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Navratri Mandir Darshan:नवरात्रि में कहां करें देवी दर्शन? जानें देश के 4 प्रसिद्ध मंदिरों का इतिहास और धार्मिक मान्यताएं
Navratri Mandir Darshan: दिल्ली के छतरपुर, कोलकाता के कालीघाट, उज्जैन के गढ़ कालिका और मैसूर के चामुंडेश्वरी मंदिर का इतिहास व मान्यताएं जानें।
Navratri Mandir Darshan: 4 Famous Devi Temples to Visit During Navratri
Navratri Mandir Darshan: पितृपक्ष के बाद जैसे ही शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होती है, देशभर में श्रद्धालुओं की गहरी आस्था, घंटा - घड़ियाल की पवित्र गूंज और हवन आरती के साथ मंदिरों की रौनक देखते ही बनती है। कहीं मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है तो कहीं शक्तिपीठों में विशेष अनुष्ठान शुरू हो जाते हैं। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु सिर्फ पूजा और व्रत ही नहीं करते, बल्कि देवी के प्रसिद्ध मंदिरों तक पहुंचकर दर्शन भी करते हैं।
भारत में ऐसे कई मंदिर हैं जिनसे सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताएं, पौराणिक कथाएं और स्थानीय परंपराएं जुड़ी हैं। इनमें दिल्ली का छतरपुर मंदिर, कोलकाता का कालीघाट, उज्जैन का गढ़ कालिका मंदिर और मैसूर की चामुंडेश्वरी मंदिर खास हैं। इन मंदिरों की खासियत सिर्फ इनकी धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि इनसे जुड़ा इतिहास और स्थापत्य भी है।
दिल्ली का छतरपुर मंदिर, जहां विराजती हैं मां कात्यायनी
दक्षिण दिल्ली का छतरपुर मंदिर, जिसे श्री आद्या कात्यायनी शक्तिपीठ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, मां दुर्गा के कात्यायनी स्वरूप को समर्पित है। मंदिर की स्थापना संत बाबा नागपाल जी ने की थी और इसका वर्तमान परिसर 1970 के दशक में विकसित हुआ। मंदिर की आधिकारिक जानकारी के अनुसार बाबा नागपाल ने यहां मंदिर का निर्माण शुरू कराया और धीरे-धीरे यह स्थान बड़े धार्मिक परिसर में बदल गया।
मंदिर परिसर की सबसे बड़ी खासियत इसका विशाल फैलाव और अलग-अलग देवी-देवताओं के मंदिर हैं। यहां उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय स्थापत्य शैली का मिश्रण दिखाई देता है। नवरात्रि के दौरान मां कात्यायनी के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर के आसपास का इलाका भी इस दौरान भक्तिमय नजर आता है।
इस मंदिर से जुड़ी एक खास परंपरा श्रद्धालुओं की मनोकामना से जुड़ी है। भक्त अपनी इच्छा पूरी होने की कामना लेकर यहां पूजा-अर्चना करते हैं।
पर्यटन की नजर से देखें तो मंदिर दिल्ली के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है और छतरपुर मेट्रो स्टेशन से भी पहुंचा जा सकता है।
कोलकाता का कालीघाट, जहां जुड़ी है सती के अंग गिरने की मान्यता
कोलकाता का कालीघाट काली मंदिर मां काली को समर्पित देश के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में गिना जाता है। पश्चिम बंगाल पर्यटन विभाग के अनुसार इसे शक्तिपीठ माना जाता है और यहां देवी सती के शरीर के एक अंग के गिरने की धार्मिक मान्यता जुड़ी है। स्थानीय परंपरा में सती के दाहिने पैर की अंगुली के गिरने की बात कही जाती है।
मंदिर की मौजूदा इमारत का इतिहास अपेक्षाकृत नया है। उपलब्ध आधिकारिक पर्यटन जानकारी के अनुसार वर्तमान मंदिर का निर्माण 19वीं शताब्दी की शुरुआत में हुआ था। मंदिर आदि गंगा के किनारे स्थित है और इसके परिसर में नटमंदिर तथा भगवान शिव को समर्पित नकुलेश्वर मंदिर भी है।
