Murli Manohar Joshi Wife: डॉ. जोशी की पत्नी तरला जोशी, त्याग, संघर्ष और प्रेरणा की अनकही कहानी

Murli Manohar Joshi Wife: हर सफल नेता के पीछे एक मजबूत साथी! जानिए तरला जोशी की प्रेरक कहानी...

Yogesh Mishra
Published on: 12 July 2026 6:47 PM IST
Murli Manohar Joshi Wife: डॉ. जोशी की पत्नी तरला जोशी, त्याग, संघर्ष और प्रेरणा की अनकही कहानी
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Murli Manohar Joshi Wife: किसी भी राजनेता के जीवन को सँवारने और उसे वैचारिक दृढ़ता देने में उसकी पत्नी की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मेरे जीवन में भी मेरी हमसफ़र तरला जोशी एक ऐसी ही महिला हैं, जिन्होंने हर कदम पर मेरा साथ दिया। जीवन की इस लंबी और उतार-चढ़ाव भरी यात्रा से जुड़ी कुछ अंतरंग बातें, जो मैं अपनी जीवन-संगिनी के बारे में साझा करना चाहता हूँ।

मेरा संबल, मेरी शक्ति

मुझे अपनी हमसफ़र पर नाज़ है। मेरी उपलब्धियों से आप हमारे रिश्ते की प्रगाढ़ता व गहराई को माप सकते हैं। उन्हें मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं रही। मेरी विचारधारा व कार्यों के प्रति उन्होंने कभी कोई असहमति ज़ाहिर नहीं की। यहाँ तक कि जीवन-यात्रा में आने वाली किसी कठिनाई का भी मुझसे कभी कोई ज़िक्र नहीं किया। राजनीति की व्यस्तताओं के कारण मेरा देर से घर आना, या काम के सिलसिले में अक्सर घर से बाहर रहना, इस सब को उन्होंने हमेशा प्रसन्नता से स्वीकार किया।

उन्होंने घर की बहुत अच्छी तरह देखभाल की और बाहर से आने वाले लोगों के सेवा-सत्कार में भी कोई कमी नहीं रखी। उन दिनों मेरे यहाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) व जनसंघ के बहुत से लोग आते थे, तरला जी सबका पूरा खयाल रखती थीं। आज मैं जिस मुकाम पर हूँ, तरला जी के मनसा-वाचा-कर्मणा सहयोग के बिना यहाँ पहुँचना संभव नहीं था। मेरा मानना है कि हर सफल पुरुष के पीछे स्त्री के अनंत त्याग व अगाध प्रेम की कई अनकही कथाएं छिपी रहती हैं।

आपातकाल की अग्निपरीक्षा और दृढ़ व्यक्तित्व

तरला जी में अपार धैर्य है। शादी के तुरंत बाद ही उन्होंने स्वेच्छा से अपनी नौकरी छोड़ दी थी। वह जानती थीं कि नौकरी करते हुए मेरी पारिवारिक, सामाजिक व राजनीतिक गतिविधियों में पूरी तरह सहयोग दे पाना उनके लिए संभव नहीं होगा। तरला जी अगर साहसी व धैर्यशील नहीं होतीं, तो आज तक का यह सफ़र तय कर पाना नामुमकिन था।

आपातकाल (Emergency) के दौरान 6 जून 1975 को मुझे मीसा (MISA) के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। करीब दो साल तक मुझे जेल में रहना पड़ा। उस समय मेरी दोनों बेटियां, प्रियंवदा और निवेदिता, काफी छोटी थीं। मुझे इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रोफेसरी से भी मुअत्तल (सस्पेंड) कर दिया गया था। सरकार से लड़ाई थी, इसलिए मुकदमा लड़ना लाज़मी था और परेशानियाँ भी असीमित थीं। पूरा परिवार जबरदस्त आर्थिक तंगी का सामना कर रहा था, मगर तरला जी का धैर्य मेरा सबसे बड़ा संबल बना।

इन दिक्कतों के बीच भी तरला जी ने हार नहीं मानी और बाहर रहकर हमारी लड़ाई जारी रखी। इलाहाबाद में हाईकोर्ट होने के कारण पूरे राज्य के मीसा बंदियों के मुकदमे यहीं चल रहे थे। जेल में बंद लोगों के परिवारजन जब मुकदमों की पैरवी के लिए इलाहाबाद आते, तो तरला जी न केवल उनकी मदद करती थीं, बल्कि उन्हें अपने घर में भी रखती थीं। कानूनी राय-मशविरे के लिए वह खुद उन्हें लेकर वकीलों के यहाँ जाती थीं।

