TRENDING TAGS :
Mysore Dussehra 2026:मैसूर दशहरा में हाथी पर क्यों बैठती हैं मां चामुंडेश्वरी? सोने की अंबारी का रहस्य जानिए
Mysore Dussehra 2026: मैसूर की जंबू सवारी में मां चामुंडेश्वरी को 750 किलो की सोने की अंबारी में क्यों विराजमान किया जाता है? जानें वाडियार राजवंश का इतिहास और इस शाही परंपरा का धार्मिक महत्व।
Mysore Dussehra 2026: Why Goddess Chamundeshwari Rides in the Golden Ambari
Mysore Dussehra 2026: दशहरा करीब आते ही समूचे उत्तर भारत में रावण दहन, रामलीला और मेलों से उत्सव उमड़ पड़ता है। वहीं कर्नाटक के मैसूर में विजयदशमी का नजारा ठीक बिल्कुल अलग होता है। यहां दशहरे के दिन ऐतिहासिक मैसूर पैलेस रोशनी से जगमगाता है, पारंपरिक वेशभूषा में सजे हाथियों का काफिला सड़कों से गुजरता है और मां चामुंडेश्वरी की प्रतिमा को सोने की भव्य अंबारी में विराजमान करके शाही जुलूस निकाला जाता है। इस जुलूस को जंबू सवारी कहा जाता है। मैसूर दशहरा की खासियत केवल इसकी भव्यता नहीं, बल्कि इससे जुड़ा सदियों पुराना इतिहास भी है। वाडियार राजवंश की यह परंपरा वर्ष 1610 से जुड़ी है और आज भी कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। आखिर जंबू सवारी क्यों निकाली जाती है? हाथी पर सोने की अंबारी रखने के पीछे क्या मान्यता है और मैसूर का दशहरा देश के दूसरे हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरे से कैसे अलग है? आइए जानते हैं इस शाही उत्सव की पूरी कहानी।
विजयनगर साम्राज्य से जुड़ा है मैसूर दशहरा का इतिहास
मैसूर दशहरा का इतिहास समझने के लिए हमें 400 साल से भी अधिक पीछे जाना होगा। इस उत्सव की जड़ें दक्षिण भारत के शक्तिशाली विजयनगर साम्राज्य की दशहरा परंपराओं से जुड़ी मानी जाती हैं। उस समय विजयदशमी का त्योहार धार्मिक आस्था के साथ राजकीय शक्ति, समृद्धि और सैन्य वैभव प्रदर्शित करने का अवसर भी होता था। विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद दक्षिण भारत में कई राजवंशों ने इसकी सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाया। इनमें मैसूर का वाडियार राजवंश भी शामिल था। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, राजा वाडियार प्रथम ने वर्ष 1610 में श्रीरंगपट्टनम में दशहरा उत्सव को राजकीय स्वरूप दिया। बाद में मैसूर राजवंश की राजधानी मैसूर बनने के साथ यह उत्सव शहर की पहचान बन गया।
समय के साथ दशहरा केवल राजपरिवार का धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि इसमें आम लोगों की भागीदारी भी बढ़ती गई। आज कर्नाटक सरकार और मैसूर राजपरिवार से जुड़ी परंपराओं के माध्यम से यह उत्सव राज्य की ऐतिहासिक विरासत को जीवित रखे हुए है।
जंबू सवारी क्यों निकाली जाती है?
जंबू सवारी मैसूर दशहरा का सबसे चर्चित आकर्षण है। विजयदशमी के दिन निकलने वाली इस शाही शोभायात्रा में मां चामुंडेश्वरी की उत्सव प्रतिमा को सजे हुए हाथी पर रखी विशेष अंबारी में विराजमान किया जाता है। इस दौरान हाथियों, पारंपरिक वाद्ययंत्रों, लोक कलाकारों और सांस्कृतिक झांकियों का काफिला शहर की सड़कों से गुजरता है।
इस जुलूस का धार्मिक महत्व देवी दुर्गा की उस शक्ति से जुड़ा है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। मैसूर की अधिष्ठात्री देवी चामुंडेश्वरी को यहां विशेष श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी ने महिषासुर का वध किया था। मैसूर का नाम भी महिषासुर की पौराणिक कथा से जुड़ा माना जाता है। जंबू सवारी में धार्मिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक विरासत एक साथ देखने को मिलते हैं।
750 किलो की सोने की अंबारी
जंबू सवारी में सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है सोने की अंबारी, जिसे कन्नड़ में 'चिन्नादा अंबारी' भी कहा जाता है। इसका कुल वजन करीब 750 किलोग्राम बताया जाता है। एक दिलचस्प तथ्य यह है कि यह पूरी तरह ठोस सोने से नहीं बनी है। इसका आधार लकड़ी का है, जिस पर सोने की परत चढ़ाई गई है। इस पर इस्तेमाल किए गए सोने का वजन लगभग 80 किलोग्राम बताया जाता है। इस अंबारी में मां चामुंडेश्वरी की उत्सव प्रतिमा रखी जाती है। इसे शाही सम्मान और धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है। इतनी भारी अंबारी को उठाकर चलना हाथी के लिए बड़ी जिम्मेदारी होती है। इसलिए इसके लिए चुने जाने वाले हाथी को लंबे समय तक विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है।
जंबू सवारी में हाथियों की क्या होती है भूमिका?
