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Maut Ke Sanket: मौत से पहले इंसान मुंह से सांस क्यों लेने लगता है? क्या यह मृत्यु का संकेत है?
Maut Ke Sanket Kya Hai: जीवन के अंतिम चरण में सांस के बदलते पैटर्न, Mandibular Breathing, Cheyne-Stokes Breathing और Death Rattle को समझाने वाली जानकारी।
Mouth Breathing Before Death |Maut Ke Sanket Kya Hai Explained in Hindi | Newstrack Hindi News
Maut Ke Sanket Kya Hai: हमारे समाज में एक पुरानी धारणा है कि जब किसी बीमार या बहुत बुज़ुर्ग इंसान का अंत करीब आता है, तो वह नाक की जगह मुंह से सांस लेने लगता है। मुंह खुला रहने लगता है और सांस के साथ जबड़ा ऊपर-नीचे हिलता है। घर के बड़े-बूढ़े यह देखकर कह देते हैं कि ‘अब मुंह से सांस चलने लगी है, समय पास है।‘
दिलचस्प बात यह है कि इस लोक-अनुभव के पीछे कुछ असली शरीर-विज्ञान है। पर इसे अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाता है। हर मरता हुआ इंसान मुंह से सांस नहीं लेता। और किसी जीवित इंसान का मुंह से सांस लेना अपने आप में मौत का संकेत नहीं है। नींद, बंद नाक, फेफड़ों की बीमारी और सांस फूलने में भी लोग मुंह से सांस लेते हैं। लेकिन जीवन के आखिरी घंटों या दिनों में कुछ लोगों में मुंह खुलना, जबड़े के साथ सांस चलना और सांस की लय बदलना सचमुच देखा जाता है। आधुनिक उपशामक चिकित्सा (palliative care, यानी गंभीर बीमारी में आराम देने वाली देखभाल) में इसे बाकायदा दर्ज किया गया है। ब्रिटेन की संस्था मैरी क्यूरी (Marie Curie) की जानकारी में इसे मैंडिबुलर ब्रीदिंग (mandibular breathing), यानी जबड़े के सहारे दिखने वाली सांस, कहा गया है।
आम सांस नाक से, तो आखिर में मुंह से क्यों?
सेहतमंद हालत में इंसान आम तौर पर नाक से सांस लेता है। नाक सिर्फ हवा का रास्ता नहीं है, वह हवा को छानती है, नम करती है और कुछ हद तक गर्म भी करती है। शांत सांस का ज़्यादातर काम डायफ्राम (diaphragm, छाती और पेट के बीच की बड़ी पेशी) और पसलियों की मांसपेशियां करती हैं। सांस लेना इतना सहज होता है कि इसके लिए हमें सोचना नहीं पड़ता।
जीवन के आखिरी दौर में हालत बदल सकती है। बीमारी बढ़ने के साथ इंसान बहुत कमज़ोर और उनींदा हो सकता है, होश कम हो सकता है, मांसपेशियों पर काबू घट सकता है, और निगलने-खांसने की ताकत कम हो सकती है। आखिरी दिनों में कम खाना-पीना, बहुत कमज़ोरी, नींद, निगलने में दिक्कत और सांस के ढंग में बदलाव आम तौर पर देखे जाते हैं।
ऐसे में चेहरे और जबड़े की मांसपेशियों की सामान्य कसावट भी घट सकती है। निचला जबड़ा ढीला पड़ जाए तो मुंह खुला रह सकता है। साथ में सांस का ज़ोर बढ़ा हुआ या बेतरतीब हो, तो बाहर से हर सांस के साथ मुंह और जबड़ा हिलते दिखते हैं। इसीलिए घरवालों को लगता है कि वह ‘मुंह से ही सांस ले रहा है।‘
पर एक अहम फर्क है: मुंह खुला होना और शरीर का सिर्फ मुंह के रास्ते सांस पर निर्भर हो जाना एक बात नहीं है। आखिरी वक्त में जो दिखता है, उसमें मांसपेशियों की ढील, होश का कम होना और बदला हुआ सांस का ज़ोर, सब शामिल हो सकते हैं।
सांस को चलाता कौन है?
