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Mahabharat: कुरुक्षेत्र का अंतिम सत्य, शकुनि का वह गुप्त रहस्य जिसने श्री कृष्ण को भी रुला दिया
Mahabharat Secret Story: महाभारत का युद्ध सिर्फ तीरों और रथों का टकराव नहीं था, वह असल में मानव मस्तिष्क के भीतर छिपी कुंठाओं, प्रतिशोध और नियति का एक बेहद जटिल ताना-बाना था।
Mahabharat Secret Story: महाभारत का युद्ध सिर्फ तीरों और रथों का टकराव नहीं था, वह असल में मानव मस्तिष्क के भीतर छिपी कुंठाओं, प्रतिशोध और नियति का एक बेहद जटिल ताना-बाना था। जब हम इस महाविनाश के खलनायकों को याद करते हैं, तो गांधार के राजकुमार शकुनि का चेहरा सबसे पहले उभरता है। एक ऐसा चरित्र जिसे सदियों से केवल कुटिल, कपटी और षड्यंत्रकारी मानकर खारिज कर दिया गया। लेकिन कुरुक्षेत्र की उस अंतिम ढलती शाम को, जब लहूलुहान होकर शकुनि अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था, तब इतिहास के पन्नों में एक ऐसा मोड़ आया जिसने पाप और पुण्य की स्थापित परिभाषाओं को झकझोर कर रख दिया। वह मरते-मरते अपनी बहन गांधारी के सामने एक ऐसा 'सीक्रेट' यानी 'रहस्य' (सीक्रेट) खोल गया, जिसे सुनकर पास ही खड़े योगेश्वर श्री कृष्ण की आंखें भी भर आईं।
बात उस समय की है जब अठारह दिनों का यह भयंकर नरसंहार अपनी समाप्ति पर था। चारों ओर टूटे हुए रथ, हाथियों के शव और हस्तिनापुर के वैभव का मलबे के सिवा कुछ शेष नहीं था। गांधारी, जिसने जीवन भर अपने पति के अंधत्व को सांझा करने के लिए आंखों पर पट्टी बांधे रखी थी, अपने सौ पुत्रों के शवों पर विलाप करती हुई कुरुक्षेत्र की मिट्टी में भटक रही थी।
उसी समय उसकी नजर अपने लहूलुहान भाई शकुनि पर पड़ी। गांधारी के भीतर का शोक अचानक आक्रोश में बदल गया। उसने कांपती आवाज में सीधे शकुनि से पूछा, "भाई! क्या तुम्हें अपने कर्मों पर रत्ती भर भी पछतावा नहीं है? तुम्हारे ही कपट ने आज मेरे पूरे वंश का समूल नाश कर दिया।"
शकुनि के चेहरे पर उस समय कोई पश्चाताप नहीं था, बल्कि एक अजीब सी थकान और दर्दभरी मुस्कान थी। उसने जो सच बयां किया, वह हस्तिनापुर के उस काले अतीत से जुड़ा था जिसे सब भूल चुके थे। शकुनि ने बताया कि यह प्रतिशोध दुर्योधन के प्रति उसके प्रेम से नहीं, बल्कि गांधार के उस घोर अपमान से जनमा था जो हस्तिनापुर ने उन्हें दिया था। जब गांधारी का विवाह धृतराष्ट्र से हुआ, तो राजनीतिक आशंकाओं के चलते हस्तिनापुर ने शकुनि के पिता राजा सुबल और उनके पूरे परिवार को एक अंधेरे कारागार (प्रिजन) में कैद कर दिया था। वहां उन्हें प्रतिदिन केवल एक मुट्ठी अनाज दिया जाता था ताकि वे भूख से तड़प-तड़प कर मर जाएं।
"जब आंखों के सामने पूरा परिवार तड़पकर मर रहा हो, तो इंसान के भीतर का राजकुमार मर जाता है और केवल प्रतिशोध की आग बचती है।" - शकुनि
शकुनि ने रुंधे गले से उस खौफनाक रात का सच उजागर किया जब उसके पिता और भाइयों ने तय किया था कि वे अपने हिस्से का सारा भोजन शकुनि को देंगे, ताकि कम से कम एक व्यक्ति जीवित बच सके और हस्तिनापुर के इस अहंकार को मिट्टी में मिला सके।
शकुनि के पिता ने मरते समय अपनी उंगलियों की हड्डियों से वे जादुई पासे बनाए थे, जो शकुनि के मानसिक संकल्प पर चलते थे। शकुनि ने गांधारी से कहा, "बहन, लोग मुझे दुर्योधन का शुभचिंतक समझते रहे, लेकिन सच तो यह है कि मैं कौरवों के भीतर छिपे अधर्म और अहंकार को हवा दे रहा था ताकि वे स्वयं अपने विनाश का कारण बन सकें। मैं जानता था कि जहां अधर्म होगा, वहां नारायण होंगे और जहां नारायण होंगे, वहां कौरवों का अंत निश्चित होगा। मैं तो बस निमित्त मात्र था।"
इस पूरे नैरेटिव यानी 'विमर्श' (नैरेटिव) का सबसे भावुक मोड़ तब आया जब शकुनि ने कुछ कदम दूर खड़े श्री कृष्ण की ओर देखा। उसने स्वीकार किया कि युद्ध से ठीक पहले जब उसकी मुलाकात द्वारकाधीश से हुई थी, तब उसने कृष्ण से एक गुप्त प्रार्थना की थी कि, "हे माधव! यदि इस युद्ध में अधर्म का अंत होना तय है, तो मुझे भी इस व्यवस्था का हिस्सा बनाकर मेरे इस प्रतिशोध के मानसिक बंधन से मुक्त कर दीजिए।" शकुनि के भीतर छिपे इस भयंकर अंतर्द्वंद्व और एक मजबूर बेटे व भाई की पीड़ा को सुनकर अंततः अंतर्यामी श्री कृष्ण भी अपने आंसू नहीं रोक पाए। उन्होंने आगे बढ़कर कहा कि मनुष्य की बुद्धि जब प्रतिशोध की दासी बन जाती है, तो वह स्वयं के साथ-साथ पूरे युग को अंधकार में धकेल देती है, भले ही उसका उद्देश्य न्याय पाना ही क्यों न हो। शकुनि ने अंततः कृष्ण के चरणों की ओर देखते हुए अपने प्राण त्याग दिए, और इसके साथ ही महाभारत का सबसे विवादित चरित्र इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए सो गया।
साभार- (महाभारत के स्त्री पर्व और क्षेत्रीय लोक कथाओं के प्रसंगों पर आधारित)


