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Food-Brain Connection: मनपसंद खाना देखते ही मुंह में पानी क्यों आता है?
Food and Brain Connection: मनपसंद खाना देखते या उसकी खुशबू महसूस करते ही मुंह में लार क्यों बनने लगती है? जानिए सेफेलिक फेज, मस्तिष्क, लार ग्रंथियों, डोपामिन, वेगस नर्व और पाचन की तैयारी के पीछे का विज्ञान।
Food and Brain Connection Explained in Hindi
Food and Brain Connection Explained: सामने गरम समोसा, बिरयानी, जलेबी या अपना कोई मनपसंद खाना आते ही कई बार पहला कौर मुंह में जाने से पहले ही लार बनने लगती है। इसके लिए भोजन को छूना भी जरूरी नहीं है। उसे देखना, उसकी खुशबू आना, उसका नाम सुनना, तस्वीर देखना या कभी-कभी सिर्फ उसकी कल्पना करना भी काफी होता है। आम भाषा में इसे ‘मुंह में पानी आना’ कहते हैं, लेकिन शरीर विज्ञान की नजर से देखें तो यह शरीर की पाचन के लिए तैयारी है।
दरअसल, जैसे ही मस्तिष्क को भोजन का संकेत मिलता है, वह शरीर को संदेश देना शुरू कर देता है कि खाना आने वाला है। इसके बाद स्वायत्त तंत्रिका तंत्र लार ग्रंथियों को सक्रिय करता है और कुछ ही समय में मुंह में लार बढ़ने लगती है। इसी दौरान पेट और पाचन तंत्र भी भोजन के लिए तैयारी शुरू कर सकते हैं। इसे ‘सेफेलिक फेज’ कहा जाता है। आसान भाषा में कहें तो यह पाचन का वह शुरुआती चरण है जो भोजन के पेट में पहुंचने से पहले ही मस्तिष्क के संकेतों से शुरू हो जाता है।
आंख ने खाना देखा, लेकिन मस्तिष्क ने उसका स्वाद भी याद कर लिया
मान लीजिए आपके सामने गरमागरम जलेबी रख दी गई। आंखों से मिली जानकारी मस्तिष्क तक पहुंचती है और वह उसके आकार, रंग और दूसरी खासियतों को पहचानता है। इसके साथ ही मस्तिष्क उस दृश्य को पुरानी यादों से जोड़ने लगता है। उसे याद आता है कि यह वही जलेबी है जिसे पहले खाया था, इसका स्वाद मीठा था और इसे खाने में आनंद आया था। यानी मस्तिष्क सिर्फ सामने रखी चीज को नहीं देख रहा होता। वह उसके साथ जुड़ी पुरानी याद, स्वाद, खुशबू और उससे मिलने वाले आनंद को भी जोड़ रहा होता है। इसी वजह से केवल खाना देखने से भी शरीर में ऐसी प्रतिक्रिया शुरू हो सकती है, जैसी भोजन सामने आने के बाद होती है।
अगर साथ में खाने की खुशबू भी आ रही हो तो यह प्रतिक्रिया और मजबूत हो सकती है। नाक गंध के अणुओं को पहचानकर उनकी जानकारी मस्तिष्क तक पहुंचाती है। गंध का यादों और भावनाओं से बहुत गहरा संबंध है। इसलिए मां के हाथ के किसी खास खाने की खुशबू, बचपन की मिठाई या किसी खास मसाले की महक अचानक कई साल पुरानी याद सामने ला सकती है।
मस्तिष्क लार ग्रंथियों को कैसे संदेश देता है?
