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Famous Scientist: आपके हर Video Call के पीछे इस भारतीय वैज्ञानिक की कहानी, फिर नाम क्यों नहीं जानते?
Famous Indian Scientist: नरिंदर सिंह कपानी कौन थे? जानिए उस भारतीय वैज्ञानिक की कहानी जिसने Fiber Optics को नाम और पहचान दी, तस्वीर को कांच के रेशों से भेजने का रास्ता बनाया और आधुनिक संचार की नींव रखने में योगदान दिया।
Famous Indian Scientist Narinder Singh Kapany Biography in Hindi
Famous Indian Scientist: आप जिस वक़्त यह लेख पढ़ रहे हैं, उसी वक़्त समुद्र की तलहटी में बिछे बाल जैसे पतले कांच के धागों में रोशनी के पल्स दौड़ रहे हैं, और वही आपके वीडियो कॉल, यूट्यूब और बैंक ट्रांज़ैक्शन को एक महाद्वीप से दूसरे तक पहुँचा रहे हैं। इस तकनीक को "फ़ाइबर ऑप्टिक्स" कहते हैं, और यह नाम दुनिया को एक पंजाब में जन्मे वैज्ञानिक ने दिया था। फिर भी स्कूल की किताबों में उनका नाम शायद ही मिलता है। कहानी कहती है कि स्कूल में एक शिक्षक ने कहा था कि रोशनी हमेशा सीधी चलती है, और एक बच्चे ने पूछा कि हम उसे मोड़ क्यों नहीं सकते। वह बच्चा नरिंदर सिंह कपानी था।
कौन थे नरिंदर सिंह कपानी?
नरिंदर सिंह कपानी का जन्म 31 अक्तूबर 1926 को पंजाब के मोगा में हुआ था। उनके पिता कोयला उद्योग में काम करते थे, और परिवार उन्हें देहरादून ले गया, जहाँ उनकी परवरिश हुई। आगरा विश्वविद्यालय से पढ़ाई के बाद वे भारतीय आयुध कारख़ाना सेवा में अधिकारी बने। 1952 में वे पीएचडी के लिए लंदन के इम्पीरियल कॉलेज पहुँचे, जहाँ उनके गाइड थे प्रोफ़ेसर हेरोल्ड हॉपकिंस, जो उस दौर के सबसे बड़े ऑप्टिक्स-सिद्धांतकारों में गिने जाते थे। यहीं उनकी मुलाक़ात अपनी भावी पत्नी सतिंदर कौर से भी हुई।
असल में उन्होंने खोजा क्या था?
इसे समझने के लिए पहले यह जानना होगा कि रोशनी काँच के धागे में मुड़ती कैसे है। जब रोशनी घने माध्यम (काँच) से हल्के माध्यम (हवा) की ओर एक ख़ास कोण से टकराती है, तो वह बाहर निकलने के बजाय पूरी तरह भीतर लौट आती है। इसे "पूर्ण आंतरिक परावर्तन" कहते हैं। इसी वजह से काँच के पतले धागे में घुसी रोशनी बार-बार भीतर की दीवारों से टकराती हुई, धागे के मुड़ने के साथ मुड़ती चली जाती है और दूसरे सिरे से निकल आती है। यह सिद्धांत नया नहीं था। 19वीं सदी में वैज्ञानिक पानी की धार में रोशनी को मुड़ते दिखा चुके थे।
