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नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी क्या होती है? लक्षण, रिश्तों पर असर और इससे निपटने के उपाय
हर आत्मविश्वासी या स्वार्थी व्यक्ति नार्सिसिस्ट नहीं होता। समझिए Narcissistic Personality Disorder क्या है, इसके प्रमुख व्यवहारिक संकेत कौन से हैं, यह रिश्तों और काम पर कैसे असर डाल सकता है और कब किसी व्यक्ति को ‘नार्सिसिस्ट’ कहने के बजाय उसके व्यवहार के पैटर्न पर ध्यान देना चाहिए।
Narcissistic Personality Disorder Explained
Narcissistic Personality Disorder Explained: क्या आपके आसपास कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे हमेशा अपनी तारीफ चाहिए? जो अपनी गलती आसानी से स्वीकार नहीं करता, आपकी सफलता से खुश होने के बजाय परेशान हो जाता है, आलोचना सुनते ही भड़क उठता है और धीरे-धीरे आपको यह महसूस कराने लगता है कि हर समस्या की वजह आप ही हैं? सोशल मीडिया की भाषा में ऐसे व्यक्ति को तुरंत ‘नार्सिसिस्ट’ कह दिया जाता है। लेकिन मनोविज्ञान में मामला इतना आसान नहीं है।
नार्सिसिज़्म यानी आत्ममुग्धता एक सीमा तक सामान्य मानवीय गुण हो सकता है। अपनी उपलब्धियों पर गर्व करना, तारीफ पसंद करना, महत्वाकांक्षी होना या कभी-कभी अपने हित को प्राथमिकता देना अपने आप में मानसिक विकार नहीं है। समस्या तब गंभीर होती है जब स्वयं को असाधारण रूप से महत्वपूर्ण समझने, लगातार प्रशंसा चाहने, विशेष व्यवहार की अपेक्षा करने, दूसरों की भावनाओं को कम महत्व देने और आलोचना या असफलता के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होने का एक स्थायी ढांचा बन जाए और उसका असर रिश्तों, काम तथा रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ने लगे।
इसे ‘नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी डिसऑर्डर’ यानी आत्ममुग्ध व्यक्तित्व विकार कहा जाता है। इसका निदान केवल इंटरनेट पर पढ़े कुछ लक्षणों से नहीं किया जा सकता। किसी व्यक्ति के लंबे समय के व्यवहार, उसके रिश्तों, सोचने के तरीके और जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ करता है।
नार्सिसिज़्म नाम कहां से आया?
‘नार्सिसिज़्म’ शब्द ग्रीक मिथक के नार्सिसस से जुड़ा है। कथा में नार्सिसस अपनी ही छवि देखकर उस पर मोहित हो गया था। लेकिन आधुनिक मनोविज्ञान में नार्सिसिज़्म का अर्थ केवल शीशे में खुद को देखते रहना या अपनी तस्वीरें खिंचवाना नहीं है। यह आत्मसम्मान, अपनी पहचान, दूसरों के साथ संबंध और अपने महत्व को बनाए रखने की मनोवैज्ञानिक जरूरत से जुड़ा जटिल व्यक्तित्व गुण है।
दिलचस्प बात यह है कि बाहर से बहुत आत्मविश्वासी दिखने वाला नार्सिसिस्टिक व्यक्ति भीतर से उतना मजबूत हो, यह जरूरी नहीं। कुछ लोगों में आत्ममूल्य अस्थिर हो सकता है। मामूली आलोचना, अस्वीकृति या हार भी उनके भीतर शर्म, अपमान, क्रोध या असफलता की बहुत तीखी भावना पैदा कर सकती है। यही विरोधाभास नार्सिसिज़्म को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी है। बाहर दिखाई देने वाला अहंकार हमेशा भीतर के मजबूत आत्मविश्वास का प्रमाण नहीं होता।