मनपसंद भोजन की जानकारी मिलने के बाद मस्तिष्क के कई हिस्से मिलकर काम करते हैं। इनमें हाइपोथैलेमस, अमिग्डाला, इन्सुला और भोजन तथा पुरस्कार से जुड़ी दूसरी प्रणालियां शामिल हैं। लार बनने और उससे जुड़ी गतिविधियों को नियंत्रित करने में मस्तिष्क का एक हिस्सा, जिसे मस्तिष्क-तना कहा जाता है, महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इसके बाद स्वायत्त तंत्रिका तंत्र लार ग्रंथियों को सक्रिय करता है। हमें इसके लिए जानबूझकर कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती। हम केवल खाना देख रहे होते हैं, लेकिन शरीर पहले ही अगले चरण की तैयारी शुरू कर चुका होता है।
मुंह में तीन बड़ी जोड़ी लार ग्रंथियां होती हैं, जिन्हें पैरोटिड, सबमैंडिबुलर और सबलिंगुअल ग्रंथियां कहा जाता है। इनके अलावा कई छोटी लार ग्रंथियां भी होती हैं। तंत्रिका संकेत मिलने पर ये ज्यादा लार बनाने लग सकती हैं। इसलिए ‘मुंह में पानी आना’ केवल कहावत नहीं है। यह शरीर की वास्तविक तंत्रिका संबंधी प्रतिक्रिया है।
लार सिर्फ पानी नहीं होती
लार का ज्यादातर हिस्सा पानी होता है, लेकिन इसमें कई ऐसे पदार्थ भी होते हैं जो भोजन को निगलने और पचाने में मदद करते हैं। इसमें इलेक्ट्रोलाइट, म्यूसिन और कई एंजाइम होते हैं। म्यूसिन भोजन को चिकना बनाने और उसे आसानी से निगलने में मदद करता है। लार में मौजूद अल्फा-एमाइलेज स्टार्च जैसे कार्बोहाइड्रेट के पाचन की शुरुआत मुंह में ही कर सकता है। लार भोजन में मौजूद रासायनिक पदार्थों को घोलती भी है, ताकि वे स्वाद कलिकाओं तक पहुंच सकें। इसलिए खाना आने से पहले लार बढ़ना शरीर का बेवजह उत्साहित होना नहीं है। शरीर मुंह को भोजन के लिए तैयार कर रहा होता है, ताकि खाना आसानी से चबाया और निगला जा सके और पाचन की शुरुआती प्रक्रिया ठीक से शुरू हो।
पेट को भी खाना आने की खबर पहले मिल जाती है
यह तैयारी सिर्फ मुंह तक सीमित नहीं रहती। भोजन को देखने, सूंघने या उसके बारे में सोचने से पेट और पाचन तंत्र में भी कुछ बदलाव शुरू हो सकते हैं। इसमें ‘वेगस नर्व’ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मस्तिष्क से आने वाले संकेत पेट में अम्ल और पाचन से जुड़ी गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं। अग्न्याशय और पाचन तंत्र के दूसरे हिस्सों में भी भोजन आने से पहले कुछ प्रतिक्रियाएं शुरू हो सकती हैं। यानी पहला निवाला पेट में पहुंचने से पहले ही शरीर को अंदाजा हो चुका होता है कि खाना आने वाला है। शरीर इस इंतजार में नहीं रहता कि खाना पहले पेट में पहुंचे और उसके बाद तैयारी शुरू हो। भोजन का दृश्य और उसकी खुशबू ही शरीर के लिए एक तरह की पूर्व सूचना बन जाते हैं।
मनपसंद खाना देखकर भूख अचानक क्यों बढ़ जाती है?
यहां मस्तिष्क की पुरस्कार प्रणाली काम करती है। अगर कोई खाना पहले आपको अच्छा अनुभव दे चुका है तो उसका दृश्य या खुशबू भविष्य में मिलने वाले उसी आनंद का संकेत बन सकती है। इस प्रक्रिया में डोपामिन से जुड़ी प्रणालियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। डोपामिन को केवल ‘खुशी का रसायन’ कहना सही नहीं है। यह किसी चीज की चाह, प्रेरणा, सीखने और किसी संभावित पुरस्कार की ओर ध्यान खींचने में भी मदद करता है। यही वजह है कि कोई व्यक्ति पेट भर खाना खाने के बाद भी अपनी पसंद की मिठाई देखकर उसे खाने के लिए तैयार हो सकता है। यहां भूख और खाने की इच्छा को अलग-अलग समझना जरूरी है। पेट खाली होने से पैदा होने वाली भूख एक जैविक प्रक्रिया है, जबकि स्वादिष्ट भोजन देखकर पैदा होने वाली इच्छा में याद, पसंद और पुरस्कार की भूमिका ज्यादा हो सकती है।
तस्वीर देखकर भी मुंह में पानी क्यों आ सकता है?
