Lift Ke Bare Me Jankari: लिफ्ट में पेट क्यों डूबता है... शरीर को कैसे पता चलता है कि हम ऊपर जा रहे?

Lift Ke Bare Me Jankari: लिफ्ट या फ्लाइट में कुछ सेकंड के लिए पेट में डूबने या हल्कापन क्यों महसूस होता है?

Yogesh Mishra
Published on: 7 Oct 2026 1:29 PM IST
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Lift Me Pet Kyon Dubta Hai | Lift Flights Explained in Hindi 

Lift Me Pet Kyon Dubta Hai: लिफ्ट तेजी से ऊपर चलती है तो एक पल के लिए लगता है जैसे शरीर नीचे दब गया हो। वही लिफ्ट नीचे उतरना शुरू करे तो पेट में हल्का खालीपन या ‘डूबने’ जैसा एहसास होता है। विमान के उड़ान भरते समय, अचानक ऊंचाई बदलने पर या हवा के झटके में भी ऐसा हो सकता है। रोलर कोस्टर में यही अनुभूति बहुत तेज हो जाती है।

हम इसे आम तौर पर ‘पेट में गुदगुदी’, ‘दिल बैठना’ या ‘पेट ऊपर-नीचे होना’ कहते हैं। लेकिन हमारा शरीर सीधे यह नहीं माप रहा होता कि हम कितनी ऊंचाई पर पहुंच गए हैं। वह मुख्य रूप से यह महसूस करता है कि गति बदल रही है, गुरुत्वाकर्षण के मुकाबले शरीर पर लगने वाला बल कैसे बदल रहा है और शरीर किस दिशा में त्वरण कर रहा है। इस काम में भीतरी कान, आंखें, मांसपेशियां, जोड़ और शरीर के दूसरे संवेदक मिलकर मस्तिष्क को लगातार जानकारी देते हैं।

कान सिर्फ सुनने के लिए नहीं है

कान के भीतर सुनने के अलावा शरीर का संतुलन और गति समझने वाली एक अलग व्यवस्था भी होती है, जिसे 'वेस्टिब्युलर तंत्र' कहते हैं। इसकी मदद से हम सिर घुमाने, झुकने, घूमने और अचानक आगे-पीछे या ऊपर-नीचे होने को महसूस कर पाते हैं।

इसके दो हिस्से खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं। पहला है तीन अर्धवृत्ताकार नलिकाएं, जो सिर के घूमने को पहचानती हैं। जब आप सिर घुमाते हैं तो इनके भीतर मौजूद द्रव जड़त्व के कारण थोड़ी देर पीछे रहता है। इससे बेहद संवेदनशील बाल कोशिकाएं मुड़ती हैं और मस्तिष्क को पता चलता है कि सिर किस दिशा में घूम रहा है।

दूसरा हिस्सा है 'ओटोलिथ अंग', जिसमें 'यूट्रिकल' और 'सैक्यूल' होते हैं। इनके भीतर बेहद छोटे कैल्शियम कार्बोनेट के कण होते हैं, जिन्हें 'ओटोकोनिया' कहा जाता है। ये कण गुरुत्व और सीधी रेखा में होने वाले त्वरण के कारण थोड़ा खिसकते हैं और बाल कोशिकाओं को मोड़ते हैं। इससे मस्तिष्क को पता चलता है कि शरीर पर किस दिशा में बल पड़ रहा है।

यानी हमारे भीतरी कान में प्रकृति ने एक तरह का जैविक गति-मापक बना रखा है।

क्या कान को पता चलता है कि लिफ्ट ऊपर जा रही है?

