महाराजा गंगा सिंह राठौड़ : वह राजा जिसने रेगिस्तान में नदी उतारी और फ्रांस में भारत के नाम से हस्ताक

Ganga Canal History: महाराजा गंगा सिंह राठौड़ ने बीकानेर को आधुनिक रूप देने में अहम भूमिका निभाई। गंग नहर से रेगिस्तान में सतलुज का पानी पहुंचाया और 1919 की वर्साय संधि पर भारत के प्रतिनिधि के रूप में हस्ताक्षर किए।

Yogesh Mishra
Published on: 28 Aug 2026 10:50 PM IST
Ganga Canal History
X

Maharaja Ganga Singh (Image Credit-Social Media)

Maharaja Ganga Singh: इतिहास में कुछ शासकों की पहचान उनके युद्धों से होती है, कुछ की उनके बनवाए महलों से और कुछ की उनके साम्राज्य के विस्तार से। लेकिन बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह राठौड़ की कहानी कुछ अलग है। उनकी विरासत को समझने के लिए दो तस्वीरें सामने रखनी चाहिए। पहली तस्वीर 28 जून,1919 की फ्रांस के वर्साय महल की है। जहाँ प्रथम विश्वयुद्ध के बाद दुनिया की नई व्यवस्था तय करने के लिए विजेता राष्ट्रों के प्रतिनिधि जमा हैं और उन्हीं के बीच राजपूताना की एक रियासत बीकानेर का महाराजा भारत की ओर से इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संधियों में से एक पर हस्ताक्षर कर रहा है। दूसरी तस्वीर कुछ वर्ष बाद की है, जब उसी महाराजा की कोशिशों से सतलुज का पानी पंजाब से चलकर राजस्थान के उस रेगिस्तान में पहुँचता है जहाँ अकाल, प्यास और बंजर धरती सदियों से जीवन की नियति बने हुए थे। आज का श्रीगंगानगर, जिसकी पहचान राजस्थान के सर्वाधिक उपजाऊ कृषि क्षेत्रों में होती है, इस दूसरी कहानी का जीवित स्मारक है। इसीलिए गंगा सिंह को केवल अंग्रेजों के निकट रहने वाले किसी भारतीय रजवाड़े के राजा के रूप में देखना अधूरा इतिहास होगा। वे ब्रिटिश साम्राज्य की सत्ता-संरचना के भीतर अत्यंत प्रभावशाली भारतीय राजकुमार थे, सैनिक थे, प्रशासक थे, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय रियासतों के प्रतिनिधि थे और अपने राज्य में आधुनिक आधारभूत ढाँचे के निर्माण को शासन का केंद्रीय उद्देश्य मानने वाले शासक भी थे। उनके व्यक्तित्व का विरोधाभास भी यहीं है, वे ब्रिटिश राज के विश्वसनीय सहयोगी थे। लेकिन उसी व्यवस्था के भीतर भारत और भारतीय रियासतों की राजनीतिक हैसियत बढ़ाने की कोशिश भी करते रहे।