अगर खाने की वास्तविक मौजूदगी जरूरी होती तो मोबाइल पर किसी स्वादिष्ट खाने की तस्वीर या वीडियो देखकर मुंह में लार नहीं बननी चाहिए थी। लेकिन ऐसा हो सकता है। इसका कारण यह है कि मस्तिष्क अनुभव से सीखता है। वह किसी खास दृश्य को उसके स्वाद और उससे मिलने वाले आनंद से जोड़ लेता है। इसलिए गरम पिज्जा पर पिघलता चीज, चाट पर डाली जाती चटनी, तवे पर सिकता पराठा या रस से भरी जलेबी का दृश्य देखते ही मस्तिष्क अनुमान लगा सकता है कि आगे कैसा स्वाद मिलने वाला है। वास्तव में अभी भोजन का कोई स्वाद मुंह तक नहीं पहुंचा है, फिर भी मस्तिष्क पुराने अनुभवों के आधार पर शरीर को तैयारी का संकेत दे सकता है। यही वजह है कि खाने की तस्वीरें और विज्ञापन इतने असरदार होते हैं। वे पेट में भोजन पहुंचाए बिना ही मस्तिष्क में भोजन से जुड़े पुराने अनुभवों और इच्छाओं को सक्रिय कर सकते हैं।
पावलोव के कुत्तों का प्रयोग इस बात को समझने में मदद करता है
रूसी शरीर विज्ञानी इवान पावलोव ने पाचन और लार पर अपने प्रयोगों के दौरान देखा कि कुत्ते केवल भोजन मुंह में आने पर ही लार नहीं बनाते थे। भोजन से जुड़े संकेत भी धीरे-धीरे लार की प्रतिक्रिया पैदा करने लगे। अगर कोई ऐसा संकेत, जिसका शुरू में भोजन से कोई संबंध नहीं था, बार-बार भोजन के साथ दिया जाए तो कुछ समय बाद वही संकेत अकेले भी लार की प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है। इसी से ‘क्लासिकल कंडीशनिंग’ का प्रसिद्ध सिद्धांत सामने आया।
मनुष्यों में यह प्रक्रिया कहीं ज्यादा जटिल है। किसी खास रेस्तरां का नाम, रसोई की परिचित खुशबू, खाने का समय, पैकेट खुलने की आवाज या किसी खास व्यंजन का नाम भी पुराने अनुभव के कारण भोजन का संकेत बन सकता है। कभी आपने ध्यान दिया होगा कि केवल नींबू काटने की कल्पना करने पर भी मुंह में लार बढ़ने लगती है। नींबू सामने नहीं है, फिर भी मस्तिष्क ने पुराने अनुभव के आधार पर खट्टे स्वाद की तैयारी शुरू कर दी।
नींबू की कल्पना करते ही मुंह में पानी क्यों आता है?
इसे समझने का सबसे आसान तरीका यही है। कल्पना कीजिए कि एक ताजा नींबू सामने रखा है। उसे काटा गया है और उसका खट्टा रस आपकी जीभ पर पड़ रहा है। कई लोगों को यह पढ़ते-पढ़ते ही मुंह में लार महसूस होने लगेगी। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मस्तिष्क में नींबू का दृश्य, उसकी खुशबू, खट्टा स्वाद और उससे जुड़े पुराने अनुभव आपस में जुड़े हुए हैं। केवल कल्पना ही उस तंत्रिका तंत्र के कुछ हिस्सों को सक्रिय कर सकती है। मस्तिष्क को ऐसा लगता है कि अब खट्टा पदार्थ मुंह में आने वाला है, इसलिए लार बढ़ सकती है। लार मुंह के वातावरण को नम रखने के साथ भोजन में मौजूद रसायनों को घोलने और मुंह की सुरक्षा में भी मदद करती है।
भूखे होने पर यह प्रतिक्रिया ज्यादा तेज क्यों लगती है?
