कजरी तीज पर क्यों गाए जाते हैं कजरी गीत? जानिए इस मानसूनी त्योहार की परंपरा और धार्मिक महत्व

Kajari Teej 2026: कजरी तीज इस साल 31 अगस्त को मनाई जाएगी। जानें कजरी तीज का महत्व, व्रत-पूजन विधि, पौराणिक कथा, श्रृंगार, कजरी गीत और इससे जुड़ी मान्यताएं।

Shweta Srivastava
Published on: 29 Aug 2026 5:19 PM IST
Kajari Teej 2026
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Kajari Teej 2026 (Image Credit-Social Media)

Kajari Teej 2026: बारिश की फुहारों के बीच मनाए जाने वाले तीज के पर्वों में कजरी तीज का विशेष महत्व माना जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से महिलाओं से जुड़ा है और उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश तथा राजस्थान समेत कई राज्यों में अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाता है। कजरी तीज को कजली तीज, बड़ी तीज और सातुड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन महिलाएं व्रत रखने के साथ माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं। कई क्षेत्रों में कजरी गीत गाने और झूला झूलने की भी परंपरा है।

इस साल कब मनाई जाएगी कजरी तीज?

पंचांग के अनुसार इस वर्ष कजरी तीज का पर्व 31 अगस्त 2026, सोमवार को मनाया जाएगा। यह भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। तिथि और पूजा के समय में स्थान के अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा का समय देखना उचित रहता है।

कजरी तीज को मानसून से जुड़ा पर्व भी कहा जाता है। बारिश के मौसम में प्रकृति के हरे-भरे रूप के बीच महिलाएं पारंपरिक परिधान पहनती हैं, श्रृंगार करती हैं और परिवार की सुख-समृद्धि तथा वैवाहिक जीवन की मंगलकामना के लिए पूजा-अर्चना करती हैं।

क्या है कजरी तीज?

कजरी तीज हिंदू धर्म का एक प्रमुख लोक-पर्व है, जिसे विशेष रूप से महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। विवाहित महिलाएं पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से व्रत रखती हैं। वहीं, कई मान्यताओं के अनुसार अविवाहित लड़कियां मनचाहा जीवनसाथी पाने की इच्छा से यह व्रत करती हैं।

हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में कजरी तीज से जुड़ी परंपराओं में अंतर देखने को मिलता है। कहीं इसे शिव-पार्वती की पूजा से जोड़ा जाता है तो कहीं कजरी गीतों और लोक परंपराओं का विशेष महत्व होता है।

कजरी तीज क्यों मनाई जाती है?

कजरी तीज को वैवाहिक सुख और दांपत्य जीवन की मंगलकामना से जुड़ा पर्व माना जाता है। विवाहित महिलाएं इस दिन व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया।

इसी मान्यता के आधार पर कजरी तीज सहित तीज के विभिन्न पर्वों को पति-पत्नी के रिश्ते, प्रेम, समर्पण और वैवाहिक सुख से जोड़कर देखा जाता है।

कजरी तीज की लोककथा क्या है?

कजरी तीज से जुड़ी एक लोककथा मध्य भारत के कजली वन से जुड़ी बताई जाती है। लोक मान्यता के अनुसार इस क्षेत्र में कजरी नाम के लोकगीत गाए जाते थे। इन गीतों में वर्षा, प्रकृति, प्रेम और विरह की भावनाओं को व्यक्त किया जाता था।

कथा के अनुसार राजा ददुरई की मृत्यु और उनकी पत्नी रानी नागमती के सती होने के बाद राज्य के लोगों ने अपने दुख और विरह को कजरी गीतों के माध्यम से व्यक्त किया। धीरे-धीरे इन गीतों का संबंध कजरी तीज के पर्व से जुड़ गया।

आज भी उत्तर प्रदेश और मध्य भारत के कई हिस्सों में कजरी तीज के अवसर पर लोकगीत गाने की परंपरा देखने को मिलती है। विशेष रूप से मिर्जापुर, वाराणसी और आसपास के क्षेत्रों में कजरी गीत लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं।

शिव-पार्वती से जुड़ी मान्यता

कजरी तीज को लेकर एक अन्य धार्मिक मान्यता भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी है। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए लंबे समय तक कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया।

हालांकि इस कथा के अलग-अलग क्षेत्रीय और धार्मिक संस्करण मिलते हैं। इसलिए इसे ऐतिहासिक तथ्य के बजाय पौराणिक मान्यता के रूप में देखना उचित है।

कजरी तीज की पूजा कैसे करें?