हर आत्मविश्वासी या स्वार्थी व्यक्ति नार्सिसिस्ट नहीं होता
यह सबसे जरूरी अंतर है। कोई व्यक्ति अपनी उपलब्धियों पर गर्व करता है, नेतृत्व करना चाहता है, तारीफ पसंद करता है या कभी-कभी स्वार्थी व्यवहार करता है तो इससे वह नार्सिसिस्टिक व्यक्तित्व विकार से ग्रस्त नहीं हो जाता। हम सभी में आत्मकेंद्रित प्रवृत्तियां अलग-अलग मात्रा में हो सकती हैं। स्वस्थ आत्मसम्मान वाला व्यक्ति अपनी योग्यता पहचान सकता है, लेकिन दूसरों की योग्यता भी स्वीकार करता है। वह अपनी सफलता पर खुश होता है, लेकिन दूसरे की सफलता को अपने लिए खतरा नहीं मानता। आलोचना से असहमत हो सकता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर अपनी गलती पर विचार भी कर सकता है। समस्या तब होती है जब यह व्यवहार लगातार और अलग-अलग परिस्थितियों में दिखाई देने वाला कठोर ढांचा बन जाए और व्यक्ति तथा उसके आसपास के लोगों के जीवन को नुकसान पहुंचाने लगे। इसलिए किसी सूची में पांच लक्षण मिल जाने के बाद पति, पत्नी, दोस्त, बॉस या किसी सार्वजनिक व्यक्ति को ‘नार्सिसिस्ट’ घोषित कर देना मनोवैज्ञानिक निदान नहीं है।
नार्सिसिस्टिक व्यक्ति के प्रमुख लक्षण क्या हो सकते हैं?
ऐसा व्यक्ति खुद को दूसरों से अधिक महत्वपूर्ण समझ सकता है और अपनी उपलब्धियों या प्रतिभा को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर सकता है। उसे लगातार प्रशंसा और मान्यता की जरूरत हो सकती है। वह यह अपेक्षा कर सकता है कि उसे विशेष सुविधा मिले या उसके साथ सामान्य नियमों से अलग व्यवहार किया जाए। वह अपनी सफलता, शक्ति, सुंदरता, प्रतिभा या आदर्श जीवन की कल्पनाओं में अत्यधिक डूबा रह सकता है। उसे यह विश्वास भी हो सकता है कि केवल खास या असाधारण लोग ही उसे समझ सकते हैं। दूसरों से अपने हित के लिए काम लेना और उनकी जरूरतों तथा भावनाओं को पर्याप्त महत्व न देना भी प्रमुख संकेतों में शामिल हो सकता है। ईर्ष्या करना, यह मानना कि दूसरे उससे ईर्ष्या करते हैं और अहंकारी या श्रेष्ठतापूर्ण व्यवहार भी दिखाई दे सकता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू और भी महत्वपूर्ण है। जब उसकी प्रशंसा न हो, उसे विशेष महत्व न मिले या कोई उससे असहमत हो जाए तब उसका व्यवहार कैसा होता है?
ऐसा व्यक्ति मामूली आलोचना को भी अपमान मान सकता है। वह अत्यधिक गुस्सा कर सकता है, सामने वाले को नीचा दिखा सकता है, तिरस्कार कर सकता है या ऐसी परिस्थितियों से बच सकता है जहां उसके असफल होने की संभावना हो। यही कारण है कि किसी व्यक्ति को केवल उसकी सफलता के समय देखकर समझना मुश्किल हो सकता है। कई बार उसका असली संघर्ष तब दिखाई देता है जब कोई उसे ‘न’ कहता है, उसकी गलती बताता है, उससे असहमत होता है या उससे ज्यादा सफल दिखाई देता है।
क्या नार्सिसिस्ट व्यक्ति वास्तव में खुद से बहुत प्यार करता है?