सात साल के बच्चे ने संभाला उत्तराधिकार



महाराजा गंगा सिंह का जन्म 13 अक्टूबर, 1880 को हुआ था। वे बीकानेर के राठौड़ राजवंश से थे और अपने बड़े भाई महाराजा डूंगर सिंह की मृत्यु के बाद केवल सात वर्ष की अवस्था में 31 अगस्त, 1887 को बीकानेर की गद्दी के उत्तराधिकारी बने। बालक होने के कारण शासन तत्काल उनके हाथ में नहीं आया। 16 दिसंबर, 1898 को लगभग अठारह वर्ष की आयु में उन्हें पूर्ण शासनाधिकार प्राप्त हुए। उनकी शिक्षा और प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया गया। उन्होंने मेयो कॉलेज, अजमेर में शिक्षा प्राप्त की और प्रशासन चलाने के लिए उन्हें बाकायदा प्रशिक्षित किया गया। उपलब्ध जीवनी संबंधी अभिलेख बताते हैं कि प्रशिक्षण केवल राजदरबार के शिष्टाचार तक सीमित नहीं था, उन्हें प्रशासन की निचली इकाइयों से लेकर सर्वोच्च स्तर तक की कार्यप्रणाली समझाई गई। बाद में सैनिक प्रशिक्षण भी मिला। यही प्रशिक्षण उनके शासन में दिखाई देता है। उन्होंने न्यायपालिका और कार्यपालिका को अलग करने, न्यायिक संस्थाएँ विकसित करने, शिक्षा, अस्पताल, रेलवे और जल व्यवस्था बढ़ाने तथा प्रतिनिधि संस्थाओं की शुरुआत जैसे कदम उठाए। राजस्थान सरकार से जुड़े बीकानेर नगर निगम का इतिहास भी उन्हें आधुनिक बीकानेर का असाधारण शासक बताते हुए गंग नहर, प्रशासनिक आधुनिकीकरण और जनकल्याण योजनाओं को उनकी प्रमुख उपलब्धियों में गिनता है।

लेकिन गंगा सिंह की कहानी को बीकानेर की सीमा के भीतर रखकर नहीं समझा जा सकता। वे उस दौर के उन गिने-चुने भारतीय राजाओं में थे जिनकी पहुँच ब्रिटिश साम्राज्य की सर्वोच्च निर्णयकारी संस्थाओं तक हो गई थी। सैनिक जीवन ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई। वे 1900 के आसपास चीन के बॉक्सर विद्रोह से जुड़े सैन्य अभियान में गए और प्रथम विश्वयुद्ध के समय उनकी बीकानेर कैमल कॉर्प्स, जिसे गंगा रिसाला भी कहा जाता था, ब्रिटिश युद्ध प्रयास का हिस्सा बनी। गंगा सिंह स्वयं भी युद्ध से जुड़े अभियानों में सक्रिय रहे। मिस्र में तुर्क सेनाओं के विरुद्ध कार्रवाई में उनकी भूमिका का समकालीन विवरण मिलता है। 1917 तक उनका राजनीतिक और सैनिक कद इतना बढ़ चुका था कि वे इंपीरियल वार कॉन्फ्रेंस और इंपीरियल वार कैबिनेट की प्रक्रियाओं में भारतीय प्रतिनिधित्व का हिस्सा बने। यह कोई सामान्य उपलब्धि नहीं थी। उस समय भारत स्वतंत्र देश नहीं था, वह ब्रिटिश शासन के अधीन था और कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड या दक्षिण अफ्रीका जैसे डोमिनियन की संवैधानिक स्थिति भी उसे प्राप्त नहीं थी। फिर भी प्रथम विश्वयुद्ध में भारत के विशाल सैनिक, आर्थिक और मानवीय योगदान ने ब्रिटेन के लिए यह कठिन बना दिया कि युद्ध के बाद होने वाली विश्व व्यवस्था की बातचीत से भारत को पूरी तरह बाहर रखा जाए। भारत सरकार से संबद्ध भारतीय विश्व मामलों की परिषद ने भी इस ऐतिहासिक क्रम की ओर ध्यान दिलाया है कि युद्ध में भारत के योगदान के बाद उसे इंपीरियल वार कैबिनेट में स्थान मिला और इसके परिणामस्वरूप 1919 के पेरिस शांति सम्मेलन में ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतिनिधिमंडल के अंतर्गत भारत को अलग प्रतिनिधित्व मिला।

वर्साय की संधि पर गंगा सिंह के हस्ताक्षर क्यों हैं?