असली चुनौती यह थी कि इसे इस्तेमाल लायक कैसे बनाया जाए। अकेला धागा सिर्फ़ रोशनी ले जा सकता है, तस्वीर नहीं। तस्वीर ले जाने के लिए हज़ारों धागों को इस तरह बाँधना पड़ता है कि हर धागा तस्वीर के एक "बिंदु" की रोशनी ले जाए और दोनों सिरों पर उनकी क्रमबद्धता वही रहे। 1954 में हॉपकिंस और कपानी ने नेचर पत्रिका में घोषणा की कि हज़ारों बेहद पतले काँच के रेशों को बाँधकर सिरे से सिरे तक जोड़ा जा सकता है, और पेपर का शीर्षक था "A flexible fibrescope, using static scanning"। उन्होंने लगभग 75 सेंटीमीटर लंबे, कई हज़ार रेशों वाले बंडल में कम नुक़सान के साथ रोशनी पहुँचाने में सफलता पाई। यानी पहली बार मुड़ी हुई नली के ज़रिए तस्वीर को "कोने के पार" भेजा जा सकता था। उसी दौर में डच वैज्ञानिक अब्राहम वैन हील ने भी स्वतंत्र रूप से इसी दिशा में काम किया था, और रेशों के ऊपर कम घनत्व वाली परत, यानी "क्लैडिंग", चढ़ाने जैसी अहम प्रगति में कई लोगों का योगदान रहा।
यह खोज सबसे पहले चिकित्सा में काम आई। इसी तकनीक से एंडोस्कोप जैसे उपकरण बने, जो शरीर के भीतर मुड़े रास्तों से होकर अंदर की तस्वीर बाहर ला सकते हैं, बिना बड़ी चीर-फाड़ के।
फ़ाइबर ऑप्टिक्स नाम कैसे पड़ा?
1960 में साइंटिफ़िक अमेरिकन के एक कवर-लेख में कपानी ने इस शब्द को गढ़ा। नाम बहुत मायने रखता है, क्योंकि एक नाम के बाद बिखरे हुए प्रयोग एक "क्षेत्र" बन जाते हैं, जिस पर पैसा, शोध-पत्र और करियर टिक सकते हैं। इतिहासकार जेफ़ हेख़्ट की किताब City of Light के अनुसार 1955 से 1965 के बीच कपानी ने 56 वैज्ञानिक शोध-पत्र लिखे या सह-लिखे, जो उस दशक में इस क्षेत्र में छपे सारे शोध का लगभग 30% था। उन्होंने इस विषय पर पहली किताब भी लिखी। जब वे आगंतुकों को इसका प्रदर्शन दिखाते, तो मज़ाक में इसे अपना "इंडियन ऑप्टिकल रोप ट्रिक" कहते थे।
अमेरिका और सिलिकॉन वैली का सफ़र
1955 में पीएचडी पूरी करने के बाद कपानी अमेरिका चले गए और रोचेस्टर विश्वविद्यालय तथा शिकागो के इलिनॉय इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में काम किया। 1960 में उन्होंने ऑप्टिक्स टेक्नोलॉजी इंक की स्थापना की, जो सिलिकॉन वैली की शुरुआती वेंचर-कैपिटल समर्थित कंपनियों में गिनी जाती है। आगे चलकर उन्होंने 1973 में कैप्ट्रॉन और 2000 में K2 ऑप्ट्रॉनिक्स जैसी कंपनियाँ भी बनाईं। उन्होंने कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय (बर्कले और सांता क्रूज़) और स्टैनफ़र्ड में पढ़ाया भी, और उनका शोध लेज़र, बायोमेडिकल उपकरण, सौर ऊर्जा और प्रदूषण निगरानी तक फैला। यूसी सांता क्रूज़ में उनके नाम से उद्यमिता की एक चेयर भी स्थापित है। वे सिख कला और संस्कृति के बड़े संरक्षक भी थे, उन्होंने 1967 में सिख फ़ाउंडेशन की नींव रखी और सैन फ़्रांसिस्को के एशियन आर्ट म्यूज़ियम में सिख गैलरी के लिए बड़ा दान दिया।
क्या आधुनिक संचार उन्हीं की खोज पर टिका है?