ऊपरी तौर पर ऐसा ही लगता है, लेकिन वास्तविकता ज्यादा जटिल है। स्वस्थ आत्मसम्मान और नार्सिसिज़्म एक चीज नहीं हैं। स्वस्थ आत्मसम्मान अपेक्षाकृत स्थिर होता है। व्यक्ति को अपनी कीमत का एहसास होता है, इसलिए उसे हर समय दूसरों से यह प्रमाण लेने की जरूरत नहीं होती कि वह कितना अच्छा है। नार्सिसिस्टिक व्यक्तित्व में आत्ममूल्य कई बार दूसरों की प्रशंसा और मान्यता पर ज्यादा निर्भर हो सकता है। यही कारण है कि “मैं सबसे श्रेष्ठ हूं” कहने वाला व्यक्ति छोटी सी आलोचना से भीतर तक टूट या बेहद क्रोधित हो सकता है। इसलिए नार्सिसिज़्म को केवल ‘बहुत बड़ा अहंकार’ कहना अधूरा है। कुछ मामलों में यह अस्थिर आत्ममूल्य को श्रेष्ठता की भावना के सहारे सुरक्षित रखने का तरीका भी हो सकता है।
क्या सभी नार्सिसिस्ट दिखावा करने वाले और घमंडी होते हैं?
आम तौर पर नार्सिसिस्ट की एक ही तस्वीर दिखाई जाती है - ऊंची आवाज में अपनी उपलब्धियां बताने वाला, हर जगह खुद को केंद्र में रखने वाला और दूसरों को नीचा दिखाने वाला व्यक्ति। लेकिन वास्तविकता में आत्ममुग्ध प्रवृत्तियां अलग-अलग रूपों में दिखाई दे सकती हैं। कुछ लोग बहुत स्पष्ट रूप से अपनी श्रेष्ठता दिखाते हैं। उन्हें लगता है कि वे सबसे बेहतर हैं, उनके नियम अलग हैं और उन्हें विशेष व्यवहार मिलना चाहिए। वहीं कुछ लोग बाहर से शर्मीले, आहत या असुरक्षित दिखाई दे सकते हैं, लेकिन भीतर लगातार यह भावना रह सकती है कि उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे या दुनिया उनकी असाधारण क्षमता को पहचान नहीं रही। मनोवैज्ञानिक साहित्य में नार्सिसिज़्म के ऐसे अलग रूपों को समझाने के लिए ‘ग्रैंडियोस’ और ‘वल्नरेबल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इन्हें इंटरनेट पर किसी व्यक्ति का खुद से निदान करने का साधन नहीं समझना चाहिए।
रिश्ते की शुरुआत में नार्सिसिस्ट बहुत आकर्षक क्यों लग सकता है?
करीबी रिश्तों में ऐसे व्यवहार को पहचानना कई बार मुश्किल होता है। शुरुआत में व्यक्ति बेहद आकर्षक, आत्मविश्वासी, महत्वाकांक्षी और ध्यान रखने वाला दिखाई दे सकता है। वह आपकी खूब तारीफ कर सकता है, आपको असाधारण बता सकता है और बहुत जल्दी भावनात्मक रूप से करीब आने की कोशिश कर सकता है। लेकिन केवल बहुत प्यार, तारीफ या आकर्षक व्यक्तित्व नार्सिसिज़्म का प्रमाण नहीं है। असल परीक्षा तब शुरू होती है जब रिश्ते में बराबरी आती है। जब आपकी इच्छा उसकी इच्छा से टकराती है, आप उससे असहमत होते हैं, अपनी स्वतंत्रता चाहते हैं या उसकी किसी गलती की ओर ध्यान दिलाते हैं, तब उसका व्यवहार कैसा होता है? अगर इसके बाद लगातार अपमान, नियंत्रण, दोषारोपण, भावनात्मक दंड या आपकी भावनाओं की उपेक्षा शुरू हो जाती है तो यह गंभीर चेतावनी हो सकती है। इसलिए किसी रिश्ते को केवल उसकी खूबसूरत शुरुआत से नहीं, बल्कि असहमति, सीमाओं और आपकी स्वतंत्रता के प्रति दूसरे व्यक्ति के व्यवहार से समझना ज्यादा उपयोगी है।
क्या ‘लव बॉम्बिंग’ नार्सिसिस्ट की पक्की पहचान है?
