Body Odor and Attraction: किसी व्यक्ति की खुशबू हमें आकर्षित क्यों करती है? क्या है इसका विज्ञान?

Body Odor and Attraction: किसी खास व्यक्ति की प्राकृतिक खुशबू हमें आकर्षित क्यों करती है? जानिए शरीर की गंध, जीन, MHC, दिमाग, यादों और आकर्षण के बीच का वैज्ञानिक संबंध।

Neel Mani Lal
Published on: 25 Aug 2026 5:34 PM IST
Body Odor and Attraction
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Body Odor and Attraction (Image Credit-Social Media)

Body Odor and Attraction: कभी सोचा है कि किसी अपने के करीब बैठते ही एक अजीब सा सुकून क्यों महसूस होता है, या किसी के शरीर की खुशबू क्यों दिमाग में इतनी गहराई तक बस जाती है कि सालों बाद भी वही खुशबू महसूस होते ही पुरानी यादें ताज़ा हो जाती हैं? यह सिर्फ भावुक बात नहीं, बल्कि इसके पीछे एक ठोस और दिलचस्प विज्ञान छिपा है, जो हमारी नाक, हमारे जीन और हमारे दिमाग तक फैला हुआ है।

शरीर की अपनी प्राकृतिक खुशबू कहां से आती है

इंसानी शरीर से निकलने वाली प्राकृतिक खुशबू का ज्यादातर हिस्सा पसीने की एक खास ग्रंथि से आता है, जिसे एपोक्राइन ग्रंथि (Apocrine Gland) कहा जाता है। यह ग्रंथियां शरीर के कुछ खास हिस्सों में ज्यादा घनी होती हैं, जैसे बगल और कमर के आसपास, और यह सामान्य पसीने की ग्रंथियों से अलग तरह का पसीना छोड़ती हैं, जिसमें प्रोटीन और फैट जैसे तत्व ज्यादा मात्रा में मौजूद होते हैं।



दिलचस्प बात यह है कि जब यह पसीना पहली बार त्वचा से निकलता है, तो यह लगभग गंधहीन होता है। असली खुशबू तब बनती है, जब त्वचा पर मौजूद प्राकृतिक बैक्टीरिया इस पसीने को तोड़ना शुरू करते हैं। हर इंसान की त्वचा पर मौजूद बैक्टीरिया का मिश्रण थोड़ा अलग होता है, और यही अलग-अलग बैक्टीरिया मिलकर हर व्यक्ति की अपनी एक बेहद खास और अनोखी प्राकृतिक खुशबू बनाते हैं, जो किसी और की खुशबू से बिल्कुल अलग होती है।

जीन और इम्यून सिस्टम का इसमें क्या रोल है

वैज्ञानिकों ने पाया है कि किसी व्यक्ति की प्राकृतिक खुशबू का सीधा संबंध उसके इम्यून सिस्टम से जुड़े कुछ खास जीन से होता है, जिन्हें ‘मेजर हिस्टोकंपैटिबिलिटी कॉम्प्लेक्स’ (Major Histocompatibility Complex) या संक्षेप में एमएचसी कहा जाता है। यह जीन शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं, और हर व्यक्ति में इनका एक अलग संयोजन होता है।

‘स्वेटी टी-शर्ट स्टडी’ नामक एक बेहद मशहूर वैज्ञानिक प्रयोग में महिलाओं को अलग-अलग पुरुषों द्वारा पहनी गई टी-शर्ट सूंघने के लिए दी गईं, बिना यह बताए कि कौन-सी टी-शर्ट किसकी है। नतीजों में यह देखा गया कि महिलाएं आमतौर पर उन पुरुषों की खुशबू को ज्यादा आकर्षक मानती थीं, जिनके एमएचसी जीन उनके अपने जीन से काफी अलग थे। यह वैज्ञानिक रूप से बेहद तार्किक भी है, क्योंकि जब दो लोगों के इम्यून सिस्टम जीन अलग-अलग होते हैं, तो उनकी संभावित संतान में बीमारियों से लड़ने की क्षमता कहीं ज्यादा व्यापक और मजबूत हो सकती है। यानी हमारी नाक, बिना हमें एहसास हुए, कहीं न कहीं जैविक रूप से बेहतर साथी चुनने में हमारी मदद कर रही होती है।

