Impostor Syndrome क्या है? किसने खोजा और कैसे पहचानें इसके लक्षण

Impostor Syndrome Kya Hai: इम्पॉस्टर सिंड्रोम क्या है, यह शब्द किसने गढ़ा और मनोवैज्ञानिकों ने इसे कैसे पहचाना? जानिए इसके लक्षण, कारण और खुद में पहचानने का आसान तरीका।

Neel Mani Lal
Published on: 11 Aug 2026 1:07 PM IST
Impostor Syndrom kya Hai
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Impostor Syndrom kya Hai

Impostor Syndrome Kya Hai: आपने कोई बड़ी परीक्षा पास की। अच्छी नौकरी मिली। पदोन्नति हुई। पुरस्कार मिला। आपकी तारीफ हुई। लोग आपको काबिल मानते हैं। लेकिन आपके भीतर एक आवाज कहती है कि “मैं उतना काबिल नहीं हूं, जितना लोग समझ रहे हैं।”

आप सोचते हैं कि सफलता आपकी मेहनत या प्रतिभा से नहीं मिली, बल्कि किस्मत से मिल गई। सही समय पर सही जगह होने की वजह से मौका मिल गया। शायद लोगों ने आपको जरूरत से ज्यादा सक्षम समझ लिया। और सबसे बड़ा डर यह रहता है कि किसी दिन सबको पता चल जाएगा कि असल में आप उतने योग्य नहीं हैं, जितना वे समझते हैं।

अगर उपलब्धियों के बावजूद इस तरह के विचार बार-बार आते हैं, तो संभव है कि आप उस मनोवैज्ञानिक अनुभव से गुजर रहे हों जिसे आज आम तौर पर इम्पॉस्टर सिंड्रोम कहा जाता है।

यह अनुभव खास तौर पर दिलचस्प इसलिए है क्योंकि इसमें बाहर की दुनिया और व्यक्ति की अपने बारे में धारणा एक-दूसरे से बिल्कुल उलट हो सकती हैं। बाहर से व्यक्ति सफल दिखाई देता है, लेकिन भीतर उसे लगता है कि वह किसी तरह अपनी असली क्षमता छिपाकर आगे बढ़ रहा है।

और इस अवधारणा की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है।

इम्पॉस्टर सिंड्रोम शब्द किसने बनाया?

इम्पॉस्टर सिंड्रोम की शुरुआत किसी सोशल मीडिया चलन से नहीं हुई थी। इसे 1978 में दो अमेरिकी मनोवैज्ञानिकों पॉलिन रोज क्लांस और सुजैन इम्स ने वैज्ञानिक साहित्य में पेश किया था। उन्होंने इसे “इम्पॉस्टर फिनॉमिनन” कहा था।

दोनों मनोवैज्ञानिकों ने उन महिलाओं के अनुभवों पर ध्यान दिया जो पढ़ाई और पेशे में बेहद सफल थीं, लेकिन अपनी सफलता को अपनी क्षमता का परिणाम मानने में असमर्थ थीं। यानी समस्या यह नहीं थी कि उनके पास उपलब्धियां नहीं थीं। समस्या यह थी कि वे अपनी उपलब्धियों को अपनी उपलब्धि मान ही नहीं पा रही थीं। उनके आसपास के लोगों के लिए वे सफल थीं। उनके अंक अच्छे थे। उनका करियर अच्छा था। उन्होंने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की थीं। लेकिन उनके भीतर यह भावना बनी हुई थी कि वे किसी तरह दूसरों को भ्रमित कर रही हैं।

क्लांस और इम्स ने 1978 के अपने शोध में इस अनुभव का वर्णन किया और शुरुआत में इसे मुख्य रूप से सफल महिलाओं के संदर्भ में देखा। बाद के शोध से स्पष्ट हुआ कि यह अनुभव केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है और पुरुषों समेत अलग-अलग समूहों में पाया जा सकता है।

यहीं से एक ऐसा विचार सामने आया जिसने बाद के दशकों में मनोविज्ञान, शिक्षा और कार्यस्थल की चर्चाओं में बहुत जगह बनाई।

मनोवैज्ञानिकों को कैसे पता चला कि ऐसा कुछ होता है?

यह खोज किसी मशीन या मस्तिष्क की स्कैनिंग से नहीं हुई थी। यह लोगों की बातचीत, उनके अनुभवों और उनके व्यवहार को समझने से शुरू हुई। क्लांस और इम्स ने ऐसी सफल महिलाओं के अनुभवों पर गौर किया जिनके बाहरी परिणाम उनकी आत्म-धारणा से मेल नहीं खाते थे। यह विरोधाभास महत्वपूर्ण था।

अगर कोई व्यक्ति असफल हो रहा है और उसे लगता है कि वह सक्षम नहीं है, तो इसमें मनोवैज्ञानिक रूप से आश्चर्य की बात नहीं है। लेकिन अगर कोई लगातार सफल हो रहा है और फिर भी मानता है कि वह वास्तव में सक्षम नहीं है, तो सवाल उठता है कि वह अपनी सफलता को देखता कैसे है?

