Infrasound Cause: क्या बिना सुनाई दिए भी कोई आवाज इंसान में डर पैदा कर सकती है?

Infrasound Cause: इन्फ्रासाउंड क्या है और क्या इसे सुन न पाने के बावजूद यह बेचैनी, डर या चक्कर जैसी अनुभूति पैदा कर सकता है? जानिए कम आवृत्ति वाली ध्वनि, वैज्ञानिक शोध और भूतिया अनुभवों के पीछे का विज्ञान।

Neel Mani Lal
Published on: 29 Oct 2026 4:51 PM IST
Can Infrasound Cause Fear and Anxiety | How Infrasound Affects the Human Body | Newstrack Hindi News
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Can Infrasound Cause Fear and Anxiety | How Infrasound Affects the Human Body | Newstrack Hindi News

Infrasound Cause: कल्पना कीजिए कि आप किसी पुराने, सुनसान मकान में बैठे हैं। वहां सब कुछ शांत है। न कोई दिखाई दे रहा है और न ही कोई असामान्य आवाज सुनाई दे रही है। फिर भी आपको अचानक बेचैनी महसूस होने लगती है। ऐसा लगता है जैसे कोई आपको देख रहा हो। कमरे में अजीब-सा भारीपन है और आप वहां से बाहर निकलना चाहते हैं। क्या यह सिर्फ मन का वहम है? या हो सकता है कि उस जगह पर कोई ऐसी ध्वनि मौजूद हो जिसे आपके कान सामान्य तरीके से सुन नहीं पा रहे हों?

विज्ञान में एक ऐसी ही ध्वनि को इन्फ्रासाउंड (Infrasound) कहा जाता है। यह इतनी कम फ्रीक्वेंसी वाली ध्वनि होती है कि इंसान इसे सामान्य परिस्थितियों में अक्सर सुन नहीं पाता। कुछ वैज्ञानिक शोधों में संकेत मिले हैं कि इन्फ्रासाउंड का संपर्क इंसान के मूड और बेचैनी से जुड़ी कुछ प्रतिक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है।

लेकिन क्या यही ध्वनि किसी अनदेखी मौजूदगी का एहसास करा सकती है? क्या यह डर, चक्कर या अजीब संवेदनाओं की वजह बन सकती है?

इन्फ्रासाउंड क्या होता है?

हमारे आसपास हर समय अलग-अलग प्रकार की ध्वनियां मौजूद रहती हैं। किसी व्यक्ति की आवाज, गाड़ी का हॉर्न, पंखे की आवाज और संगीत, ये सभी ध्वनि तरंगों के उदाहरण हैं। ध्वनि किसी वस्तु के कंपन से पैदा होती है। जब कोई वस्तु कंपन करती है, तो वह अपने आसपास के माध्यम, जैसे हवा, में दबाव के छोटे-छोटे बदलाव पैदा करती है। ये बदलाव तरंगों के रूप में आगे बढ़ते हैं और हमारे कानों तक पहुंचकर सुनने का अनुभव पैदा कर सकते हैं। ध्वनि की एक महत्वपूर्ण विशेषता होती है उसकी आवृत्ति यानी Frequency। इसे हर्ट्ज (Hz) में मापा जाता है। आवृत्ति बताती है कि एक सेकंड में कितने कंपन पूरे होते हैं।

आम तौर पर सामान्य सुनने की क्षमता वाला युवा इंसान लगभग 20 हर्ट्ज से 20,000 हर्ट्ज तक की आवृत्तियों को सुन सकता है। हालांकि, वास्तविक सीमा व्यक्ति की उम्र, सुनने की क्षमता और ध्वनि की तीव्रता पर निर्भर करती है। 20 हर्ट्ज से कम आवृत्ति वाली ध्वनि को सामान्यतः इन्फ्रासाउंड कहा जाता है। इसके विपरीत, 20,000 हर्ट्ज से ऊपर की ध्वनि को अल्ट्रासाउंड कहा जाता है। इस तरह इन्फ्रासाउंड और अल्ट्रासाउंड ध्वनि आवृत्तियों के दो अलग-अलग छोरों पर स्थित हैं।

अगर हम इसे सुन नहीं सकते, तो इसका असर कैसे हो सकता है?