एक दौर तो ऐसा आया जब तत्कालीन जिलाधिकारी ने उनसे तंग आकर यहाँ तक कह दिया, 'लगता है, अब आपको भी मीसा में बंद करना पड़ेगा।' इसके बावजूद उन्होंने निडर होकर अपना अभियान जारी रखा। इस दौरान मेरे सहयोगियों, मित्रों और पार्टी के लोगों ने कई बार तरला जी की आर्थिक मदद करनी चाही, लेकिन उन्होंने स्वाभिमान के साथ सहयोग लेने से साफ मना कर दिया। उन्होंने शुभचिंतकों से कहा, 'यदि मैंने किसी पर निर्भरता दिखाई, तो डॉ. जोशी को बहुत बुरा लगेगा। अभी मेरे पास कुछ जमा-पूंजी है, और ज़रूरत पड़ी तो मैं कोई काम कर लूंगी, आखिर पढ़ी-लिखी हूँ।' इस तरह तरला जी विषम से विषम परिस्थितियों में मेरी असली ताकत बनीं।

वैचारिक समानता और अटूट भरोसा

एक छोटी-सी घटना से आप यह समझ सकते हैं कि मेरी विचारधारा तथा नीतियों को लागू करने में उनकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही है। जब मैं इलाहाबाद में पढ़ाता था, उन दिनों स्नातक (Graduation) के छात्रों के पाठ्यक्रम में सामान्य अंग्रेजी एक अनिवार्य विषय था। सामान्य अंग्रेजी का पेपर जांचने या पढ़ाने का काम विश्वविद्यालय के कुछ अध्यापकों की पत्नियों के ज़िम्मे था। मैंने इस विसंगति का विरोध किया और एकेडमिक काउंसिल से यह अनिवार्यता समाप्त कराई।

इस पर अंग्रेजी के तत्कालीन विभागाध्यक्ष ने एक चाल चली। उन्होंने तरला जी को अंग्रेजी पढ़ाने का एक अस्थायी नियुक्ति-पत्र भेज दिया, क्योंकि वह जानते थे कि विवाह से पहले तरला जी रायपुर में अंग्रेजी की ही अध्यापिका थीं। उनकी मंशा यह थी कि अगर तरला जी ने इसे स्वीकार कर लिया, तो वह सबसे जूनियर टीचर होंगी और इस तरह या तो मैं अपना विरोध बंद कर दूंगा या फिर इस व्यवस्था को मान लूँगा। लेकिन तरला जी ने मुझसे बिना कुछ पूछे ही उस नियुक्ति-पत्र पर यह लिखकर वापस कर दिया—'यह संभव नहीं है। अगर मुझे नौकरी करनी ही होगी, तो मैं बाकायदा इंटरव्यू देकर स्थायी नौकरी करूंगी।'

इसी तरह, जब मैं कन्याकुमारी से कश्मीर तक की 'एकता यात्रा' पर जा रहा था, तब सुरक्षा को लेकर तरह-तरह की आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं। तमाम मित्र और शुभचिंतक मुझे मना कर रहे थे, लेकिन तरला जी ने मुझे जाने से नहीं रोका, बल्कि यह कहकर मेरा हौसला बढ़ाया कि 'भगवान हैं, सब ठीक होगा।' यह दिखाता है कि हम दोनों की विचारधारा, जीवन की दृष्टि और प्रतिबद्धताओं में कितनी गहरी समानता है।

समाज सेवा और 'शुचिता' का संकल्प

मेरी राजनीतिक गतिविधियों में भी वह पूरे उत्साह से मेरा साथ देती हैं। सभी चुनावों में तरला जी हमेशा साए की तरह मेरे साथ रहीं। मेरे निर्वाचन क्षेत्र के कार्यकर्ताओं की देखभाल करना और उनकी समस्याओं को हल करने में उनकी मदद करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।

वह 'शुचिता' नामक एक स्वयंसेवी संस्था (NGO) भी चलाती हैं, जिसमें उनकी विशेष रुचि है। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने कई गरीब व बेसार महिलाओं को न केवल स्वावलंबी बनाया है, बल्कि यह संस्था इन महिलाओं के उत्पादों को बाज़ार तक ले जाने का भी काम करती है। उत्कृष्ट कोटि के कच्चे माल के प्रयोग के कारण इन उत्पादों की बाज़ार में खासी मांग है।