इस अध्ययन का एक और दिलचस्प पहलू यह भी सामने आया कि जो महिलाएं गर्भनिरोधक गोलियां ले रही थीं, उनकी पसंद इस पैटर्न से उलट थी। वे अक्सर उन पुरुषों की खुशबू को ज्यादा पसंद करती थीं, जिनके जीन उनसे मिलते-जुलते थे। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि गर्भनिरोधक गोलियां शरीर में हार्मोन के स्तर को इस तरह बदल देती हैं कि यह दिमाग को गर्भावस्था जैसी स्थिति का आभास कराती हैं, जिससे साथी चुनने की प्राथमिकता भी बदल सकती है। यह खोज आज भी वैज्ञानिकों के बीच चर्चा का विषय है, और यह दिखाती है कि हार्मोन का स्तर किस हद तक हमारी अनजानी पसंद-नापसंद को प्रभावित कर सकता है।

फेरोमोन का दिलचस्प पर उलझा हुआ विज्ञान

आकर्षण और खुशबू की बात हो, तो ‘फेरोमोन’ शब्द का जिक्र लगभग हमेशा आता है। फेरोमोन असल में वह रासायनिक संकेत हैं, जो कई जानवरों में एक-दूसरे को बिना किसी सचेत सोच के जैविक संदेश भेजने का काम करते हैं, जैसे यह बताना कि वे प्रजनन के लिए तैयार हैं, या किसी क्षेत्र पर उनका अधिकार है। कई कीड़े-मकोड़ों और स्तनधारी जानवरों में इसका असर बेहद स्पष्ट रूप से देखा और साबित किया जा चुका है।



इंसानों में फेरोमोन के अस्तित्व और असर को लेकर वैज्ञानिक जगत में आज भी काफी बहस चल रही है। कुछ अध्ययनों में यह संकेत मिले हैं कि इंसानों में भी कुछ ऐसे रासायनिक संकेत मौजूद हो सकते हैं, जो अनजाने में हमारी पसंद-नापसंद को प्रभावित करते हैं, पर अभी तक विज्ञान किसी एक खास ‘इंसानी फेरोमोन’ की पूरी तरह पुष्टि नहीं कर पाया है, जैसा कि कुछ जानवरों में साफ तौर पर देखा गया है। इसलिए जब भी कोई उत्पाद यह दावा करे कि उसमें ‘इंसानी फेरोमोन’ मिलाए गए हैं जो आकर्षण बढ़ाते हैं, उसे थोड़े संदेह के साथ देखना समझदारी है, क्योंकि इस विषय पर वैज्ञानिक सहमति अभी बननी बाकी है।

दिमाग खुशबू को यादों से क्यों जोड़ देता है

खुशबू और आकर्षण के इस पूरे रिश्ते को समझने के लिए यह जानना भी जरूरी है कि हमारा दिमाग गंध को कैसे प्रोसेस करता है। हमारी नाक से आने वाले गंध के संकेत सीधे दिमाग के उस हिस्से से जुड़े होते हैं, जिसे ओल्फैक्टरी बल्ब कहा जाता है, और यह हिस्सा दिमाग के उन क्षेत्रों के बेहद करीब स्थित है, जो भावनाओं और यादों को संभालते हैं, जैसे हिप्पोकैम्पस (hippocampus ) और एमिग्डला (Amygdala)। यही वजह है कि गंध हमारी बाकी इंद्रियों, जैसे देखना या सुनना, के मुकाबले कहीं ज्यादा गहराई से और कहीं ज्यादा तेज़ी से भावनाओं और पुरानी यादों को जगा देती है। जब हम किसी करीबी व्यक्ति के पास लंबा समय बिताते हैं, तो उसकी प्राकृतिक खुशबू धीरे-धीरे दिमाग में उस व्यक्ति के साथ जुड़े सुकून, अपनापन और सुरक्षा के एहसास से जुड़ जाती है। इसी वजह से किसी अपने की खुशबू महसूस होते ही अक्सर एक अनजाना सा भावनात्मक सुकून मिलता है, भले ही हमें यह समझ न आए कि यह एहसास कहां से आया।