यहाँ ईमानदारी से तस्वीर को समझना ज़रूरी है, क्योंकि यही सबसे ज़्यादा भ्रम की जगह है। कपानी की खोज ने तस्वीर भेजने वाली फ़ाइबर तकनीक की नींव रखी और इस क्षेत्र को नाम और पहचान दी। पर आज के इंटरनेट-केबल की बुनियादी रुकावट अलग थी: काँच में रोशनी इतनी जल्दी सोख ली जाती थी कि वह कुछ मीटर बाद ही मर जाती थी। इसे हल करने का श्रेय चार्ल्स काओ को जाता है, जिन्होंने 1966 में दिखाया कि बेहद शुद्ध काँच से दूर तक संकेत ले जाने वाले रेशे बन सकते हैं। 1970 के दशक की शुरुआत में कॉर्निंग की प्रयोगशाला ने ऐसे व्यावहारिक रेशे बनाए।
2009 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार काओ को उनके फ़ाइबर-ऑप्टिक कार्य के लिए मिला। सही यह है कि कपानी उस इमारत की शुरुआती नींव के पत्थरों में थे, और उस इमारत को खड़ा करने वाले कई हाथ थे।
दरअसल, 1960 के दशक में काँच के रेशों में रोशनी इतनी तेज़ी से घट जाती थी कि कुछ दस मीटर बाद संकेत मर जाता था। ब्रिटेन की एक दूरसंचार प्रयोगशाला में काम कर रहे चार्ल्स काओ ने अपने सहयोगी जॉर्ज हॉकम के साथ 1966 में तर्क दिया कि असली दोष काँच की बनावट में नहीं, उसकी अशुद्धियों में है। उनका अनुमान था कि बेहद शुद्ध काँच से रोशनी का नुक़सान इतना घटाया जा सकता है कि संचार संभव हो जाए। 1970 के आसपास कॉर्निंग की टीम ने ऐसा रेशा बनाकर दिखाया। इसके लिए काओ को 2009 के नोबेल का आधा हिस्सा मिला।
समंदर के नीचे की रोशनी
आज दुनिया के महाद्वीपों के बीच का ज़्यादातर इंटरनेट-ट्रैफ़िक उपग्रहों से नहीं, समुद्र की तलहटी में बिछी फ़ाइबर केबलों से गुज़रता है। हर रेशा लेज़र की स्पंदित रोशनी ले जाता है, और लंबी दूरी पर संकेत को बीच-बीच में "ऑप्टिकल एम्प्लिफ़ायर" से दोबारा ताक़त दी जाती है। एक ही रेशे में अलग-अलग रंगों की रोशनी एक साथ भेजकर क्षमता कई गुना बढ़ाई जाती है। भारत के मुंबई और चेन्नई जैसे तटीय शहर ऐसी कई केबलों के उतरने के प्रमुख बिंदु हैं। यानी कपानी की उस मुड़ती रोशनी की कहानी आज आपके हर वीडियो कॉल तक पहुँचती है।
सम्मान, देर से आया
नवंबर 1999 में फ़ॉर्च्यून पत्रिका ने कपानी को 20वीं सदी के सात "अनसंग हीरोज़" में गिना। 4 दिसंबर 2020 को 94 साल की उम्र में कैलिफ़ोर्निया में उनका निधन हुआ, और कुछ ही हफ़्ते बाद, जनवरी 2021 में, भारत ने उन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित करने की घोषणा की। उनकी आत्मकथा The Man Who Bent Light उनके अपने शब्दों में यह सफ़र सँजोती है।
कपानी की कहानी में दो सबक़ साथ चलते हैं। पहला, विज्ञान में खोजने और दुनिया को समझाने का काम अलग-अलग होता है, और दोनों उतने ही ज़रूरी हैं। दूसरा, बड़ी तकनीकें किसी एक दिमाग की उपज नहीं होतीं, उन्हें कई लोग अलग-अलग दशकों में आगे बढ़ाते हैं, और इतिहास अक्सर बाद के नामों को ज़्यादा याद रखता है। पंजाब के एक छोटे क़स्बे से निकलकर लंदन, रोचेस्टर और सिलिकॉन वैली तक पहुँचने वाला यह वैज्ञानिक इसी सच्चाई का नाम है: जो नींव डालता है, उसका नाम अक्सर इमारत पर नहीं खुदता।