‘लव बॉम्बिंग’ शब्द आजकल सोशल मीडिया पर बहुत इस्तेमाल होता है। अत्यधिक प्यार, उपहार, संदेश और प्रशंसा के बाद अचानक नियंत्रण, दूरी या भावनात्मक दबाव का व्यवहार कुछ अस्वस्थ रिश्तों में देखा जा सकता है। लेकिन किसी रिश्ते की बहुत प्रेमपूर्ण शुरुआत अकेले नार्सिसिस्टिक व्यक्तित्व विकार साबित नहीं करती। इसी तरह ‘गैसलाइटिंग’ शब्द भी सावधानी से इस्तेमाल होना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति लगातार वास्तविक घटनाओं को नकारता है, आपकी याददाश्त पर संदेह पैदा करता है और आपको अपनी ही वास्तविकता पर भरोसा न करने देने की कोशिश करता है तो यह गंभीर भावनात्मक नियंत्रण हो सकता है। लेकिन हर असहमति या किसी घटना को अलग तरीके से याद करना गैसलाइटिंग नहीं है। व्यवहार का नाम लगाने से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका लगातार असर देखना है।
नार्सिसिस्टिक व्यक्ति कितना नुकसानदेह हो सकता है?
यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी प्रवृत्तियां कितनी गंभीर हैं, आपका रिश्ता क्या है और उसका व्यवहार किस तरह का है। नार्सिसिस्टिक व्यक्तित्व विकार हिंसा का दूसरा नाम नहीं है। किसी व्यक्ति में यह विकार होने का मतलब यह नहीं कि वह हिंसक या अपराधी होगा। लेकिन गंभीर नार्सिसिस्टिक व्यवहार वाले रिश्ते में भावनात्मक दबाव काफी ज्यादा हो सकता है। लगातार आलोचना, अपमान, नियंत्रण, अपनी गलतियों का दोष दूसरे पर डालना, दूसरे की उपलब्धियों को कमतर करना और उसकी सीमाओं की अनदेखी धीरे-धीरे उसके आत्मविश्वास को कमजोर कर सकती है। एक समय बाद सामने वाला व्यक्ति सोचने लग सकता है, “शायद गलती हमेशा मेरी ही होती है।” यही सबसे नुकसानदेह स्थितियों में से एक है।
अगर आप लगातार शब्द तौलकर बोल रहे हैं ताकि दूसरा नाराज न हो, हर विवाद के बाद खुद को दोषी मानते हैं, अपने दोस्तों या परिवार से दूर होते जा रहे हैं, अपनी उपलब्धियां छिपाने लगे हैं ताकि दूसरे को बुरा न लगे या आपकी सीमाएं बार-बार तोड़ी जा रही हैं तो सामने वाले का चिकित्सकीय निदान कुछ भी हो, रिश्ता अस्वस्थ हो सकता है।
नार्सिसिस्टिक बॉस की पहचान कैसे करें?
काम की जगह पर यह व्यवहार अलग रूप ले सकता है। ऐसा अधिकारी अपनी टीम की सफलता का श्रेय खुद ले सकता है और असफलता का दोष कर्मचारियों पर डाल सकता है। उसे अत्यधिक प्रशंसा पसंद हो सकती है। वह आलोचना करने वाले कर्मचारी को अपने लिए खतरा मान सकता है और अपने पसंदीदा लोगों को विशेष सुविधा दे सकता है। लेकिन यहां भी निदान से ज्यादा व्यवहार महत्वपूर्ण है।
कठोर, अहंकारी या खराब प्रबंधक होना अपने आप में मानसिक विकार नहीं है। अगर बॉस नियमित रूप से सार्वजनिक अपमान करता है, काम का श्रेय छीनता है, विरोध करने पर बदला लेता है या अपने पद का गलत इस्तेमाल करता है तो उससे निपटने के लिए उसका मानसिक रोग साबित करने की जरूरत नहीं है। महत्वपूर्ण निर्देश लिखित रूप में लेना, जरूरी बातचीत का रिकॉर्ड रखना और संस्था में उपलब्ध शिकायत या सहायता व्यवस्था का इस्तेमाल करना ज्यादा व्यावहारिक कदम हो सकते हैं।
नार्सिसिस्टिक माता-पिता का बच्चे पर क्या असर पड़ सकता है?