हम सो रहे हों, बेहोश हों या सांस के बारे में सोच भी न रहे हों, फिर भी सांस चलती रहती है। क्योंकि इसका असली नियंत्रण दिमाग के निचले हिस्से, खासकर ब्रेनस्टेम (brainstem, यानी मस्तिष्क-तना) में बैठे तंत्रिका जाल के पास है। शरीर खून में कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन और अम्लता के संकेतों पर लगातार प्रतिक्रिया करता है, और उसी के हिसाब से सांस की रफ्तार और गहराई बदलती है।
गंभीर बीमारी के आखिरी चरण में शरीर का भीतरी संतुलन बिगड़ने लगता है। खून का बहाव बदलता है, होश घटता है, चयापचय (metabolism) बदलता है, और दिमाग का सांस वाला नियंत्रण भी पहले जैसा नहीं रहता। नतीजा यह कि सांस अंदर-बाहर, अंदर-बाहर की बंधी लय में नहीं चलती। कभी उथली, कभी गहरी, कभी तेज़, कभी बहुत धीमी हो जाती है, और बीच में कई सेकंड के लिए रुक भी सकती है। ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवा एनएचएस (NHS) भी आखिरी घंटों और दिनों में ऐसी बेतरतीब सांस को दर्ज करती है।
चेन-स्टोक्स सांस (Cheyne-Stokes breathing) क्या है?
यह आखिरी वक्त में दिखने वाले सबसे जाने-पहचाने बदलावों में से एक है, हालांकि यह सिर्फ मौत के समय ही नहीं होता। इसमें सांस धीरे-धीरे गहरी और कभी तेज़ होती जाती है, फिर धीरे-धीरे हल्की पड़ती है, फिर कुछ देर के लिए बिल्कुल रुक जाती है, और फिर दोबारा शुरू हो जाती है। यही चक्र दोहराया जा सकता है: हल्की सांस → गहरी सांस → और गहरी → फिर हल्की → फिर ठहराव → फिर सांस शुरू।
यह चक्र शरीर के सांस-नियंत्रण और खून में कार्बन डाइऑक्साइड जैसे संकेतों के बीच प्रतिक्रिया में आए बदलाव से जुड़ा हो सकता है। एनएचएस और कई उपशामक देखभाल सेवाएं इसे मौत के करीब दिखने वाले संभावित बदलावों में गिनती हैं। लेकिन इसका मतलब अपने आप यह नहीं कि इंसान कुछ मिनटों में चला जाएगा। यह गंभीर दिल या तंत्रिका की बीमारियों और कुछ दूसरी हालतों में भी दिख सकता है।
जब हर सांस के साथ जबड़ा हिलता है
'मुंह से सांस चलने' वाली पुरानी धारणा को शायद सबसे ज़्यादा इसी दृश्य ने जन्म दिया। जीवन के बिल्कुल आखिरी चरण में कुछ लोगों में सांस लेते समय निचला जबड़ा नीचे-ऊपर चलता दिखता है। इसी को ‘मैंडिबुलर ब्रीदिंग’ कहते हैं। ‘मैरी क्यूरी’ इसे आखिरी वक्त में हो सकने वाले बदलाव के रूप में साफ बताती है: मुंह खुल सकता है और सांस लेते समय जबड़ा हिल सकता है। भारतीय परिवारों ने पीढ़ियों से यह दृश्य देखा होगा। मेडिकल शब्द जाने बिना भी लोगों ने अनुभव से पहचान लिया कि बहुत गंभीर मरीज़ में ऐसी सांस दिखे तो हालत अक्सर बहुत नाज़ुक होती है। कई लोक-धारणाओं की तरह यहां भी पहले अवलोकन आया, उसकी वैज्ञानिक व्याख्या बाद में।
एगोनल ब्रीदिंग (Agonal breathing): इससे अलग और बहुत अहम
एक और शब्द है ‘एगोनल ब्रीदिंग’, जिसे समझना बेहद ज़रूरी है। यह सामान्य सांस नहीं होती। दिल रुकने या दिमाग तक खून और ऑक्सीजन न पहुंचने जैसी बहुत गंभीर हालत में इंसान कभी-कभी हांफने, गैस लेने या ज़ोर लगाकर अजीब ढंग से सांस खींचने जैसी हरकत करता है। बाहर से लगता है कि अभी सांस चल रही है, जबकि दिल के दौरे के मामले में ऐसी हांफती सांस असरदार सांस नहीं मानी जाती। इसलिए आखिरी दिनों की स्वाभाविक प्रक्रिया और अचानक दिल रुकने (cardiac arrest) में फर्क करना बहुत ज़रूरी है। अगर कोई इंसान पहले से जीवन के अंतिम दौर की देखभाल में नहीं है, अचानक बेहोश हो जाए, पुकारने पर कोई जवाब न दे और बस बीच-बीच में हांफता दिखे, तो यह सोचकर न बैठें कि कि मुंह से सांस चल रही है। यह आपातकाल हो सकता है। तुरंत डॉक्टरी मदद और ज़रूरत हो तो पुनर्जीवन (CPR) की ज़रूरत पड़ सकती है।
आखिरी वक्त में गले से "घर्र-घर्र" आवाज़ क्यों आती है?
