Kis Bartan Me Khana Khana Chahiye: तांबे-पीतल के बर्तनों में दही, नींबू या टमाटर रखना कितना खतरनाक?

Kis Bartan Me Khana Khana Chahiye: तांबे, पीतल और कांसे के बर्तनों में खाना कितना सुरक्षित है?

Yogesh Mishra
Published on: 23 Oct 2026 7:19 PM IST
Kis Bartan Me Khana Khana Chahiye|Copper Brass Bronze Utensils Explained in Hindi | Newstrack Hindi
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Kis Bartan Me Khana Khana Chahiye|Copper Brass Bronze Utensils Explained in Hindi | Newstrack Hindi 

Kis Bartan Me Khana Khana Chahiye: भारतीय रसोई में पीतल, ताँबे और काँसे के बर्तनों का इस्तेमाल सदियों से होता आया है। आज भी कई लोग ताँबे के लोटे में पानी रखते हैं, काँसे की थाली में खाना खाते हैं और पीतल के पुराने बर्तनों को संभालकर रखते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि इन बर्तनों में खाना खाने से सेहत को खास फायदे मिलते हैं। दूसरी ओर, यह चेतावनी भी अक्सर सुनने को मिलती है कि इनमें दही, नींबू, इमली या टमाटर रखने से खाना ज़हरीला हो सकता है।

आखिर सच क्या है? क्या खट्टा खाना धातु के संपर्क में आते ही ज़हरीला बन जाता है? क्या इन बर्तनों में खाना पकाना सुरक्षित है, लेकिन उसे लंबे समय तक रखना खतरनाक हो सकता है? और अगर इनका इस्तेमाल भारत में सदियों से होता रहा है, तो आज इनके इस्तेमाल में सावधानी बरतने की सलाह क्यों दी जाती है?

इसका जवाब परंपरा को सही या गलत ठहराने के बजाय रसायन विज्ञान और खाद्य सुरक्षा को समझने में है। पीतल, ताँबे और काँसे के बर्तन अपने आप ज़हरीले नहीं होते, लेकिन गलत बर्तन में गलत तरह का खाना पकाने या रखने से हानिकारक धातुएँ भोजन में घुल सकती हैं।

ताँबा, पीतल और काँसा एक ही धातु नहीं हैं

इन बर्तनों के सुरक्षित इस्तेमाल को समझने के लिए पहले इनके बीच का अंतर जानना जरूरी है।

ताँबा (Copper): यह लालिमा वाली धातु है और गर्मी तथा बिजली का अच्छा चालक (कंडक्टर) है। हमारे शरीर को भी थोड़ी मात्रा में ताँबे की जरूरत होती है।

पीतल (Brass): यह मुख्य रूप से ताँबे और जस्ते को मिलाकर बनाया जाता है। अलग-अलग पीतल में इन धातुओं का अनुपात और दूसरी अशुद्धियाँ अलग हो सकती हैं।

काँसा (Bronze): पारंपरिक रूप से यह ताँबे और टिन को मिलाकर बनाया जाता है। लेकिन बाजार में काँसे के नाम से मिलने वाले सभी बर्तनों की धातु संरचना एक जैसी हो, यह जरूरी नहीं है।

इन तीनों में ताँबा मौजूद होता है। जब भोजन इनके संपर्क में आता है, तो कुछ परिस्थितियों में धातु के बहुत छोटे कण यानी आयन भोजन में घुल सकते हैं। पीतल से ताँबे और जस्ते के आयन भी निकल सकते हैं। बर्तन में मौजूद दूसरी धातुओं की अशुद्धियाँ भी भोजन में पहुँच सकती हैं। यह कितना होगा, यह कई बातों पर निर्भर करता है। जैसे भोजन कितना खट्टा है, उसमें कितना नमक है, उसे कितनी देर रखा गया है, उसका तापमान क्या है और बर्तन की सतह किस हालत में है।

क्या नींबू, दही या इमली डालते ही खाना ज़हरीला हो जाता है?