साहित्यिक अभिरुचि और कलात्मक गृहस्थी

तरला जी को पुस्तकें पढ़ने का बेहद शौक है। उनकी हिंदी और अंग्रेजी साहित्य, दोनों में गहरी रुचि है। वैसे भी हमारे घर का पूरा माहौल ही हमेशा से साहित्यिक रहा है। उनकी बहन शिवानी जी हिंदी की जानी-मानी लेखिका रही हैं, और दूसरी बहन जयंती पंत ने भी लेखन के क्षेत्र में नाम कमाया। उनकी माँ गुजराती, संस्कृत और हिंदी की प्रकांड विदुषी थीं। तरला जी को अंग्रेजी साहित्य में टॉमस हार्डी विशेष रूप से पसंद हैं।

अपने इस शौक के कारण वह किताबों का रख-रखाव बहुत संजीदगी से करती हैं। हमारे घर की लाइब्रेरी में दुर्लभ किताबों का बेहतरीन संग्रह है, जिसे तरला जी ने एकदम सिस्टमैटिक ढंग से सहेज कर रखा है। मैं जब भी कोई किताब चाहता हूँ, वह मुझे तुरंत मिल जाती है।

कुशल गृहणी और आत्मीयता के रिश्ते

किताबों के साथ-साथ तरला जी एक बेहद कुशल गृहणी भी हैं। वह सभी शाकाहारी व्यंजन बहुत लजीज बनाती हैं। पहाड़ी व्यंजन बनाने में तो उनका कोई सानी नहीं है। उनके हाथ का बना पारंपरिक पहाड़ी 'रस' खाकर तो कोई भी उंगलियां चाटता रह जाए। रस विभिन्न पहाड़ी दालों को मिलाकर बनता है और पहाड़ की ये दालें बेहद स्वादिष्ट होती हैं। वह आज भी खाना स्वयं बनाती हैं।

वैसे, स्वाद के मामले में मैं भी थोड़ा पाकशास्त्री (कुकिंग का जानकार) हूँ। मेरे परिवार में लड़कों को भी खाना बनाना सिखाया जाता था, जो मुझे मेरी माँ ने सिखाया था। उन्होंने मुझे हर तरह के शाकाहारी व्यंजन बनाना सिखाया। शादी के बाद जब मैंने पहली बार तरला जी को तरोई की सब्जी और रोटी बनाकर खिलाई, तो उन्हें बड़ा ताज्जुब हुआ कि मुझे भी इतना अच्छा खाना बनाना आता है।

तरला जी के संस्कारों और भावनाओं में भारतीय संस्कृति रची-बसी है। भारतीय परंपराओं व मूल्यों में उनकी गहरी आस्था है। वह धार्मिक तो हैं, परंतु संकीर्णता उन्हें छूकर भी नहीं गुज़री। हर धर्म के प्रति सदाशयता उनके व्यक्तित्व का अटूट हिस्सा है। वह कभी भी किसी दुःख या अभाव को लेकर शिकायत नहीं करतीं। गहरी धार्मिक आस्था के कारण वह मानती हैं कि हर बुरा समय वक्त के साथ गुज़र जाता है।

हम दोनों एक-दूसरे के सबसे अच्छे आलोचक भी हैं। यही वजह है कि हमारे बीच देश, समाज और राजनीति से जुड़े तमाम ज्वलंत मुद्दों पर अक्सर खुली बहस होती है। कई बार इस बहस के केंद्र में मेरी अपनी राजनीति भी होती है, लेकिन यह विमर्श हमेशा रचनात्मक और दिशा दिखाने वाला रहा है। इस संवाद के निष्कर्षों से सदैव हमारा मार्गदर्शन ही हुआ है।

तरला जी न केवल अपने घर-परिवार को संभालने में, बल्कि समाज के सभी रिश्तों को निभाने में भी बेहद निपुण हैं। उनकी यही आत्मीयता हमारे संसदीय क्षेत्र के लोगों से उन्हें सीधे तौर पर जोड़े रखती है। मैंने अपना पहला चुनाव अल्मोड़ा से लड़ा था, और आज इतने दशकों बाद भी अल्मोड़ा के लोग उनसे मिलने हमारे घर आते रहते हैं। मैं आज जीवन के जिस भी शिखर पर हूँ, उसमें तरला जी की बराबर की मूक भागीदारी है।

( साभार- जागरण सखी। मूल रुप से प्रकाशित अगस्त,2001)

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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