यही उनके जीवन से जुड़ा सबसे दिलचस्प और अक्सर गलत ढंग से समझा जाने वाला प्रश्न है। 11 नवंबर, 1918 के युद्धविराम से प्रथम विश्वयुद्ध की लड़ाई रुक गई थी। लेकिन युद्ध की औपचारिक राजनीतिक व्यवस्था बाद की शांति संधियों से बनी। जर्मनी के साथ मुख्य संधि 28 जून, 1919 को फ्रांस के वर्साय महल में हुई। यही प्रसिद्ध वर्साय की संधि थी। संधि के मूल अभिलेख में भारत के प्रतिनिधियों के रूप में दो नाम स्पष्ट रूप से दर्ज हैं, भारत सचिव एडविन सैमुअल मॉन्टेग्यू और बीकानेर के महाराजा मेजर जनरल सर गंगा सिंह बहादुर। ब्रिटेन के नेशनल आर्काइव्स में सुरक्षित संधि के विवरण में भी हस्ताक्षरकर्ताओं की सूची में गंगा सिंह का नाम मौजूद है। इसलिए यह कोई लोककथा या बाद में जोड़ा गया गौरव-वर्णन नहीं है। बल्कि मूल अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज से प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य है।

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि 1919 में महाराजा गंगा सिंह किसी स्वतंत्र भारतीय राष्ट्र की निर्वाचित सरकार की ओर से संधि कर रहे थे। भारत तब गुलाम था। यही इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलू है। वे पेरिस शांति सम्मेलन में भारतीय रियासतों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख भारतीय शासक के रूप में पहुँचे थे और ब्रिटिश साम्राज्य की प्रतिनिधित्व व्यवस्था के भीतर भारत की ओर से हस्ताक्षरकर्ता बने। प्रथम विश्वयुद्ध में अविभाजित भारत का योगदान असाधारण था। भारतीय सैनिक यूरोप, पश्चिम एशिया और अफ्रीका के अनेक मोर्चों पर लड़े। भारत ने धन, सामग्री, पशु, रसद और दूसरी सहायता भी दी। इसी योगदान के कारण युद्धोत्तर व्यवस्था में भारत को अलग प्रतिनिधित्व देने का राजनीतिक आधार मजबूत हुआ। गंगा सिंह स्वयं युद्ध प्रयास के प्रमुख राजसी समर्थकों में थे। उनकी सैनिक प्रतिष्ठा थी। ब्रिटिश नेतृत्व से सीधा संपर्क था। वे प्रभावशाली वक्ता और भारतीय रियासतों के स्वीकार्य प्रतिनिधि थे। इसलिए उनका चयन आकस्मिक नहीं था। ब्रिटिश सत्ता के प्रति उनकी निष्ठा निश्चित रूप से इसका एक कारण थी। लेकिन केवल वही कारण नहीं थी, उनकी प्रशासनिक प्रतिष्ठा, युद्ध में भूमिका और भारतीय रियासतों के बीच राजनीतिक हैसियत भी महत्वपूर्ण थी। 1922 के Encyclopaedia Britannica के विवरण में उन्हें शांति सम्मेलन में भारतीय रियासतों का प्रतिनिधि चुने जाने और 28 जून. 1919 को किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय समझौते पर भारतीय हस्ताक्षर करने वाले प्रमुख व्यक्तित्व के रूप में दर्ज किया गया है।