जंबू सवारी में हाथी केवल जुलूस का हिस्सा नहीं होते, बल्कि इस परंपरा के मुख्य आकर्षण हैं। सबसे आगे चलने वाले हाथी को अंबारी उठाने की जिम्मेदारी दी जाती है। उसके साथ दूसरे सजे हुए हाथी भी चलते हैं, जिनके साथ महावत और देखभाल करने वाले कर्मचारी रहते हैं। इस आयोजन की तैयारी कई सप्ताह पहले शुरू हो जाती है। हाथियों को जंगल से मैसूर लाने की प्रक्रिया को 'गज पायना' कहा जाता है। महल पहुंचने के बाद उन्हें विशेष भोजन दिया जाता है और जुलूस के रास्ते पर नियमित रूप से चलाया जाता है, ताकि वे भीड़, संगीत और शहर के शोर के अभ्यस्त हो सकें। अंबारी का भार उठाने के लिए उनकी क्षमता भी धीरे-धीरे तैयार की जाती है। इस दौरान हाथियों की सेहत और सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना जरूरी होता है। उनके प्रशिक्षण और स्वास्थ्य की निगरानी के लिए विशेषज्ञों और पशु चिकित्सकों की मदद ली जाती है। हाथियों की यह तैयारी जंबू सवारी को व्यवस्थित तरीके से आयोजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
मैसूर पैलेस में आज भी निभाई जाती है शाही दरबार की परंपरा
मैसूर दशहरा की भव्यता जंबू सवारी तक सीमित नहीं है। नवरात्रि के दौरान ऐतिहासिक मैसूर पैलेस में धार्मिक अनुष्ठान और शाही परंपराओं से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। वाडियार राजपरिवार के वंशज पारंपरिक शाही पोशाक में निजी दरबार की परंपरा निभाते हैं। यह आयोजन उस दौर की याद दिलाता है, जब दशहरा राजपरिवार के प्रमुख राजकीय उत्सवों में शामिल था। शाम होते ही महल हजारों बल्बों की रोशनी से जगमगा उठता है। रोशन महल, उसकी ऐतिहासिक वास्तुकला और उत्सव का माहौल पर्यटकों को आकर्षित करता है। दशहरा के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों, लोककलाओं और अन्य आयोजनों से पूरा शहर उत्सव के रंग में रंग जाता है।
बन्नीमंटप मैदान में होता है उत्सव का शानदार समापन
जंबू सवारी मैसूर पैलेस से शुरू होकर करीब पांच किलोमीटर की दूरी तय करते हुए बन्नीमंटप मैदान तक पहुंचती है। रास्ते में लोक कलाकार, पारंपरिक बैंड, सजीव झांकियां और विभिन्न सांस्कृतिक दल अपनी प्रस्तुतियां देते हैं। इस तरह जुलूस कर्नाटक की सांस्कृतिक विविधता को भी सामने लाता है।विजयदशमी की शाम बन्नीमंटप में 'पंजिना कवायतु' यानी टॉर्चलाइट परेड का आयोजन भी किया जाता है। इसमें रोशनी, घुड़सवार दल और अनुशासित परेड उत्सव को यादगार बनाते हैं। यह कार्यक्रम मैसूर दशहरा के शाही और सांस्कृतिक आयोजनों के समापन का प्रमुख हिस्सा है।
उत्तर भारत के दशहरे से कैसे अलग है मैसूर का उत्सव?
उत्तर भारत में दशहरे का सबसे प्रमुख आकर्षण भगवान राम की रावण पर विजय और रावण दहन है। मैसूर में भी विजयदशमी बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देती है, लेकिन यहां उत्सव का केंद्र मां चामुंडेश्वरी की पूजा, शाही जुलूस और वाडियार राजवंश की ऐतिहासिक विरासत है। मैसूर की जंबू सवारी इसलिए खास है, क्योंकि यह करीब चार सदियों पुरानी परंपरा को वर्तमान से जोड़ती है।


