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Indoor Air Pollution: क्या घर के भीतर भी वायु प्रदूषण होता है, नुकसान क्यों पहुंचा रही घर की हवा
Indoor Air Pollution Explained: क्या घर की हवा बाहर की हवा से ज्यादा प्रदूषित हो सकती है? जानिए PM2.5, कार्बन मोनोऑक्साइड, रसोई का धुआं, अगरबत्ती, एयर फ्रेशनर, सीलन और फफूंद से जुड़े इनडोर एयर पॉल्यूशन के खतरे।
Indoor Air Pollution Explained in Hindi
Indoor Air Pollution Explained: वायु प्रदूषण का नाम लेते ही हमारे सामने सड़क पर धुआं छोड़ती गाड़ियां, फैक्ट्रियों की चिमनियां, निर्माण की धूल और सर्दियों में छाई धुंध की तस्वीर आती है। हमें लगता है कि घर इन सब चीजों से बचने की सुरक्षित जगह है। लेकिन कहानी इतनी सीधी नहीं है। जिस घर के भीतर हम बाहर की जहरीली हवा से बचने के लिए दरवाजे और खिड़कियां बंद कर लेते हैं, उसी घर के अंदर कई तरह के प्रदूषक पैदा हो सकते हैं।
घर की हवा में पीएम 2.5 जैसे बेहद महीन कण, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, तंबाकू का धुआं, खाना पकाने से निकले कण, अगरबत्ती और धूप का धुआं, मोमबत्ती के दहन से निकले पदार्थ, सफाई और सुगंध वाले उत्पादों से निकलने वाले रसायन, फफूंद के सूक्ष्म बीजाणु, धूल और पालतू जानवरों से जुड़े एलर्जन मौजूद हो सकते हैं। कुछ इमारतों में रेडॉन जैसी गैस भी समस्या बन सकती है।
अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के अनुसार कुछ वाष्पशील कार्बनिक रसायनों की मात्रा घर के भीतर बाहर की तुलना में कई गुना ज्यादा हो सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी घरेलू वायु प्रदूषण को हृदय रोग, स्ट्रोक, फेफड़ों की पुरानी बीमारियों, फेफड़े के कैंसर और सांस से जुड़े संक्रमणों से जोड़ता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि घर की हवा खराब होने के लिए कमरे में धुआं दिखाई देना जरूरी नहीं है। कई खतरनाक प्रदूषक न दिखाई देते हैं और न उनकी कोई खास गंध होती है। इसलिए चमकता हुआ साफ कमरा, सुगंधित हवा या ठंडा एसी वाला कमरा अपने आप अच्छी हवा की गारंटी नहीं देता।
घर की हवा आखिर खराब होती कैसे है?
घर के भीतर प्रदूषण दो मुख्य रास्तों से आता है। पहला रास्ता बाहर की हवा है। सड़क की धूल, वाहनों से निकलने वाले कण, निर्माण का मलबा, आसपास जलाया गया कचरा और शहर की प्रदूषित हवा दरवाजों, खिड़कियों और भवन की छोटी-छोटी दरारों से घर में प्रवेश कर सकती है। दूसरा रास्ता ज्यादा दिलचस्प है, घर खुद भी प्रदूषण पैदा करता है।
रसोई इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। कुछ ईंधन जलाने पर गैस और महीन कण निकलते हैं। लकड़ी, कोयला, उपला, फसल के अवशेष और मिट्टी का तेल घर के भीतर खास तौर पर ज्यादा प्रदूषण पैदा कर सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिसंबर 2025 के आकलन के अनुसार दुनिया में करीब 2.1 अरब लोग अब भी ऐसे ईंधन और तकनीकों पर मुख्य रूप से निर्भर हैं जो घर के भीतर काफी प्रदूषण पैदा करते हैं। 2021 में घरेलू वायु प्रदूषण से जुड़े कारणों से अनुमानित 29 लाख समयपूर्व मौतें हुई थीं। भारत जैसे देशों में यह समस्या खास महत्व रखती है, क्योंकि कई परिवारों में खाना पकाने, पानी गर्म करने या दूसरे घरेलू कामों के लिए अलग-अलग तरह के ईंधन इस्तेमाल होते हैं।
एलपीजी है तो क्या रसोई का प्रदूषण खत्म?