यहीं से बना लीग ऑफ़ नेशंस

इस घटना का एक और दूरगामी परिणाम था, जिस पर अक्सर ध्यान नहीं जाता। वर्साय की संधि के बाद बनी लीग ऑफ नेशंस, यानी राष्ट्र संघ में भारत मूल सदस्य बना, जबकि भारत उस समय स्वतंत्र राष्ट्र तक नहीं था। भारतीय विश्व मामलों की परिषद के अनुसार युद्ध में भारतीय योगदान, इंपीरियल वार कैबिनेट में भारत का प्रवेश और पेरिस शांति सम्मेलन में उसकी भागीदारी एक-दूसरे से जुड़े हुए थे और इसी प्रक्रिया ने भारत को वर्साय संधि पर हस्ताक्षर तथा राष्ट्र संघ की संस्थापक सदस्यता का अवसर दिया। गंगा सिंह ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की हैसियत को मजबूत करने की वकालत भी की। बाद में वे राष्ट्र संघ में भारतीय प्रतिनिधित्व से भी जुड़े। इसलिए वर्साय में उनके हस्ताक्षर का महत्व केवल यह नहीं है कि एक भारतीय महाराजा विश्व नेताओं के साथ बैठा था, इसका महत्व यह भी है कि औपनिवेशिक अधीनता के बावजूद भारत पहली बार उभरती बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था में एक अलग राजनीतिक इकाई के रूप में दिखाई देने लगा था। फिर भी इस उपलब्धि को स्वतंत्र भारत की कूटनीतिक उपलब्धि बताना इतिहास की दृष्टि से गलत होगा, क्योंकि प्रतिनिधित्व की अंतिम संवैधानिक संरचना ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर ही थी।

रेगिस्तान की त्रासदी जिसने एक राजा की प्राथमिकता बदल दी

यदि वर्साय गंगा सिंह के अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व का प्रतीक है तो गंग नहर उनकी शासन-दृष्टि की सबसे स्थायी निशानी है। इसके पीछे एक भयानक मानवीय त्रासदी थी। 1899-1900 का अकाल, जिसे राजस्थान के इतिहास में विक्रम संवत 1956 के कारण प्रायः छप्पनिया अकाल कहा जाता है, राजपूताना के सबसे विनाशकारी अकालों में था। बीकानेर जैसी शुष्क रियासत के लिए स्थिति और भयावह थी। राजस्थान के हनुमानगढ़ जिला गजेटियर में दर्ज है कि युवा महाराजा को 1899-1900 में इस विकराल अकाल से जूझना पड़ा और उन्होंने राहत कार्य चलाए। भारत की 2011 की जनगणना के श्रीगंगानगर जिला इतिहास में इससे भी महत्वपूर्ण उल्लेख मिलता है। अकाल की पीड़ा देखकर महाराजा ने अपने राज्य में भुखमरी समाप्त करने के लिए नहर बनाने का संकल्प लिया। समस्या बिल्कुल स्पष्ट थी, बीकानेर के उत्तरी हिस्से में जमीन थी। लेकिन भरोसेमंद पानी नहीं था। वर्षा पर निर्भर कृषि बार-बार अकाल के सामने टूट जाती थी। यदि किसी स्थायी नदी का पानी इस भूभाग तक लाया जा सके तो केवल खेती नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था और बसावट का चरित्र बदल सकता था।

पंजाब से ले आये पानी

विचार सरल था। उसे लागू करना असाधारण रूप से कठिन। सतलुज बीकानेर की अपनी नदी नहीं थी। उसका पानी पंजाब से लाना था और जल अधिकारों के प्रश्न में पंजाब के साथ तत्कालीन बहावलपुर रियासत के हित भी जुड़े थे। यानी यह केवल इंजीनियरिंग परियोजना नहीं थी। अंतर-रियासती जल राजनीति का प्रश्न भी था। वर्षों तक सर्वेक्षण, तकनीकी अध्ययन, बातचीत, आपत्तियाँ और राजनीतिक खींचतान चली। अंततः सितंबर 1920 में बीकानेर को सतलुज के पानी में हिस्सा मिलने का रास्ता साफ हुआ। राजस्थान सरकार के श्रीगंगानगर संबंधी नगर नियोजन दस्तावेज में साफ दर्ज है कि महाराजा के अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप बीकानेर राज्य को सितंबर,1920 में सतलुज के पानी का हिस्सा मिला और दिसंबर, 1925 में फिरोजपुर में गंग नहर की नींव महाराजा गंगा सिंह ने रखी। यह बिंदु महत्वपूर्ण है, क्योंकि नहर का श्रेय केवल उस व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता जिसने इंजीनियरिंग नक्शा बनाया या निर्माण कराया, गंगा सिंह की निर्णायक भूमिका राजनीतिक इच्छा, पानी का अधिकार प्राप्त करने, संसाधन जुटाने और परियोजना को राज्य की सर्वोच्च प्राथमिकता बनाने में थी।