यही कारण है कि किसी बिछड़े हुए साथी का तकिया या कपड़ा सूंघकर लोग अक्सर गहरी भावुकता महसूस करते हैं, या किसी पुराने प्रेमी की याद किसी अजनबी की मिलती-जुलती खुशबू से भी अचानक ताज़ा हो सकती है। यह इसलिए होता है क्योंकि दिमाग ने उस खास खुशबू को सिर्फ एक गंध के तौर पर नहीं, बल्कि उस पूरे भावनात्मक अनुभव के साथ एक पैकेज की तरह सहेज कर रखा होता है, जिसमें सुरक्षा, प्यार और अपनापन, सब कुछ शामिल होता है।

सेक्सुअल वेलनेस में गंध की भूमिका

यौन सेहत और अंतरंगता में खुशबू की भूमिका क्या है? शारीरिक निकटता के दौरान प्राकृतिक शारीरिक गंध एक बेहद अहम भूमिका निभाती है, क्योंकि यह सिर्फ शारीरिक आकर्षण तक सीमित नहीं, बल्कि यह दिमाग में सुरक्षा, अपनापन और जुड़ाव का भी एहसास पैदा करती है। कई सेक्स थेरेपिस्ट और रिलेशनशिप विशेषज्ञ मानते हैं कि साथी की प्राकृतिक खुशबू के प्रति सहज आकर्षण, रिश्ते में शारीरिक अंतरंगता और भावनात्मक जुड़ाव, दोनों को गहरा करने में मदद करता है।



इसी संदर्भ में एक अहम पहलू है ऑक्सीटोसिन नाम के हार्मोन का, जिसे अक्सर ‘बॉन्डिंग हार्मोन’ कहा जाता है। शारीरिक नज़दीकी, स्पर्श और अंतरंगता के दौरान यह हार्मोन बड़ी मात्रा में रिलीज़ होता है, और इसका असर साथी की प्राकृतिक खुशबू के प्रति हमारे जुड़ाव को भी मजबूत करता है। यानी शारीरिक नज़दीकी सिर्फ शारीरिक अनुभव नहीं, बल्कि यह एक ऐसा जैविक चक्र बनाती है, जिसमें खुशबू, स्पर्श और हार्मोन आपस में मिलकर भावनात्मक बंधन को और गहरा करते हैं।

कई रिलेशनशिप और सेक्सुअल वेलनेस विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि लंबे समय तक साथ रहने वाले जोड़ों में साथी की प्राकृतिक गंध के प्रति एक तरह की परिचित सुकून जैसी भावना विकसित हो जाती है, जो अंतरंगता को और आरामदायक और गहरा बनाती है। यही वजह है कि कई बार लोग यह महसूस करते हैं कि किसी लंबे अलगाव, जैसे यात्रा या दूरी, के बाद साथी के करीब आते ही एक खास तरह की राहत और सुकून का एहसास होता है, जो सिर्फ भावनात्मक जुड़ाव नहीं, बल्कि इसी जैविक-गंध वाले तंत्र का भी हिस्सा है।