एलपीजी और बिजली लकड़ी या कोयले जैसे प्रदूषणकारी ईंधनों की तुलना में बहुत स्वच्छ विकल्प हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि गैस पर खाना पकाने वाली रसोई में वेंटिलेशन की जरूरत नहीं है। गैस जलने पर नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसी गैसें बन सकती हैं। इसके अलावा खाना पकाते समय, खासकर तेज तापमान पर तलने, भूनने या कुछ चीजों को जलने के करीब तक पकाने पर महीन कण और दूसरे पदार्थ भी हवा में पहुंच सकते हैं। यानी प्रदूषण सिर्फ चूल्हे से निकलने वाले धुएं का नाम नहीं है। खाना पकाने की प्रक्रिया खुद भी हवा की गुणवत्ता बदल सकती है। इसीलिए रसोई में बाहर की ओर हवा निकालने वाला अच्छा एग्जॉस्ट या चिमनी उपयोगी है। सिर्फ खिड़की के सामने खाना पकाने से हमेशा पर्याप्त वेंटिलेशन नहीं मिलता, क्योंकि हवा का रास्ता, कमरे का आकार और बाहर की हवा की स्थिति भी मायने रखती है।
अगरबत्ती और धूप भी हवा को प्रदूषित कर सकती है?
यहां एक आम भ्रम सामने आता है। हम अक्सर मान लेते हैं कि प्राकृतिक या धार्मिक चीज से निकलने वाला धुआं हानिकारक नहीं होगा। लेकिन किसी पदार्थ का प्राकृतिक होना और उसे जलाने पर प्रदूषण न पैदा होना, दोनों अलग बातें हैं। अगरबत्ती, धूप, कपूर, मोमबत्ती और कुछ जलने वाले मच्छर भगाने वाले उत्पाद दहन के दौरान हवा में महीन कण और अलग-अलग गैसें छोड़ सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के दौरान होने वाले दहन को घर के भीतर वायु प्रदूषण के संभावित स्रोतों में शामिल करता है। इसका मतलब यह नहीं है कि कभी एक अगरबत्ती जलाना सिगरेट पीने के बराबर है। असली जोखिम इस बात पर निर्भर करता है कि कितनी चीज जलाई जा रही है, कितनी देर तक, कमरे का आकार कितना है और धुआं बाहर निकलने की व्यवस्था कैसी है। लेकिन रोज लंबे समय तक कई अगरबत्तियां जलाकर कमरे को पूरी तरह बंद रखना हवा को शुद्ध करने का वैज्ञानिक तरीका नहीं है।
एयर फ्रेशनर हवा साफ करता है या सिर्फ गंध बदलता है?
‘एयर फ्रेशनर’ नाम सुनकर लगता है कि वह हवा को साफ कर देगा। लेकिन सामान्य एयर फ्रेशनर का मुख्य काम हवा से प्रदूषक निकालना नहीं, बल्कि गंध को दबाना या दूसरी खुशबू फैलाना होता है। सुगंधित स्प्रे, परफ्यूम, सफाई के रसायन, पेंट, वार्निश, गोंद, कीटनाशक और नया फर्नीचर कुछ ऐसे रसायन हवा में छोड़ सकते हैं जो आसानी से गैस बनकर फैल जाते हैं। इन्हें वाष्पशील कार्बनिक रसायन कहा जाता है। अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के अनुसार हजारों घरेलू उत्पाद ऐसे रसायन छोड़ सकते हैं और कुछ की मात्रा घर के भीतर बाहर की तुलना में काफी ज्यादा हो सकती है। इनका असर पदार्थ और उसकी मात्रा पर निर्भर करता है। कुछ लोगों को आंख, नाक और गले में जलन, सिरदर्द या मतली जैसी परेशानी हो सकती है। कुछ खास रसायनों के लंबे और ज्यादा संपर्क से गंभीर स्वास्थ्य जोखिम भी जुड़े हैं। इसलिए नए पेंट या फर्नीचर की तेज गंध को सिर्फ ‘नए सामान की खुशबू’ समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। वह हवा में निकल रहे रसायनों का संकेत भी हो सकती है।
PM2.5 इतना खतरनाक क्यों है?