दिलचस्प जवाब है, कान को ऊंचाई का नहीं, मुख्य रूप से त्वरण (Acceleration) का पता चलता है।

मान लीजिए लिफ्ट जमीन पर खड़ी है। गुरुत्वाकर्षण आपको नीचे खींच रहा है और लिफ्ट का फर्श आपको ऊपर की ओर सहारा दे रहा है। अब लिफ्ट ऊपर की ओर तेजी से चलना शुरू करती है। फर्श आपके पैरों को सामान्य से थोड़ा ज्यादा बल से ऊपर धकेलता है। इसलिए आपको कुछ क्षण के लिए अपना वजन बढ़ा हुआ महसूस हो सकता है। भीतरी कान भी इस बदलाव को महसूस करता है। लेकिन जैसे ही लिफ्ट ऊपर जाकर समान गति से चलने लगती है, त्वरण लगभग खत्म हो जाता है। अब वह ऊपर तो जा रही है, लेकिन उसकी गति बदल नहीं रही। इसलिए शरीर को लगातार यह संकेत नहीं मिलता रहता कि वह ऊपर जा रहा है।

यही वजह है कि अगर कोई लिफ्ट बिल्कुल शांत हो, उसमें खिड़की न हो और वह बहुत सहज तरीके से समान गति से ऊपर जाए, तो केवल शरीर की संवेदनाओं से यह बताना मुश्किल हो सकता है कि आप ऊपर जा रहे हैं या स्थिर हैं। सरल शब्दों में, हम गति से ज्यादा गति में बदलाव को महसूस करते हैं।

लिफ्ट रुकते समय पेट में डूबने जैसा क्यों लगता है?

ऊपर जाती लिफ्ट को मंजिल पर रुकना है तो उसकी ऊपर की गति कम होने लगती है। इसका मतलब है कि उसका त्वरण नीचे की दिशा में हो गया। उस समय फर्श का शरीर को दिया जाने वाला सहारा कुछ क्षण के लिए कम हो सकता है और आपको हल्कापन महसूस होता है।

यही वह क्षण है जब पेट में ‘डूबने’ जैसा एहसास हो सकता है। नीचे जाती लिफ्ट में इसका उलटा होता है। नीचे जाते समय शुरुआत में हल्कापन महसूस हो सकता है और नीचे पहुंचकर जब लिफ्ट ब्रेक लगाती है तो कुछ क्षण के लिए शरीर भारी-सा लग सकता है। इसलिए पेट का यह एहसास पूरी यात्रा के दौरान नहीं रहता। यह खास तौर पर लिफ्ट के चलने, गति बदलने और रुकने के समय होता है। पेट मंजिलें नहीं गिन रहा होता, वह त्वरण में आए बदलाव को महसूस कर रहा होता है।

ये एहसास पेट में ही क्यों होता है?

गति की जानकारी देने में भीतरी कान की बड़ी भूमिका है, लेकिन पेट में होने वाली अनुभूति केवल कान की वजह से नहीं होती। हमारे पेट और दूसरे आंतरिक अंग मुलायम ऊतकों और सहायक संरचनाओं के बीच टिके होते हैं। जब पूरे शरीर का त्वरण अचानक बदलता है तो शरीर और उसके अंदर के अंगों पर लगने वाले बल का वितरण भी थोड़ी देर के लिए बदल जाता है।

इसे कार से समझिए। कार अचानक आगे बढ़ती है तो सीट आपकी पीठ को आगे धकेलती है, लेकिन आपको ऐसा लगता है जैसे शरीर पीछे रह गया हो। वास्तव में कोई रहस्यमय ताकत आपको पीछे नहीं खींच रही होती। आपका शरीर अपनी पुरानी अवस्था बनाए रखने की कोशिश कर रहा होता है, जबकि कार आगे बढ़ रही होती है। पेट के अंदर भी जड़त्व काम करता है। अचानक त्वरण बदलने पर आंतरिक अंगों और आसपास के ऊतकों पर खिंचाव और दबाव का वितरण बदल सकता है। इन संकेतों को भीतरी कान और शरीर के दूसरे संवेदकों से मिली जानकारी के साथ मस्तिष्क जोड़ता है। इन सबका मिला-जुला अनुभव हमें ‘पेट छूटने’ या ‘डूबने’ जैसा महसूस हो सकता है।

विमान में यह अनुभव ज्यादा जटिल क्यों होता है?