यह कहना सही नहीं है कि नींबू या दही डालते ही खाना अचानक किसी ज़हरीले पदार्थ में बदल जाता है। असल में, कुछ परिस्थितियों में भोजन के संपर्क से धातु के आयन उसमें घुलने लगते हैं। इस प्रक्रिया को मेटल लीचिंग कहते हैं। नींबू में साइट्रिक एसिड, दही में लैक्टिक एसिड और इमली में कई तरह के कार्बनिक एसिड होते हैं। टमाटर में भी एसिड मौजूद होते हैं। ये भोजन को खट्टा बनाते हैं और कुछ परिस्थितियों में धातु के घुलने की प्रक्रिया बढ़ा सकते हैं। इसी वजह से बिना सुरक्षित आंतरिक परत वाले ताँबे, पीतल और काँसे के बर्तनों में ये चीजें पकाने या लंबे समय तक रखने से बचना चाहिए: नींबू पानी और दूसरे खट्टे पेय, दही और छाछ, इमली की चटनी या खट्टी ग्रेवी, टमाटर वाली करी, सिरके वाला अचार और दूसरी अम्लीय चीजें, फलों का खट्टा रस।

ध्यान रहे कि हर खट्टे खाने का असर एक जैसा नहीं होता। भोजन में मौजूद एसिड की मात्रा, नमक, तापमान और बर्तन के संपर्क में रहने का समय भी मायने रखता है। केवल स्वाद से यह तय नहीं किया जा सकता कि भोजन कितना सुरक्षित है।

अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के खाद्य सुरक्षा नियमों में बिना उपयुक्त सुरक्षा परत वाले ताँबे और उसकी मिश्रधातुओं के संपर्क में पीएच 6 से कम वाले खाद्य पदार्थों के इस्तेमाल पर रोक के प्रावधान हैं। सिरका और फलों के रस इसके उदाहरण हैं। यह अमेरिकी नियम है, लेकिन इसके पीछे का रासायनिक सिद्धांत दूसरी जगहों पर भी लागू होता है। सबसे आसान और सुरक्षित तरीका है कि खट्टा खाना पकाने और रखने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले स्टेनलेस स्टील या उपयुक्त काँच के बर्तन इस्तेमाल करें।

शरीर में ताँबा ज्यादा पहुँच जाए तो क्या होता है?

ताँबा शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व है। यह कुछ एंजाइमों के काम, आयरन के इस्तेमाल, तंत्रिका तंत्र और शरीर के ऊतकों को बनाए रखने में मदद करता है। लेकिन जरूरत से ज्यादा ताँबा नुकसान पहुँचा सकता है।

अमेरिकी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के अनुसार, वयस्कों के लिए ताँबे की रोजाना अनुशंसित मात्रा करीब 900 माइक्रोग्राम है। वहीं वयस्कों के कुल दैनिक सेवन की ऊपरी सीमा 10 मिलीग्राम निर्धारित की गई है। ये दोनों अलग-अलग उद्देश्य वाले आँकड़े हैं। ये किसी खास बर्तन में रखे भोजन या पानी के लिए सीधे सुरक्षित मात्रा तय नहीं करते।

बहुत ज्यादा ताँबा शरीर में पहुँचने पर ये समस्याएँ हो सकती हैं: मतली और उल्टी, पेट दर्द और ऐंठन, दस्त, गंभीर या लंबे समय तक अधिक संपर्क होने पर लिवर और किडनी को नुकसान।

विल्सन डिजीज नाम की दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है, क्योंकि उनके शरीर में ताँबा जमा होने की समस्या हो सकती है।हालाँकि, भोजन में थोड़ी मात्रा में ताँबा पहुँचने का मतलब अपने आप ज़हर फैलना नहीं है। असली जोखिम इस बात पर निर्भर करता है कि कितनी धातु शरीर में पहुँची और कितने समय तक संपर्क बना रहा। किसी खास बर्तन से कितनी धातु भोजन में घुली है, यह बिना जाँच के पता लगाना मुश्किल है।

क्या पीतल के बर्तनों में सीसा भी हो सकता है?