भोजन को लेकर हमारी प्रतिक्रिया सिर्फ आंख और नाक तय नहीं करते। मस्तिष्क लगातार यह भी जान रहा होता है कि शरीर को कितनी ऊर्जा की जरूरत है। पेट और आंत से आने वाले संकेत और घ्रेलिन, लेप्टिन, इंसुलिन जैसे हार्मोन भोजन से जुड़ी भूख और तृप्ति को नियंत्रित करने में भूमिका निभाते हैं। लंबे समय से खाना न मिलने पर भूख से जुड़े संकेत बढ़ सकते हैं और भोजन का दृश्य तथा खुशबू ज्यादा आकर्षक लग सकती है। इसके उलट पर्याप्त भोजन के बाद शरीर से मिलने वाले तृप्ति के संकेत मस्तिष्क को बताते हैं कि ऊर्जा की जरूरत काफी हद तक पूरी हो चुकी है। फिर भी बहुत स्वादिष्ट खाना पुरस्कार प्रणाली को सक्रिय कर सकता है। इसलिए पेट भरने के बाद भी मिठाई देखकर उसे खाने की इच्छा होना असामान्य नहीं है। यही वजह है कि कभी-कभी हम कहते हैं, ‘पेट भर गया है, लेकिन मिठाई के लिए जगह है।’ असल में यहां पेट की भूख और किसी खास स्वाद को खाने की इच्छा अलग-अलग प्रक्रियाओं से प्रभावित हो रही होती हैं।
खाना मुंह में जाते ही अनुभव बदल जाता है
खाना देखने और सूंघने तक मस्तिष्क अनुमान लगा रहा था। लेकिन पहला निवाला मुंह में जाते ही उसे वास्तविक जानकारी मिलने लगती है। जीभ और मुंह में मौजूद स्वाद रिसेप्टर मीठा, नमकीन, खट्टा, कड़वा और उमामी जैसे मूल स्वादों से जुड़े संकेत पहचानते हैं। लेकिन जिसे हम आम तौर पर ‘स्वाद’ कहते हैं, वह सिर्फ जीभ की वजह से नहीं बनता। खाना चबाते समय उसकी खुशबू के अणु मुंह के पीछे से नाक तक पहुंचते हैं। इसे ‘रेट्रोनैसल स्मेल’’ कहा जाता है। मस्तिष्क स्वाद, खुशबू, तापमान, बनावट, मसाले की जलन, ठंडक और चबाने की अनुभूति को जोड़कर खाने का पूरा स्वाद अनुभव तैयार करता है।
यही कारण है कि तेज जुकाम होने पर जीभ मीठा या नमकीन पहचान सकती है, फिर भी खाना फीका लगता है। इसकी वजह यह है कि खाने की खुशबू पहचानने की क्षमता कमजोर हो जाती है और स्वाद का पूरा अनुभव प्रभावित होता है।
शरीर इतनी पहले से तैयारी क्यों करता है?
विकास (इवोल्यूशन) के लिहाज से यह व्यवस्था काफी उपयोगी है। अगर शरीर भोजन पेट में पहुंचने के बाद ही पाचन की तैयारी शुरू करता तो पूरी प्रक्रिया शुरू होने में ज्यादा समय लगता। इसके बजाय मस्तिष्क ने भोजन से जुड़े भरोसेमंद संकेतों, जैसे दृश्य, खुशबू, स्वाद और पुरानी यादों को आने वाले भोजन की पूर्व सूचना की तरह इस्तेमाल करना सीख लिया। इससे भोजन आने से पहले ही लार बढ़ सकती है, मुंह और निगलने की प्रक्रिया तैयार हो सकती है और पाचन तंत्र भी अपना काम शुरू करने के लिए तैयार होने लगता है। इसीलिए मनपसंद खाना देखकर ‘मुंह में पानी आना’ वास्तव में सिर्फ मुंह की घटना नहीं है। आंख या नाक भोजन की जानकारी देती है, मस्तिष्क उसे पुरानी याद और स्वाद के अनुभव से जोड़ता है, पुरस्कार प्रणाली संभावित आनंद को पहचानती है और स्वायत्त तंत्रिका तंत्र लार ग्रंथियों तथा पाचन तंत्र को तैयारी का संकेत देता है।
पहला कौर अभी मुंह तक पहुंचा भी नहीं होता, लेकिन मस्तिष्क उसके आने का अनुमान लगाकर शरीर को पहले ही बता चुका होता है कि खाना आने वाला है। इसलिए मुंह में आई लार सिर्फ ‘पानी’ नहीं, बल्कि शरीर के उस पुराने और बेहद सटीक इंतजाम का हिस्सा है जो खाने से पहले ही पाचन की तैयारी शुरू कर देता है।