यहीं इम्पॉस्टर फिनॉमिनन का मूल विचार सामने आया।

ऐसे व्यक्ति को अपनी सफलता के पीछे अपनी क्षमता दिखाई नहीं देती। उसे सफलता के दूसरे कारण दिखाई देते हैं - किस्मत, संयोग, दूसरों की मदद, आसान परीक्षा, अच्छे संपर्क या परिस्थितियों का फायदा। यानी उपलब्धि तो स्वीकार है, लेकिन उपलब्धि का श्रेय खुद को देना मुश्किल है।

इसकी सबसे बड़ी पहचान

मान लीजिए किसी पत्रकार को लगातार कई महत्वपूर्ण खबरें मिलती हैं। उसकी रिपोर्टिंग की तारीफ होती है और उसे एक बड़ा पद मिल जाता है। आम तौर पर वह सोच सकता है कि “मैंने अच्छा काम किया, इसलिए मुझे यह जिम्मेदारी मिली।”

लेकिन इम्पॉस्टर भावनाओं से जूझ रहा व्यक्ति सोच सकता है कि “इस बार तो बस किस्मत अच्छी थी। अगली बार शायद मैं इतनी अच्छी खबर नहीं कर पाऊंगा।” अगर उसे पुरस्कार मिलता है तो वह कह सकता है कि “जूरी को पूरी जानकारी नहीं थी।”

अगर बॉस तारीफ करता है तो वह सोच सकता है कि “उन्हें अभी मेरी असली कमियां पता नहीं हैं।”

अगर कोई बड़ी जिम्मेदारी मिलती है तो डर पैदा हो सकता है - “अब सबको पता चल जाएगा कि मैं वास्तव में इतना सक्षम नहीं हूं।”

इस तरह सफलता भी राहत देने के बजाय नई चिंता पैदा कर सकती है।

मन में एक अजीब चक्र बन जाता है

इम्पॉस्टर अनुभव में अक्सर एक चक्र दिखाई देता है।

व्यक्ति को कोई चुनौती मिलती है। उसे डर लगता है कि वह असफल हो जाएगा। फिर वह या तो बहुत ज्यादा मेहनत करता है या काम टालने लगता है। काम पूरा हो जाता है और सफलता मिल जाती है।

लेकिन सफलता के बाद वह यह नहीं कहता कि “मैं सक्षम था।” वह कहता है “मैंने बहुत ज्यादा मेहनत की, इसलिए हो गया।”

अगली बार जब चुनौती आती है तो उसे फिर लगता है कि शायद इस बार वह सफल नहीं होगा। इस तरह हर सफलता उसके आत्मविश्वास को बढ़ाने के बजाय अगले डर को जन्म दे सकती है। मनोवैज्ञानिक साहित्य में इसी तरह के आत्म-संदेह, उपलब्धि को आंतरिक रूप से स्वीकार न कर पाने और खुद के ‘फर्जी’ साबित होने के डर को इम्पॉस्टर फिनॉमिनन के केंद्रीय हिस्सों के रूप में वर्णित किया गया है।

क्या हर आत्म-संदेह इम्पॉस्टर सिंड्रोम है?

हर व्यक्ति कभी-कभी अपनी क्षमता पर संदेह करता है। नई नौकरी शुरू करते समय घबराहट होना सामान्य है। पहली बार मंच पर बोलते हुए डर लगना सामान्य है। किसी कठिन परीक्षा से पहले यह सोचना कि “पता नहीं मैं कर पाऊंगा या नहीं”, अपने आप में इम्पॉस्टर फिनॉमिनन नहीं है।

इम्पॉस्टर अनुभव में समस्या तब दिखाई देती है जब वास्तविक उपलब्धियों के बावजूद अपनी क्षमता को लगातार नकारने का पैटर्न बन जाता है।

व्यक्ति के पास अपनी क्षमता के ठोस प्रमाण होते हैं, लेकिन उसकी आत्म-धारणा उन प्रमाणों को स्वीकार नहीं करती। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन इसे ऐसे लोगों की स्थिति के रूप में परिभाषित करता है जो सफल और उपलब्धि हासिल करने के बावजूद खुद को धोखेबाज मानते हैं और डरते हैं कि अंततः उनकी कथित अक्षमता सामने आ जाएगी।

किसी व्यक्ति में इसे कैसे पहचानें?