यह एक जरूरी बात है, जिसे बर्तन खरीदते समय ध्यान में रखना चाहिए। पीतल मुख्य रूप से ताँबे और जस्ते से बनता है। लेकिन कुछ पीतल की मिश्रधातुओं में सीसा मिलाया जा सकता है। इसके अलावा, घटिया कच्चे माल या ठीक से नियंत्रित न किए गए धातु के मिश्रण से बने बर्तनों में भी सीसे जैसी हानिकारक अशुद्धियाँ मौजूद हो सकती हैं। इसका मतलब यह नहीं कि हर पीतल के बर्तन में सीसा होता है। लेकिन सिर्फ चमक देखकर यह भी तय नहीं किया जा सकता कि बर्तन सीसामुक्त और खाने के लिए सुरक्षित है। सीसा एक जहरीली धातु है। यह बच्चों के दिमाग और नर्वस सिस्टम के विकास को नुकसान पहुँचा सकता है। गर्भावस्था के दौरान इसका संपर्क भी चिंता का विषय है। सीसे के संपर्क का कोई ऐसा स्तर नहीं माना जाता, जिसे हर परिस्थिति में पूरी तरह सुरक्षित कहा जा सके।

अमेरिकी FDA ने दिसंबर 2024 में कुछ आयातित बर्तनों के बारे में चेतावनी जारी की थी। कुछ बर्तनों से भोजन में सीसा पहुँचने की आशंका सामने आई थी। 2025 में भी संबंधित चेतावनियाँ अपडेट की गईं और जनवरी 2026 में कुछ धातु के बर्तनों को संभावित सीसा संदूषण के कारण वापस मँगाने की कार्रवाई की खबरें सामने आईं। इसलिए बर्तन खरीदते समय केवल उसके पारंपरिक नाम, रंग या चमक पर भरोसा न करें। उसकी धातु संरचना और खाने के संपर्क में इस्तेमाल करने की सुरक्षा के बारे में भरोसेमंद जानकारी लेना ज्यादा जरूरी है।

क्या काँसे के बर्तन पीतल और ताँबे से ज्यादा सुरक्षित हैं?

ऐसा कोई नियम नहीं है कि हर काँसे का बर्तन हर तरह के खाने के लिए सुरक्षित होता है। पारंपरिक काँसा ताँबे और टिन से बनता है। लेकिन धातुओं का अनुपात, निर्माण की गुणवत्ता और दूसरी अशुद्धियाँ बर्तन की सुरक्षा को प्रभावित कर सकती हैं।

मई 2025 में अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र (CDC) की एक रिपोर्ट में न्यूयॉर्क के एक परिवार के लोगों के खून में सीसे का स्तर बढ़ने का संबंध नेपाल से लाए गए पारंपरिक काँसे और पीतल के बर्तनों से पाया गया था। प्रभावित लोगों में एक गर्भवती महिला भी शामिल थीं। इस घटना का मतलब यह नहीं कि सभी काँसे और पीतल के बर्तन खतरनाक हैं। यह बताती है कि केवल पारंपरिक बर्तन होने से उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं मिल जाती।

अगर बर्तन खाद्य इस्तेमाल के लिए बना है, उसकी धातु संरचना की गुणवत्ता भरोसेमंद है और उसमें हानिकारक अशुद्धियाँ नियंत्रित हैं, तो जोखिम अलग हो सकता है। लेकिन बर्तन की गुणवत्ता के बारे में जानकारी न हो, तो उसमें खट्टा खाना पकाने या लंबे समय तक रखने से बचना बेहतर है।

पुराने समय में पीतल और ताँबे के बर्तनों पर कलई क्यों की जाती थी?

