Home Vastu: घर के बीच में खाली जगह क्यों छोड़ी जाती थी, इस पर वास्तु और विज्ञान क्या कहते हैं?

Brahmasthan Vastu Explained: पुराने भारतीय घरों में बीच में आंगन या ब्रह्मस्थान क्यों बनाया जाता था? जानिए वास्तु की परंपरा और आंगन के पीछे छिपे प्राकृतिक प्रकाश, वेंटिलेशन, तापीय आराम, निजता और सामाजिक उपयोग के वैज्ञानिक पहलू।

Yogesh Mishra
Published on: 25 Sept 2026 5:40 PM IST
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Brahmasthan Vastu Explained in Hindi: पुराने भारतीय घरों, हवेलियों और दक्षिण भारत के परंपरागत आवासों को देखें तो एक बात बार-बार दिखाई देती है। मकान चारों तरफ बना है, लेकिन उसके ठीक बीच में आंगन या खुला स्थान छोड़ा गया है। कई घरों में यह जगह इतनी महत्वपूर्ण थी कि उसके चारों ओर कमरों, बरामदों और रास्तों की पूरी संरचना तय होती थी। वास्तु परंपरा में भवन के केंद्रीय क्षेत्र को ‘ब्रह्मस्थान’ कहा गया और इसे अपेक्षाकृत खुला, हल्का तथा अवरोध-मुक्त रखने की धारणा विकसित हुई।

आधुनिक वास्तुकला में इसी तरह की व्यवस्था को केंद्रीय आंगन कहा जाता है। ब्रह्मस्थान एक धार्मिक और दार्शनिक अवधारणा भी है, जबकि आंगन एक भौतिक वास्तु तकनीक है। फिर भी दोनों के बीच एक दिलचस्प मेल दिखाई देता है। घर के बीच में खुली जगह रखने से प्रकाश, हवा, तापमान और पारिवारिक गतिविधियों के लिए उपयोगी स्थान मिल सकता है।

यहीं से असली सवाल उठता है। जब जमीन आज की तरह महंगी थी और पुराने समय में भी बड़ा मकान बनाना आसान नहीं था, तब लोगों ने घर के सबसे केंद्रीय हिस्से को खाली क्यों छोड़ा? क्या यह केवल वास्तु की धार्मिक मान्यता थी या इसके पीछे कोई ऐसा विज्ञान भी था जिसे आज हम प्रकाश, वेंटिलेशन और तापीय आराम (thermal relief) की भाषा में समझ सकते हैं?

ब्रह्मस्थान वास्तव में क्या है?

परंपरागत वास्तु-विचार में भवन को एक ज्यामितीय मंडल में विभाजित करके उसके मध्य क्षेत्र को विशेष महत्व दिया गया। इसी केंद्रीय क्षेत्र को ब्रह्मस्थान कहा गया। सामान्य अर्थ में इसे भवन के बीच का ऐसा हिस्सा माना गया जहां भारी निर्माण या अनावश्यक अवरोध कम रखे जाते थे। लेकिन हर ब्रह्मस्थान खुली छत वाला आंगन नहीं होता और हर आधुनिक आंगन ब्रह्मस्थान नहीं है। बड़े पारंपरिक घरों में दोनों अक्सर एक-दूसरे से मिल जाते थे, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों और भवनों में उनकी संरचना अलग रही। कहीं पूरा मध्य भाग आसमान के लिए खुला था, कहीं केंद्रीय हिस्सा बरामदे या हल्के ढांचे से घिरा था और कहीं एक ही घर में कई आंगन होते थे।

पुराने लोगों ने घर का सबसे कीमती हिस्सा खाली क्यों छोड़ा?

आज किसी व्यक्ति के पास 2,000 वर्ग फुट का छोटा प्लॉट हो तो वह आमतौर पर जमीन के अधिक से अधिक हिस्से पर कमरा बनाना चाहेगा। बीच में 300 या 400 वर्ग फुट खुला छोड़ना उसे जगह की बर्बादी लग सकता है। लेकिन पुराने घर की परिस्थितियां बिल्कुल अलग थीं।