कजरी तीज के दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और स्वच्छ या नए वस्त्र पहनती हैं। इसके बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है। कई महिलाएं इस दिन पारंपरिक तरीके से श्रृंगार भी करती हैं।

पूजा के लिए भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। इसके बाद दोनों की विधि-विधान से पूजा की जाती है। पूजा में जल, अक्षत, रोली, फूल, फल, मिठाई और अपनी परंपरा के अनुसार अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है।

कई स्थानों पर कजरी तीज की कथा सुनी या पढ़ी जाती है और कजरी गीत गाए जाते हैं। पूजा के बाद महिलाएं अपनी मान्यता और परिवार की परंपरा के अनुसार व्रत का पारण करती हैं।

व्रत में निर्जला रहना जरूरी नहीं

कजरी तीज के अवसर पर कुछ महिलाएं निर्जला व्रत भी रखती हैं। निर्जला व्रत का अर्थ है पूरे दिन पानी और भोजन का सेवन न करना। हालांकि हर व्यक्ति के लिए निर्जला व्रत सुरक्षित नहीं होता।

गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों, बच्चों और किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों को बिना चिकित्सकीय सलाह के निर्जला व्रत नहीं रखना चाहिए। व्रत की परंपरा निभाने के साथ स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है।

कजरी तीज पर कैसे करें श्रृंगार?

कजरी तीज पर महिलाएं पारंपरिक परिधान पहनकर श्रृंगार करती हैं। कई जगहों पर महिलाएं साड़ी, लहंगा या अन्य पारंपरिक कपड़े पहनती हैं। हाथों में मेहंदी, चूड़ियां और अन्य आभूषण पहनने की परंपरा भी है।

विवाहित महिलाओं को उनके मायके से कपड़े, श्रृंगार सामग्री, मिठाई और अन्य उपहार भेजने की परंपरा कई क्षेत्रों में सिंधारा के रूप में प्रचलित है। हालांकि इसकी रस्म और सामग्री क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकती है।

कजरी गीत और झूलों का क्या महत्व है?

कजरी तीज केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। इसका एक महत्वपूर्ण पक्ष लोक संस्कृति भी है। मानसून के दौरान महिलाएं समूह में कजरी गीत गाती हैं। इन गीतों में प्रेम, विरह, सावन, मायके की याद और वैवाहिक जीवन की भावनाओं को अभिव्यक्ति मिलती है।

कई क्षेत्रों में पेड़ों पर झूले डालने और महिलाओं के झूला झूलने की परंपरा भी रही है। यही वजह है कि कजरी तीज को केवल व्रत नहीं, बल्कि नारी भावनाओं, लोक संगीत और मानसूनी संस्कृति से जुड़ा पर्व भी माना जाता है।

हरियाली तीज और हरतालिका तीज से अलग है कजरी तीज

तीज का पर्व केवल एक दिन या एक त्योहार तक सीमित नहीं है। भारत के अलग-अलग हिस्सों में हरियाली तीज, कजरी तीज और हरतालिका तीज जैसे पर्व मनाए जाते हैं।

तीनों के समय, धार्मिक मान्यताओं और पूजा-पद्धति में अंतर है। कजरी तीज भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है, जबकि हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है। इसलिए इन दोनों को एक ही पर्व समझना सही नहीं है।

कजरी तीज का असली संदेश

कजरी तीज में धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोक संस्कृति और पारिवारिक रिश्तों की भी झलक मिलती है। यह पर्व महिलाओं को एक साथ आने, गीत-संगीत के जरिए अपनी भावनाएं व्यक्त करने और परिवार के सुख-समृद्धि की कामना करने का अवसर देता है।

कजरी गीतों में जहां सावन की खूबसूरती दिखाई देती है, वहीं विरह और मायके की याद भी सुनाई देती है। यही भाव इस पर्व को दूसरे तीज उत्सवों से अलग पहचान देते हैं।

बारिश की बूंदें, कजरी की तान,

सजता है हर आंगन और मुस्कुराता है मन।

व्रत में आस्था, गीतों में प्यार,

कजरी तीज लाती है रिश्तों में बहार।

इस तरह कजरी तीज केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय लोक परंपरा, स्त्री भावनाओं, संगीत और पारिवारिक संबंधों का उत्सव भी है।

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मैं श्वेता श्रीवास्तव 15 साल का मीडिया इंडस्ट्री में अनुभव रखतीं हूँ। मैंने अपने करियर की शुरुआत एक रिपोर्टर के तौर पर की थी। पिछले 9 सालों से डिजिटल कंटेंट इंडस्ट्री में कार्यरत हूँ। इस दौरान मैंने मनोरंजन, टूरिज्म और लाइफस्टाइल डेस्क के लिए काम किया है। इसके पहले मैंने aajkikhabar.com और thenewbond.com के लिए भी काम किया है। साथ ही दूरदर्शन लखनऊ में बतौर एंकर भी काम किया है। मैंने लखनऊ यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एंड फिल्म प्रोडक्शन में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है। न्यूज़ट्रैक में मैं लाइफस्टाइल और टूरिज्म सेक्शेन देख रहीं हूँ।

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