5 दिसंबर, 1925 को फिरोजपुर के पास नहर के निर्माण की औपचारिक शुरुआत हुई और 1927 में पानी राजस्थान पहुँचा। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 26 अक्टूबर, 1927 को नहर का उद्घाटन हुआ। जनगणना के जिला इतिहास में लगभग 89 मील लंबी नहर द्वारा सतलुज का पानी इस शुष्क भूभाग तक पहुँचाए जाने का उल्लेख है। राजस्थान सरकार के सिंचाई संबंधी आधिकारिक पोर्टल के अनुसार आज जिस गंग नहर प्रणाली को हम देखते हैं उसका कृषि योग्य सिंचित क्षेत्र लगभग 7.76 लाख एकड़, यानी लगभग 3.14 लाख हेक्टेयर है। समय के साथ मुख्य नहर, वितरिकाओं और छोटी नहरों का विशाल तंत्र विकसित हुआ। यह मूल परियोजना से आगे हुए विस्तार और आधुनिकीकरण का परिणाम है, इसलिए आज के पूरे नेटवर्क को अकेले 1927 की निर्माण उपलब्धि मानना उचित नहीं होगा। लेकिन जिस मूल जल-व्यवस्था ने इस क्षेत्र का भाग्य बदला उसकी आधारशिला गंगा सिंह के शासन में ही रखी गई थी।

नहर नहीं, एक नया समाज बसाया गया



गंग नहर का वास्तविक महत्व उसके किलोमीटर, क्यूसेक या लागत में नहीं है। उसका महत्व इस बात में है कि उसने भूगोल को अर्थव्यवस्था में बदल दिया। जहाँ वर्षा की अनिश्चितता के कारण स्थायी और गहन खेती कठिन थी, वहाँ सिंचाई उपलब्ध होने लगी। खेती बढ़ी तो किसानों की आवश्यकता हुई, नई बसावटें विकसित हुईं, पंजाब से बड़ी संख्या में कृषक परिवार आए, इनमें सिख किसान भी बड़ी संख्या में थे। कृषि के साथ मंडियाँ, सड़कें, रेलवे, व्यापार और शहरी केंद्र विकसित हुए। रामू की ढाणी और बाद में रामनगर कहलाने वाली छोटी बसावट इसी परिवर्तन के साथ विकसित हुई और आगे चलकर महाराजा के नाम पर श्रीगंगानगर बनी। भारत सरकार की जनगणना के जिला इतिहास में श्रीगंगानगर के विकास को सीधे गंग नहर से जोड़ा गया है। राजस्थान पर्यटन भी 1927 में गंग नहर के निर्माण को श्रीगंगानगर क्षेत्र के कायाकल्प का निर्णायक मोड़ मानता है।

इस परियोजना को आधुनिक भारत के जल इतिहास की दृष्टि से देखें तो गंगा सिंह की सोच और भी महत्वपूर्ण दिखाई देती है। वे ऐसे समय में अंतर-नदी अथवा अंतर-क्षेत्रीय जल हस्तांतरण की अवधारणा पर काम कर रहे थे जब आधुनिक राजस्थान का अस्तित्व भी नहीं था। पानी पंजाब की सतलुज नदी से लेना था, उसे लंबी दूरी तक नियंत्रित ढंग से ले जाना था, शुष्क बीकानेर की जमीन में वितरित करना था और उसके आसपास कृषि उपनिवेश विकसित करने थे। इसके लिए केवल नहर खोद देना पर्याप्त नहीं था, भूमि आवंटन, बसावट, परिवहन और बाजार व्यवस्था को भी साथ-साथ विकसित करना पड़ता था। बीकानेर-हनुमानगढ़ रेल संपर्क और आगे श्रीगंगानगर क्षेत्र को रेल व्यवस्था से जोड़ना इसी व्यापक आर्थिक सोच का हिस्सा बना। परिणाम यह हुआ कि रेगिस्तान का वह उत्तरी क्षेत्र, जो कभी अकाल और पानी की कमी का प्रतीक था, धीरे-धीरे राजस्थान के सबसे महत्वपूर्ण कृषि पट्टों में बदल गया। इस अर्थ में गंग नहर केवल सिंचाई परियोजना नहीं बल्कि एक तरह की क्षेत्रीय आर्थिक पुनर्रचना थी।