तब बिजली के पंखे, वातानुकूलन, शक्तिशाली कृत्रिम रोशनी और यांत्रिक वेंटिलेशन जैसी सुविधाएं नहीं थीं। घनी बस्ती में अगर मकान चारों ओर से बंद बना दिया जाता तो उसके बीच के कमरे अंधेरे और हवा रहित हो सकते थे। इस समस्या का समाधान था, घर को केवल बाहर की ओर नहीं बल्कि भीतर की ओर भी खोलना। आंगन इसलिए सिर्फ ‘खाली जगह’ नहीं था। वह घर की प्राकृतिक रोशनी और हवा की व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा था। आसपास के कमरों के दरवाजे और खिड़कियां आंगन की तरफ खुलती थीं। इससे सड़क की ओर बड़ी खिड़कियां दिए बिना भी घर के अंदर प्रकाश और हवा पहुंच सकती थी। यानी जिस जगह को आज हम खाली जमीन कह सकते हैं, वह पुराने मकान में वास्तव में भवन की प्राकृतिक पर्यावरण व्यवस्था का हिस्सा थी।

आंगन घर में हवा कैसे चलाता था?

इसका संबंध तापमान और हवा की गति से है। गर्म हवा सामान्यतः ऊपर उठती है। यदि घर में पर्याप्त ऊंचाई वाला खुला हिस्सा हो तो गर्म हवा ऊपर की ओर निकल सकती है और डिजाइन के अनुसार दूसरे खुले हिस्सों से हवा का आवागमन हो सकता है। इसे चिमनी प्रभाव के रूप में समझा जा सकता है। अगर आंगन के आसपास अलग-अलग दिशाओं में दरवाजे, खिड़कियां या अन्य खुले हिस्से हों तो क्रॉस वेंटिलेशन भी बढ़ सकता है। इस तरह आंगन घर के भीतर हवा के आने-जाने का रास्ता बना सकता है।

लेकिन ये भी ध्यान रखिये कि सिर्फ मकान के बीच में खुला स्थान बना देने से हर घर अपने आप ठंडा नहीं हो जाता। आंगन की चौड़ाई और ऊंचाई, बाहरी हवा की दिशा, सूर्य की स्थिति, आसपास की दीवारों की ऊंचाई, खिड़कियों की स्थिति और स्थानीय जलवायु, सब मिलकर तय करते हैं कि हवा वास्तव में कितनी चलेगी। गलत अनुपात वाला आंगन उलटा गर्मी जमा करने वाला स्थान भी बन सकता है। इसलिए पारंपरिक आंगन की सफलता सिर्फ उसके अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसकी ज्यामिति और पूरे घर के साथ उसके संबंध में थी।

लखनऊ के पुराने घरों में यह व्यवस्था क्यों उपयोगी थी?

उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में गर्मी, मानसून और सर्दी तीनों का सामना करना पड़ता है। इसलिए यहां का पारंपरिक मकान केवल गर्मी से बचने के लिए नहीं बनाया जाता था। मोटी दीवारें, छज्जे, नियंत्रित बाहरी खुलाव और अंदर का आंगन मिलकर मौसम के अनुसार अलग-अलग तरह से काम करते थे। लखनऊ और वाराणसी जैसे शहरों के पारंपरिक आंगन वाले घरों पर हुए वास्तु संबंधी अध्ययनों में आंगन के आकार, उसकी ऊंचाई, सूर्य के प्रकाश और आसपास के कमरों के तापीय व्यवहार के बीच संबंध देखा गया है। सामान्य निष्कर्ष यह है कि सही अनुपात वाला आंगन प्राकृतिक प्रकाश और तापीय आराम में मदद कर सकता है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हर आंगन का परिणाम एक जैसा नहीं होता। यानी पुराने वास्तु का रहस्य केवल ‘बीच में आंगन’ नहीं था। असली बात थी, आंगन कितना बड़ा हो, कितना गहरा हो, किस दिशा में हो, उसके ऊपर कितनी छाया हो और उसके चारों तरफ के कमरे कैसे व्यवस्थित हों।

रात में आंगन का व्यवहार और भी दिलचस्प होता है

दिन में भवन की दीवारें, छत और फर्श सूर्य से ऊर्जा ग्रहण करते हैं। रात में खुले आकाश के संपर्क में मौजूद सतहें विकिरण के जरिए ऊष्मा छोड़ सकती हैं। गर्म और शुष्क जलवायु में अगर रात की हवा भी ठंडी हो तो आंगन और उसके आसपास की भारी दीवारें अपेक्षाकृत ठंडी हो सकती हैं। अगले दिन यही भारी दीवारें अंदर के तापमान को तेजी से बढ़ने से रोकने में मदद कर सकती हैं। इसे तापीय द्रव्यमान के प्रभाव के रूप में समझा जाता है।

राजस्थान, गुजरात और उत्तर भारत के कई पारंपरिक मकानों में मोटी दीवार, छाया, आंगन और रात की हवा एक संयुक्त व्यवस्था की तरह काम कर सकते थे। हालांकि गर्म और आर्द्र क्षेत्रों में आंगन का आदर्श स्वरूप अलग हो सकता है। वहां हवा का आवागमन अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। इसीलिए भारत की आंगन परंपरा को किसी एक ‘वास्तु फार्मूले’ से समझना ठीक नहीं है। अलग-अलग जलवायु ने अलग-अलग प्रकार के आंगन और भवन संरचनाएं पैदा कीं।

घर के बीच में धूप आने का फायदा क्या था?

