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Kitchen Sponge Microplastic Pollution: क्या आपका किचन स्पंज बढ़ा रहा है माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण? नई रिसर्च में खुलासा
Kitchen Sponge Microplastic Pollution: नई रिसर्च में पता चला है कि बर्तन धोने वाले स्पंज से माइक्रोप्लास्टिक कण निकलकर पर्यावरण तक पहुंच सकते हैं।
Kitchen Sponge Microplastic Pollution 2026
Kitchen Sponge Microplastic Pollution: हर घर में बर्तन धोने वाला स्क्रबर रोजमर्रा की जरूरत का एक अहम हिस्सा है। लेकिन क्या आपको पता है कि, रोजाना बर्तन साफ करने के लिए इस्तेमाल होने वाला यह साधारण किचन स्पंज पर्यावरण के लिए एक छिपा हुआ खतरा बन सकता है। जर्मनी के बॉन विश्वविद्यालय की नई रिसर्च में पता चला है कि बर्तन धोने के दौरान स्पंज से माइक्रोप्लास्टिक कण निकलते हैं, जो पानी के जरिए पर्यावरण में पहुंच जाते हैं। हैरानी की बात यह है कि ये कण आंखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन लंबे समय तक मिट्टी, नदियों और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में बने रह सकते हैं। अध्ययन ने यह भी दिखाया कि पुराने और घिसे हुए स्पंज इस समस्या को और बढ़ा देते हैं।
किचन में रखा बर्तन साफ करने वाला स्पंज अब सिर्फ सफाई का साधन नहीं, बल्कि माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण का एक नया स्रोत भी माना जा रहा है। जर्मनी के बॉन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह सामने आया है कि रोजमर्रा के इस्तेमाल के दौरान स्पंज से बेहद छोटे प्लास्टिक कण निकलते हैं, जो पानी के साथ पर्यावरण में पहुंच जाते हैं। माइक्रोप्लास्टिक वे प्लास्टिक कण होते हैं जिनका आकार 5 मिलीमीटर से भी छोटा होता है। ये इतने सूक्ष्म होते हैं कि सामान्य तौर पर दिखाई नहीं देते, लेकिन पर्यावरण और जीव-जंतुओं पर इनका असर लंबे समय तक बना रह सकता है। वैज्ञानिक पिछले कई वर्षों से समुद्र, नदियों, मिट्टी और यहां तक कि मानव शरीर में भी माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी को लेकर चिंता जता रहे हैं।
घरों और लैब में हुआ विस्तृत परीक्षण
इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने जर्मनी और उत्तरी अमेरिका के कई घरों को शामिल किया। प्रतिभागियों ने अपने रोजमर्रा के तरीके से अलग-अलग प्रकार के स्पंज का इस्तेमाल किया और उससे जुड़ी जानकारी दर्ज की। साथ ही वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में स्पंजबॉट नाम की विशेष मशीन का उपयोग किया। यह मशीन बर्तन धोने के दौरान होने वाले दबाव, रगड़ और घिसाव की प्रक्रिया को दोहराती है। इसके जरिए शोधकर्ताओं ने समझने की कोशिश की कि समय के साथ स्पंज किस तरह टूटते हैं और उनसे प्लास्टिक कण कैसे निकलते हैं।
हर प्रकार के स्पंज से निकले माइक्रोप्लास्टिक
अध्ययन में जांचे गए सभी स्पंज से माइक्रोप्लास्टिक निकलने की पुष्टि हुई। हालांकि इसकी मात्रा स्पंज की सामग्री, गुणवत्ता और इस्तेमाल के तरीके पर निर्भर पाई गई। शोधकर्ताओं के अनुसार, एक व्यक्ति द्वारा एक साल में इस्तेमाल किए जाने वाले स्पंज से लगभग 0.68 ग्राम से 4.21 ग्राम तक माइक्रोप्लास्टिक निकल सकता है। पहली नजर में यह मात्रा कम लग सकती है, लेकिन जब करोड़ों लोग रोजाना ऐसे स्पंज का इस्तेमाल करते हैं तो इसका कुल प्रभाव काफी बड़ा हो सकता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि बड़े पैमाने पर उपयोग होने पर इन स्पंजों से निकलने वाले माइक्रोप्लास्टिक का उत्सर्जन सैकड़ों टन तक पहुंच सकता है।
क्यों चिंता की बात हैं ये छोटे कण
माइक्रोप्लास्टिक कण पानी के साथ सीवेज सिस्टम में पहुंच जाते हैं। हालांकि कुछ कण जल शोधन संयंत्रों में रुक जाते हैं, लेकिन सभी को रोक पाना संभव नहीं होता। कई कण नदियों, झीलों और समुद्रों तक पहुंच जाते हैं। समुद्री जीव अक्सर इन्हें भोजन समझकर निगल लेते हैं। इससे उनके स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है। वैज्ञानिक यह भी जांच रहे हैं कि माइक्रोप्लास्टिक खाद्य श्रृंखला के जरिए इंसानों तक किस हद तक पहुंच रहा है और इसके संभावित स्वास्थ्य प्रभाव क्या हो सकते हैं।
पानी की बर्बादी भी बड़ा पर्यावरणीय खतरा
रिसर्च का एक दिलचस्प निष्कर्ष यह भी रहा कि पर्यावरण पर सबसे अधिक असर सिर्फ माइक्रोप्लास्टिक से नहीं, बल्कि बर्तन धोने में होने वाली पानी की अत्यधिक खपत से पड़ता है। अध्ययन के अनुसार, कुल पर्यावरणीय प्रभाव में पानी के उपयोग की हिस्सेदारी लगभग 85 से 97 प्रतिशत तक रही। यानी यदि लोग बर्तन धोते समय जरूरत से ज्यादा पानी बहाते हैं तो उसका पर्यावरण पर असर माइक्रोप्लास्टिक से भी अधिक हो सकता है।
पर्यावरण को नुकसान कम करने के लिए क्या करें
विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ आसान आदतें अपनाकर इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। बर्तन धोते समय पानी का सीमित उपयोग करें, कम प्लास्टिक वाले या प्राकृतिक सामग्री से बने स्पंज चुनें और स्पंज को जरूरत से पहले न फेंकें। इसके अलावा, अच्छी गुणवत्ता वाले टिकाऊ स्पंज लंबे समय तक चलते हैं, जिससे बार-बार नए स्पंज खरीदने की जरूरत कम पड़ती है और प्लास्टिक कचरा भी घटता है। किचन में इस्तेमाल होने वाला एक साधारण स्पंज देखने में भले ही मामूली लगे, लेकिन उसके पर्यावरणीय प्रभाव को बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह अध्ययन इस बात की ओर इशारा करता है कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी चीजें भी प्रदूषण में योगदान दे सकती हैं। ऐसे में संसाधनों का समझदारी से इस्तेमाल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।