भारतीय रसोई में पीतल और ताँबे के कई बर्तनों के अंदर सफेद चमकदार परत चढ़ाई जाती थी। इस प्रक्रिया को कलई करना कहते हैं। कलई में बर्तन की अंदरूनी सतह पर टिन की पतली परत चढ़ाई जाती है। इसका मकसद भोजन और नीचे मौजूद ताँबे या पीतल के बीच सीधे संपर्क को कम करना है।

जब कलई अच्छी तरह की गई हो और उसकी परत सही हालत में हो, तो वह धातु के सीधे संपर्क से होने वाली कुछ रासायनिक प्रतिक्रियाओं को कम कर सकती है। यही वजह है कि पुराने समय में खाना पकाने वाले कई ताँबे और पीतल के बर्तनों पर कलई की जाती थी। लेकिन कलई हमेशा के लिए नहीं टिकती। लगातार इस्तेमाल, रगड़ने और घिसने से इसकी परत पतली हो सकती है या उतर सकती है। अगर नीचे की धातु दिखाई देने लगे, तो भोजन उसके सीधे संपर्क में आ सकता है। कलई की गुणवत्ता भी जरूरी है। इसके लिए खाने के संपर्क में इस्तेमाल के योग्य सामग्री होनी चाहिए। सीसे वाले सोल्डर या अज्ञात मिश्रधातु से की गई परत सुरक्षित नहीं मानी जा सकती।

क्या ताँबे के लोटे में रातभर रखा पानी पीना फायदेमंद है?

ताँबे के बर्तन में पानी रखने की परंपरा भारत में लंबे समय से चली आ रही है। इसके समर्थन में अक्सर कहा जाता है कि ताँबा पानी में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया को मार सकता है। इस दावे का कुछ वैज्ञानिक आधार है। ताँबे की सतह और उससे निकलने वाले आयन कुछ सूक्ष्मजीवों की संरचना और उनके काम करने के तरीके को प्रभावित कर सकते हैं। कुछ प्रयोगशाला अध्ययनों में ताँबे के बर्तनों में कई घंटे तक रखे पानी में खास बैक्टीरिया की संख्या कम होती देखी गई है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि ताँबे के बर्तन में रखा हर पानी पीने के लिए सुरक्षित हो जाता है। नतीजे पानी में मौजूद सूक्ष्मजीवों, पानी की रासायनिक संरचना, बर्तन की सफाई और पानी कितनी देर रखा गया है, इन सभी बातों पर निर्भर करते हैं।

ताँबे का लोटा पानी साफ करने का भरोसेमंद विकल्प नहीं है। यह हर तरह के वायरस, परजीवी या रासायनिक प्रदूषण को सुरक्षित तरीके से नहीं हटाता। जरूरत के अनुसार पानी उबालना या प्रमाणित वॉटर ट्रीटमेंट सिस्टम इस्तेमाल करना ज्यादा भरोसेमंद है। इसी तरह, ताँबे के बर्तन में पानी रखने से पाचन में चमत्कारी सुधार, वजन घटने, इम्युनिटी बढ़ने या कई बीमारियों के इलाज जैसे दावों के समर्थन में पर्याप्त उच्च गुणवत्ता वाले मानव अध्ययन उपलब्ध नहीं हैं। अगर आप ताँबे के बर्तन में पानी रखते हैं, तो बर्तन साफ और खाद्य इस्तेमाल के लिए उपयुक्त होना चाहिए। उसमें नींबू या सिरका मिलाकर पानी न रखें। अंदर हरे या नीले रंग का जमाव दिखाई दे, या बर्तन की गुणवत्ता संदिग्ध हो, तो उसका इस्तेमाल रोक दें।

ताँबे और पीतल के बर्तनों पर हरी परत क्यों जमती है?