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी ध्वनि को सामान्य तरीके से सुन न पाना और उसके किसी भी प्रभाव को महसूस न कर पाना, दोनों एक ही बात नहीं हैं।बहुत कम आवृत्ति वाली ध्वनि को सुनने के लिए सामान्य से अधिक ध्वनि-तीव्रता की जरूरत पड़ सकती है। पर्याप्त तीव्रता पर कुछ इन्फ्रासाउंड इंसान को सुनाई भी दे सकता है या कंपन और दबाव जैसी अनुभूति पैदा कर सकता है। इसलिए यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि इन्फ्रासाउंड हमेशा इंसानों के लिए अदृश्य या अप्रत्यक्ष रहता है। इसका अनुभव ध्वनि की आवृत्ति, तीव्रता और संपर्क की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

उदाहरण के लिए, किसी बड़ी मशीन या औद्योगिक उपकरण से पैदा होने वाली कम आवृत्ति की ध्वनि कभी-कभी गहरी गूंज, कंपन या भारीपन जैसी अनुभूति पैदा कर सकती है। कुछ परिस्थितियों में इमारत की दीवारों, खिड़कियों या अन्य हिस्सों में होने वाला कंपन भी परेशानी का कारण बन सकता है। ऐसे मामलों में केवल इन्फ्रासाउंड ही नहीं, बल्कि दूसरी कम आवृत्ति वाली आवाजें और संरचनात्मक कंपन भी भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए यदि किसी कमरे में अजीब-सी गूंज या कंपन महसूस हो, तो तुरंत यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि वहां इन्फ्रासाउंड मौजूद है। इसे साबित करने के लिए उपयुक्त उपकरणों से माप करना जरूरी है।

इन्फ्रासाउंड पैदा कहां होता है?

इन्फ्रासाउंड कोई काल्पनिक या दुर्लभ चीज नहीं है। यह प्रकृति और आधुनिक मशीनों, दोनों में पाया जाता है।प्रकृति में कई घटनाएं कम आवृत्ति वाली ध्वनि पैदा कर सकती हैं। इनमें शामिल हैं: तेज तूफान और आंधियां, ज्वालामुखी गतिविधियां, भूकंप से जुड़ी कुछ घटनाएं, समुद्र की लहरों और वायुमंडल के बीच होने वाली प्रक्रियाएं। कुछ जानवर भी कम आवृत्ति वाली ध्वनियों का इस्तेमाल संचार के लिए करते हैं। उदाहरण के लिए, हाथी लंबी दूरी तक संवाद करने में कम आवृत्ति वाली आवाजों का उपयोग कर सकते हैं।

मशीनों और तकनीक से पैदा होने वाले इन्फ्रासाउंड स्रोतों में बड़ी मशीनें, औद्योगिक उपकरण, वेंटिलेशन सिस्टम, भारी वाहन और पवन टर्बाइन शामिल हो सकते हैं।

हालांकि, इन सभी स्रोतों से पैदा होने वाली हर आवाज इन्फ्रासाउंड नहीं होती। इनके साथ सामान्य रूप से सुनाई देने वाली आवाजें और अन्य कम आवृत्ति वाली ध्वनियां भी पैदा हो सकती हैं। यही वजह है कि किसी मशीन के पास बेचैनी या कंपन महसूस होने पर ध्वनि की वास्तविक आवृत्ति और तीव्रता को मापे बिना उसके कारण की पुष्टि नहीं की जा सकती।

क्या इन्फ्रासाउंड इंसान में बेचैनी और डर पैदा कर सकता है?