गंगा सिंह के शासन की दूसरी उपलब्धियों को इसके साथ रखकर देखें तो एक निश्चित प्रशासनिक दृष्टि उभरती है। रेलवे का विस्तार हुआ, न्यायिक संस्थाएँ बनाई गईं, शिक्षा का प्रसार हुआ, अस्पताल और जनकल्याण व्यवस्थाएँ विकसित की गईं और 1913 में प्रतिनिधि सभा जैसी संस्था स्थापित की गई। उनके शासन को लोकतांत्रिक शासन कहना निश्चित रूप से गलत होगा, आखिर वह एक राजशाही थी, लेकिन समकालीन भारतीय रियासतों की तुलना में बीकानेर प्रशासन के आधुनिकीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा था। नेशनल पोर्ट्रेट गैलरी का जीवनी विवरण भी उन्हें पानी, रेलवे, अस्पताल, विद्यालय और प्रतिनिधि सभा को बढ़ावा देने वाले प्रगतिशील शासक के रूप में दर्ज करता है। इसलिए गंग नहर को उनकी किसी अकेली सनक या प्रतिष्ठा परियोजना के रूप में देखने के बजाय उस प्रशासनिक सोच के हिस्से के रूप में देखना चाहिए जिसमें राज्य की आर्थिक क्षमता बढ़ाने के लिए बुनियादी ढाँचे में निवेश किया जा रहा था।

अंग्रेजों के मित्र थे या भारतीय हितों के प्रतिनिधि?

महाराजा गंगा सिंह का मूल्यांकन करते समय सबसे कठिन प्रश्न यही है। राष्ट्रवादी इतिहास की आज की कसौटी से देखें तो वे ब्रिटिश साम्राज्य के अत्यंत निकट थे। उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश युद्ध प्रयास का खुलकर समर्थन किया, ब्रिटिश सेना में ऊँचे पद प्राप्त किए और साम्राज्य की महत्वपूर्ण संस्थाओं में स्थान पाया। उन्हें ब्रिटिश शासन से अनेक उपाधियाँ और सम्मान मिले। इसलिए उन्हें औपनिवेशिक सत्ता-विरोधी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक रूप से अनुचित होगा। लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा यह है कि उन्होंने इसी साम्राज्यवादी व्यवस्था के भीतर भारतीय रियासतों और भारत की राजनीतिक स्थिति को ऊँचा उठाने की कोशिश की। वे भारतीय रियासतों के लिए संस्थागत मंच के समर्थक थे और 1921 में स्थापित चैम्बर ऑफ प्रिंसेज के पहले चांसलर बने। वे राष्ट्र संघ और बाद में गोलमेज सम्मेलनों जैसे अंतरराष्ट्रीय और साम्राज्यीय मंचों पर भारत से जुड़े प्रश्नों में सक्रिय रहे। यानी उनकी राजनीति गांधी, तिलक, नेहरू या सुभाष चंद्र बोस की राजनीति नहीं थी, बल्कि राजशाही और साम्राज्य के भीतर भारत के लिए अधिक प्रतिष्ठा, अधिकार और हिस्सेदारी हासिल करने की राजनीति थी। इन दोनों ऐतिहासिक सत्यों को साथ रखे बिना उनका संतुलित मूल्यांकन संभव नहीं है।