विमान केवल ऊपर-नीचे नहीं चलता। वह आगे बढ़ता है, ऊपर चढ़ता है, नीचे उतरता है, मुड़ता है, झुकता है और हवा के कारण अचानक ऊपर-नीचे भी हो सकता है। इसलिए उड़ान के दौरान शरीर को कई तरह के त्वरण एक साथ महसूस होते हैं।

उड़ान भरते समय विमान पहले रनवे पर तेजी से आगे बढ़ता है। सीट आपकी पीठ को धक्का देती है और आपको पीछे दबने जैसा लगता है। फिर विमान का अगला हिस्सा ऊपर उठता है और चढ़ाई शुरू होती है। इस दौरान भीतरी कान को शरीर की गति, सिर की स्थिति और गुरुत्व से जुड़े कई संकेत मिलते हैं।

यहां एक दिलचस्प समस्या आती है। ओटोलिथ अंग हमेशा अकेले यह तय नहीं कर सकते कि उन्हें महसूस हो रहा बल गुरुत्वाकर्षण के कारण है या वाहन के त्वरण के कारण। इसलिए मस्तिष्क को आंखों, भीतरी कान और मांसपेशियों से मिली जानकारी को मिलाकर अनुमान लगाना पड़ता है कि वास्तव में शरीर किस स्थिति में है। इसी कारण विमान में केवल शरीर की अनुभूति हमेशा भरोसेमंद नहीं होती। खराब दृश्यता में पायलट को अपनी इंद्रियों से भ्रम हो सकता है, इसलिए वे विमान के उपकरणों पर भरोसा करने का प्रशिक्षण लेते हैं।

टर्बुलेंस में अचानक पेट क्यों बैठ जाता है?

विमान में पेट के अचानक ‘बैठने’ जैसा एहसास अक्सर तब होता है जब ऊर्ध्वाधर त्वरण तेजी से बदलता है। अगर विमान कुछ क्षण के लिए नीचे की ओर तेजी से बढ़े तो सीट का शरीर को दिया जाने वाला सहारा कम महसूस हो सकता है। शरीर का महसूस होने वाला वजन भी घट जाता है और पेट में खालीपन जैसा एहसास पैदा हो सकता है।

रोलर कोस्टर में यही प्रभाव बहुत तेज होता है। अगर वाहन और उसमें बैठे व्यक्ति कुछ समय के लिए लगभग गुरुत्वाकर्षण की गति से नीचे की ओर बढ़ रहे हों तो सीट शरीर को सामान्य वजन जितना सहारा नहीं देती। उस समय भारहीनता जैसी अनुभूति हो सकती है। इसका मतलब यह नहीं कि गुरुत्वाकर्षण गायब हो गया। गुरुत्वाकर्षण लगातार मौजूद रहता है, लेकिन शरीर और वाहन लगभग एक साथ नीचे की ओर बढ़ रहे होते हैं। इसलिए सामान्य वजन जैसा एहसास कम हो जाता है।

क्या पेट के अंग सचमुच ऊपर उठ जाते हैं?

हमारे आंतरिक अंग शरीर के भीतर ऊतकों, झिल्लियों और दूसरी संरचनाओं से जुड़े और समर्थित रहते हैं। अचानक त्वरण बदलने पर उन पर लगने वाले बल और दबाव का वितरण जरूर बदल सकता है। इसी से खिंचाव या हल्केपन की अनुभूति पैदा हो सकती है। इसलिए एहसास बिल्कुल वास्तविक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पेट या आंतें अपनी जगह छोड़कर ऊपर चली गईं।

क्या शरीर ऊपर और नीचे का फर्क कर सकता है?

हां, लेकिन वह पृथ्वी से आपकी ऊंचाई को सीधे नहीं मापता। शरीर के पास ऐसा कोई जैविक ऊंचाई-मापक नहीं है जो बताए कि आप तीसरी मंजिल पर हैं या दसवीं पर। भीतरी कान गुरुत्व के मुकाबले सिर की स्थिति और सीधी रेखा में होने वाले त्वरण को महसूस करता है। आंखें बाहरी दुनिया का संदर्भ देती हैं। मांसपेशियां और जोड़ शरीर की मुद्रा बताते हैं, जबकि पैरों पर पड़ने वाला दबाव यह जानकारी देता है कि जमीन या फर्श कितना सहारा दे रहा है।

मस्तिष्क इन सभी संकेतों को जोड़कर शरीर की स्थिति का अनुमान लगाता है। इसलिए आंखें बंद होने पर भी हम आम तौर पर समझ सकते हैं कि लिफ्ट अचानक ऊपर या नीचे चल पड़ी है। लेकिन अगर लिफ्ट समान गति से बहुत सहज तरीके से चलती रहे तो कुछ समय बाद केवल शरीर की संवेदनाओं से यह बताना कठिन हो जाता है कि वह अभी भी ऊपर जा रही है।

आंख और कान अलग-अलग संकेत दें तो चक्कर क्यों आता है?