PM2.5 उन बेहद महीन कणों को कहा जाता है जिनका आकार करीब 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। ये सामान्य धूल के बड़े कणों की तरह केवल नाक या गले में रुक जाने वाले कण नहीं हैं। इनमें से कई फेफड़ों के बहुत अंदर तक पहुंच सकते हैं। कुछ कणों और उनके घटकों का असर पूरे शरीर पर भी पड़ सकता है। लंबे समय तक PM2.5 के संपर्क का संबंध हृदय और रक्तवाहिकाओं से जुड़ी बीमारियों के साथ भी पाया गया है। यही वजह है कि वायु प्रदूषण को केवल सांस की बीमारी मानना अधूरा है। लंबे समय तक महीन कणों के संपर्क में रहने से शरीर में सूजन और दूसरी जैविक प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं, जिसका असर फेफड़ों के साथ हृदय और रक्तवाहिकाओं पर भी पड़ सकता है।
बंद कमरे में प्रदूषण जमा क्यों हो जाता है?
एक कमरे में लगातार प्रदूषण पैदा हो रहा है, लेकिन बाहर निकलने के रास्ते बहुत कम हैं। ऐसे में प्रदूषक हवा में जमा होते रहेंगे। मान लीजिए छोटी रसोई में खाना तल रहा है, एग्जॉस्ट बंद है और खिड़कियां भी बंद हैं। खाना पकाने के दौरान निकले महीन कण और गैसें अचानक गायब नहीं हो जाएंगी। कुछ हवा में बने रहेंगे, कुछ सतहों पर बैठेंगे और कुछ सांस के साथ शरीर में जाएंगे। यही कारण है कि किसी घर के भीतर प्रदूषण कुछ परिस्थितियों में बाहर की तुलना में ज्यादा हो सकता है। लेकिन यह हर घर और हर शहर में सच नहीं है। अगर बाहर PM2.5 बहुत ज्यादा है और घर में कोई बड़ा प्रदूषण स्रोत नहीं है, तो बाहर की हवा ज्यादा खराब हो सकती है। असल सवाल यह है कि प्रदूषक कहां पैदा हो रहे हैं, कितनी मात्रा में हैं, हवा कितनी तेजी से बदल रही है और व्यक्ति उस हवा में कितने समय तक सांस ले रहा है।
कार्बन मोनोऑक्साइड सबसे खतरनाक घरेलू गैसों में क्यों है?