लंबे समय से वैज्ञानिक यह जांचते रहे हैं कि क्या कम आवृत्ति वाली ध्वनि इंसान के मूड, नींद, ध्यान और शारीरिक संवेदनाओं को प्रभावित कर सकती है। कुछ अध्ययनों में कम आवृत्ति वाले शोर के संपर्क और लोगों की परेशानी, चिड़चिड़ेपन, नींद में बाधा तथा ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई के बीच संबंध देखे गए हैं। लेकिन ऐसे अध्ययनों से हमेशा यह साबित नहीं होता कि इन समस्याओं का कारण विशेष रूप से इन्फ्रासाउंड ही था। आसपास का अन्य शोर, व्यक्ति की परिस्थितियां और दूसरे कारक भी प्रभाव डाल सकते हैं। इस विषय पर 2026 में प्रकाशित एक छोटे प्रयोगात्मक अध्ययन ने फिर से ध्यान आकर्षित किया। शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों को संगीत सुनाया और कुछ परिस्थितियों में उसके साथ लगभग 18 हर्ट्ज की इन्फ्रासाउंड ध्वनि भी चलाई। प्रतिभागी यह पहचान नहीं पाए कि इन्फ्रासाउंड कब मौजूद था। फिर भी, इन्फ्रासाउंड वाले समूह में अधिक चिड़चिड़ापन, संगीत को अधिक उदास महसूस करना और तनाव से जुड़े हार्मोन कॉर्टिसोल का बढ़ा हुआ स्तर पाया गया। यह एक दिलचस्प संकेत है कि इन्फ्रासाउंड कुछ परिस्थितियों में भावनात्मक प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकता है, भले ही व्यक्ति उसे स्पष्ट रूप से सुन न पाए। लेकिन इस नतीजे की सीमाएं भी हैं। अध्ययन में प्रतिभागियों की संख्या कम थी और इससे यह साबित नहीं होता कि इन्फ्रासाउंड हर इंसान में बेचैनी पैदा करेगा या लंबे समय तक संपर्क से गंभीर मानसिक समस्याएं होंगी।

दूसरी ओर, 2021 में प्रकाशित एक नियंत्रित प्रयोग में 38 प्रतिभागियों को उनके शयनकक्षों में 28 रातों तक इन्फ्रासाउंड के संपर्क में रखा गया। शोधकर्ताओं को नींद, संज्ञानात्मक क्षमता और कई अन्य व्यवहार संबंधी मापों में स्पष्ट नकारात्मक प्रभाव नहीं मिला। दोनों अध्ययनों को साथ रखकर देखें, तो तस्वीर यह बनती है कि इन्फ्रासाउंड के संभावित प्रभावों पर शोध जारी है। कुछ परिस्थितियों में यह असहजता या मूड में बदलाव से जुड़ा हो सकता है, लेकिन इसके असर को लेकर अभी निर्णायक निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते।

क्या इन्फ्रासाउंड किसी भूत या अनदेखी मौजूदगी का एहसास करा सकता है?

इन्फ्रासाउंड की चर्चा अक्सर भुतहा मकानों और असामान्य अनुभवों के संदर्भ में होती है। इसकी एक वजह यह विचार है कि कोई व्यक्ति किसी जगह पर कम आवृत्ति वाली ध्वनि के कारण असहज महसूस कर सकता है, लेकिन उसे परेशानी का स्पष्ट कारण समझ में नहीं आता। वह उस अनुभव को किसी रहस्यमय घटना से जोड़ सकता है। कल्पना कीजिए कि आप किसी पुराने कमरे में हैं। वहां वेंटिलेशन सिस्टम या कोई मशीन लगातार गहरी, कम आवृत्ति वाली ध्वनि पैदा कर रही है। आपको स्पष्ट आवाज सुनाई नहीं देती, लेकिन वहां का वातावरण आपको अप्रिय लग सकता है। यदि आप पहले से मानते हैं कि उस जगह पर कुछ रहस्यमय है, तो आप अपनी बेचैनी को किसी अनदेखी मौजूदगी से जोड़ सकते हैं।

इसे समझने में मनोविज्ञान की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। इंसानी मस्तिष्क हमेशा आसपास के वातावरण से संकेत लेकर यह अनुमान लगाता रहता है कि क्या सुरक्षित है और क्या खतरा पैदा कर सकता है। जब किसी अनुभव का स्पष्ट कारण समझ में नहीं आता, तो हमारी अपेक्षाएं और पहले से बनी धारणाएं उसकी व्याख्या को प्रभावित कर सकती हैं।

अब तक इस बात का ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि इन्फ्रासाउंड भूत दिखा सकता है, किसी अदृश्य प्राणी की मौजूदगी साबित कर सकता है या अपने आप भ्रमात्मक दृश्य पैदा करता है। इन्फ्रासाउंड के कारण बेचैनी महसूस होने की संभावना और किसी अलौकिक घटना की पुष्टि, दो बिल्कुल अलग दावे हैं। पहले विषय पर शोध हो रहा है, लेकिन दूसरे दावे को समर्थन देने वाला विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

क्या इन्फ्रासाउंड से चक्कर, सिरदर्द या शरीर में अजीब संवेदनाएं हो सकती हैं?