अगर माता या पिता बच्चे को एक स्वतंत्र व्यक्ति की बजाय अपनी प्रतिष्ठा का विस्तार समझने लगें तो समस्या पैदा हो सकती है। बच्चा सफल हुआ तो श्रेय माता-पिता खुद ले सकते हैं और असफल हुआ तो बच्चे को अपनी इज्जत खराब करने वाला मान सकते हैं। उसकी पसंद, भावनाएं और पहचान माता-पिता की अपेक्षाओं के नीचे दब सकती हैं। ऐसे वातावरण में बच्चा यह सीख सकता है कि प्यार और स्वीकार्यता उसकी उपलब्धियों पर निर्भर है। उसे लग सकता है कि सफल होने पर ही वह महत्वपूर्ण है और असहमति करने पर भावनात्मक दूरी या सजा मिल सकती है। लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है। सख्त पालन-पोषण, गलतियां करने वाला माता-पिता या कभी-कभार स्वार्थी व्यवहार देखकर किसी को नार्सिसिस्टिक व्यक्तित्व विकार वाला घोषित नहीं किया जा सकता।
इसकी जड़ बचपन में होती है या जीन में?
विज्ञान के पास इसका कोई एक निश्चित कारण नहीं है। उपलब्ध समझ के अनुसार नार्सिसिस्टिक व्यक्तित्व विकार कई तरह के आनुवंशिक, मनोवैज्ञानिक और पर्यावरणीय कारकों के मेल से विकसित हो सकता है। व्यक्तित्व का विकास, पारिवारिक वातावरण, बचपन के अनुभव और कुछ आनुवंशिक प्रवृत्तियां भूमिका निभा सकती हैं। अत्यधिक प्रशंसा, वास्तविकता से बहुत अलग तरीके से बच्चे को श्रेष्ठ बताना या दूसरी ओर अत्यधिक आलोचना जैसे अनुभवों को संभावित कारकों के रूप में देखा गया है।लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किसी एक तरह की परवरिश से निश्चित रूप से यह विकार पैदा होगा।इसी तरह यह मानना भी गलत होगा कि हर नार्सिसिस्टिक व्यक्ति के बचपन में कोई बड़ा आघात जरूर हुआ होगा।
क्या सोशल मीडिया लोगों को नार्सिसिस्ट बना रहा है?
सोशल मीडिया आत्ममुग्ध प्रवृत्तियों को दिखाने और मजबूत करने के लिए एक मंच जरूर दे सकता है। लाइक, प्रशंसा, अनुयायी, सामाजिक तुलना और लगातार अपनी छवि दिखाने की सुविधा लोगों को बाहरी मान्यता पर ज्यादा निर्भर बना सकती है।लेकिन बहुत सेल्फी लेना, अपनी उपलब्धियां साझा करना या सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना किसी मानसिक विकार का प्रमाण नहीं है।यहां कारण और अभिव्यक्ति के बीच अंतर समझना जरूरी है। सोशल मीडिया किसी पहले से मौजूद प्रवृत्ति को बढ़ावा दे सकता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति नार्सिसिस्टिक व्यक्तित्व विकार विकसित कर लेगा।
क्या नार्सिसिस्ट को पता होता है कि वह नार्सिसिस्ट है?