आंगन का दूसरा बड़ा लाभ प्राकृतिक प्रकाश था। पुराने घने मोहल्लों में घर एक-दूसरे से सटे रहते थे। बाहरी दीवार में बड़ी खिड़कियां देना हर जगह संभव नहीं था। ऐसे में घर को बाहर की बजाय भीतर की ओर खोलना अधिक व्यावहारिक था। आंगन से आने वाला प्रकाश बरामदों और कमरों तक पहुंच सकता था। दीवारों और फर्श से परावर्तित रोशनी भी अंदर के हिस्सों को उजाला देती थी। इस तरह दिन में कृत्रिम रोशनी की जरूरत कम हो सकती थी। आधुनिक भवन विज्ञान भी आंतरिक आंगन को प्राकृतिक प्रकाश और वेंटिलेशन उपलब्ध कराने वाली वास्तु व्यवस्था के रूप में स्वीकार करता है। भवन की ऊंचाई और उपयोग के अनुसार आंगन के आकार को नियंत्रित करना जरूरी होता है, क्योंकि बहुत छोटा आंगन पर्याप्त रोशनी नहीं देगा और बहुत गहरा आंगन भी प्रभावी नहीं हो सकता। यानी आज का भवन विज्ञान ‘ब्रह्मस्थान’ की आध्यात्मिक अवधारणा को प्रमाणित नहीं करता, लेकिन केंद्रीय खुले स्थान के कई भौतिक लाभों को माप सकता है।

आंगन सिर्फ हवा और रोशनी के लिए नहीं था

पुराने संयुक्त परिवार में आंगन घर का साझा जीवन भी था। सुबह की पूजा, बच्चों का खेलना, घरेलू काम, अनाज सुखाना, कपड़े सुखाना, परिवार का बैठना और त्योहारों की गतिविधियां, बहुत कुछ इसी जगह होता था। यह पूरी तरह सार्वजनिक भी नहीं था और पूरी तरह निजी भी नहीं। सड़क और निजी कमरों के बीच यह एक अर्ध-निजी साझा क्षेत्र था। इस व्यवस्था से निजता भी मिलती थी। बाहरी सड़क की तरफ अपेक्षाकृत कम और छोटी खिड़कियां रखी जा सकती थीं, जबकि घर के कमरे अंदर आंगन की ओर खुल सकते थे। इससे हवा और प्रकाश मिलते थे, लेकिन बाहरी लोगों की सीधी नजर से परिवार का जीवन कुछ हद तक सुरक्षित रहता था। इसलिए आंगन को केवल तापमान नियंत्रित करने वाली तकनीक मानना भी अधूरा होगा। वह सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा भी था।

क्या ‘ब्रह्मस्थान की ऊर्जा’ वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है?

यहां वास्तु और विज्ञान की सीमा साफ रखना जरूरी है। वास्तु परंपरा ब्रह्मस्थान को भवन का विशेष ऊर्जा केंद्र मान सकती है और उससे धार्मिक, ब्रह्मांडीय या शुभ-अशुभ अर्थ जोड़ सकती है। लेकिन आधुनिक भौतिकी और भवन विज्ञान में ऐसी कोई स्थापित, मापी जा सकने वाली ‘ब्रह्मस्थान ऊर्जा’ ज्ञात नहीं है जो घर के केंद्र से निकलती हो और परिवार के धन, स्वास्थ्य या भाग्य को सीधे प्रभावित करती हो।

इसलिए यह कहना कि घर के बीच में भारी अलमारी रखने से कोई अदृश्य ऊर्जा रुक जाएगी और परिवार की आर्थिक प्रगति प्रभावित होगी, या केंद्रीय हिस्से में शौचालय होने से निश्चित बीमारी पैदा होगी, ऐसे कारण-परिणाम संबंधों का वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। लेकिन इसका ये मतलब भी नहीं कि ब्रह्मस्थान की पूरी परंपरा इसलिए निरर्थक थी। हो सकता है कि लंबे समय के वास्तु अनुभव से विकसित कुछ व्यावहारिक नियम बाद में धार्मिक और दार्शनिक भाषा में व्यक्त किए गए हों।