कार्बन मोनोऑक्साइड की सबसे डरावनी बात यह है कि यह दिखाई नहीं देती और इसकी कोई गंध भी नहीं होती। यह गैस ईंधन के अधूरे जलने से पैदा हो सकती है। खराब तरीके से काम कर रहे हीटर, चूल्हे, अंगीठी और दूसरे ईंधन जलाने वाले उपकरण इसके स्रोत बन सकते हैं, खासकर जब कमरे में हवा का आना-जाना ठीक न हो। कार्बन मोनोऑक्साइड रक्त में मौजूद हीमोग्लोबिन से बहुत मजबूती से जुड़ जाती है। इससे शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक ऑक्सीजन पहुंचाने की क्षमता प्रभावित होती है। सिरदर्द, चक्कर, कमजोरी, मतली और उलझन शुरुआती संकेत हो सकते हैं। ज्यादा संपर्क होने पर व्यक्ति बेहोश हो सकता है और मौत भी हो सकती है। इसीलिए बंद कमरे में कोयले की अंगीठी या अनुपयुक्त ईंधन वाला हीटर चलाकर सोना बेहद खतरनाक है। सोते हुए व्यक्ति को खतरे का पता चलने से पहले ही कार्बन मोनोऑक्साइड का स्तर खतरनाक हो सकता है।
घर की सीलन और फफूंद भी समस्या है
घर की हवा में केवल रसायन और धूल ही समस्या नहीं हैं। सीलन वाली दीवारों, पानी के रिसाव, लगातार नम बाथरूम और ज्यादा नमी वाले हिस्सों में फफूंद बढ़ सकती है। फफूंद हवा में बहुत छोटे बीजाणु छोड़ सकती है। संवेदनशील लोगों में इनके कारण छींक, नाक बहना, आंखों में जलन और एलर्जी हो सकती है। अस्थमा वाले व्यक्ति में इनके संपर्क से लक्षण बढ़ सकते हैं। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फफूंद को केवल साफ करना काफी नहीं है। अगर दीवार में पानी लगातार रिस रहा है तो हर सप्ताह उस पर सफाई करने से समस्या की जड़ खत्म नहीं होगी। रिसाव और नमी के स्रोत को ठीक करना जरूरी है।
घर की धूल सिर्फ मिट्टी नहीं है
घर की धूल देखने में मामूली लगती है, लेकिन यह कई चीजों का मिश्रण होती है। इसमें बाहर से आई मिट्टी, कपड़ों और बिस्तर के रेशे, त्वचा से निकले छोटे कण, परागकण, पालतू जानवरों से जुड़े एलर्जन और डस्ट माइट से जुड़े पदार्थ शामिल हो सकते हैं। एलर्जी और अस्थमा वाले लोगों के लिए यह खास तौर पर महत्वपूर्ण है। घर साफ दिखाई दे रहा हो, फिर भी बिस्तर, गद्दे, कालीन और दूसरे कपड़े वाले सामान में ऐसे पदार्थ मौजूद हो सकते हैं जो संवेदनशील लोगों में लक्षण बढ़ा दें। इसलिए दिखाई देने वाली धूल कम होना और हवा में एलर्जी पैदा करने वाले पदार्थ बिल्कुल न होना, दोनों एक ही बात नहीं हैं।
सिगरेट का धुआं घर के हर व्यक्ति को प्रभावित करता है
घर के भीतर धूम्रपान इनडोर वायु प्रदूषण का सबसे स्पष्ट स्रोतों में से एक है। सिगरेट का धुआं केवल उसे पीने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। घर में मौजूद दूसरे लोग भी उसे सांस के साथ अंदर लेते हैं। सेकेंडहैंड धुएं में हजारों रासायनिक पदार्थ होते हैं। इसका संबंध वयस्कों में फेफड़े के कैंसर और हृदय तथा रक्तवाहिका संबंधी बीमारियों से है। बच्चों में इससे सांस के संक्रमण और अस्थमा जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। खिड़की खोलकर या दूसरे कमरे में जाकर सिगरेट पीना जोखिम को पूरी तरह खत्म नहीं करता। घर और कार के भीतर धूम्रपान न करना ही सबसे प्रभावी उपाय है।
किसे ज्यादा खतरा हो सकता है?