कम आवृत्ति वाली ध्वनि और शोर से जुड़े कुछ अध्ययनों में लोगों ने सिरदर्द, चक्कर, असहजता, थकान या नींद में परेशानी जैसे लक्षण बताए हैं। लेकिन इन लक्षणों को सीधे इन्फ्रासाउंड का परिणाम मानना सही नहीं होगा। कई अध्ययन कम आवृत्ति वाले शोर पर केंद्रित हैं, जिसमें इन्फ्रासाउंड के साथ ऐसी ध्वनियां भी शामिल हो सकती हैं जिन्हें इंसान सुन सकता है। इसके अलावा, किसी व्यक्ति को लक्षण महसूस होना और यह साबित हो जाना कि किसी खास ध्वनि ने ही वे लक्षण पैदा किए, दो अलग बातें हैं। यदि ध्वनि बहुत तीव्र हो, तो कम आवृत्ति वाले कंपन को महसूस किया जा सकता है। कुछ परिस्थितियों में कान में दबाव या शरीर में कंपन जैसी अनुभूति भी हो सकती है। लेकिन सामान्य वातावरण में मौजूद इन्फ्रासाउंड से सभी प्रकार के शारीरिक लक्षण पैदा होते हैं, ऐसा मानने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।

यदि किसी जगह पर बार-बार सिरदर्द, चक्कर या बेचैनी महसूस होती है, तो उसके कई संभावित कारण हो सकते हैं। इनमें अन्य प्रकार का शोर, वेंटिलेशन की समस्या, खराब नींद, तनाव या कोई स्वास्थ्य समस्या शामिल हो सकती है। ऐसी स्थिति में केवल इन्फ्रासाउंड को जिम्मेदार मानने के बजाय वास्तविक कारण की जांच करना अधिक उपयोगी होगा।

क्या इन्फ्रासाउंड को मापा जा सकता है?

इन्फ्रासाउंड को मापने के लिए विशेष ध्वनि-मापन उपकरणों और उपयुक्त माइक्रोफोन का इस्तेमाल किया जाता है। सामान्य मोबाइल फोन या साधारण रिकॉर्डिंग उपकरण बहुत कम आवृत्ति वाली ध्वनियों को सही तरीके से रिकॉर्ड नहीं कर पाते। कई उपकरणों में ऐसी ध्वनियों को पकड़ने की क्षमता ही सीमित होती है। इसलिए यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके घर या कार्यस्थल पर असामान्य कम आवृत्ति वाली ध्वनि मौजूद है, तो सामान्य मोबाइल ऐप से उसे मापने का प्रयास निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। विशेषज्ञ ध्वनि की आवृत्ति, तीव्रता और समय के साथ उसमें होने वाले बदलावों को माप सकते हैं। जरूरत पड़ने पर मशीनों, वेंटिलेशन सिस्टम, पाइपों या भवन के अन्य हिस्सों की भी जांच की जा सकती है। इस तरह यह पता लगाने में मदद मिलती है कि परेशानी का कारण इन्फ्रासाउंड है, कोई दूसरी कम आवृत्ति वाली आवाज है या संरचनात्मक कंपन।

इस विषय की असली दिलचस्पी किसी रहस्य या डर में नहीं, बल्कि इस बात में है कि हमारा मस्तिष्क और शरीर आसपास के वातावरण के उन संकेतों पर भी किस तरह प्रतिक्रिया कर सकते हैं, जिन्हें हम हमेशा स्पष्ट रूप से पहचान नहीं पाते। और विज्ञान की खूबसूरती यही है: वह रहस्यमय लगने वाले अनुभवों को भी सवालों, प्रयोगों और प्रमाणों के जरिए समझने की कोशिश करता है।

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