एक ही व्यवस्था, लेकिन दो अलग व्याख्याएं

मान लीजिए किसी पारंपरिक नियम में कहा जाता है कि घर के बीच का हिस्सा भारी और पूरी तरह बंद नहीं होना चाहिए। वास्तु इसकी व्याख्या ऊर्जा के प्रवाह से कर सकता है। विज्ञान उस अदृश्य ऊर्जा की पुष्टि नहीं करता। लेकिन भवन विज्ञान यह जरूर कह सकता है कि अगर घर की पूरी प्रकाश और हवा व्यवस्था केंद्रीय आंगन पर निर्भर है और आपने उसी हिस्से को भारी निर्माण से बंद कर दिया, तो आसपास के कमरों का प्राकृतिक प्रकाश और वायु संचार प्रभावित हो सकता है। नतीजा कुछ हद तक समान दिखाई दे सकता है, लेकिन कारण अलग हैं। एक सांस्कृतिक और दार्शनिक व्याख्या है। दूसरी मापी जा सकने वाली भौतिक प्रक्रिया।

वास्तु की वैज्ञानिक चर्चा का उपयोगी तरीका यही है कि जहां कोई पारंपरिक नियम प्रकाश, हवा, ताप, दिशा, जल निकासी या संरचना जैसे वास्तविक भौतिक कारकों से जुड़ता है, वहां उसके पीछे का वास्तु विज्ञान खोजा जाए। लेकिन जहां कोई नियम धन, बीमारी, संतान, भाग्य या अदृश्य ऊर्जा के निश्चित परिणामों का दावा करता है, वहां उसके लिए अलग वैज्ञानिक प्रमाण की जरूरत होगी।

क्या आज के फ्लैट में भी बीच का हिस्सा खाली रखना जरूरी है?

आधुनिक अपार्टमेंट में पर्याप्त खिड़कियां, बालकनी, यांत्रिक वेंटिलेशन, कृत्रिम प्रकाश और ताप नियंत्रण मौजूद हो सकते हैं। इसलिए केवल इसलिए कि कोई जगह घर के ज्यामितीय केंद्र में है, उसे खाली रखना वैज्ञानिक आवश्यकता नहीं है। बहुमंजिला भवन में केंद्रीय हिस्सा लिफ्ट, सीढ़ियों, सेवाओं और संरचनात्मक कोर के लिए सबसे उपयुक्त स्थान हो सकता है। ऊंची इमारतों में केंद्रीय संरचनात्मक कोर भूकंप और हवा जैसे भारों से निपटने में भी महत्वपूर्ण हो सकता है। इसलिए एक या दो मंजिला पुराने आंगन वाले मकान के सिद्धांतों को आधुनिक बहुमंजिला इमारत पर उसी रूप में लागू करना उचित नहीं होगा।

इसी तरह छोटे प्लॉट में सिर्फ वास्तु के नाम पर बहुत छोटा और गहरा आंगन छोड़ देना भी जरूरी नहीं कि फायदेमंद हो। खराब अनुपात वाला आंगन पर्याप्त प्रकाश नहीं देगा, हवा का आवागमन सीमित कर सकता है और बारिश, नमी तथा रखरखाव की समस्या पैदा कर सकता है।

क्या आंगन हमेशा घर को ठंडा करता है?

आंगन की सफलता स्थानीय जलवायु, उसकी चौड़ाई और ऊंचाई, सूर्य की दिशा, छाया, दीवारों की मोटाई, निर्माण सामग्री और खुले हिस्सों पर निर्भर करती है। बहुत चौड़ा और बिना छाया वाला आंगन गर्मियों में काफी सौर ऊष्मा अंदर ला सकता है। बहुत संकरा और गहरा आंगन पर्याप्त प्रकाश और हवा नहीं दे सकता। गर्म और सूखे क्षेत्र में जिस प्रकार का आंगन उपयोगी हो सकता है, जरूरी नहीं कि वही गर्म-आर्द्र तटीय क्षेत्र में भी उतना प्रभावी हो। इसलिए पुराने घरों की असली वास्तु बुद्धिमत्ता सिर्फ ‘बीच में जगह छोड़ने’ में नहीं थी। वह जगह कितनी होनी चाहिए और उसके चारों ओर भवन कैसे बनाया जाए, असली सवाल यह था।

पेड़ और पानी का क्या विज्ञान था?