वर्साय में उनकी मौजूदगी इसी विरोधाभास का सबसे शानदार उदाहरण है। एक ओर वह दृश्य ब्रिटिश साम्राज्य की संरचना का हिस्सा था, दूसरी ओर पहली बार विश्व राजनीति के सर्वोच्च मंचों में भारत नाम से अलग हस्ताक्षर दिखाई दे रहा था। इसी तरह गंग नहर भी राजशाही की परियोजना थी, लेकिन उसका लाभ अंततः लाखों सामान्य लोगों और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचा। इतिहास में व्यक्ति का मूल्यांकन केवल उसकी राजनीतिक निष्ठा से नहीं, बल्कि उसके शासन के दीर्घकालिक परिणामों से भी होता है। गंगा सिंह की सबसे बड़ी परीक्षा शायद यही है कि उनकी मृत्यु के आठ दशक बाद भी उनकी बनाई राजनीतिक व्यवस्थाओं से अधिक उनकी जल व्यवस्था जीवित दिखाई देती है। साम्राज्य समाप्त हो गया, बीकानेर रियासत समाप्त हो गई, राजाओं के अधिकार समाप्त हो गए, लेकिन सतलुज का पानी आज भी उसी भूभाग की कृषि अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा बना हुआ है।

महाराजा गंगा सिंह की मृत्यु 2 फरवरी 1943 को हुई। वे स्वतंत्र भारत देखने के लिए जीवित नहीं रहे। लेकिन उनकी जिंदगी भारत के इतिहास के एक विलक्षण संक्रमणकाल को समेटती है। जब उन्होंने शासन संभाला तब भारत सैकड़ों रियासतों और सीधे ब्रिटिश शासन वाले प्रांतों में बँटा था, अकाल लाखों लोगों के जीवन को तबाह कर सकते थे और भारतीयों की विश्व राजनीति में स्वतंत्र आवाज लगभग नहीं थी। जब उनका जीवन समाप्त हुआ तब स्वतंत्रता की आहट स्पष्ट हो चुकी थी। इस लंबी यात्रा में गंगा सिंह कभी ब्रिटिश साम्राज्य के सैनिक दिखाई देते हैं, कभी राजपूताना के शक्तिशाली महाराजा, कभी भारतीय रियासतों के प्रवक्ता, कभी वर्साय के भव्य हॉल में विश्व नेताओं के बीच भारत के हस्ताक्षरकर्ता और कभी रेगिस्तान में खड़े उस शासक के रूप में जिसने अकाल का उत्तर राहत बाँटने भर में नहीं, बल्कि सतलुज को रेगिस्तान तक पहुँचाने में खोजा।

और शायद यही गंगा सिंह की विरासत को समझने का सबसे अच्छा सूत्र है। वर्साय के दस्तावेज पर उनका हस्ताक्षर इतिहास की किताबों में सुरक्षित है, लेकिन गंग नहर का हस्ताक्षर जमीन पर लिखा हुआ है। वर्साय की विश्व व्यवस्था बहुत पहले बदल चुकी, लीग ऑफ नेशंस भी समाप्त हो गई, ब्रिटिश साम्राज्य भी इतिहास हो गया और बीकानेर की राजशाही भी नहीं रही। लेकिन जिस रेगिस्तान में कभी अकाल जीवन का स्थायी भय था, वहाँ आज खेत हैं, मंडियाँ हैं, शहर हैं और लाखों लोगों की आजीविका है। श्रीगंगानगर का नाम ही उस महाराजा की स्मृति अपने भीतर लिए हुए है। किसी शासक की ऐतिहासिक विरासत की इससे कठिन और शायद इससे बेहतर कसौटी क्या हो सकती है कि उसके सिंहासन के समाप्त हो जाने के बहुत बाद भी उसके निर्णय से आया पानी लोगों के खेतों में बहता रहे।

Yogesh Mishra
ABOUT THE AUTHOR

Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

Next Story