ताँबे और उसकी मिश्रधातुओं (अलॉय) की सतह हवा, नमी और आसपास मौजूद दूसरे रसायनों के संपर्क में आकर बदल सकती है। इससे सतह पर अलग-अलग ताँबा यौगिक बनते हैं, जो कुछ परिस्थितियों में हरे या नीले रंग के दिखाई देते हैं। इन जमावों को आम बोलचाल में अक्सर जंग या वर्डिग्रिस कहा जाता है। लेकिन इनकी वास्तविक रासायनिक संरचना अलग-अलग हो सकती है। इनमें ताँबे के कार्बोनेट, हाइड्रॉक्साइड, एसीटेट या दूसरे यौगिक शामिल हो सकते हैं।

यहाँ एक बात समझना जरूरी है। लोहे पर लगने वाली जंग और ताँबे पर बनने वाली हरी परत रासायनिक रूप से एक जैसी नहीं होतीं। अगर बर्तन की अंदरूनी सतह पर हरा या नीला जमाव दिखाई दे, तो उसे बिना जाँच और उचित सफाई के खाना या पानी रखने के लिए इस्तेमाल न करें। कुछ ताँबा यौगिक निगलने पर नुकसान पहुँचा सकते हैं। हर तरह की सतही रंगत एक जैसी नहीं होती, लेकिन खाने के सीधे संपर्क में आने वाली सतह साफ और इस्तेमाल के योग्य होनी चाहिए। अगर परत का कारण समझ में न आए, तो बर्तन की जाँच कराना बेहतर है।

क्या इन बर्तनों में खाना खाने से शरीर को अतिरिक्त खनिज मिलते हैं?

ताँबा और जस्ता दोनों शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व हैं। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि पीतल या ताँबे के बर्तन में खाना खाने से पोषण की कमी दूर हो जाएगी। शरीर को जरूरी खनिज संतुलित भोजन से मिलने चाहिए। दालें, अनाज, मेवे, बीज और दूसरे खाद्य पदार्थ कई पोषक तत्वों के अच्छे स्रोत हैं। धातु के बर्तन से भोजन में कितना ताँबा या जस्ता घुलेगा, यह निश्चित नहीं होता। अगर मात्रा बहुत कम है, तो उससे कोई खास पोषण लाभ नहीं मिलेगा। अगर मात्रा जरूरत से ज्यादा हो जाए, तो नुकसान हो सकता है।

इसी तरह, काँसे की थाली में खाना खाने से पाचन बेहतर होने, दिमाग तेज होने या किसी खास बीमारी से बचाव होने के दावों के समर्थन में पर्याप्त मजबूत मानव अनुसंधान उपलब्ध नहीं है। इसलिए धातु के बर्तन से अनिश्चित मात्रा में खनिज मिलने को पोषण बढ़ाने का भरोसेमंद तरीका नहीं मानना चाहिए।

गरम खाने और ठंडे खाने में क्या फर्क पड़ता है?

तापमान धातु और भोजन के बीच होने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है। आमतौर पर अधिक तापमान पर कुछ रासायनिक प्रक्रियाएँ तेज हो सकती हैं। इसलिए बिना सुरक्षित परत वाले धातु के बर्तन में खट्टी ग्रेवी को लंबे समय तक पकाने या उबालने से धातु के घुलने का जोखिम बढ़ सकता है। लेकिन ठंडा खाना भी हमेशा सुरक्षित नहीं होता। अगर दही, इमली की चटनी या कोई दूसरी खट्टी चीज लंबे समय तक अनुपयुक्त धातु के बर्तन में रखी जाए, तो उसमें भी धातु घुल सकती है।

उदाहरण के लिए, बिना कलई वाले पीतल के बर्तन में इमली की चटनी रातभर रखना ठीक नहीं है, भले ही उसे गरम न किया गया हो।

इसलिए केवल यह देखना काफी नहीं कि खाना गरम है या ठंडा। बर्तन की बनावट, उसकी अंदरूनी परत, खाने की अम्लीयता और संपर्क में रहने का समय भी मायने रखते हैं।

क्या इन बर्तनों में सूखा खाना परोस सकते हैं?

