जुड़ी देवी निनकासी का उल्लेख मिलता है और करीब 4,000 साल पुराने एक प्रसिद्ध सुमेरियन पाठ में बीयर बनाने की प्रक्रिया का काव्यात्मक वर्णन भी मिलता है।

यानी शराब इतनी महत्वपूर्ण हो चुकी थी कि उसके लिए देवता तक मौजूद थे। यह बताता है कि शराब सिर्फ पीने की चीज नहीं रही थी। वह संस्कृति का हिस्सा बन चुकी थी।

सुमेर में बीयर की पूरी रेसिपी तक लिखी गई

लगभग 4,000 साल पुराने सुमेरियन “हिम्न टू निनकासी” को बीयर बनाने की एक तरह की प्राचीन रेसिपी माना जाता है।

इसमें अनाज को तैयार करने, माल्ट बनाने, पानी में मिलाने और किण्वन जैसी प्रक्रियाओं का वर्णन मिलता है। हालांकि प्राचीन पाठों की भाषा और शब्दों को समझना आसान नहीं है, इसलिए यह कहना मुश्किल है कि उस समय की बीयर बिल्कुल किस स्वाद और ताकत की होती थी।

एक और दिलचस्प बात यह है कि प्राचीन मेसोपोटामिया में बीयर को बड़े बर्तन से साझा करके पीने की परंपरा भी थी। बाद में अलग-अलग पीने के बर्तनों का इस्तेमाल बढ़ा। पुरातत्वविदों के लिए ये बर्तन सिर्फ शराब पीने की चीजें नहीं हैं; वे समाज में बदलते रिश्तों, दर्जे और सामाजिक व्यवहार की कहानी भी बताते हैं।

क्या शराब ने खेती शुरू करवाने में मदद की?

यह इतिहास का सबसे दिलचस्प सवाल है और इसका जवाब अभी पूरी तरह तय नहीं है। कृषि शुरू होने के पीछे कई कारण थे - भोजन की जरूरत, आबादी का बढ़ना, मौसम और पर्यावरण में बदलाव, पौधों और जानवरों को नियंत्रित करने की कोशिश आदि।

लेकिन कुछ शोधकर्ताओं ने यह विचार रखा है कि शुरुआती समाजों में किण्वित पेय और सामूहिक दावतें भी खेती के विकास से जुड़ी हो सकती हैं। यानी लोग अनाज सिर्फ रोटी या दलिया के लिए नहीं, बल्कि बीयर जैसे पेय बनाने के लिए भी चाहते रहे होंगे। संभव है कि शराब ने खेती से जुड़ी शुरुआती अर्थव्यवस्था और सामाजिक आयोजनों में एक भूमिका निभाई हो।

शराब हर संस्कृति में क्यों दिखाई देती है?

चीन में किण्वित पेय, पश्चिम एशिया में बीयर, मिस्र में बीयर और वाइन, ग्रीस में वाइन, रोम में वाइन, अफ्रीका में अनाज और ताड़ से बने पेय, अमेरिका में मक्का से बने किण्वित पेय - इतनी अलग-अलग संस्कृतियों में शराब क्यों?

इसका सबसे सीधा जवाब है कि किण्वन के लिए इंसान को किसी जादुई तकनीक की जरूरत नहीं थी।

जहां शर्करा मौजूद है और सही तापमान व वातावरण मिलता है, वहां सूक्ष्म जीव किण्वन शुरू कर सकते हैं।

इंसान ने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग पौधे उगाए, लेकिन लगभग हर समाज के पास किसी न किसी रूप में मीठे फल, अनाज, शहद, जड़ें या पौधों के रस मौजूद थे।

इसलिए अलग-अलग जगहों पर रहने वाले लोगों ने स्वतंत्र रूप से किण्वन की खोज कर ली। यही कारण है कि शराब किसी एक सभ्यता की संपत्ति नहीं बनी।

यूरोप में वाइन इतनी महत्वपूर्ण कैसे हो गई?

भूमध्यसागर के आसपास अंगूर की खेती के लिए मौसम अच्छा था। इसलिए वहां वाइन की संस्कृति मजबूत हुई।

प्राचीन ग्रीस में वाइन सिर्फ नशे का पेय नहीं थी। वह सामाजिक जीवन, दावतों और धार्मिक परंपराओं का हिस्सा थी। बाद में रोमनों ने अंगूर की खेती और वाइन बनाने की परंपरा को अपने विशाल साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों तक फैलाया।

यही वजह है कि आज फ्रांस, इटली, स्पेन और यूरोप के दूसरे हिस्सों की शराब संस्कृति को समझने के लिए रोमन साम्राज्य का इतिहास भी समझना पड़ता है।

मिस्र में बीयर आम लोगों का पेय थी

प्राचीन मिस्र में बीयर का इस्तेमाल काफी व्यापक था। अनाज आधारित पेय होने की वजह से यह उन समाजों में भी उपयोगी था जहां अंगूर की खेती हर जगह संभव नहीं थी। शराब यानी वाइन कई जगहों पर ज्यादा प्रतिष्ठित पेय बन गई, जबकि बीयर आम लोगों के दैनिक जीवन से जुड़ी रही।