घर की खराब हवा का असर हर व्यक्ति पर बिल्कुल एक जैसा नहीं होता। बच्चों के फेफड़े अभी विकसित हो रहे होते हैं। बुजुर्गों और पहले से अस्थमा, सीओपीडी या हृदय रोग जैसी समस्याओं वाले लोगों पर भी प्रदूषण का असर ज्यादा हो सकता है। प्रदूषणकारी ईंधन से खाना पकाने वाले घरों में महिलाओं और छोटे बच्चों का संपर्क भी ज्यादा हो सकता है, क्योंकि वे घर और रसोई में अधिक समय बिताते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2021 में घरेलू वायु प्रदूषण से जुड़े कारणों से अनुमानित 29 लाख समयपूर्व मौतें हुईं। इनमें पांच साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या तीन लाख से अधिक थी।
क्या AC चलाने से घर की हवा साफ हो जाती है?
एयर कंडीशनर का मुख्य काम तापमान और नमी को नियंत्रित करना है। उसके फिल्टर की क्षमता मॉडल के अनुसार अलग होती है। सामान्य फिल्टर बड़े धूलकणों को पकड़ सकता है, लेकिन हर तरह के PM2.5 या गैसीय प्रदूषकों को हटाने के लिए वह पर्याप्त नहीं होता। इसके अलावा अगर कमरे में खाना पकाने, धूम्रपान या किसी दूसरे स्रोत से लगातार प्रदूषण पैदा हो रहा है तो सिर्फ ठंडी हवा चलाने से मूल समस्या खत्म नहीं होगी। दूसरी तरफ बाहर की हवा बहुत प्रदूषित हो तो हर समय खिड़की खोलना भी सही समाधान नहीं है। इसलिए वेंटिलेशन का इस्तेमाल मौसम, बाहरी वायु गुणवत्ता और घर के अंदर मौजूद प्रदूषण स्रोत को देखकर करना चाहिए।
एयर प्यूरीफायर कितना काम करता है?
अच्छी गुणवत्ता और कमरे के हिसाब से सही क्षमता वाला एयर प्यूरीफायर हवा में तैरते PM2.5 और कुछ दूसरे महीन कणों को काफी कम कर सकता है। लेकिन इसे हर समस्या का इलाज नहीं माना जा सकता। प्यूरीफायर दीवार में छिपे पानी के रिसाव को ठीक नहीं करेगा। कार्बन मोनोऑक्साइड को सामान्य कण फिल्टर से नहीं हटाया जा सकता। अगर कमरे में लगातार धुआं पैदा हो रहा है तो सबसे पहले धुएं का स्रोत कम करना जरूरी है।
घर की हवा सुधारने का सबसे अच्छा तरीका आमतौर पर तीन स्तरों पर काम करता है: प्रदूषण का स्रोत कम करना, जरूरत के मुताबिक हवा का वेंटिलेशन करना और जहां जरूरी हो वहां सही फिल्टर का इस्तेमाल करना। यानी सिर्फ महंगा उपकरण खरीद लेना समाधान नहीं है। अगर रसोई का एग्जॉस्ट काम नहीं कर रहा, घर में धूम्रपान हो रहा है या दीवार में लगातार सीलन है तो समस्या की जड़ वहीं बनी रहेगी।
क्या घर में ज्यादा पौधे लगाने से हवा साफ हो जाएगी?
यह भी एक लोकप्रिय धारणा है। कुछ शुरुआती प्रयोगों से यह विचार लोकप्रिय हुआ कि पौधे घर की हवा से रसायन निकाल सकते हैं। लेकिन वास्तविक घरों में कुछ गमले सामान्य वेंटिलेशन या प्रभावी एयर फिल्टर की जगह ले सकते हैं, इसका मजबूत व्यावहारिक प्रमाण नहीं है। इसलिए पौधे जरूर लगाइए, लेकिन उन्हें PM2.5, धुएं या दूसरे गंभीर घरेलू प्रदूषण का इलाज न समझिए। बहुत ज्यादा पानी देकर गमलों की मिट्टी लगातार गीली रखना भी सही नहीं है, क्योंकि इससे नमी और फफूंद की दूसरी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
बाहर की हवा से घर की हवा ज्यादा खराब कब हो सकती है?