कई पारंपरिक आंगनों में पेड़, पौधे या पानी के छोटे स्रोत भी दिखाई देते हैं। इनके पीछे भी कुछ भौतिक कारण हो सकते हैं। वनस्पति छाया देती है और वाष्पोत्सर्जन के जरिए आसपास की सूक्ष्म जलवायु को प्रभावित कर सकती है। गर्म और शुष्क परिस्थितियों में पानी का वाष्पीकरण आसपास की हवा को कुछ हद तक ठंडा कर सकता है। लेकिन गर्म और बहुत आर्द्र जलवायु में इसका प्रभाव सीमित हो सकता है। गलत तरीके से रखा पानी मच्छरों और नमी की समस्या भी पैदा कर सकता है। इसलिए किसी विशेष पौधे को घर की हवा को चमत्कारिक ढंग से शुद्ध करने वाला या किसी विशेष बीमारी को रोकने वाला बताना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। आंगन का मुख्य पर्यावरणीय लाभ उसकी पूरी संरचना, छाया, हवा और खुले आकाश के साथ संबंध से आता है।

आधुनिक वास्तुकार फिर आंगन की ओर क्यों लौट रहे हैं?

आज वातानुकूलन और कृत्रिम रोशनी ने भवन डिजाइन को बहुत बदल दिया है, लेकिन इन सुविधाओं की ऊर्जा लागत ने प्राकृतिक और निष्क्रिय वास्तु तकनीकों को फिर महत्वपूर्ण बना दिया है। प्राकृतिक प्रकाश, छाया, पार-वायु संचार, तापीय द्रव्यमान और आंगन जैसी पुरानी तकनीकों को अब कंप्यूटर अनुकरण और आधुनिक माप उपकरणों से जांचा जा सकता है। इसलिए पारंपरिक भवनों में मौजूद कुछ जलवायु-अनुकूल तकनीकों को आधुनिक इमारतों में नए रूप में अपनाने पर काम हो रहा है। आज का आंगन पुराने घर जैसा बड़ा खुला चौकोर हिस्सा ही हो, यह जरूरी नहीं। वह छोटा प्रकाश-कूप, अंदरूनी बगीचा, दो मंजिलों के बीच खुला स्थान या नियंत्रित वेंटिलेशन वाला केंद्रीय क्षेत्र भी हो सकता है। पुराने डिजाइन की नकल करना लक्ष्य नहीं है। उसके पीछे काम करने वाले सिद्धांतों को समझना अधिक महत्वपूर्ण है।

ब्रह्मस्थान के पीछे कितना वास्तु और कितना विज्ञान?

सबसे संतुलित उत्तर यही है कि ब्रह्मस्थान एक पारंपरिक वास्तु अवधारणा है, जबकि केंद्रीय आंगन एक वास्तविक वास्तु तकनीक है। इतिहास में दोनों कई जगह एक-दूसरे से जुड़े, लेकिन दोनों एक ही चीज नहीं हैं।

ब्रह्मस्थान को ‘ब्रह्मांडीय ऊर्जा का वैज्ञानिक रूप से सिद्ध केंद्र’ कहना उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण से आगे जाना होगा। लेकिन पुराने भारतीय घर के बीच में खुली जगह रखने को केवल अंधविश्वास कह देना भी भारतीय वास्तुकला के व्यावहारिक अनुभव को नजरअंदाज करना होगा। एक अच्छे आंगन वाले घर ने एक ही केंद्रीय जगह से कई समस्याएं हल कीं। उसने भीतर के कमरों तक दिन का प्रकाश पहुंचाया, हवा के आवागमन के लिए रास्ता दिया, मौसम के अनुसार तापीय आराम में मदद की, बाहरी सड़क से निजता बनाए रखने में सहायता की और परिवार के लिए साझा खुला स्थान दिया। परंपरा ने इस केंद्रीय रिक्तता को धार्मिक और दार्शनिक अर्थ देकर ‘ब्रह्मस्थान’ का विशेष महत्व दिया। विज्ञान उसके अदृश्य ऊर्जा संबंधी दावों की पुष्टि नहीं करता, लेकिन उसी खुली जगह के प्रकाश, वेंटिलेशन और तापीय व्यवहार से जुड़े कई लाभों को आज मापा जा सकता है। शायद पुराने भारतीय घर का सबसे दिलचस्प सबक यही है कि कभी-कभी मकान की सबसे उपयोगी जगह वह नहीं होती जिस पर हमने कुछ बनाया हो, बल्कि वह होती है जिसे सोच-समझकर खाली छोड़ा गया हो।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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