इसे पहचानने का सबसे आसान तरीका किसी एक लक्षण को देखना नहीं, बल्कि सोच और व्यवहार के पैटर्न को देखना है।

मसलन, अगर किसी व्यक्ति को लगातार यह लगता है कि उसकी सफलता उसकी क्षमता के कारण नहीं बल्कि किस्मत के कारण है, तो यह एक संकेत हो सकता है।

अगर उसे तारीफ मिलने पर खुशी से ज्यादा चिंता होती है कि “अब अगली बार मुझसे इससे भी ज्यादा उम्मीद की जाएगी”, तो यह भी एक संकेत हो सकता है।

अगर वह अपनी गलतियों को अपनी वास्तविक क्षमता का प्रमाण और अपनी सफलताओं को अपवाद मानता है, तो यह पैटर्न महत्वपूर्ण है।

अगर उसे लगातार डर रहता है कि सहकर्मी, शिक्षक, बॉस या दूसरे लोग किसी दिन समझ जाएंगे कि वह उतना सक्षम नहीं है, जितना वे सोचते हैं, तो यह इम्पॉस्टर भावनाओं से मेल खा सकता है। ऐसे व्यक्ति के लिए सफलता भी एक तरह का दबाव बन सकती है। उसे लगता है कि एक बार सफल होना दुर्घटना हो सकता है, लेकिन अगली बार वही परिणाम हासिल करना उसके लिए जरूरी होगा।

क्या ऐसे लोग हमेशा बहुत सफल होते हैं?

शुरुआती शोध में इस अनुभव को खास तौर पर सफल और उच्च उपलब्धि वाले लोगों के संदर्भ में देखा गया था, लेकिन बाद के शोध ने इस धारणा को व्यापक किया। इम्पॉस्टर अनुभव केवल किसी खास पेशे या उपलब्धि स्तर तक सीमित नहीं है।

यह विद्यार्थी, शिक्षक, डॉक्टर, वैज्ञानिक, कलाकार, प्रबंधक, उद्यमी या किसी नए पद पर पहुंचा व्यक्ति, किसी में भी दिखाई दे सकता है। खासकर तब जब व्यक्ति किसी नए वातावरण में प्रवेश करता है और उसे लगता है कि आसपास के बाकी लोग उससे ज्यादा सक्षम हैं।

नई नौकरी, पदोन्नति, प्रतिष्ठित संस्थान में प्रवेश, नेतृत्व की जिम्मेदारी या करियर बदलना ऐसे अवसर हो सकते हैं जब ये भावनाएं ज्यादा उभरें।

महिलाओं से इसे जोड़ने की शुरुआत क्यों हुई थी?

क्लांस और इम्स ने शुरुआत में जिन महिलाओं का अध्ययन किया, उनमें यह भावना दिखाई दी कि उनकी सफलता उनकी वास्तविक क्षमता को प्रतिबिंबित नहीं करती। लेकिन बाद के शोध ने दिखाया कि पुरुष भी इम्पॉस्टर भावनाओं का अनुभव करते हैं।

इसलिए आज इसे केवल महिलाओं की समस्या मानना सही नहीं होगा। बाद के अध्ययनों ने पुरुषों और महिलाओं दोनों में इसकी मौजूदगी दिखाई है।

हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी पाया है कि सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियां इन भावनाओं को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे वातावरण जहां किसी व्यक्ति को लगता है कि वह “यहां का नहीं है”, वहां अपनी सफलता को स्वीकार करना और कठिन हो सकता है।

यानी यह केवल व्यक्ति के दिमाग की कहानी नहीं है।

कार्यस्थल, सामाजिक अपेक्षाएं, परिवार, प्रतिस्पर्धा और पहचान भी भूमिका निभा सकते हैं।

मनोवैज्ञानिकों ने इसे मापना कैसे शुरू किया?

किसी अनुभव को वैज्ञानिक रूप से समझने के लिए सिर्फ लोगों की कहानियां पर्याप्त नहीं होतीं। शोधकर्ताओं को यह भी देखना होता है कि उस अनुभव की तीव्रता को किसी व्यवस्थित तरीके से कैसे मापा जाए।

1981 में मनोवैज्ञानिक जोन सी. हार्वी ने इम्पॉस्टर फिनॉमिनन को मापने के लिए शुरुआती पैमानों में से एक विकसित किया।

इसके बाद 1985 में पॉलिन क्लांस ने Clance Impostor Phenomenon Scale, यानी CIPS विकसित किया। इसमें व्यक्ति से उसकी सोच और अनुभवों से जुड़े 20 कथनों पर प्रतिक्रिया मांगी जाती है।

बाद में इसके वैज्ञानिक परीक्षण भी हुए। शोध में CIPS का संबंध आत्म-सम्मान, चिंता और अवसाद जैसी मनोवैज्ञानिक अवधारणाओं से पाया गया, लेकिन इसे इनसे अलग पहचाना भी जा सका।

यानी इम्पॉस्टर भावनाएं केवल “कम आत्मविश्वास” का दूसरा नाम नहीं हैं। इनके अपने विशिष्ट पैटर्न हो सकते हैं।

2026 के एक नए अध्ययन में भी CIPS के मनोमितीय गुणों की जांच की गई और इम्पॉस्टर फिनॉमिनन को कम आत्म-सम्मान, चिंता और सामाजिक रूप से निर्धारित पूर्णतावाद से जुड़ी, लेकिन उनसे अलग, एक विशिष्ट मनोवैज्ञानिक संरचना के रूप में देखा गया।

क्या इम्पॉस्टर सिंड्रोम कोई मानसिक बीमारी है?