इसका एक कारण यह भी था कि बीयर अनाज से बनाई जा सकती थी और अनाज खेती करने वाले समाजों में आसानी से उपलब्ध था। प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया में बीयर के महत्व के कई प्रमाण मिलते हैं।

भारत में भी शराब कोई नई चीज नहीं है

भारत की कहानी भी इस मामले में बाकी दुनिया से अलग नहीं है। प्राचीन भारतीय साहित्य में सुरा जैसे किण्वित पेयों का उल्लेख मिलता है। बाद के दौर में अलग-अलग इलाकों में अनाज, फल, ताड़ के रस और दूसरे स्थानीय स्रोतों से बने पेय इस्तेमाल होते रहे।

भारत जैसे विशाल देश में शराब की परंपरा एक जैसी नहीं रही। अलग-अलग इलाकों, समुदायों और समय के हिसाब से पेय और उनका सामाजिक महत्व बदलता रहा।

दिलचस्प बात यह है कि शराब का इतिहास यहां सिर्फ “शराब पीने” का इतिहास नहीं है। यह खेती, स्थानीय पेड़-पौधों, व्यापार, सामाजिक नियमों और राज्य की नीतियों से भी जुड़ा रहा है। औपनिवेशिक दौर में शराब पर कर और नियंत्रण की नीतियां भी शासन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनीं।

इसलिए भारत में शराब की कहानी को समझने के लिए सिर्फ धार्मिक ग्रंथों को देखना पर्याप्त नहीं होगा। पुरातत्व, साहित्य, व्यापार और प्रशासनिक इतिहास, सबको साथ देखना पड़ता है।

शराब को देवताओं से क्यों जोड़ा गया?

आज हमें पता है कि किण्वन एक जैविक प्रक्रिया है। खमीर शर्करा को बदलता है और अल्कोहल पैदा होता है।

लेकिन हजारों साल पहले किसी इंसान को यह कैसे समझ आता? उसने देखा कि मीठा रस कुछ दिनों में बदल गया। उसमें बुलबुले आए। उसका स्वाद बदल गया। और उसे पीने के बाद दिमाग की हालत भी बदल गई।

उस दौर में यह लगभग जादू जैसा अनुभव रहा होगा। यही वजह है कि कई सभ्यताओं में शराब और धार्मिक रस्मों के बीच मजबूत संबंध बना।

सुमेर में बीयर की देवी निनकासी का उल्लेख मिलता है। ग्रीक दुनिया में वाइन का संबंध डायोनिसस से था। अलग-अलग संस्कृतियों में किण्वित पेयों को देवताओं, पूजा और उत्सवों से जोड़ा गया। शराब का नशा भी लोगों को ऐसी मानसिक अवस्था देता था जिसे वे सामान्य अनुभव से अलग मान सकते थे।

शराब को बचाकर रखना भी एक समस्या थी

आज हमारे पास फ्रिज, कांच की बोतलें, स्टील के टैंक और आधुनिक संरक्षण तकनीक है।

प्राचीन इंसान के पास इनमें से कुछ नहीं था।

किण्वित पेय जल्दी खराब भी हो सकते थे। इसलिए कई समाजों में शराब बनाना लगातार चलने वाली गतिविधि रही होगी। मेसोपोटामिया के बारे में शोध से पता चलता है कि बीयर वहां रोजमर्रा की जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। शराब को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की तकनीक धीरे-धीरे विकसित हुई। बर्तन, लकड़ी के पीपे, अलग-अलग किण्वन तकनीक और बाद में आसवन ने शराब की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया।

व्हिस्की, रम और वोदका बहुत बाद की कहानी हैं

एक बात जो अक्सर लोगों को हैरान करती है वह यह है कि शराब और डिस्टिल्ड शराब एक ही चीज नहीं हैं।

बीयर और वाइन जैसे पेय किण्वन से बनाए जा सकते हैं। लेकिन व्हिस्की, रम, वोदका और ब्रांडी जैसी मजबूत शराब बनाने के लिए आसवन यानी distillation की जरूरत पड़ती है।

आसवन एक ज्यादा जटिल तकनीक है और इसका व्यापक विकास किण्वित पेयों के हजारों साल बाद हुआ। Smithsonian के अनुसार बीयर और वाइन जैसे किण्वित पेय आसुत शराब से काफी पुराने हैं, जबकि डिस्टिल्ड स्पिरिट्स का विकास मध्यकालीन दुनिया से जुड़ा है।

यानी इंसान ने पहले शराब बनाई, फिर बहुत बाद में उसे ज्यादा मजबूत बनाने की तकनीक विकसित की।

इंसान को आखिर शराब का नशा अच्छा क्यों लगता है?