यही बात मोशन सिकनेस को समझने में भी मदद करती है। कार में बैठकर मोबाइल पढ़ने का उदाहरण लीजिए। आपकी आंखें मोबाइल को स्थिर देख रही हैं, लेकिन भीतरी कान महसूस कर रहा है कि कार मुड़ रही है, ब्रेक लगा रही है और गति बदल रही है। मस्तिष्क को एक ही समय पर दो अलग-अलग संकेत मिल रहे होते हैं। इसी तरह जहाज में नीचे बैठे व्यक्ति को आंखों से ज्यादा गति दिखाई नहीं दे सकती, जबकि भीतरी कान लगातार झूलने का संकेत दे रहा होता है। इस तरह की असंगति से चक्कर, मितली और असहजता पैदा हो सकती है।

अंतरिक्ष यात्रा में यह समस्या और दिलचस्प हो जाती है। पृथ्वी पर मस्तिष्क ने गुरुत्वाकर्षण को ‘नीचे’ की दिशा के स्थायी संकेत के रूप में समझना सीखा है। लेकिन अंतरिक्ष में अंतरिक्ष यात्री और यान लगातार मुक्त-पतन की स्थिति में होते हैं, इसलिए सामान्य गुरुत्व संकेत बहुत बदल जाता है। मस्तिष्क को नई परिस्थिति के अनुसार अपनी व्याख्या बदलनी पड़ती है।

अंतरिक्ष यात्री को ‘ऊपर’ और ‘नीचे’ कैसे पता चलता है?

पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण हमें लगातार एक मजबूत संदर्भ देता है। जिस दिशा में पृथ्वी हमें खींचती है, वही हमारे लिए ‘नीचे’ बन जाती है। भीतरी कान इसी संकेत के साथ काम करना सीखता है। अंतरिक्ष यान पृथ्वी की कक्षा में लगातार पृथ्वी की ओर गिर रहा होता है, लेकिन उसकी आगे की गति इतनी अधिक होती है कि वह पृथ्वी से टकराने के बजाय उसके चारों ओर घूमता रहता है। यान के अंदर व्यक्ति को लगभग भारहीनता महसूस होती है।

इस स्थिति में भीतरी कान को पृथ्वी जैसा स्थायी ‘नीचे’ नहीं मिलता। इसलिए अंतरिक्ष में ऊपर और नीचे की समझ काफी हद तक आंखों और आसपास के संदर्भ पर निर्भर हो जाती है। कुछ समय बाद मस्तिष्क इस नई स्थिति के अनुसार खुद को ढाल भी लेता है।

विमान में कान बंद होने का इससे क्या संबंध है?

विमान में कान बंद होना और पेट में हल्कापन महसूस होना दो अलग घटनाएं हैं। पेट में हल्कापन और गति की अनुभूति में मुख्य भूमिका भीतरी कान के संतुलन तंत्र की होती है। लेकिन विमान के ऊपर जाने या नीचे आने पर कान में दबाव, दर्द या ‘पॉप’ जैसी अनुभूति मुख्य रूप से मध्य कान और यूस्टेशियन नली से जुड़ी होती है।

विमान की ऊंचाई बदलने पर केबिन का वायु दबाव बदलता है। मध्य कान के अंदर की हवा और बाहर के दबाव में अंतर हो सकता है। यूस्टेशियन नली इस दबाव को बराबर करने में मदद करती है। सर्दी, नाक बंद होने या एलर्जी में यह काम मुश्किल हो सकता है और कान में ज्यादा दबाव या दर्द महसूस हो सकता है। इसलिए उड़ान के दौरान एक साथ दो अलग अनुभव हो सकते हैं। पेट में डूबने जैसा एहसास त्वरण से जुड़ा है, जबकि कान बंद होने जैसा एहसास वायु दबाव में बदलाव से।

कुछ लोगों को यह ज्यादा क्यों महसूस होता है?