नाम में “सिंड्रोम” होने के बावजूद इम्पॉस्टर सिंड्रोम कोई स्वतंत्र मानसिक रोग का औपचारिक निदान नहीं है।

दिलचस्प बात यह है कि मूल शोधकर्ताओं ने भी इसे “इम्पॉस्टर फिनॉमिनन” कहा था, “सिंड्रोम” नहीं। “सिंड्रोम” शब्द बाद में लोकप्रिय हुआ।

इसलिए किसी व्यक्ति के बारे में केवल यह कहना कि “उसे इम्पॉस्टर सिंड्रोम है”, अपने आप में कोई चिकित्सकीय निदान नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि इससे होने वाली परेशानी नकली है।

लगातार आत्म-संदेह, अपनी उपलब्धियों को नकारना और हर समय पकड़े जाने का डर चिंता, कम आत्म-सम्मान, तनाव और कुछ लोगों में अवसाद जैसे मानसिक स्वास्थ्य परिणामों से जुड़ा हो सकता है।

सबसे बड़ा विरोधाभास क्या है?

इम्पॉस्टर अनुभव का सबसे अजीब हिस्सा यही है कि व्यक्ति की सफलता और उसकी आत्म-धारणा एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी हो जाती हैं।

आत्मविश्वास और वास्तविक क्षमता के बीच संतुलन जरूरी है। अगर कोई व्यक्ति अपनी उपलब्धियों का श्रेय कभी खुद को नहीं देता, हर सफलता को किस्मत बताता है और हर गलती को अपनी असली पहचान मानता है, तो उसकी आत्म-धारणा वास्तविकता से दूर हो सकती है।

ऐसे में सबसे उपयोगी कदम यह देखना है कि भावना और तथ्य अलग-अलग क्या कह रहे हैं।

इम्पॉस्टर अनुभव में समस्या अक्सर यह होती है कि व्यक्ति पहले तथ्य को नजरअंदाज करके दूसरे को सच मान लेता है।

तो खुद को कैसे पहचानें?

अपने आप से यह पूछना ज्यादा उपयोगी है कि क्या आपकी सफलता के ठोस प्रमाण मौजूद होने के बावजूद आप लगातार उसे अपनी क्षमता से अलग मानते हैं।

- क्या आप अपनी उपलब्धियों को कम करके देखते हैं?

- क्या आप सफलता को मुख्य रूप से किस्मत या संयोग का परिणाम मानते हैं?

- क्या तारीफ मिलने के बाद आत्मविश्वास बढ़ने के बजाय अगली बार असफल होने का डर बढ़ जाता है?

- क्या आपको लगता है कि आपके आसपास के लोग आपकी क्षमता को जरूरत से ज्यादा आंक रहे हैं?

- क्या आप लगातार इस डर में रहते हैं कि किसी दिन आपकी “असलियत” सबके सामने आ जाएगी?

अगर इनमें से कई बातें लंबे समय से आपके अनुभव का हिस्सा हैं और इनकी वजह से काम, पढ़ाई, रिश्ते या मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहे हैं, तो किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना उपयोगी हो सकता है।

यह जरूरी नहीं कि व्यक्ति को कोई मानसिक बीमारी हो। लेकिन लगातार चलने वाला आत्म-संदेह जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।

इम्पॉस्टर सिंड्रोम की कहानी हमें आखिर क्या बताती है?

आज “इम्पॉस्टर सिंड्रोम” शब्द इतना लोकप्रिय हो चुका है कि लोग कभी-कभी सामान्य असुरक्षा को भी इसी नाम से पुकार देते हैं।

लेकिन मूल विचार इससे ज्यादा गहरा है।

यह उस अजीब स्थिति के बारे में है जिसमें आपके पास सफल होने के पर्याप्त सबूत हैं, लेकिन आपका दिमाग उन सबूतों को आपकी सफलता का प्रमाण मानने से इनकार कर देता है।

और शायद इसी वजह से इसकी सबसे सटीक पहचान यह नहीं है कि कोई व्यक्ति खुद को असफल मानता है।

बल्कि यह है कि वह सफल होने के बाद भी खुद को सफल मान नहीं पाता।

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