यह भी मुंह से सांस वाली धारणा के साथ जुड़ गई है। आम बोलचाल में इसे ‘अंतिम घरघराहट’ कहते हैं और अंग्रेज़ी मेडिकल साहित्य में डेथ रैटल (death rattle)। आम हालत में गले और सांस की नली में बनने वाली लार और बलगम को हम निगलते या खांसकर साफ करते रहते हैं, और हमें पता भी नहीं चलता। आखिरी हालत में होश कम होने, निगलने की ताकत घटने और खांसी का ज़ोर कम होने से यह गले और सांस की नली में जमा हो सकता है। हवा जब इसके बीच से गुज़रती है तो गीली, घरघराती या खड़खड़ाती आवाज़ बनती है। एनएचएस इसे आखिरी वक्त के आम सांस-बदलावों में गिनता है।
परिवार को यह आवाज़ बहुत बेचैन करने वाली लग सकती है, क्योंकि सुनकर लगता है जैसे दम घुट रहा हो। लेकिन उपशामक चिकित्सा की जानकारी के मुताबिक यह आवाज़ आम तौर पर खुद मरते हुए इंसान को उतना कष्ट नहीं देती जितना सुनने वाले घरवालों को लगता है। इसीलिए डॉक्टर और नर्स मरीज़ की स्थिति बदल सकते हैं, सिर एक तरफ कर सकते हैं, या ज़रूरत हो तो जमाव घटाने वाली दवाएं दे सकते हैं। मकसद आराम देना होता है।
मुंह सूखा क्यों दिखता है?
मुंह खोलकर सांस लेने पर हवा लगातार मुंह की भीतरी सतह से गुज़रकर उसे सुखाती है। साथ ही आखिरी हालत में खाना-पानी बहुत कम हो जाता है, निगलना मुश्किल हो सकता है, और कुछ दवाएं भी मुंह सुखाती हैं। इसलिए होंठ, जीभ और मुंह का सूखना आम बात हो जाती है। मैरी क्यूरी की जानकारी में भी मुंह से सांस और कम पानी को सूखे मुंह की वजहों में गिना गया है। इसीलिए आखिरी वक्त की देखभाल में बार-बार ज़बरदस्ती पानी पिलाने की जगह मुंह और होंठ को नम रखना आराम देने वाली बहुत अहम देखभाल है, खासकर जब इंसान सुरक्षित ढंग से निगल न पा रहा हो। निगलने की ताकत जा चुकी हो तो जबरन पानी देने से वह सांस की नली में जा सकता है।
क्या मुंह से सांस शुरू होने का मतलब है कि बस कुछ घंटे बचे हैं?
ऐसा नहीं है। इसे घड़ी की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। लोक-धारणा का यही हिस्सा वैज्ञानिक रूप से गलत हो जाता है। मौत की प्रक्रिया हर इंसान में अलग होती है। किसी में सांस के बदलाव कई दिन रह सकते हैं, किसी में कुछ घंटे, और किसी में सिर्फ आखिरी मिनटों में साफ दिखते हैं। मैरी क्यूरी के मुताबिक उथली या बेतरतीब सांस कुछ लोगों में कुछ दिन और दूसरों में सिर्फ घंटों या मिनटों तक रह सकती है। सिर्फ मुंह से सांस मौत के समय का भरोसेमंद संकेत नहीं है। सेहतमंद इंसान भी बंद नाक की वजह से मुंह से सांस ले सकता है। नींद में ऐसा हो सकता है, गंभीर फेफड़े या दिल की बीमारी में हो सकता है, बेहोशी में भी हो सकता है। इसलिए सिर्फ खुला मुंह देखकर मौत का अंदाज़ा लगाना वैज्ञानिक नहीं है। डॉक्टर पूरी तस्वीर देखते हैं: होश का स्तर, खाना-पानी लेना, निगलने की क्षमता, पेशाब की मात्रा, खून का बहाव, त्वचा का तापमान और रंग, कमज़ोरी, सांस की लय और मूल बीमारी की हालत। इनमें से कई बदलाव एक साथ दिखें, तभी आखिरी अवस्था का अंदाज़ा ज़्यादा पक्का होता है।
क्या इंसान को लगता है कि उसका दम घुट रहा है?