कालीघाट की सबसे अलग पहचान यहां विराजमान मां काली की प्रतिमा है। देवी की प्रतिमा में तीन आंखें, चार हाथ और बाहर निकली हुई जीभ दिखाई देती है। स्वर्ण आभूषणों से सजी यह प्रतिमा श्रद्धालुओं के साथ-साथ पर्यटकों का भी ध्यान खींचती है।
नवरात्रि और काली पूजा जैसे अवसरों पर यहां विशेष भीड़ देखने को मिलती है। इसलिए अगर आप धार्मिक यात्रा के साथ कोलकाता की सांस्कृतिक विरासत देखना चाहते हैं, तो कालीघाट को यात्रा में जरूर शामिल करें।
उज्जैन का गढ़ कालिका मंदिर, जहां कालिदास से जुड़ी है मान्यता
मध्य प्रदेश के उज्जैन को भारत के प्रमुख धार्मिक शहरों में गिना जाता है। इसी शहर में स्थित है गढ़ कालिका मंदिर, जो मां कालिका को समर्पित प्राचीन मंदिरों में शामिल है। जिला प्रशासन की वेबसाइट के अनुसार यह मंदिर शहर से करीब चार किलोमीटर दूर है और दोनों नवरात्रियों में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु विशेष पूजा के लिए पहुंचते हैं।
इस मंदिर से जुड़ी सबसे लोकप्रिय मान्यताओं में महाकवि कालिदास का नाम आता है। स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार कालिदास मां कालिका के उपासक थे और उन्होंने यहां साधना की थी। यही वजह है कि मंदिर को विद्या और शक्ति की साधना से भी जोड़कर देखा जाता है।
उज्जैन की धार्मिक यात्रा में गढ़ कालिका मंदिर का अनुभव इसलिए भी अलग है क्योंकि इसके आसपास महाकालेश्वर, काल भैरव और क्षिप्रा नदी जैसे कई महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल हैं। ऐसे में नवरात्रि के दौरान उज्जैन जाने वाले श्रद्धालु अपनी यात्रा में इसे आसानी से शामिल कर सकते हैं।
मैसूर की चामुंडेश्वरी मंदिर, जहां महिषासुर का हुआ था अंत
कर्नाटक के मैसूर की पहचान सिर्फ महल और दशहरा उत्सव से नहीं, बल्कि चामुंडी पहाड़ी पर स्थित चामुंडेश्वरी मंदिर से भी है। सरकारी पर्यटन जानकारी के अनुसार यह मंदिर मैसूर से करीब 13 किलोमीटर दूर चामुंडी पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। देवी चामुंडेश्वरी को मां दुर्गा का उग्र स्वरूप माना जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार महिषासुर नाम के राक्षस से देवताओं और लोगों को बचाने के लिए देवी ने चामुंडेश्वरी का रूप धारण किया और उसका वध किया। इसी वजह से देवी को महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है। मैसूर के नाम को भी इसी पौराणिक कथा से जोड़ा जाता है।
चामुंडी पहाड़ी की यात्रा अपने आप में एक अलग अनुभव है। पहाड़ी पर मंदिर के अलावा विशाल नंदी की प्रतिमा भी आकर्षण का केंद्र है। सरकारी जानकारी के मुताबिक यहां प्राचीन महाबलेश्वर मंदिर भी मौजूद है और इस क्षेत्र का इतिहास कई सदियों पुराना है।
नवरात्रि और मैसूर दशहरा के समय इस क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक रौनक और बढ़ जाती है। पहाड़ी से मैसूर शहर का दृश्य भी पर्यटकों को आकर्षित करता है।
नवरात्रि सिर्फ व्रत और पूजा का पर्व नहीं है। यह भारत की अलग-अलग धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को करीब से देखने का भी अवसर देता है।
अगर इस नवरात्रि आप मंदिर दर्शन के साथ यात्रा का अनुभव भी लेना चाहते हैं, तो इन स्थानों की अपनी अलग पहचान है। बस यात्रा से पहले मंदिर के दर्शन समय, भीड़ और स्थानीय व्यवस्था की जानकारी जरूर ले लें, क्योंकि नवरात्रि में इन धार्मिक स्थलों पर सामान्य दिनों की तुलना में काफी अधिक श्रद्धालु पहुंच सकते हैं।