अत्यधिक सुगंधित उत्पादों से प्राकृतिक खुशबू छिप जाना

आज के दौर में डियोड्रेंट, परफ्यूम और तरह-तरह के सुगंधित उत्पादों का इस्तेमाल इतना आम हो गया है कि बहुत बार हमारी प्राकृतिक शारीरिक गंध पूरी तरह ढक जाती है। कुछ वैज्ञानिकों और रिलेशनशिप विशेषज्ञों का मानना है कि इससे साथी चुनने और आपसी जैविक अनुकूलता को स्वाभाविक रूप से परखने की प्राकृतिक प्रक्रिया में कुछ हद तक रुकावट आ सकती है, क्योंकि जिस प्राकृतिक जैविक सिग्नल के आधार पर दिमाग अनजाने में साथी चुनता है, वह भारी परफ्यूम की परत के नीचे छिप जाता है। इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं कि व्यक्तिगत स्वच्छता या खुशबू का इस्तेमाल गलत है, बल्कि यह सिर्फ यह दिखाता है कि प्राकृतिक शारीरिक गंध का भी अपना एक जैविक और भावनात्मक महत्व है, जिसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। कई रिलेशनशिप विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते हैं कि जोड़ों के बीच कभी-कभी बिना किसी कृत्रिम खुशबू के, सिर्फ प्राकृतिक निकटता का अनुभव करना, आपसी भावनात्मक और शारीरिक जुड़ाव को समझने का एक अच्छा तरीका हो सकता है।

हार्मोनल बदलाव और खुशबू के प्रति संवेदनशीलता


यह भी दिलचस्प है कि किसी व्यक्ति की गंध के प्रति संवेदनशीलता उसके शरीर के हार्मोनल चक्र के हिसाब से भी बदल सकती है। कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में यह देखा गया है कि महिलाओं में मासिक धर्म चक्र के अलग-अलग समय पर गंध सूंघने और उसे पसंद-नापसंद करने की क्षमता में मामूली उतार-चढ़ाव आ सकता है, जो हार्मोन के स्तर में बदलाव से जुड़ा माना जाता है। यह भी इस बात का एक और सबूत है कि गंध और आकर्षण का यह पूरा तंत्र सिर्फ मानसिक पसंद नहीं, बल्कि गहराई से जैविक और हार्मोनल प्रक्रियाओं से जुड़ा हुआ है।

स्वच्छता और प्राकृतिक गंध के बीच संतुलन

इस पूरे विज्ञान से एक बेहद व्यावहारिक सीख मिलती है - स्वच्छता और प्राकृतिक गंध के बीच एक स्वस्थ संतुलन बनाए रखना जरूरी है। बहुत ज्यादा तेज़ या कृत्रिम खुशबू प्राकृतिक जैविक संकेतों को पूरी तरह दबा सकती है, जबकि बुनियादी साफ-सफाई की कमी भी अंतरंगता और आराम में रुकावट बन सकती है। एक हल्का, संतुलित तरीका अपनाना, जिसमें शरीर की प्राकृतिक गंध पूरी तरह गायब न हो, बल्कि हल्की और स्वाभाविक बनी रहे, कई विशेषज्ञों के मुताबिक अंतरंगता और आकर्षण, दोनों के लिए बेहतर माना जाता है।

किसी व्यक्ति की खुशबू हमें सिर्फ इसलिए आकर्षित नहीं करती कि वह अच्छी महकती है, बल्कि इसके पीछे एक गहरी जैविक प्रक्रिया छिपी है, जिसमें इम्यून सिस्टम से जुड़े जीन, दिमाग का भावनाओं और यादों से जुड़ा हिस्सा, और हार्मोन जैसे ऑक्सीटोसिन, सब मिलकर काम करते हैं। यही वजह है कि प्राकृतिक शारीरिक गंध सिर्फ शारीरिक आकर्षण का ज़रिया नहीं, बल्कि यह जैविक अनुकूलता, भावनात्मक जुड़ाव और अंतरंगता की गहराई को समझने का भी एक अनकहा, पर बेहद असरदार माध्यम है। यही वजह है कि आज सेक्सुअल वेलनेस और रिश्तों की सेहत को समझने वाले विशेषज्ञ भी इस प्राकृतिक, जैविक संकेत को नज़रअंदाज़ करने के बजाय, इसे समझने और इसका सम्मान करने की सलाह देते हैं।

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