व्यक्तित्व विकारों की एक मुश्किल यह है कि व्यक्ति को अपने सोचने और व्यवहार करने का तरीका सामान्य लग सकता है। उसे समस्या अपने व्यवहार में नहीं बल्कि दूसरों में दिखाई दे सकती है। इसी वजह से मदद लेने की इच्छा भी कम हो सकती है। कई लोग नार्सिसिज़्म के कारण सीधे उपचार के लिए नहीं आते, बल्कि अवसाद, चिंता, रिश्ते टूटने, काम की समस्या या किसी दूसरे संकट के बाद मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ तक पहुंचते हैं। उपचार की एक बड़ी चुनौती यही हो सकती है कि व्यक्ति अपने व्यवहार में बदलाव की जरूरत को स्वीकार नहीं कर पाता।
क्या नार्सिसिस्ट बदल सकता है?
बदलाव संभव है, लेकिन यह आसान या तुरंत होने वाली प्रक्रिया नहीं है। इस विकार के उपचार में मनोचिकित्सा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को अपने भावनात्मक ढांचे, आत्मसम्मान, रिश्तों और प्रतिक्रियाओं को बेहतर समझने तथा आलोचना, असफलता और भावनात्मक तनाव से अधिक स्वस्थ तरीके से निपटना सीखने में मदद करना हो सकता है।
नार्सिसिस्टिक व्यक्तित्व विकार को सीधे खत्म करने वाली कोई खास दवा नहीं है। अगर साथ में अवसाद, चिंता या कोई दूसरी मानसिक समस्या मौजूद हो तो उसके लिए चिकित्सक दवा दे सकता है। उपचार की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह हो सकती है कि व्यक्ति अपने व्यवहार को समस्या न माने या उपचार को ही अपने ऊपर हमला समझ ले। इसलिए बदलाव में समय, निरंतरता और व्यक्ति की अपनी भागीदारी महत्वपूर्ण होती है।
अगर आपके जीवन में ऐसा व्यक्ति है तो क्या करें?
सबसे पहले उसे बदलना अपना निजी अभियान न बनाइए। आप किसी दूसरे व्यक्ति को केवल प्रेम, तर्क या त्याग के सहारे बदलने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। इसके बजाय अपनी सीमाएं स्पष्ट कीजिए। कौन सा व्यवहार आप स्वीकार करेंगे और कौन सा नहीं, यह खुद तय कीजिए। बातचीत में जरूरी बातों पर टिके रहिए और हर उकसावे पर लंबी सफाई देने से बचिए। जहां महत्वपूर्ण हो वहां लिखित रिकॉर्ड रखिए। अगर रिश्ता लगातार आपको मानसिक रूप से तोड़ रहा है तो खुद किसी मनोवैज्ञानिक या परामर्शदाता की सहायता लेना उपयोगी हो सकता है, भले सामने वाला उपचार लेने के लिए तैयार न हो। और एक बहुत महत्वपूर्ण बात, अपनी रक्षा के लिए सामने वाले का निदान साबित करना जरूरी नहीं है। अगर कोई व्यक्ति आपको लगातार अपमानित करता है, धमकाता है, नियंत्रित करता है या नुकसान पहुंचाता है तो उसका व्यवहार ही सीमा तय करने के लिए पर्याप्त कारण है।
क्या ऐसे व्यक्ति से रिश्ता तोड़ देना चाहिए?