सूखी रोटी, कुछ सूखे नाश्ते और कम नमी वाले खाद्य पदार्थों का धातु के साथ संपर्क खट्टी ग्रेवी या तरल भोजन से अलग होता है। आम तौर पर कम नमी और कम अम्लीयता वाली परिस्थितियों में धातु के घुलने की संभावना कम हो सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर पुरानी धातु की थाली सुरक्षित है। अगर उसमें सीसा या दूसरी हानिकारक अशुद्धियाँ मौजूद हैं, तो सूखा खाना परोसने से सभी जोखिम खत्म नहीं हो जाते।

बर्तन की वास्तविक धातु संरचना, उसकी सतह और खाद्य इस्तेमाल के लिए उसकी उपयुक्तता यहाँ भी महत्वपूर्ण हैं। किसी भरोसेमंद बर्तन में सूखी रोटी परोसने और बिना सुरक्षित परत वाले बर्तन में गरम खट्टी दाल लंबे समय तक रखने को एक जैसा नहीं माना जाना चाहिए।

इन बर्तनों का इस्तेमाल करते समय कौन-सी सावधानियाँ रखें?

अगर आपके घर में पीतल, ताँबे या काँसे के पुराने बर्तन हैं, तो उन्हें तुरंत फेंकने की जरूरत नहीं है। लेकिन उनका इस्तेमाल केवल परंपरा या दिखावट के आधार पर भी तय नहीं करना चाहिए।

इन आसान सावधानियों का ध्यान रखें:

खट्टे खाने के लिए: नींबू, दही, इमली, सिरका, अचार और टमाटर वाली ग्रेवी पकाने या रखने के लिए स्टेनलेस स्टील या उपयुक्त काँच के बर्तन चुनें।

कलई वाले बर्तन: अंदर की टिन की परत सही हालत में होनी चाहिए। अगर परत उतर गई है या नीचे की धातु दिख रही है, तो बर्तन की मरम्मत कराएँ।

बर्तन खरीदते समय: केवल शुद्ध पीतल या शुद्ध काँसा लिखा होने पर भरोसा न करें। जहाँ संभव हो, खाद्य इस्तेमाल की उपयुक्तता और सीसा जैसी अशुद्धियों की जाँच के बारे में भरोसेमंद जानकारी लें।

हरे या नीले जमाव पर: बर्तन की अंदरूनी सतह पर ऐसा जमाव दिखे, तो उसकी जाँच और उचित सफाई के बिना उसमें भोजन या पानी न रखें।

बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए: संदिग्ध गुणवत्ता वाले धातु के बर्तनों के इस्तेमाल से विशेष रूप से बचें।

रोजमर्रा के इस्तेमाल में: अच्छी गुणवत्ता वाला स्टेनलेस स्टील एक व्यावहारिक विकल्प है। अम्लीय भोजन रखने के लिए उपयुक्त काँच भी अच्छा विकल्प हो सकता है।

अगर संदिग्ध बर्तन में रखा खाना खाने के बाद तेज पेट दर्द, लगातार उल्टी या कोई गंभीर परेशानी हो, तो चिकित्सकीय मदद लें। केवल खाने के रंग या स्वाद से यह पता नहीं लगाया जा सकता कि उसमें कितनी धातु घुली है। सीसे के लंबे समय तक संपर्क से नुकसान बिना साफ लक्षणों के भी हो सकता है।

कुलमिलाकर, सीधी बात यह है कि ताँबा, पीतल और काँसा न तो चमत्कारी औषधि हैं और न ही अपने आप ज़हर। सही गुणवत्ता का बर्तन चुनना, उसके लिए उपयुक्त भोजन इस्तेमाल करना और उसकी सतह की हालत पर ध्यान देना ही सुरक्षित उपयोग का सबसे अच्छा तरीका है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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