यह सवाल सिर्फ इतिहास का नहीं, विज्ञान का भी है।

शराब दिमाग में कई तरह के न्यूरोट्रांसमीटर सिस्टम पर असर डालती है। इससे कुछ समय के लिए तनाव और झिझक कम महसूस हो सकती है, व्यक्ति ज्यादा खुला हुआ महसूस कर सकता है और मूड में बदलाव आ सकता है। यही अनुभव इंसानों को शराब की तरफ खींचता रहा होगा। लेकिन यही उसका खतरा भी है।

जो चीज थोड़ी मात्रा में कुछ लोगों को आराम या खुशी का अनुभव दे सकती है, वही ज्यादा मात्रा में निर्णय लेने की क्षमता, संतुलन और व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। लंबे समय तक ज्यादा शराब पीना शरीर और दिमाग दोनों के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

इसलिए शराब के इतिहास को सिर्फ “इंसान को नशा पसंद था” कहकर खत्म करना गलत होगा।

शराब इतनी टिकाऊ क्यों साबित हुई?

दुनिया में बहुत से खाने और पेय आए और चले गए। लेकिन शराब हजारों साल बाद भी मौजूद है।

इसका कारण शायद यह है कि शराब ने एक साथ कई भूमिकाएं निभाईं।

यह पेय थी। यह भोजन और पोषण का हिस्सा बनी। यह सामाजिक समारोहों में इस्तेमाल हुई। धार्मिक रस्मों में पहुंची। मेहमाननवाजी का हिस्सा बनी। व्यापार की वस्तु बनी। सत्ता और कर व्यवस्था का हिस्सा बनी और बाद में बड़े उद्योग में बदल गई। दूसरे शब्दों में कहें तो शराब सिर्फ एक पेय नहीं रही; वह इंसानी संस्कृति की एक संस्था बन गई।

क्या इंसान शराब के बिना भी सभ्यता बना सकता था?

यह कहना गलत होगा कि शराब ने सभ्यता बनाई। मानव सभ्यता के विकास के पीछे खेती, जल, तकनीक, व्यापार, भाषा, सामाजिक संगठन, युद्ध, पर्यावरण और हजारों दूसरे कारण थे। लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि शराब का कोई महत्व नहीं था। पुरातत्व से साफ दिखाई देता है कि किण्वित पेय कई शुरुआती समाजों में महत्वपूर्ण थे। मेसोपोटामिया में बीयर सामाजिक और धार्मिक जीवन का हिस्सा थी। चीन में हजारों साल पहले मिश्रित किण्वित पेय मौजूद थे। नाटुफियन लोगों के पास करीब 13,000 साल पहले बीयर जैसी चीज बनाने की तकनीक थी। इससे पता चलता है कि शराब इंसान की कहानी के साथ बहुत शुरुआती दौर से चल रही है।

तो आखिर इंसान ने पहली बार शराब क्यों बनाई?

शायद इसका जवाब किसी एक कारण में नहीं है।

शायद शुरुआत गलती से हुई।

किसी फल का रस अपने आप किण्वित हुआ होगा। किसी इंसान ने उसे चखा होगा और उसे नया स्वाद और नया असर महसूस हुआ होगा।

फिर इंसान ने प्रयोग किया होगा।

उसने देखा होगा कि फल को कुछ समय रखने से क्या होता है। अनाज को भिगोने और अंकुरित करने से क्या होता है। शहद और पानी को रखने से क्या होता है। अलग-अलग चीजों को मिलाने पर क्या होता है।

धीरे-धीरे संयोग तकनीक बना।

फिर तकनीक संस्कृति बनी।

फिर संस्कृति ने उसे धर्म, उत्सव, भोजन, व्यापार और सामाजिक जीवन से जोड़ दिया।

और हजारों साल बाद वही किण्वन प्रक्रिया आज दुनिया के सबसे बड़े पेय उद्योगों में से एक बन गई।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि जब इंसान ने पहली बार शराब बनाई होगी, उसे यह बिल्कुल पता नहीं रहा होगा कि वह खमीर नाम के सूक्ष्म जीव को काम पर लगा रहा है। उसे यह भी नहीं मालूम रहा होगा कि शर्करा से अल्कोहल बनने की रासायनिक प्रक्रिया क्या है।

वह बस प्रकृति को देख रहा था और उसके साथ प्रयोग कर रहा था।

करीब 13,000 साल पुराने बीयर के प्रमाण से लेकर आज की आधुनिक शराब बनाने वाली फैक्ट्रियों तक की यात्रा दरअसल इंसान की एक बहुत पुरानी आदत की कहानी है—जो चीज प्रकृति करती हुई दिखे, उसे समझो, दोहराओ और आखिर में उसे अपने काम की तकनीक बना लो।

और शायद यही वजह है कि शराब का इतिहास इतना पुराना होने के बावजूद खत्म नहीं हुआ।

इंसान ने शराब की खोज सिर्फ नशे के लिए नहीं की थी। उसने किण्वन की खोज की थी। नशा उसकी सबसे यादगार देन बन गया।

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