नार्सिसिस्टिक लक्षणों वाला हर व्यक्ति एक जैसा नहीं होता और हर कठिन रिश्ता खत्म करना जरूरी नहीं है। अगर व्यक्ति अपनी समस्या स्वीकार करता है, आपकी सीमाओं का सम्मान करता है, उपचार लेने के लिए तैयार है और उसके व्यवहार में लंबे समय तक वास्तविक बदलाव दिखाई देता है तो रिश्ता सुधर सकता है। लेकिन अगर रिश्ते में हिंसा, धमकी, आर्थिक नियंत्रण, लगातार भावनात्मक उत्पीड़न या आपकी सुरक्षा का खतरा है तो सवाल यह नहीं रह जाता कि सामने वाला नार्सिसिस्ट है या नहीं। सवाल आपकी सुरक्षा का हो जाता है। ऐसी स्थिति में भरोसेमंद लोगों, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और जरूरत पड़ने पर स्थानीय सहायता सेवाओं की मदद लेना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
लेबल नहीं, व्यवहार का पैटर्न देखिए
किसी व्यक्ति को समझने के लिए कुछ सवाल ज्यादा उपयोगी हो सकते हैं। क्या वह गलती होने पर जिम्मेदारी स्वीकार करता है? क्या वह बिना किसी स्वार्थ के आपकी भावनाओं को समझने की कोशिश कर सकता है? क्या वह आपकी सफलता से खुश हो सकता है? क्या आप उससे असहमत होकर भी सुरक्षित महसूस करते हैं? क्या वह आपका ‘न’ सुनकर आपकी सीमा का सम्मान करता है? क्या माफी मांगने के बाद उसके व्यवहार में वास्तव में बदलाव आता है? क्या उस रिश्ते में आपकी अपनी पहचान और स्वतंत्रता सुरक्षित रहती है? इनमें से एक-दो सवालों का जवाब ‘नहीं’ होना किसी मानसिक विकार का प्रमाण नहीं है। लेकिन अगर वर्षों से लगभग हर सवाल का जवाब नकारात्मक है और उसका असर आपकी मानसिक शांति, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता पर पड़ रहा है तो समस्या के नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका प्रभाव है।
सबसे बड़ी गलती है, इंटरनेट से किसी का निदान कर देना
आज ‘नार्सिसिस्ट’ शब्द लगभग गाली की तरह इस्तेमाल होने लगा है। पति से झगड़ा हुआ तो वह नार्सिसिस्ट, पत्नी ने आलोचना की तो वह नार्सिसिस्ट, बॉस ने छुट्टी नहीं दी तो वह नार्सिसिस्ट। इस तरह इस्तेमाल करने से दो नुकसान होते हैं। सामान्य मानवीय कमियों को बीमारी बना दिया जाता है और वास्तविक नार्सिसिस्टिक व्यक्तित्व विकार की गंभीरता भी कम करके देखी जाने लगती है। सही निदान में व्यक्ति के लंबे समय के व्यवहार, रिश्तों, भावनाओं, सोचने के तरीके और जीवन पर उसके प्रभाव को देखा जाता है। इसके अलावा अवसाद, चिंता, आघात और दूसरी मानसिक स्थितियों के लक्षण भी कई बार एक-दूसरे से मिल सकते हैं। इसलिए पेशेवर मूल्यांकन जरूरी है।
और शायद इस पूरे विषय का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है।
आत्मविश्वास नार्सिसिज़्म नहीं है। आत्मप्रेम नार्सिसिज़्म नहीं है। स्वार्थ का कोई एक प्रसंग भी नार्सिसिज़्म नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब ‘मैं’ इतना बड़ा हो जाए कि सामने वाले का ‘तुम’ लगातार छोटा करना पड़े। स्वस्थ व्यक्ति कह सकता है, “मैं महत्वपूर्ण हूं और तुम भी महत्वपूर्ण हो।”गंभीर नार्सिसिस्टिक ढांचा कई बार इसके बिल्कुल उलट हो सकता है, “मैं महत्वपूर्ण हूं, इसलिए तुम्हें कम महत्वपूर्ण होना चाहिए।”यही अंतर रिश्तों को समझने की सबसे उपयोगी कुंजी है।
इसलिए अगर आपके आसपास कोई ऐसा व्यक्ति है तो उसे तुरंत कोई मनोवैज्ञानिक नाम देने की कोशिश मत कीजिए। उसके व्यवहार का लंबे समय का ढांचा देखिए। अपनी सीमाएं देखिए। अपनी सुरक्षा देखिए। और सबसे बढ़कर यह देखिए कि उस रिश्ते में रहते हुए आप धीरे-धीरे मजबूत हो रहे हैं या छोटे होते जा रहे हैं। क्योंकि कई बार असली सवाल यह नहीं होता कि सामने वाला नार्सिसिस्ट है या नहीं? बल्कि असली सवाल होता है - उसके साथ रहते हुए मैं खुद क्या बनता जा रहा हूं?