हर व्यक्ति की गति और संतुलन महसूस करने की संवेदनशीलता एक जैसी नहीं होती। किसी व्यक्ति को लिफ्ट के छोटे बदलाव भी साफ महसूस हो सकते हैं, जबकि दूसरे को वही लिफ्ट लगभग सामान्य लगेगी।

अनुभव और आदत भी असर डालते हैं। जो लोग रोज तेज लिफ्ट में चलते हैं, उनका मस्तिष्क इन संकेतों को सामान्य मानकर उन पर कम ध्यान दे सकता है। इसी तरह पायलट, नाविक और अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण और अनुभव से असामान्य गति-संकेतों को बेहतर ढंग से समझना सीखते हैं। हालांकि अगर सामान्य यात्रा में बार-बार तेज चक्कर, कमरा घूमने जैसा एहसास, संतुलन बिगड़ना, उल्टी, बेहोशी, अचानक सुनाई कम देना या किसी एक कान से जुड़ी असामान्य समस्या हो तो इसे केवल लिफ्ट या यात्रा का असर मानना ठीक नहीं है। ऐसे लक्षण भीतरी कान या संतुलन तंत्र की किसी समस्या से भी जुड़े हो सकते हैं।

हमारे कान के भीतर एक जैविक गति-मापक है

आज के मोबाइल फोन में गति और घूमने की दिशा मापने वाले संवेदक होते हैं। फोन को घुमाइए तो वह अपनी दिशा बदलने का पता लगा लेता है। कार में रखे फोन का गति में बदलाव भी दर्ज किया जा सकता है।

प्रकृति ने इससे मिलता-जुलता काम हमारे शरीर में बहुत पहले कर दिया था। अर्धवृत्ताकार नलिकाएं सिर के घूमने को पहचानती हैं, जबकि यूट्रिकल और सैक्यूल गुरुत्व तथा सीधी रेखा में होने वाले त्वरण से जुड़े संकेत पकड़ते हैं। आंखें बाहरी दुनिया का संदर्भ देती हैं और मांसपेशियां तथा जोड़ शरीर की मुद्रा की जानकारी देते हैं। मस्तिष्क इन सभी संकेतों को मिलाकर तय करता है कि शरीर किस दिशा में है और उसके साथ क्या हो रहा है।

इसलिए अगली बार तेज लिफ्ट नीचे जाए और एक पल के लिए पेट ‘छूटता’ हुआ लगे तो याद रखिए, आपका पेट मंजिल बदलने की खबर नहीं दे रहा है। आपका पूरा शरीर त्वरण में आए अचानक बदलाव को महसूस कर रहा है और भीतरी कान के बेहद छोटे कैल्शियम कार्बोनेट कण मस्तिष्क को बता रहे हैं कि गुरुत्व और गति का सामान्य हिसाब कुछ क्षण के लिए बदल गया है।

सबसे दिलचस्प बात यही है कि शरीर को सीधे यह पता नहीं चलता कि हम तीसरी मंजिल से दसवीं मंजिल पर पहुंच गए हैं। उसे मुख्य रूप से यह पता चलता है कि हम चलना शुरू हुए, गति बदली, मुड़े या रुक गए। अगर कोई बिल्कुल शांत लिफ्ट आपको समान गति से लगातार ऊपर ले जाए तो कुछ समय बाद शरीर के लिए ‘मैं ऊपर जा रहा हूं’ और ‘मैं स्थिर हूं’ के बीच फर्क करना आश्चर्यजनक रूप से कठिन हो सकता है।

यही छोटा-सा अनुभव हमें एक बड़ी बात समझाता है: हमारा शरीर दुनिया में अपनी स्थिति को किसी एक संवेदक से नहीं, बल्कि गुरुत्व, गति, आंखों, कान और शरीर के दूसरे संकेतों को जोड़कर समझता है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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