यह सबसे जरूरी सवाल है, क्योंकि अक्सर कहा जाता है कि ‘घर के अंदर की हवा बाहर से भी ज्यादा प्रदूषित होती है।’ यह हमेशा सही नहीं है। अगर किसी शहर में बाहर PM2.5 बहुत ज्यादा है और घर के अंदर कोई बड़ा प्रदूषण स्रोत नहीं है तो बाहर की हवा ज्यादा खराब हो सकती है। लेकिन घर के भीतर एक खास खतरा यह है कि प्रदूषण का स्रोत आपके बहुत करीब हो सकता है और आप उसी हवा में लगातार कई घंटे रह सकते हैं। रसोई में चूल्हे से निकलने वाले कण आपके सांस लेने वाले क्षेत्र तक तुरंत पहुंच सकते हैं। बंद कमरे में उनका स्तर तेजी से बढ़ सकता है। रात में सोते समय भी व्यक्ति कई घंटे उसी कमरे की हवा में रहता है। इसलिए सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि हवा में प्रदूषण कितना है। यह भी महत्वपूर्ण है कि प्रदूषण का स्रोत कितना करीब है और व्यक्ति कितनी देर तक उसके संपर्क में है। यही वजह है कि घर की हवा की गुणवत्ता स्वास्थ्य के लिए इतनी महत्वपूर्ण है।
घर की हवा बेहतर रखने का सबसे आसान तरीका क्या है?
घर को पूरी तरह प्रदूषण रहित बनाना संभव नहीं है और न ही इसकी जरूरत है। ज्यादा जरूरी है कि बड़े स्रोतों को पहचाना जाए और उन्हें नियंत्रित किया जाए। खाना पकाते समय बाहर की ओर हवा निकालने वाला प्रभावी एग्जॉस्ट या चिमनी इस्तेमाल करना, स्वच्छ ईंधन का उपयोग करना, घर के भीतर धूम्रपान न करना, बंद कमरे में कोयले की अंगीठी न जलाना, गैस और दूसरे ईंधन वाले उपकरणों का सही रखरखाव करना, पानी के रिसाव और सीलन को जल्दी ठीक करना, पेंट और तेज रसायनों के इस्तेमाल के समय उचित वेंटिलेशन रखना और अनावश्यक सुगंधित स्प्रे तथा लंबे समय तक जलने वाली चीजों का इस्तेमाल कम करना, ये सभी कदम महत्वपूर्ण हैं। इसके बाद जरूरत के अनुसार एयर प्यूरीफायर और दूसरे फिल्ट्रेशन उपाय मदद कर सकते हैं।
आखिर में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि साफ दिखाई देने वाला घर और साफ हवा वाला घर एक ही चीज नहीं हैं। फर्श पर धूल न दिखे, कमरे में अच्छी खुशबू हो और एसी लगातार चल रहा हो, फिर भी हवा में PM2.5, कार्बन मोनोऑक्साइड या दूसरे अदृश्य प्रदूषक मौजूद हो सकते हैं। बाहर की धुंध हमें दिखाई देती है, इसलिए हम उससे डरते हैं। घर का प्रदूषण अक्सर अदृश्य होता है, इसलिए हम उसे नजरअंदाज कर देते हैं। यही इसकी सबसे बड़ी चाल है। घर हमें बाहर के प्रदूषण से बचाने की जगह जरूर हो सकता है, लेकिन तभी जब हम यह समझें कि चार दीवारों के भीतर की हवा अपने आप साफ नहीं हो जाती। अच्छी इनडोर हवा का आधार किसी एक मशीन या किसी एक पौधे में नहीं, बल्कि कम प्रदूषण पैदा करने, नमी और धुएं के स्रोत को नियंत्रित करने, सही समय पर हवा बदलने और जरूरत पड़ने पर प्रभावी फिल्ट्रेशन करने में है।