यह परिवारों की सबसे बड़ी चिंता होती है। देखने में आखिरी सांसें बहुत मेहनत वाली लग सकती हैं: मुंह खुला, जबड़ा हिलता हुआ, सांसों के बीच लंबा अंतर, गले से आवाज़। देखने वाले को स्वाभाविक रूप से लगता है कि इंसान बहुत तकलीफ में होगा। लेकिन जो दिखता है और जो इंसान महसूस करता है, वह हमेशा एक जैसा नहीं होता। जीवन के आखिरी चरण में होश अक्सर काफी कम हो चुका होता है, और शरीर की ऑक्सीजन की ज़रूरत भी घटती जाती है। उपशामक चिकित्सा के कई स्रोत बताते हैं कि बेतरतीब सांस और जमे हुए बलगम की आवाज़ का मतलब मरीज़ में तकलीफ होना ज़रूरी नहीं। हालांकि इसका यह मतलब भी नहीं कि मरते हुए इंसान को कभी सांस की तकलीफ नहीं होती। सांस फूलने का एहसास (dyspnoea) असली और कष्टदायक हो सकता है, और उपशामक चिकित्सा के पास उसे कम करने के उपाय होते हैं। इसलिए डॉक्टर चेहरे के भाव, बेचैनी, सांस के ज़ोर और दूसरी प्रतिक्रियाओं को देखकर तय करते हैं कि इंसान परेशान है या बस सांस का स्वाभाविक आखिरी बदलाव चल रहा है।
यह पुरानी धारणा बनी कैसे?
शायद कोई एक ऐसा ऐतिहासिक पल नहीं है जब किसी ने पहली बार कहा हो कि मुंह से सांस आने लगे तो अंत करीब है। ज़्यादा संभावना है कि यह पीढ़ियों के सीधे अनुभव से बनी लोक-पहचान है। आधुनिक अस्पताल बनने से बहुत पहले ज़्यादातर लोग घरों में ही मरते थे। परिवार के कई लोग ज़िंदगी भर अपने माता-पिता, दादा-दादी और दूसरे रिश्तेदारों के आखिरी दिन देखते थे। उन्होंने बार-बार एक क्रम देखा होगा: इंसान खाना छोड़ता है, ज़्यादा सोता है, बोलना कम होता है, निगलना मुश्किल होता है, मुंह खुला रहने लगता है, सांस बेतरतीब होती है, कभी जबड़ा सांस के साथ चलता है, गले से आवाज़ आती है, सांसों के बीच का अंतर बढ़ता जाता है, और आखिर में सांस रुक जाती है।
उन्हें ब्रेनस्टेम, कार्बन डाइऑक्साइड, मांसपेशियों की कसावट या चेन-स्टोक्स जैसे शब्द नहीं पता होंगे। पर दिखने वाला पैटर्न उन्होंने पहचान लिया था। यहीं से सीधा निष्कर्ष बन गया: मुंह से सांस चलने लगी है, अंत पास है।
आधुनिक चिकित्सा ने इस अवलोकन के एक हिस्से की पुष्टि की है, और उसका मतलब ज़्यादा सटीक किया है। आखिरी वक्त में मुंह खुलना और जबड़े के साथ सांस चलना सचमुच हो सकता है। पर यह कोई रहस्यमय आखिरी सांस का रास्ता बदलना नहीं है। यह घटते होश, मांसपेशियों की ढील, निगलने-खांसने की ताकत में कमी, और दिमाग व शरीर के सांस-नियंत्रण में हो रहे अंतिम बदलावों का दिखने वाला नतीजा है। शायद सबसे अहम बात यही है कि नाक की सांस बंद होकर मुंह की सांस शुरू होना मौत की कोई अनिवार्य जैविक रस्म नहीं है। आखिरी वक्त में शरीर की पूरी सांस वाली व्यवस्था बदल रही होती है, और खुला मुंह व हिलता जबड़ा उस बड़े बदलाव का सिर्फ सबसे आसानी से दिखने वाला हिस्सा है।
ध्यान रखें कि यह विषय संवेदनशील है, इसलिए अगर आप या आपके परिवार में कोई ऐसी स्थिति से गुज़र रहा है, तो मरीज़ की देखभाल करने वाली डॉक्टरी टीम से सीधे बात करना सबसे अच्छा रहेगा।


